फ़ोटो: अजय मोहन
प्रस्तावित बीज विधेयक, 2025 मौजूदा बीज अधिनियम, 1966 और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 की जगह लेने के लिए तैयार किया गया है।
इसमें बीज की गुणवत्ता, पंजीकरण और उसके स्रोत से लेकर बिक्री तक की जानकारी यानी ट्रेसबिलिटी (Traceability) पर जोर है।
भारत में ऐसी फसल किस्में विकसित की जा रही हैं जो कम पानी, सूखे, बाढ़ और जलभराव जैसी स्थितियों का सामना कर सकें।
प्रस्तावित कानून में बीज की पानी की जरूरत या सूखा-सहनशीलता की जानकारी किसान को देना स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं किया गया है।
देश में बीजों की गुणवत्ता और उनकी बिक्री को नियंत्रित करने वाला करीब छह दशक पुराना कानून बदलने की तैयारी है। केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में बीज विधेयक, 2025 का मसौदा सार्वजनिक किया था। प्रस्तावित कानून मौजूदा बीज अधिनियम, 1966 और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 की जगह लेगा। सरकार के मुताबिक नए कानून का मकसद बाजार में अच्छे बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करना और नकली या घटिया बीजों की बिक्री रोकना है। इसके साथ यह भी तय करने की कोशिश है कि खराब बीज मिलने पर जिम्मेदारी किसकी होगी।
सितंबर 2026 में सरकार ने किसान संगठनों के साथ प्रस्तावित कानून पर फिर बातचीत शुरू की। इसमें बीजों के पंजीकरण, QR कोड के जरिए उनकी ट्रेसबिलिटी, नकली बीजों पर सख्त कार्रवाई और किसानों के पारंपरिक बीजों से जुड़े अधिकारों जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
लेकिन बदलती जलवायु और बढ़ते जल संकट के बीच बीज से जुड़ा एक दूसरा सवाल भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। किसान जिस किस्म का बीज खरीद रहा है, क्या उसे यह भी पता होना चाहिए कि उस किस्म को कितने पानी की जरूरत है? वह सूखे या कम बारिश को कितना सह सकती है? ज्यादा बारिश या जलभराव वाले इलाके में वह किस्म कितनी कारगर होगी?
यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश में अब ऐसी किस्में विकसित की जा रही हैं जो कम पानी, सूखे, बाढ़, जलभराव या ज्यादा गर्मी में भी बेहतर ढंग से टिक सकें। नया कानून बीज की पहचान, गुणवत्ता और उसके स्रोत की जानकारी किसान तक पहुंचाने की बात करता है। ऐसे में क्या किसान को यह भी बताया जा सकता है कि उस बीज को कितना पानी चाहिए और वह किस तरह के मौसम के लिए ठीक है?
देश में बीजों की गुणवत्ता और बिक्री से जुड़े मौजूदा नियम बीज अधिनियम, 1966, बीज नियम, 1968 और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 हैं। बीते छह दशकों में खेती और बीज बाजार दोनों में काफी बदलाव आया है। निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ी है, नई किस्में और संकर बीज (Hybrid Seeds) बाजार में आए हैं और बीजों की खरीद-बिक्री का दायरा भी बढ़ा है।
सितंबर 2026 में किसान संगठनों के साथ हुई बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मौजूदा बीज अधिनियम के दायरे से करीब 70 प्रतिशत बीज बाहर हैं। उनके मुताबिक राज्यों में बीजों से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी अंतर है और मौजूदा कानून में दंड के प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं। सरकार का कहना है कि नकली और घटिया बीजों पर प्रभावी कार्रवाई तथा जिम्मेदारी तय करने के लिए नए और ज्यादा सख्त नियमों की जरूरत है। इस बैठक और प्रस्तावित प्रावधानों की जानकारी कृषि मंत्रालय की 10 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में दी गई है।
सरकार ने नवंबर-दिसंबर 2025 में मसौदे पर सुझाव मांगे थे। कृषि मंत्रालय के मुताबिक किसानों और किसान संगठनों की ओर से करीब 18 हजार सुझाव मिले। सितंबर 2026 में परामर्श प्रक्रिया फिर शुरू की गई। फिलहाल कानून को अंतिम रूप देने की कोई समयसीमा तय नहीं की गई है।
प्रस्तावित व्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा बीजों के पंजीकरण और ट्रेसबिलिटी से जुड़ा है। सरकार के मुताबिक बाजार में बिक्री के लिए आने वाले बीज और रोपण सामग्री (Planting Material) का पंजीकरण किया जाएगा और उनकी जानकारी राष्ट्रीय रजिस्टर में रखी जाएगी।
इसके साथ बीज के पैकेट पर QR कोड लगाने की व्यवस्था प्रस्तावित है। सरकार का कहना है कि इसे स्कैन करके यह पता लगाया जा सकेगा कि बीज कहां तैयार हुआ, किसने बनाया, उसकी जांच कहां हुई और वह किन रास्तों से किसान तक पहुंचा। इसका उद्देश्य यह है कि बीज खराब निकलने की स्थिति में उसकी सप्लाई चेन का पता लगाया जा सके और जिम्मेदारी तय करना आसान हो।
केंद्र सरकार बीज प्रमाणीकरण, ट्रेसबिलिटी और समग्र भंडार (SATHI) पोर्टल पहले ही शुरू कर चुकी है। इसके जरिए बीज तैयार होने से लेकर किसान तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया का डिजिटल रिकॉर्ड रखने की कोशिश की जा रही है।
सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य बीज की सप्लाई चेन में बीज तैयार होने से लेकर किसान तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया का डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराना और नकली या घटिया बीजों की बिक्री रोकने में मदद करना है। नए कानून में इस व्यवस्था को बीज बाजार के नियमों का हिस्सा बनाने की तैयारी है।
राज्यों को भी स्थानीय जलवायु और क्षेत्रीय जरूरतों के अनुकूल नई किस्मों को राज्य स्तरीय समितियों की सिफारिश पर जारी करने की अधिक भूमिका देने का प्रस्ताव है। हालांकि राष्ट्रीय मानक लागू रहेंगे और किस्मों का रिकॉर्ड राष्ट्रीय ऑनलाइन रजिस्टर में रखा जाएगा।
प्रस्तावित कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल किसानों के पारंपरिक और अपने खेत में बचाए गए बीजों का भी है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसान अपने पारंपरिक और किसान किस्मों (Farmer Varieties) के बीजों का इस्तेमाल, आदान-प्रदान और बिक्री पहले की तरह कर सकेंगे। पारंपरिक बीजों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा। किसान चाहें तो अपनी किस्मों का स्वैच्छिक पंजीकरण करा सकेंगे।
किसानों को अपने खेत में पैदा हुए बीज को बचाने, इस्तेमाल करने, बोने, दोबारा बोने, साझा करने और आदान-प्रदान करने के अधिकार पहले से पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत भी मिले हुए हैं। फरवरी 2026 में राज्यसभा में दिए गए जवाब में कृषि मंत्रालय ने इन अधिकारों की फिर पुष्टि की थी। इससे जुड़ी जानकारी कृषि मंत्रालय के इस जवाब में उपलब्ध है।
नए कानून का एक प्रमुख उद्देश्य खराब और नकली बीजों के मामले में जिम्मेदारी तय करना है।
सरकार के सितंबर 2026 के प्रस्ताव के अनुसार मामूली उल्लंघन, जानबूझकर किए गए उल्लंघन और गंभीर अपराधों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाएगा। नकली बीज बेचने, बिना पंजीकरण कारोबार करने या जानबूझकर धोखाधड़ी जैसे गंभीर मामलों में 30 लाख रुपये तक जुर्माना और जेल प्रस्तावित है।
इसके साथ हर राज्य में बीज सुरक्षा कोष (Seed Security Fund) बनाने की बात कही गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार बीज खराब होने से किसान को नुकसान होने पर जांच के बाद 15 दिन के भीतर मुआवजा दिलाने की व्यवस्था की जाएगी। किसान के पास उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत मुआवजा मांगने का अधिकार भी बना रहेगा। इन प्रस्तावों का विवरण कृषि मंत्रालय की सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में दिया गया है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसान अपने पारंपरिक और किसान किस्मों (Farmer Varieties) के बीजों का इस्तेमाल, आदान-प्रदान और बिक्री पहले की तरह कर सकेंगे। पारंपरिक बीजों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा। किसान चाहें तो अपनी किस्मों का स्वैच्छिक पंजीकरण करा सकेंगे।
लेकिन किसान के लिए सही बीज का अर्थ केवल यह नहीं है कि बीज असली हो और उसका अंकुरण अच्छा हो। जिस इलाके में उसे बोया जा रहा है, वहां की मिट्टी, बारिश, तापमान और सिंचाई की उपलब्धता भी यह तय करती है कि वह किस्म कितनी सफल होगी।
हर फसल और उसकी हर किस्म को एक जैसा पानी नहीं चाहिए। कुछ किस्में कम पानी में भी अच्छी फसल दे सकती हैं। कुछ सूखे को बेहतर ढंग से सहती हैं। वहीं कुछ किस्में ज्यादा बारिश, बाढ़ या जलभराव वाले इलाकों के लिए तैयार की जाती हैं।
धान इसका अच्छा उदाहरण है। कृषि मंत्रालय के अनुसार 2014 से 2024 के बीच देश में धान की 668 किस्में विकसित की गईं। इनमें 199 किस्में चरम जलवायु परिस्थितियों को सहने में सक्षम बताई गई हैं। इनमें 103 किस्में सूखा और पानी की कमी (Water Stress) सहने वाली हैं, जबकि 50 किस्में बाढ़, गहरे पानी या जलमग्न होने की स्थिति को सहने के लिए विकसित की गई हैं। इससे जुड़ी जानकारी जलवायु-सहनशील धान की किस्मों पर कृषि मंत्रालय के आंकड़ों में उपलब्ध है।
यानी किसान कौन-सा बीज चुनता है, इसका संबंध केवल उपज से नहीं बल्कि उसके इलाके में पानी की उपलब्धता और मौसम की परिस्थितियों से भी हो सकता है।
यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब बारिश का स्वरूप बदल रहा हो और खेती को कहीं सूखे तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ रहा हो।
पिछले कुछ वर्षों में ऐसी फसल किस्में विकसित करने पर जोर बढ़ा है जो बदलते मौसम और मुश्किल परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सह सकें।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR ने 2014 से 2024 के बीच कुल 2,900 फसल किस्में जारी कीं। इनमें 2,661 किस्मों को सूखा, गर्मी, बाढ़, बीमारियों या कीटों जैसी एक या अधिक मुश्किल परिस्थितियों को सहने में सक्षम बताया गया है। सरकार के अनुसार राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार कार्यक्रम (NICRA) के तहत सूखा, बाढ़ और गर्मी सहने वाली 298 किस्मों को किसानों के खेतों तक ले जाया गया। इसके लिए 151 जलवायु-संवेदनशील जिलों के 448 गांव चुने गए।इससे जुड़े आंकड़े राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन पर कृषि मंत्रालय की जानकारी में दिए गए हैं।
फरवरी 2026 में सरकार ने एक और अपडेट में बताया कि 2014 से 2025-26 के बीच खेतों की फसलों की 3,236 अधिक उपज देने वाली किस्में जारी और अधिसूचित की गईं। इनमें 2,996 किस्मों को जलवायु की मुश्किल परिस्थितियों को सहने में सक्षम (Climate-resilient) बताया गया। सरकार अलग-अलग इलाकों की मिट्टी, मौसम और जलवायु के हिसाब से ऐसी किस्में विकसित करने के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों को मदद भी देती है।
नई किस्में विकसित करते समय स्थानीय मौसम और सूखा, बाढ़ या गर्मी जैसी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जा रहा है। लेकिन अगला सवाल यह है कि इस जानकारी का कितना हिस्सा किसान को उस समय आसानी से मिलता है, जब वह बाजार से बीज खरीद रहा होता है।
यहीं प्रस्तावित बीज कानून और पानी के सवाल के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। बीज विधेयक, 2025 के मसौदे में बीज की गुणवत्ता, पंजीकरण और उसके स्रोत की जानकारी पर जोर है। इसमें कंपनियों की जिम्मेदारी और किसानों के अधिकारों की भी बात है।
लेकिन किसान को यह बताना जरूरी नहीं किया गया है कि किसी किस्म को कितना पानी चाहिए। वह सूखा या जलभराव कितना सह सकती है, इसकी जानकारी देना भी अनिवार्य नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी जानकारी मौजूद नहीं है। नई किस्म तैयार करते समय कृषि अनुसंधान संस्थान यह दर्ज करते हैं कि फसल कितने दिन में तैयार होगी, उसकी संभावित पैदावार कितनी है और वह किन इलाकों के लिए ठीक है। कई किस्मों के मामले में यह भी बताया जाता है कि वे सूखा, बाढ़, जलभराव, गर्मी या मिट्टी में अधिक खारापन कितना सह सकती हैं। सवाल इस जानकारी को किसान तक पहुंचाने का है।
अगर किसी बीज के बारे में किसान आसानी से यह जान सके कि वह सिंचित या वर्षा आधारित खेती में से किसके लिए उपयुक्त है, किस तरह की जलवायु परिस्थितियों के लिए उसकी सिफारिश की गई है और वह सूखा या जलभराव कितना सह सकता है, तो किसान अपने इलाके और उपलब्ध पानी के हिसाब से बेहतर बीज चुन सकता है।
प्रस्तावित क्यूआर कोड (QR Code) की व्यवस्था का इस्तेमाल ऐसी जानकारी किसान तक पहुंचाने के लिए भी किया जा सकता है। अभी इसका मुख्य उद्देश्य बीज की पहचान और उसकी सप्लाई चेन को ट्रैक करना है।
QR कोड के जरिए किसान को बीज के निर्माता और स्रोत के साथ उस किस्म से जुड़ी दूसरी जरूरी जानकारी भी दी जा सकती है। उदाहरण के लिए, किसान को फसल की अवधि, अनुशंसित क्षेत्र, सूखा या जलभराव सहने की क्षमता और सिंचाई से जुड़ी अनुशंसाओं तक पहुंच दी जा सकती है।
फिलहाल कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। लेकिन मौजूदा डिजिटल व्यवस्था में भविष्य में ऐसी जानकारी जोड़ने की गुंजाइश हो सकती है।
साथ ही केवल QR कोड उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। जानकारी सरल भाषा में और स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए। जिन किसानों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा सीमित है उन तक यह जानकारी कृषि विज्ञान केंद्रों, स्थानीय कृषि अधिकारियों और बीज विक्रेताओं के जरिए भी पहुंचाई जा सकती है।
नकली और घटिया बीज रोकना किसानों की सुरक्षा के लिए जरूरी है। बीज की ट्रेसबिलिटी यह पता लगाने में मदद कर सकती है कि किसान के हाथ में आया बीज कहां से आया और खराब निकलने की स्थिति में उसकी जिम्मेदारी किसकी है।
लेकिन बदलती जलवायु में बीज का एक दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि वह बीज किसान के खेत और वहां उपलब्ध पानी के लिए कितना उपयुक्त है।
देश में ऐसी किस्में तैयार हो रही हैं जो सूखा, बाढ़ और गर्मी जैसी स्थितियों को बेहतर ढंग से सह सकती हैं। नया बीज कानून भी किसान तक बीज की ज्यादा जानकारी पहुंचाने की बात करता है। ऐसे में पानी और मौसम से जुड़ी जानकारी को भी इस व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है।
नए बीज कानून पर अभी परामर्श जारी है और सरकार ने इसे अंतिम रूप देने की कोई समयसीमा तय नहीं की है। ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि बीज की पहचान और गुणवत्ता के साथ किसान तक यह जानकारी कैसे पहुंचे कि वह किस तरह के मौसम, मिट्टी और पानी की स्थिति के लिए ठीक है।
आने वाले समय में किसान के लिए सिर्फ यह जानना काफी नहीं होगा कि बीज असली और अच्छी गुणवत्ता का है। यह जानना भी जरूरी होगा कि वह बीज उसके खेत, वहां के मौसम और उपलब्ध पानी के लिए सही है या नहीं।
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