बालिकुमा गॉंव का प्राचीन कुआं  

 

फोटो - बृजेंद्र दुबे 

जल संरक्षण

ओडिशा के इस गांव में निजी कुएं का पानी भी सबका है, जानिए कैसे?

जल संकट से जूझती दुनिया के बीच ओडिशा का बालिकुमा गांव साझेदारी की मिसाल पेश करता है। यहां पाइपों का नेटवर्क निजी कुओं को खेतों और घरों से जोड़ता है, जिससे हर परिवार तक पानी पहुंचता है।

Author : बृजेंद्र दुबे

सुबह के उगते सूरज की सुनहरी रोशनी बालिकुमा गॉंव के सोना सोरेन के धान के खेत पर पड़ रही थी। खेत में किसान व मज़दूर अपने काम में मगन थे। टमाटर के खेत में पौधों के बीच लगी घास को निकाल कर खेत की निराई-गोड़ाई की जा रही थी। खेत के बगल में एक तालाब में गॉंव के लड़के नहा रहे थे। इसी तालाब का पानी टमाटर के खेत में पहुंच रहा था।

बालिकुमा गॉंव में पानी के बंटवारे की एक अनोखी व्यवस्था है, जिसके तहत कई सालों से खेतों की सिंचाई होती आ रही है। यहां पानी सभी का है, भले ही वह निजी कुएं में ही क्यों न हो। हरे रंग से रंगे पानी के पाइप गॉंव की सड़कों और गलियों से होकर गुजरते हैं, जो कुओं को खेतों और घरों से जोड़ते हैं। सच पूछ‍िए तो तेजी से गर्म हो रही पृथ्‍वी पर पानी के बंटवारे का यह तरीका बेहद अनोखा है। बंटवारे की इस प्रथा से तमाम गॉंव वालों को दूर-दराज़ से पानी लाने से मुक्त‍ि मिली है। 

बालिकुमा गॉंव के पास वन क्षेत्र 

पूरा दिन निकल जाता था जंगल से पानी लाने में 

ओडिशा देश के सबसे अधिक सूखाग्रस्त राज्यों में से एक है और बालिकुमा, ओडिशा के ढेंकानाल जिले में स्थित 120 घरों में रहने वाले 650 परिवारों का एक छोटा सा गॉंव है। ओडिशा देश के सबसे अधिक सूखाग्रस्त राज्यों में से एक है। गॉंव के लगभग आधे पुरुष वर्षों से काम की तलाश में शहरों या पास के जिलों में मजदूरी करने जाते हैं, जहाँ कोयला खदानें और इस्पात कारखाने हैं।

उनके पीछे गॉंव में केवल महिलाएं ही रह जाती थीं, जिनके कई घंटे पानी लाने में ही लग जाते थे। एक तरफ जंगलों की रक्षा करने की जिम्मेदारी तो दूसरी तरफ पानी लाने का बोझ। जब से गॉंव में पाइप के जरिये पानी पहुंचाने की व्यवस्था हुई है, जब से खेती से होने वाली उपज पलायन करने वाले मजदूरों को एक नियमित आमदनी देने लगी है। साथ ही पानी के लिए दिनभर जद्दोजहद करने वाली गॉंव की महिलाओं की जिंदगी भी आसान हुई है। 

"एक जल संरक्षण परियोजना" ने बालिकुमा और इसके जैसे ओडिशा के 8 जिलों के 45 ब्लॉक के 1600 अन्य गॉंव की स्थिति में बड़ा बदलाव ला दिया। अब ये गॉंव एक तरह से मिसाल बन गए हैं। इस परियोजना के चलते सोना सोरेन और उनके परिवार को जंगल से पानी लाने की मेहनत से मुक्ति मिली। और तो और नियमित पानी मिलने से खेतों की उपज बढ़ी और आमदनी भी। 

बालिकुमा गॉंव के लोग आपस में बातचीत करते हुए 

"एक जल संरक्षण परियोजना" से क्या-क्या बदलाव हुए 

पानी के सही बंटवारे को लेकर शुरू की गई एक जल संरक्षण परियोजना से बालिकुमा गॉंव में निम्न बदलाव हुए -  

  • पहले गॉंव में एक सामुदायिक कुआं था अब 15 कुएं हो गए हैं। 

  • ग्रामीणों ने बारिश का पानी इकट्ठा करने और उसे जमीन में रिसने देने के लिए 16 तालाब खोदे और झीलों की साफ-सफाई की गई। 

  • तालाब खोदने से भूजल का जलस्तर बढ़ गया, इसके चलते आस-पास की झीलों में भी पानी बढ़ गया।  

  • गॉंव में जितने भी निजी कुएं थे, उन्हें सार्वजनिक कर दिया गया, यानी गॉंव का कोई भी व्यक्ति उनसे पानी भर सकता है। 

  • महिलाएं पहले रोज मीलों पैदल चलकर पानी के घड़े अपने सिर पर रखकर लाती थीं। वे गॉंव के इकलौते सामुदायिक कुएं, सामुदायिक झरने पर पानी भरने के लिए अपनी बारी का इंतजार करती थीं, लेकिन अब गॉंव में ही पानी उपलब्ध है। 

  • हर साल मार्च से जून या जुलाई तक लगभग सभी कुएं सूख जाते थे। लेकिन तालाबों की वजह से भूजल के स्तर में सुधार हुआ और अब कुओं में पानी निरंतर बना रहता है।

  • गॉंव में बोरवेल भी लगाये गए, ताकि पानी निकालना सुलभ हो सके।   

  • सबसे बड़ा बदलाव गॉंव की सामुदायिक जीवनशैली में बहुत बड़ा परिवर्तन आया, अब ऐसा लगता है सब एक दूसरे के साथ हैं और एक दूसरे के लिए हैं। 

बालिकुमा गॉंव का तालाब जो ग्रामीणों ने बनाया 

दरअसल निजी कुओं से भी पानी साझा करने के मामले में ग्रामीणों का सामुदायिक जीवन शैली पर आधारित है, लेकिन इससे भी अधिक जल संरक्षण परियोजना को अपनाने के लिए उनके निर्णय से प्रभावित है, जिसमें राज्य सरकार, एक गैर-लाभकारी व्यावहारिक दृष्टिकोण से सामुदायिक जीवन की पारंपरिक शैली पर आधारित है। सोना सोरेन ने बताया कि अब उन्हें घर में पानी लाने के लिए बस एक बटन चालू करना होता है।

पानी की धार से महिलाओं के जीवन में हुआ सुधार

एक समय था जब महिलाएं दिन भर पानी के लिए संघर्ष करती थीं, अब पानी की धार से महिलाओं के जीवन में व्यापक सुधार आया है। यह सब संभव हुआ गैर-लाभकारी संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सोसाइटी (FES) की एक पहल से। 

28 वर्षीय सोना सोरेन वह अपने हरे-भरे तीन एकड़ के खेत की ओर इशारा करते हुए बीते दिनों को याद करती हैं और बताती हैं, "दस साल पहले जब मेरी शादी हुई और मैं बालिकुमा आई, तब ऐसा नहीं था। धान की अच्छी फसल लगाई है। पिछले साल तीन एकड़ में धान बेचा है 1,20000 रुपये में। मेरे माता-पिता के घर में कुआं था, लेकिन इस गॉंव में पानी का संकट था। मेरे पति के परिवार के पास खेत तो था, लेकिन सिंचाई का कोई साधन नहीं था।" 

बालिकुमा गॉंव का तालाब 

एक समय था जब सोना खाना पकाने और नहाने के लिए सामुदायिक झरने से पानी भरती थीं। उन्होंने कहा, "हम लंबी कतारों में खड़े रहते थे। रात से ही जंगल से होकर सामुदायिक चूआड़ तक जाना पड़ता था, हर कोई सामुदायिक झरने के आसपास जमा हो जाता था और अक्सर झगड़े हो जाते थे। कभी-कभी जंगली जानवर भी गॉंव वालों के ऊपर हमला कर देते थे। हमने बहुत कठिन समय देखा है।"

कैसे एक शुष्क क्षेत्र में बना जलसंभर 

गॉंव में काम करने वाले FES के कार्यकर्ताओं ने करीब डेढ़ दशक पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए बताया कि 2008 में जब उन्होंने पहली बार गॉंव का दौरा किया था, तो यहां कएं सूख चुके थे और उनके भीतर पेड़ और झाड़ियां उग रही थीं। FES का मिशन राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के लिए इस शुष्क क्षेत्र में एक जलसंभर परियोजना को लागू करने का था। नाबार्ड की यह परियोजना महज़ 36 लाख रुपये की थी। यहां के लोगों की आमदनी भी बहुत कम थी। 

बालिकुमा निवासी बीजू टुडू ने याद करते हुए कहा, "खेती-बाड़ी कम होती थी और फसल का सही दाम नहीं मिलता था। घर खर्च चलाने के लिए हमारे घर के लोग अंगुल जिले की खदानों में आदमी लोग काम करते थे या कलकत्ता, चेन्नई जैसे दूर के शहरों में दिहाड़ी मजदूरी करते थे।” 

बालिकुमा गॉंव में पानी की व्यवस्था 

दुर्गा चरण सोरेन की 54 वर्षीय मां रूपी सोरेन और गॉंव की अन्य महिलाएं दिन का अच्छा-खासा समय पानी लाने में ही बिताती थीं। सुबह 5 बजे उठकर खाना पकाने और बर्तन धोने जैसे घरेलू काम निपटाती थीं और फिर पानी लाने के लिए निकल पड़ती थीं। दुर्गा चरण ने कहा, “मां दिन भर कुएं से पानी लाती रहती थी।"

इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए महिलाओं को शामिल करना अत्यंत महत्वपूर्ण था, न केवल इसलिए कि वे पानी का उपयोग वही करती थीं, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें पानी लाने में सबसे अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता था। परियोजना का उद्देश्य इसका लाभ उठाकर पानी को एक साझा संसाधन के रूप में उपयोग करने के विचार को बढ़ावा देना था।

बालिकुमा गॉंव के खेत 

ढेंकानाल में तैनात और इस परियोजना के अधिकारी द्रोण चंद्राकर FES में सीनियर मैनेजर ने कहा, “ग्रामीण जनजाति आदिवासी समुदाय के लिए पानी गहने के समान है। जितना अधिक पानी होगा, पैसा कमाने की संभावना उतनी ही बेहतर होगी। "आदमी चीजों को लाभ और हानि के नजरिए से देखते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए पानी जिंदगानी है।"

परियोजना के लिए महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन साथ ही यह सबसे बड़ी चुनौती भी थी, क्योंकि गॉंव में जनजाति आदिवासी समुदाय की महिलाएं शायद ही कभी अपना पक्ष रख पातीं।

परियोजना के अधिकारियों ने बालिकुमा में कई बार दौरा किया और लगभग दो वर्षों तक लगातार बैठकें आयोजित करके गॉंव के लोगों को परियोजना से होने वाले लाभों और सामूहिक रूप से जल उपयोग के तरीकों के बारे में समझाया। ग्रामीणों को शुरू में ही बता दिया गया था कि उन्हें तत्काल लाभ की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, क्‍योंकि लाभ लंबे समय में ही मिलेंगे। 

ढेंकनाल का बालिकुमा गॉंव जो साफ-सफाई की भी मिसाल है 

FES ओडिशा के अंगुल, कोरापुट, ढेंकनाल, क्योंझर, बलांगीर, देवगढ़, संबलपुर और नयागढ़ जिले में काम कर रहा है। इसके कामों से ओडिशा  के 45 ब्लॉक के 1600 गॉंवों में पानी को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जल संचय के आवश्यक ढांचे बन जाने के बाद, परियोजना को लागू करने वाले लगभग गॉंवों में से प्रत्येक में एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया। मरम्मत और रखरखाव के कार्यों के लिए प्रत्येक समिति को नाबार्ड द्वारा बैंक में सावधि जमा यानी एफडी के रूप में लगभग 5 लाख रुपये जमा किए गए। इस धनराशि में योगदान देने के लिए समुदाय को भी संगठित किया गया। बालिकुमा के ग्रामीणों ने परियोजना पूरी होने के बाद भी अपने अनुभव का लाभ उठाते हुए और अधिक तालाब और कुएं खोदकर एक-एक कदम आगे बढ़ाया। 

परिणामों का इंतजार लगभग पांच साल पहले खत्म हुआ था

बालिकुमा गॉंव के ग्रामीण बीजू टुडू कहते हैं कि पिछले तीन-चार वर्षों में यहां के किसानों की कृषि उपज में सुधार हुआ है। हम जो कुछ भी उगाते हैं, उसे बेच पाते हैं। अब पानी का कोई संकट नहीं है। यह मेरा कुआं नहीं है, लेकिन मैं इससे पानी लेती हूं, सोना सोरेन ने पड़ोसी खेत के कुएं की ओर इशारा करते हुए कहा, जिससे उनके खेत में सब्जियां भरपूर मात्रा में उगती हैं। बालिकुमा के लिए जो चीज कारगर साबित हुई, वह केवल कुओं की खुदाई और निर्माण ही नहीं था, बल्कि जल भंडारों का पुनर्भरण भी था।

बालिकुमा - ढेंकनाल का एक खुशहाल गॉंव जहां लोग पानी के लिए नहीं लड़ते 

सभी खुले कुओं का जीर्णोद्धार किया गया। मिट्टी के कटाव को रोकने और भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए आस-पास के जंगलों की परिधि पर पत्थरों से बने तटबंध बनाए गए। परिणामस्वरूप, बंजर भूमि उपजाऊ हो गई। 

"FES और नाबार्ड के गॉंवों से संबंधित आंकड़ों के अनुसार ग्रामीणों द्वारा निर्मित जल संरक्षण संरचनाएं भूमिगत जल को रिचार्ज कर रही हैं। बालिकुमा की यह मिसाल बताती है कि भूजल भारत की जीवन-रेखा है। अगर इस समुदाय द्वारा किए जा रहे तरीके से इसका उपयोग किया जाए, तो जल संकट पर विजय पाई जा सकती है। पानी की साझेदारी के इस मॉडल को पूरे देश में समान रूप से लागू करके टिकाऊ तरीके से पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

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