मेट्टूर बांध और स्टेनली जलाशय, तमिलनाडु
फोटो: एस. बॉमी | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स
जून से सितंबर 2026 के बीच देश में सामान्य से 12.56 प्रतिशत कम बारिश हुई।
2 नवंबर को मेट्टूर जलाशय में कुल क्षमता का करीब 23 प्रतिशत पानी था। पिछले वर्ष इसी दिन यह लगभग 99 प्रतिशत था।
भवानीसागर में 39 प्रतिशत और वैगई में करीब 36 प्रतिशत पानी उपलब्ध था।
नवंबर की शुरुआत में मेट्टूर, कृष्णराज सागर और काबिनी जैसे कावेरी नदी प्रणाली के प्रमुख जलाशयों में पिछले वर्ष से कम पानी था।
आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता उत्तर-पूर्वी मानसून की बारिश और जलाशयों से पानी छोड़े जाने पर भी निर्भर करेगी।
दक्षिण-पश्चिम मानसून का मौसम सितंबर में समाप्त हो गया। मानसून के दौरान जलाशयों में जमा पानी अगले कई महीनों की जरूरतें पूरी करता है। इससे खेती के लिए सिंचाई होती है। शहरों और गाँवों को पेयजल मिलता है। कई जलाशयों से बिजली भी बनाई जाती है।
लेकिन वर्ष 2026 में दक्षिण भारत के कई प्रमुख जलाशयों में पिछले साल के मुकाबले कम पानी है।
तमिलनाडु कृषि विभाग के जलाशय निगरानी पोर्टल पर 2 नवंबर 2026 को उपलब्ध आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। मेट्टूर जलाशय में कुल क्षमता का करीब 23 प्रतिशत पानी था। पिछले वर्ष इसी दिन यह लगभग पूरी तरह भरा हुआ था। भवानीसागर, वैगई और अलियार में भी पिछले वर्ष के मुकाबले कम पानी दर्ज किया गया।
जलाशयों की स्थिति समझने के लिए इस वर्ष की बारिश को देखना भी जरूरी है। भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के मानसून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 30 सितंबर 2026 के बीच देश में 759.5 मिलीमीटर बारिश हुई। इस अवधि की सामान्य बारिश 868.6 मिलीमीटर है।
केवल जलस्तर के आधार पर पानी की कुल मात्रा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए भंडारण के वास्तविक आंकड़े देखना जरूरी है।
यानी देश में सामान्य से 12.56 प्रतिशत कम बारिश हुई। लेकिन पूरे देश की बारिश का औसत दक्षिण भारत के सभी हिस्सों की स्थिति नहीं बताता। किसी जिले या नदी बेसिन में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्र में कम।
जलाशय में कितना पानी होगा, यह केवल उसके आसपास हुई बारिश से तय नहीं होता। इसके लिए जलग्रहण क्षेत्र में कितनी बारिश हुई, यह जानना जरूरी है। जलग्रहण क्षेत्र वह इलाका है जहां से बारिश का पानी बहकर नदी या जलाशय तक पहुँचता है।
इसके अलावा नदियों से आने वाला पानी और सिंचाई, पेयजल तथा बिजली उत्पादन के लिए छोड़ा गया पानी भी भंडारण को प्रभावित करता है। इसलिए किसी जलाशय में पानी कम होने की वजह जानने के लिए बारिश और जलाशय के संचालन, दोनों के आंकड़े देखने होंगे। क्षेत्रवार बारिश की जानकारी भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वर्षा पोर्टल पर उपलब्ध है।
नवंबर की शुरुआत में दक्षिण भारत के कई जलाशयों में पिछले साल से काफी कम पानी था। तमिलनाडु कृषि विभाग के 2 नवंबर 2026 के आंकड़ों में मेट्टूर, भवानीसागर, वैगई और अलियार जैसे जलाशयों में बड़ी कमी दिखाई देती है।
| जलाशय | 2 नवंबर 2026 | 2 नवंबर 2025 |
|---|---|---|
| मेट्टूर | 23.10% | 99.20% |
| कृष्णराज सागर | 51.90% | 100.00% |
| काबिनी | 69.40% | 99.40% |
| भवानीसागर | 38.80% | 93.90% |
| वैगई | 35.50% | 92.00% |
| अलियार | 16.50% | 98.60% |
स्रोत: तमिलनाडु कृषि विभाग, प्रमुख जलाशयों का भंडारण और जल प्रवाह, 2 नवंबर 2026। प्रतिशत कुल क्षमता और उपलब्ध भंडारण से निकाले गए हैं।
सभी आँकड़े 2 नवंबर के हैं। इसलिए पिछले साल की इसी तारीख से तुलना की गई है। तालिका से स्पष्ट है कि जलाशयों में पानी की उपलब्धता एक जैसी नहीं है। मेट्टूर और अलियार में कुल क्षमता का एक-चौथाई से भी कम पानी था। वहीं काबिनी में लगभग 69 प्रतिशत पानी उपलब्ध था। इसकी वजह समझने के लिए हर जलाशय की बारिश और जल निकासी के आंकड़े देखने होंगे।
मेट्टूर तमिलनाडु का महत्वपूर्ण जलाशय है। कावेरी नदी पर बने इस बांधध का पानी सिंचाई और दूसरी जरूरतों के लिए इस्तेमाल होता है।
राज्य सरकार के 2 नवंबर के आंकड़ों के अनुसार, मेट्टूर की कुल क्षमता 93,470 मिलियन घनफुट है। इस दिन इसमें 21,583 मिलियन घनफुट पानी उपलब्ध था।
पिछले वर्ष इसी दिन जलाशय में 92,708 मिलियन घनफुट पानी था। यानी एक वर्ष के अंतर पर तुलना करें तो उपलब्ध पानी की मात्रा लगभग 77 प्रतिशत कम थी। इसी अवधि में जलाशय का जलस्तर भी काफी अलग था। 2 नवंबर 2026 को यह 55.69 फुट था, जबकि पिछले वर्ष इसी दिन 119.52 फुट दर्ज किया गया था।
लेकिन केवल जलस्तर के आधार पर पानी की कुल मात्रा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए भंडारण के वास्तविक आंकड़े देखना जरूरी है। मेट्टूर में पानी की कमी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कावेरी से जुड़ी सिंचाई व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा है।
हालांकि, सिंचाई पर वास्तविक असर जानने के लिए यह भी देखना होगा कि जलाशय से कितना पानी छोड़ा जा रहा है और आने वाले महीनों के लिए कितना पानी तय किया गया है।
मेट्टूर के अलावा तमिलनाडु के दूसरे प्रमुख जलाशयों में भी पिछले वर्ष से कम पानी था।
2 नवंबर के सरकारी रिकॉर्ड में भवानीसागर जलाशय की कुल क्षमता 32,800 मिलियन घनफुट दर्ज है। इसमें 12,731 मिलियन घनफुट पानी था।
पिछले वर्ष इसी दिन यहां 30,813 मिलियन घनफुट पानी उपलब्ध था। यानी इस साल भंडारण पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 59 प्रतिशत कम था।
वैगई जलाशय में भी यही स्थिति दिखाई दी। इसकी कुल क्षमता 6,091 मिलियन घनफुट है। 2 नवंबर को इसमें 2,164 मिलियन घनफुट पानी था, जबकि पिछले वर्ष इसी दिन 5,601 मिलियन घनफुट पानी उपलब्ध था।
अलियार में तो कुल क्षमता का केवल 16.5 प्रतिशत पानी था। पिछले वर्ष इसी समय यह लगभग पूरी तरह भरा हुआ था। ये आंकड़े दिखाते हैं कि मानसून के बाद भी कई जलाशय पिछले वर्ष के मुकाबले काफी कम भरे हैं।
मानसून के बाद दक्षिण भारत के कई कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए जलाशयों का पानी इस्तेमाल होता है। जहां नहरों से सिंचाई होती है, वहां पानी की उपलब्धता जलाशयों के भंडारण और निर्धारित जल आवंटन पर निर्भर करती है।
लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन सभी जलाशयों में कम पानी होने का कारण केवल मानसून में कम बारिश है। इसके लिए संबंधित जलग्रहण क्षेत्रों की बारिश और जलाशयों से छोड़े गए पानी के आंकड़ों का मिलान जरूरी है।
कावेरी नदी बेसिन कर्नाटक और तमिलनाडु के बड़े कृषि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। मेट्टूर, कृष्णराज सागर और काबिनी जैसे प्रमुख जलाशय इसी नदी प्रणाली से जुड़े हैं।
तमिलनाडु कृषि विभाग के 2 नवंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, इन तीनों जलाशयों में पिछले वर्ष के मुकाबले कम पानी था। मेट्टूर में कुल क्षमता का केवल 23.1 प्रतिशत पानी था। कृष्णराज सागर में 51.9 प्रतिशत और काबिनी में 69.4 प्रतिशत पानी उपलब्ध था।
इन आँकड़ों से पता चलता है कि एक ही नदी बेसिन के जलाशयों में पानी की स्थिति अलग-अलग हो सकती है। हालांकि, इसका कारण जानने के लिए जलग्रहण क्षेत्र की बारिश, नदियों से आने वाले पानी और जलाशयों से छोड़े गए पानी के आँकड़े भी देखने होंगे।
बड़े जलाशयों का भंडारण पूरे नदी बेसिन में उपलब्ध पानी की जानकारी नहीं देता। इसके लिए छोटे बांधध, तालाब और भूजल स्रोतों की स्थिति देखना भी जरूरी है।
मानसून के बाद दक्षिण भारत के कई कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए जलाशयों का पानी इस्तेमाल होता है। जहां नहरों से सिंचाई होती है, वहां पानी की उपलब्धता जलाशयों के भंडारण और निर्धारित जल आवंटन पर निर्भर करती है।
जलाशयों में कम पानी होने से सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन दक्षिण भारत के सभी हिस्सों में खेती का मौसम एक जैसा नहीं है। तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में उत्तर-पूर्वी मानसून की बारिश भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए केवल नवंबर की शुरुआत के जलाशय आंकड़ों से पूरे सिंचाई मौसम की स्थिति तय नहीं की जा सकती।
इसके लिए देखना होगा कि आगे कितनी बारिश होती है, जलाशयों में कितना पानी पहुंचता है और सिंचाई के लिए कितनी मात्रा छोड़ी जाती है। यदि नहरों से पानी कम मिलता है, तो कुछ क्षेत्रों में किसानों की भूजल पर निर्भरता बढ़ सकती है। इससे उन इलाकों में दबाव बढ़ेगा जहां भूजल स्तर पहले से नीचे है।
दक्षिण भारत के कई शहरों और कस्बों को बड़े जलाशयों से पेयजल मिलता है। ऐसे में जल भंडारण की स्थिति जलापूर्ति की योजना के लिए भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन किसी जलाशय में कम पानी होने से यह नहीं माना जा सकता कि उससे जुड़े सभी क्षेत्रों में तत्काल पेयजल संकट है।
पानी की उपलब्धता स्थानीय जल स्रोतों, जलापूर्ति व्यवस्था और रोजाना की जरूरत पर भी निर्भर करती है।
कम भंडारण वाले क्षेत्रों में आने वाले महीनों की माँग का आकलन करना जरूरी है। साथ ही पाइपलाइन में रिसाव और पानी की बर्बादी कम करने से भी मदद मिल सकती है।
दक्षिण भारत के कई हिस्सों, खासकर तमिलनाडु में अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली उत्तर-पूर्वी मानसून की बारिश महत्वपूर्ण है। यह बारिश जलाशयों में पानी बढ़ा सकती है। लेकिन इसका असर अलग-अलग जलग्रहण क्षेत्रों में हुई वर्षा पर निर्भर करेगा। इसलिए नवंबर की शुरुआत के आंकड़े आने वाले पूरे मौसम की स्थिति तय नहीं करते।
अब नवंबर-दिसंबर की बारिश, जलाशयों में आने और छोड़े जाने वाले पानी तथा सिंचाई और पेयजल के लिए तय हिस्से पर नजर रखना जरूरी होगा।
केंद्रीय जल आयोग, भारत मौसम विज्ञान विभाग और राज्य सरकारों के जलाशय भंडारण रिकॉर्ड से इन बदलावों पर नजर रखी जा सकती है। फिलहाल नवंबर की शुरुआत के आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण भारत के कई बड़े जलाशयों में पिछले वर्ष के मुकाबले काफी कम पानी है। खासकर मेट्टूर, भवानीसागर और वैगई की स्थिति ध्यान देने योग्य है।
आगे कितनी बारिश होती है और जलाशयों से कितना पानी छोड़ा जाता है, इससे आने वाले महीनों की स्थिति तय होगी। इसलिए जलाशयों के भंडारण के साथ स्थानीय जरूरतों और पानी के आवंटन पर भी नजर रखना जरूरी होगा।
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