फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स
मानसून की वापसी 19 सितंबर से शुरू हो सकती है। सामान्य तारीख 17 सितंबर है।
13 सितंबर तक देश में बारिश 14.7% कम रही।
बारिश का समय और वितरण भी खेती और भूजल के लिए अहम है।
दो दिन की देरी जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं, लेकिन बदलते बारिश पैटर्न का सवाल जरूर उठाती है।
मानसून की वापसी इस साल सामान्य तारीख से करीब दो दिन देर से शुरू हो सकती है। लेकिन इस साल की कहानी सिर्फ मानसून की वापसी की तारीख तक सीमित नहीं है। बारिश का वितरण भी इस कहानी का अहम हिस्सा है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों से 19 सितंबर के आसपास शुरू हो सकती है। इसकी सामान्य तारीख 17 सितंबर है। IMD ने 14 सितंबर को कहा कि मानसून की वापसी के लिए पश्चिमी राजस्थान में परिस्थितियां बन रही हैं।
मानसून की वापसी का मतलब यह नहीं है कि देश में तुरंत बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, जो पश्चिमी राजस्थान से शुरू होकर धीरे-धीरे दूसरे हिस्सों तक पहुंचती है।
मानसून की वापसी की तारीख मौसम की मौजूदा स्थिति देखकर तय होती है। IMD देखता है कि किसी इलाके में लगातार बारिश कम हो रही है, हवाओं का रुख बदल रहा है और वातावरण में नमी घट रही है।
दो दिन की देरी को अकेले जलवायु परिवर्तन का संकेत मानना सही नहीं होगा। लेकिन इस साल बारिश हर जगह एक जैसी नहीं हुई है। इसका असर खेती और पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
IMD के आंकड़ों के मुताबिक 1 जून से 13 सितंबर तक देश में मानसूनी बारिश सामान्य से 14.7 फीसदी कम रही। लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में तस्वीर अलग रही। दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश सामान्य से 28 फीसदी कम और पूर्वी तथा पूर्वोत्तर भारत में 25 फीसदी कम रही। इसके मुकाबले मध्य भारत में स्थिति बेहतर रही।
मानसून की वापसी का मतलब यह नहीं है कि देश में तुरंत बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, जो पश्चिमी राजस्थान से शुरू होकर धीरे-धीरे दूसरे हिस्सों तक पहुंचती है।
जून में देश में बारिश सामान्य से 36.5 फीसदी कम रही। जुलाई में स्थिति सुधरी और बारिश सामान्य से करीब 1 फीसदी अधिक रही। इसके बावजूद 13 सितंबर तक देश की कुल बारिश सामान्य से करीब 15 फीसदी कम रही।
किसानों के लिए बारिश की मात्रा के साथ उसका समय और अंतराल भी महत्वपूर्ण है। फसल के अलग-अलग चरणों में मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी होती है। लंबे समय तक बारिश न होने पर सिंचाई की जरूरत बढ़ने लगती है। इसके बाद अचानक बहुत तेज बारिश हो तो उसका पूरा पानी मिट्टी में नहीं समा पाता और बहाव बढ़ने का खतरा रहता है।
इसका असर खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। धान जैसी फसल के लिए शुरुआती और मध्य चरण में पर्याप्त पानी जरूरी है। वहीं कटाई के आसपास होने वाली बहुत अधिक बारिश से फसल को नुकसान पहुंच सकता है। दालों और तिलहनों में भी बारिश का लंबा अंतराल या अचानक भारी बारिश पैदावार को प्रभावित कर सकती है।
खासकर उन इलाकों में यह स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है। बारिश में लंबा अंतराल होने पर किसान सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर हो सकते हैं। इससे एक तरफ फसल को तत्काल पानी मिलता है, लेकिन दूसरी तरफ भूजल पर दबाव बढ़ता है।
भारतीय मानसून और चावल की पैदावार के संबंध पर किए गए एक अध्ययन में कुल बारिश के साथ बारिश वाले दिनों, मानसून के शुरू होने और उसकी अवधि को भी महत्वपूर्ण पाया गया। इससे पता चलता है कि मानसून में बदलाव का कृषि पर असर केवल कुल बारिश के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।
बारिश में लंबे अंतराल से भूजल पर दबाव बढ़ सकता है। जब खेतों में पर्याप्त बारिश नहीं होती तो सिंचाई के लिए किसान ट्यूबवेल और दूसरे भूजल स्रोतों पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं। इससे मानसून के दौरान ही भूजल दोहन बढ़ सकता है।
धान जैसी फसल के लिए शुरुआती और मध्य चरण में पर्याप्त पानी जरूरी है। वहीं कटाई के आसपास होने वाली बहुत अधिक बारिश से फसल को नुकसान पहुंच सकता है।
भारत में भूजल और मानसूनी बारिश के संबंध पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि बारिश में बदलाव भूजल भंडारण में बदलाव से जुड़ा है। अध्ययन के मुताबिक 2002 से 2013 के बीच उत्तर भारत में भूजल भंडारण औसतन करीब 2 सेंटीमीटर सालाना घटा। वहीं, उत्तर-पश्चिम भारत में सिंचाई के लिए भूजल दोहन भी बारिश में बदलाव से जुड़ा पाया गया।
इसके उलट, बहुत तेज बारिश भी भूजल के लिए हमेशा फायदेमंद नहीं होती। मिट्टी और जमीन एक समय में सीमित मात्रा में पानी सोख सकती हैं। बहुत तेज बारिश का बड़ा हिस्सा बहकर निकल सकता है। भूजल पुनर्भरण के लिए बारिश की मात्रा के साथ उसकी गति और अवधि भी मायने रखती है।
असमान बारिश की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि एक ही मौसम में अलग-अलग जगहों पर सूखे और बाढ़ जैसे हालात बन सकते हैं।
लंबे सूखे के बाद कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने पर जमीन, नदियों और शहरों की जल निकासी व्यवस्था पर अचानक दबाव बढ़ता है। जहां पानी तेजी से बहता है, वहां बाढ़ या जलभराव का खतरा बढ़ सकता है। दूसरी ओर, जिन इलाकों में बारिश नहीं हुई वहां मिट्टी की नमी और जल उपलब्धता पहले ही कम हो चुकी होती है।
भारत में मानसूनी बारिश के क्षेत्रीय और समय के साथ बदलाव पर हुए अध्ययन में भी अलग-अलग इलाकों में सूखे और अत्यधिक बारिश के जोखिम में अंतर पाया गया है।
यह सवाल महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका जवाब किसी एक साल के आंकड़े से नहीं दिया जा सकता।
इस साल मानसून की वापसी 19 सितंबर के आसपास होने की संभावना है, जो सामान्य तारीख से करीब दो दिन देर है। यह अंतर अपने आप में जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं है। इसके लिए लंबे समय के आंकड़ों में लगातार बदलाव देखना जरूरी है।
हालांकि, IMD के 1971-2019 के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में मानसून की सामान्य वापसी की तारीखों का दोबारा आकलन किया गया। इसमें पाया गया कि उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून की नई सामान्य वापसी तारीख पुराने सामान्य मानक से दो सप्ताह से अधिक देर की है। अध्ययन ने नए आंकड़ों के आधार पर इन सामान्य तारीखों को अपडेट करने का सुझाव दिया था।
इससे पता चलता है कि मानसून की सामान्य तारीखें भी समय के साथ बदल सकती हैं। हालांकि, किसी एक साल में दो दिन की देरी को दीर्घकालिक बदलाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जलवायु परिवर्तन की चिंता इससे कहीं व्यापक है। एक अध्ययन के मुताबिक मानसून के दौरान गर्मी बढ़ने और बारिश में उतार-चढ़ाव के कारण भारत में अचानक विकसित होने वाले सूखे, यानी flash drought, का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे सूखे मिट्टी की नमी तेजी से घटाते हैं और फसलों तथा सिंचाई के लिए पानी की जरूरत बढ़ा सकते हैं। अध्ययन के मॉडल के मुताबिक सदी के अंत तक ऐसे सूखों की घटनाएं काफी बढ़ सकती हैं।
IITM के Monsoon OnLine के मुताबिक 1 जून से 13 सितंबर के बीच देश में 668.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 784.3 मिलीमीटर होती है। इस अवधि में बारिश सामान्य से 14.73 फीसदी कम रही।
इस तस्वीर से यह भी समझ आता है कि मानसून का आकलन केवल कुल बारिश के आधार पर करना पर्याप्त नहीं है। किसी इलाके में कुल बारिश सामान्य के करीब हो सकती है, लेकिन अगर बारिश कुछ ही दिनों में बहुत ज्यादा हो और बाकी समय लंबा सूखा रहे, तो खेती और पानी की उपलब्धता पर उसका असर अलग होगा। इसलिए मानसून की निगरानी में बारिश की मात्रा के साथ उसके वितरण और अंतराल पर भी ध्यान देना जरूरी है।
इसलिए मानसून की देर से वापसी को केवल मौसम की एक घटना के रूप में देखने के बजाय बारिश के बदलते पैटर्न के संदर्भ में समझना चाहिए। अभी उपलब्ध आंकड़े दो दिन की देरी को जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं बनाते। लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि आने वाले वर्षों में खेती, भूजल और बाढ़-सूखा प्रबंधन के लिए बारिश की मात्रा के साथ उसके समय, स्थान और तीव्रता को भी ध्यान में रखना होगा।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें