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पंजाब में 2025 में 111 आकलन इकाइयां अति-दोहित श्रेणी में हैं और भूजल दोहन का स्तर 156.36 प्रतिशत है।
नहरों का पानी बढ़ना तभी असरदार होगा, जब वह नियमित रूप से खेतों के टेल-एंड तक पहुंचे और ट्यूबवेल पर निर्भरता घटे।
धान की खेती और पानी की बढ़ती मांग भूजल संकट के बड़े कारणों में शामिल हैं।
टिकाऊ समाधान के लिए नहर सिंचाई के साथ फसल विविधीकरण, पानी की मांग में कमी और बेहतर सिंचाई प्रबंधन जरूरी है।
पंजाब में भूजल संकट अब भी गंभीर है, हालांकि हालिया आकलन में कुछ सुधार के संकेत भी मिले हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की 153 आकलन इकाइयों में 111 अति-दोहित, 10 क्रिटिकल, 15 सेमी-क्रिटिकल और केवल 17 सुरक्षित श्रेणी में हैं। भूजल दोहन का स्तर 156.36 प्रतिशत है। यानी राज्य अपने निकासी योग्य भूजल संसाधन से काफी अधिक पानी निकाल रहा है।
फिर भी 2024 की तुलना में अति-दोहित इकाइयों की संख्या 115 से घटकर 111 हुई है। लेकिन इसी दौरान क्रिटिकल इकाइयां 4 से बढ़कर 10 और सेमी-क्रिटिकल इकाइयां 12 से बढ़कर 15 हो गईं। सुरक्षित इकाइयों की संख्या भी 22 से घटकर 17 रह गई। इसलिए केवल अति-दोहित इकाइयों की संख्या घटने से भूजल संकट में व्यापक सुधार नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में पंजाब में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 18.60 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) और निकासी योग्य भूजल संसाधन 16.80 BCM आंका गया। इसके मुकाबले कुल वार्षिक भूजल निकासी 26.27 BCM रही। पिछले आकलन की तुलना में निकासी और भूजल दोहन का स्तर कुछ कम हुआ है, लेकिन भूजल पर दबाव अब भी बहुत अधिक है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या नहरों से पानी की बेहतर उपलब्धता पंजाब के भूजल संकट को कम करने में टिकाऊ भूमिका निभा सकती है? इसका जवाब केवल नहरों में उपलब्ध पानी की मात्रा से नहीं मिलेगा। यह भी देखना होगा कि नहर का पानी खेतों तक कितना पहुंचता है, उससे ट्यूबवेल पर निर्भरता कितनी घटती है और क्या राज्य में पानी की कुल मांग को भी कम किया जा रहा है।
पंजाब में 153 भूजल आकलन इकाइयां हैं। 2024 और नवीनतम आकलन की तुलना करने पर स्थिति में कुछ बदलाव दिखाई देता है।
| संकेतक | 2025-26 |
|---|---|
| कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण | 19.14 BCM |
| वार्षिक निकासी योग्य संसाधन | 17.29 BCM |
| कुल भूजल निकासी | 26.32 BCM |
| सिंचाई में भूजल उपयोग | 24.95 BCM |
| भूजल दोहन का स्तर | 152.22% |
| नहरों से अनुमानित पुनर्भरण | 5.5 BCM |
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की 153 आकलन इकाइयों में 115 यानी 75.16 प्रतिशत अति-दोहित श्रेणी में थीं। 2025 के आकलन में यह संख्या घटकर 111 रह गई। हालांकि, इसी दौरान क्रिटिकल इकाइयां 4 से बढ़कर 10 और सेमी-क्रिटिकल इकाइयां 12 से बढ़कर 15 हो गईं।
CGWB की आकलन पद्धति में किसी इकाई को अति-दोहित तब माना जाता है, जब वहां भूजल दोहन का स्तर 100 प्रतिशत से अधिक हो। यानी उस क्षेत्र में सालाना जितना भूजल निकाला जा सकता है, उससे अधिक पानी निकाला जा रहा है। इसलिए किसी ब्लॉक का अति-दोहित से क्रिटिकल श्रेणी में आना सुधार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां स्थिति सुरक्षित हो गई है।
पंजाब की स्थिति को केवल ब्लॉकों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। राज्य का पूरा भूजल बजट देखने पर संकट की तस्वीर और साफ होती है।
2025 के आकलन के अनुसार पंजाब में सालाना कुल भूजल पुनर्भरण करीब 18.60 BCM है। इसमें से 16.80 BCM को सालाना निकासी योग्य संसाधन माना गया है। इसके मुकाबले राज्य ने 26.27 BCM भूजल निकाला। कुल भूजल दोहन का स्तर 156.36 प्रतिशत रहा।
| भूजल आकलन श्रेणी | 2024 | 2025-26 |
|---|---|---|
| अति-दोहित | 115 | 110 |
| क्रिटिकल | 4 | 6 |
| सेमी-क्रिटिकल | 12 | 17 |
| सुरक्षित | 22 | 20 |
| कुल | 153 | 153 |
यहां एक अंतर को समझना ज़रूरी है। कुल भूजल पुनर्भरण और निकासी योग्य भूजल संसाधन एक ही चीज नहीं हैं। निकासी योग्य संसाधन तय करते समय प्राकृतिक भूजल निकास और दूसरे पर्यावरणीय पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाता है।
इसलिए 26.27 BCM की निकासी की तुलना केवल 18.60 BCM के कुल पुनर्भरण से करना पर्याप्त नहीं होगा। फिर भी यह आंकड़ा साफ बताता है कि पंजाब का भूजल बजट अभी संतुलित नहीं हुआ है।
भूजल स्तर पर कई चीजों का असर पड़ता है। इनमें बारिश, फसल का क्षेत्र, फसल की अवधि, ट्यूबवेलों की संख्या और सिंचाई तकनीक शामिल हैं।
पंजाब के भूजल संकट को खेती और सिंचाई से अलग करके नहीं देखा जा सकता। CGWB के 2025 के आकलन के अनुसार, राज्य में सालाना 26.27 BCM भूजल निकाला जा रहा है। यह 16.80 BCM के निकासी योग्य भूजल संसाधन से काफी अधिक है। इसलिए भूजल संकट से निपटने के लिए खेती और सिंचाई के तरीकों में बदलाव भी जरूरी है।
अगर खेती में पानी की मांग ऊंची बनी रहती है तो केवल भूजल पुनर्भरण बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल होगा। जितना पानी वापस जमीन में पहुंचता है, उससे अधिक पानी लगातार बाहर निकाला जाता रहा तो भूजल पर दबाव बना रहेगा।
इसलिए पंजाब के लिए दो काम साथ-साथ जरूरी हैं। पहला, पानी की वैकल्पिक आपूर्ति बढ़ाना और दूसरा, खेती में पानी की मांग घटाना।
पंजाब में खेती लंबे समय से नहर और भूजल दोनों पर निर्भर रही है। लेकिन नहर का पानी हर खेत तक एक जैसी मात्रा और नियमितता से नहीं पहुंचता। ऐसे क्षेत्रों में ट्यूबवेल किसान के लिए अधिक भरोसेमंद विकल्प बन जाता है।
नहर का पानी खेत तक नियमित रूप से पहुंचने लगे तो किसान अपनी सिंचाई जरूरत का कुछ हिस्सा सतही जल से पूरा कर सकता है। इससे ट्यूबवेल चलाने की जरूरत घट सकती है।
नहरों का एक दूसरा प्रभाव भी हो सकता है। नहरों से पानी के रिसाव और सिंचाई के दौरान खेत से लौटने वाले पानी का कुछ हिस्सा भूजल में पहुंच सकता है। हालांकि यह हर इलाके में समान नहीं होता।
पंजाब के बिस्ट-डोआब क्षेत्र पर 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पानी के समस्थानिकों के आधार पर भूजल पुनर्भरण के स्रोतों का अध्ययन किया गया। इसमें बारिश को प्रमुख स्रोत पाया गया, लेकिन कुछ नहरों और नदियों के पास सतही जल से भूजल में महत्वपूर्ण योगदान के प्रमाण भी मिले। इससे पता चलता है कि कुछ इलाकों में नहर और भूजल एक-दूसरे से जुड़े हैं। नहर का पानी कुछ जगहों पर भूजल के पुनर्भरण में भी योगदान दे सकता है।
हालिया आकलन में भूजल दोहन का स्तर थोड़ा घटा है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि इस कमी का पूरा कारण नहर सिंचाई है। भूजल स्तर पर कई चीजों का असर पड़ता है। इनमें बारिश, फसल का क्षेत्र, फसल की अवधि, ट्यूबवेलों की संख्या और सिंचाई तकनीक शामिल हैं। स्थानीय भूगर्भीय स्थिति भी भूजल स्तर को प्रभावित करती है।
CGWB के प्री-मानसून 2025 भूजल स्तर बुलेटिन के अनुसार, पंजाब के 485 निगरानी कुओं में 90 प्रतिशत से अधिक में पिछले दशक की तुलना में भूजल स्तर में गिरावट दर्ज हुई। हालांकि कुछ इलाकों में सुधार भी देखा गया। इससे पता चलता है कि राज्य में भूजल की स्थिति एक जैसी नहीं है।
इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि नहर सिंचाई भूजल पर दबाव कम करने का एक महत्वपूर्ण साधन हो सकती है, लेकिन मौजूदा सुधार को केवल नहरों का परिणाम मानने के लिए स्थानीय स्तर के और आंकड़ों की जरूरत है।
नहर का पानी मुख्य नहर या किसी बड़े वितरण केंद्र तक पहुंच जाना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल है कि वह खेत के आखिरी छोर तक कितना और कितनी नियमितता से पहुंचता है।
अगर नहर के शुरुआती हिस्से में पानी पर्याप्त है लेकिन टेल-एंड तक नहीं पहुंचता तो वहां के किसान ट्यूबवेल पर निर्भर रह सकते हैं।ऐसे में नहरों की लंबाई बढ़ने के बावजूद भूजल दोहन में कमी जरूरी नहीं कि आए।
पंजाब का भूजल संकट केवल सिंचाई के स्रोत का सवाल नहीं है। फसल का चुनाव भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए नहरों का पानी बढ़ाने के साथ ऐसी फसलों और खेती के तरीकों को बढ़ावा देना भी जरूरी है, जिनसे भूजल पर निर्भरता कम हो।
यही कारण है कि टेल-एंड तक पानी पहुंचना भूजल संरक्षण की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पंजाब में हाल के वर्षों में नहरों के पुनरुद्धार और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने पर काम हुआ है। भारत सरकार के अनुसार पिछले दो वर्षों में पंजाब में 73 छोड़ी गई या गैर-कार्यशील नहरों को बहाल किया गया और 414 किलोमीटर नहरों को फिर से चालू किया गया।
लेकिन इन प्रयासों का असली असर तभी सामने आएगा जब यह देखा जाए कि जिन खेतों को पहले नहर का पानी नहीं मिलता था, वहां अब ट्यूबवेल से पानी निकालने की मात्रा कितनी कम हुई है।
यानी नहर की सफलता को केवल बनी हुई नहरों की लंबाई से नहीं, बल्कि भूजल पंपिंग में आई कमी से भी मापना चाहिए।
पंजाब में भूजल संकट की चर्चा धान की खेती के बिना पूरी नहीं हो सकती।
मध्य पंजाब पर 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 1998 से 2017 के बीच भूजल स्तर में औसतन 69.8 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गिरावट हुई। इस गिरावट का संबंध धान के बढ़ते क्षेत्र और ट्यूबवेलों की बढ़ती संख्या से पाया गया। अध्ययन के अनुसार, मक्का से धान की ओर फसल का रुख होने से इस अवधि में करीब 2.29 BCM अतिरिक्त सिंचाई पानी की जरूरत पड़ी।
बाद के अध्ययनों ने भी इसी दिशा की ओर संकेत किया है। 2000 से 2020 के बीच किए गए एक शोध में पाया गया कि दक्षिण-पश्चिमी पंजाब के उन हिस्सों में भूजल की स्थिति अधिक खराब रही, जहां चावल की खेती का विस्तार हुआ। एक अन्य अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2019 के बीच पंजाब में औसत भूजल कमी करीब 8.91 मीटर रही और 10 मीटर से अधिक गहराई वाले भूजल क्षेत्र का विस्तार करीब 30 प्रतिशत से बढ़कर 75 प्रतिशत से अधिक हो गया।
इन शोधों का साझा निष्कर्ष यह है कि पंजाब का भूजल संकट केवल सिंचाई के स्रोत का सवाल नहीं है। फसल का चुनाव भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए नहरों का पानी बढ़ाने के साथ ऐसी फसलों और खेती के तरीकों को बढ़ावा देना भी जरूरी है, जिनसे भूजल पर निर्भरता कम हो।
अगर नहर का पानी बढ़ता है, लेकिन पानी की अधिक मांग वाली फसलों का क्षेत्र भी बढ़ता रहता है, तो भूजल पर दबाव बना रहेगा। इसी तरह अगर फसल विविधीकरण की कोशिश की जाती है लेकिन किसान को भरोसेमंद वैकल्पिक सिंचाई स्रोत नहीं मिलता तो वह फिर ट्यूबवेल पर लौट सकता है।
इसलिए पंजाब में नहर और फसल नीति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। सरहिंद नहर क्षेत्र पर किए गए एक अध्ययन में भी यही संकेत मिला। इस अध्ययन में फसल पैटर्न में बदलाव के अलग-अलग विकल्पों का मॉडल तैयार किया गया था। इसमें धान का क्षेत्र घटाकर कपास, मक्का और मूंगफली जैसी फसलों का क्षेत्र बढ़ाने पर भूजल स्तर में गिरावट को रोकने की संभावना दिखाई गई।
इससे यह संकेत मिलता है कि सिंचाई स्रोत बदलना और पानी की मांग कम करना साथ-साथ चलना चाहिए।
पंजाब सरकार की भूजल निकासी और संरक्षण दिशानिर्देश, 2020 में भी भूजल बचाने के लिए फसल विविधीकरण को महत्वपूर्ण उपाय माना गया है।
नहरों का विस्तार करते समय यह देखना जरूरी है कि अतिरिक्त पानी का स्थानीय एक्वीफर पर क्या असर होगा।
इस दिशानिर्देश में धान की जगह कम पानी वाली फसलों की ओर जाने की सिफारिश की गई है। इसमें मक्का, बाजरा, मूंगफली और मूंग जैसी फसलों का उल्लेख है। दस्तावेज में अलग-अलग फसल विकल्पों से संभावित पानी बचत का अनुमान भी दिया गया है।
इसके अलावा दिशानिर्देश में केवल फसल बदलने पर जोर नहीं दिया गया है। इसमें बेहतर सिंचाई प्रबंधन, नियंत्रित सिंचाई, जीरो-टिल जैसी तकनीकों और सूक्ष्म सिंचाई के जरिए पानी बचाने की भी बात है।
इससे पंजाब के भूजल प्रबंधन की दिशा का एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है। समस्या का समाधान केवल भूजल की जगह नहर का पानी करना नहीं है। लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि खेती में कुल पानी की जरूरत कम हो।
नहरों से होने वाला भूजल पुनर्भरण कई क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है। लेकिन नहर से रिसने वाला पानी हर इलाके में भूजल के लिए समान रूप से लाभकारी नहीं होता।
पंजाब में किए गए समस्थानिक अध्ययन ने अलग-अलग क्षेत्रों में भूजल पुनर्भरण के अलग स्रोत पाए हैं। दक्षिण-पश्चिमी पंजाब के कुछ हिस्सों में नहर को महत्वपूर्ण पुनर्भरण स्रोत पाया गया, जबकि केंद्रीय पंजाब में बारिश और भूजल पुनर्भरण के दूसरे स्रोत अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
कुछ क्षेत्रों में नहर सिंचाई से जलभराव और पानी में नमक की मात्रा बढ़ाने का खतरा भी रहा है। इसलिए नहरों का विस्तार करते समय यह देखना जरूरी है कि अतिरिक्त पानी का स्थानीय एक्वीफर पर क्या असर होगा। जहां भूजल बहुत नीचे जा रहा है, वहां नहर का पानी उपयोगी हो सकता है। लेकिन जहां पहले से जलभराव या लवणता की समस्या है, वहां केवल नहर का पानी बढ़ाना सही रणनीति नहीं होगी।
भूजल दोहन का स्तर 2024 के 156.87 प्रतिशत से घटकर 2025 में 156.36 प्रतिशत हुआ है। अति-दोहित आकलन इकाइयों की संख्या भी 115 से घटकर 111 हुई है। लेकिन क्रिटिकल इकाइयां 4 से बढ़कर 10 और सेमी-क्रिटिकल इकाइयां 12 से बढ़कर 15 हो गईं। इसलिए इन बदलावों को व्यापक सुधार मानने से पहले कुछ और संकेतकों को देखना जरूरी है।
पहला: भूजल स्तर - क्या भूजल स्तर में लगातार सुधार हो रहा है?
दूसरा: पंपिंग - क्या नहर का पानी मिलने वाले क्षेत्रों में ट्यूबवेल से निकासी वास्तव में कम हुई है?
तीसरा: खेती - क्या धान का क्षेत्र और सिंचाई के लिए पानी की कुल मांग घट रही है?
इन तीनों संकेतकों में लगातार सुधार दिखे तभी नहरों से मिली राहत को टिकाऊ बदलाव माना जा सकेगा।
पंजाब में नहर सिंचाई का विस्तार जरूरी है, खासकर उन इलाकों में जहां किसान लंबे समय से ट्यूबवेल पर निर्भर हैं। लेकिन नहर का पानी तभी भूजल संरक्षण में प्रभावी भूमिका निभा सकता है, जब वह नियमित और पर्याप्त मात्रा में खेत के आखिरी छोर तक पहुंचे। इसके साथ चार कदम जरूरी हैं।
पहला, टेल-एंड तक पानी की निगरानी: केवल नहर में छोड़े गए पानी की मात्रा नहीं, बल्कि खेत के आखिरी छोर तक पहुंचे पानी को भी मापना होगा।
दूसरा, भूजल स्तर और पंपिंग की निगरानी: जिन क्षेत्रों में नहर का पानी पहुंचा है, वहां भूजल स्तर और ट्यूबवेल से होने वाली निकासी में कितना बदलाव आया, इसका ब्लॉक स्तर पर अध्ययन होना चाहिए। इससे पता चलेगा कि नहर सिंचाई वास्तव में भूजल पर कितना दबाव कम कर रही है।
तीसरा, फसल विविधीकरण को सिंचाई और बाजार से जोड़ना: किसान से धान कम करने की उम्मीद तभी प्रभावी होगी जब उसे दूसरी फसलों के लिए भरोसेमंद सिंचाई, बाजार और उचित कीमत मिले।
चौथा, ब्लॉक स्तर पर जल बजट और स्थानीय योजना: पंजाब के सभी इलाकों में भूजल की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसलिए हर ब्लॉक की जल उपलब्धता, फसल और भूजल निकासी के हिसाब से अलग योजना बननी चाहिए।
पंजाब में अति-दोहित आकलन इकाइयों की संख्या 115 से घटकर 111 हुई है। भूजल दोहन का स्तर भी 156.87 प्रतिशत से घटकर 156.36 प्रतिशत हुआ है। ये सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन क्रिटिकल और सेमी-क्रिटिकल इकाइयों की संख्या बढ़ी है, इसलिए इसे व्यापक सुधार मानने से पहले और संकेतकों को देखना होगा।
लेकिन पंजाब अभी भी अपने निकासी योग्य भूजल संसाधन से काफी अधिक पानी निकाल रहा है। सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता भी बहुत अधिक है। इसलिए मौजूदा सुधार को मंजिल नहीं, बल्कि एक शुरुआत मानना चाहिए।
पंजाब का भूजल संकट केवल ट्यूबवेल का संकट नहीं है। इसका संबंध धान पर निर्भर खेती, सिंचाई व्यवस्था और किसानों के आर्थिक विकल्पों से भी है। नहर का पानी खेत तक पहुंचाने के साथ पानी की मांग घटाना, फसल विविधीकरण और बेहतर सिंचाई को भी बढ़ावा देना होगा।
असली सफलता तब होगी जब अति-दोहित ब्लॉकों की संख्या लगातार घटे, भूजल स्तर स्थिर हो और सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पर निर्भरता कम हो। तभी नहरों से मिली राहत को टिकाऊ बदलाव कहा जा सकेगा।
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