इंडोनेशिया में तगड़ा विस्फोट 7 सितंबर को अनाक क्राकाटाऊ ज्वालामुखी में तगड़ा विस्फोट होने के बाद लावे और राख का गुबार हवा में कई किलोमीटर ऊपर तक उठता देखा गया।
फोटो : विकी कॉमंस
इंडोनेशिया में इन दिनों एक के बाद एक ज्वालामुखियों की गतिविधि ने दुनिया का ध्यान खींचा है। मीडिया रिपोर्ट में छह ज्वालामुखियों के फटने की खबरें आई हैं। इनमें माउंट अनाक क्राकाटाऊ (Anak Krakatau), पूर्वी नुसा तेंगारा में माउंट लेवोटोबी लाकी-लाकी, योग्यकार्ता में माउंट मेरापी, पूर्वी जावा में माउंट सेमेरू, उत्तरी सुमात्रा में माउंट सिनाबुंग और पूर्वी नुसा तेंगारा में लेवोटोलोक ज्वालामुखी शामिल हैं। सबसे तगड़ा विस्फोट 7 सितंबर को अनाक क्राकाटाऊ में देखने को मिला। इसके अगले दिन 8 सितंबर को Anak Krakatau में तीन छोटे विस्फोट भी दर्ज हुए। इसी दिन Mount Ibu और Ili Lewotolok सहित छह ज्वालामुखियों में भी विस्फोट दर्ज किए गए।
ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि इंडोनेशिया में इतने ज्वालामुखी आखिर एक साथ सक्रिय क्यों हो उठे हैं? क्या इनके पीछे कोई साझा भूगर्भीय कारण है? इसके अलावा वायुमंडल में कई किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच रही इन ज्वालामुखियों की राख और गैसों का हमारे पर्यावरण, मौसम प्रणाली, जलवायु और पारिस्थितिक तंत्र पर क्या असर पड़ सकता है? एक सवाल इन ज्वालामुखियों के उफनते लावे में हवाई जहाज से बर्फ़ डाले जाने को लेकर भी उठा रहा है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है? क्या इससे ज्वालामुखी शांत हो सकता है या फिर इसकी वजह कुछ और ही है।
इंडोनेशिया में फटे ज्वालामुखियों में सबसे ज्यादा चर्चा Anak Krakatau की है, जिसके सितंबर की शुरुआत में हुए विस्फोट में राख का विशाल गुबार करीब 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गया। तेज हवाओं के कारण ज्वालामुखी की यह राख सैकड़ों किलोमीटर के दायरे में काफी दूर तक फैल गई। राख के कारण इंडोनेशिया के कई हवाई अड्डों पर उड़ानें रोकनी पड़ीं और हजारों यात्रियों को परेशानी हुई। Anak Krakatau में सबसे ज्यादा और सबसे तगड़े विस्फोट देखने को मिले हैं। इसके कारण हवाई यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ और करीब चार दिन तक इंडोनेशिया और आसपास के इलाकों में सैकड़ों उड़ानों को स्थगित रखा गया। दुनिया भर में ज्वालामुखीय गतिविधियों पर नजर रखने वाले प्लेटफॉर्म Badan Geologi की 7 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक -
4 सितंबर रात पश्चिमी इंडोनेशियाई समय (WIB) के अनुसार 23:07 से लगातार हलचलें शुरू हुईं।
6 सितंबर 00:04 WIB को बड़ा विस्फोट हुआ।
यह विस्फोट करीब 25 घंटे तक चला।
इसके बाद तीन Strombolian विस्फोट दर्ज हुए।
6–7 सितंबर के दौरान भी 3 eruption earthquakes दर्ज हुए।
ज्वालामुखी का खतरे का स्तर Level III (Siaga) बना हुआ है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि छह ज्वालामुखियों के एक ही दिन सक्रिय होने से यह धारणा बनी कि पृथ्वी के गर्भ में कहीं कोई बहुत बड़ा भूगर्भीय बदलाव तो नहीं हो रहा है, जो सारी धरती को प्रभावित करने वाला हो? लेकिन भूवैज्ञानिकों के मुताबिक इन ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण पूरी तरह स्थानीय हैं। इंडोनेशिया की ज्वालामुखी गतिविधियों और भूगर्भीय आपदाओं की निगरानी तथा चेतावनी देने वाली सरकारी संस्था Pusat Vulkanologi dan Mitigasi Bencana Geologi (PVMBG) की रिपोर्ट के मुताबिक इन छह ज्वालामुखियों की अपनी-अपनी मैग्मा प्रणालियां हैं। इनमें हर ज्वालामुखी का अपना “मैग्मा कक्ष” और अपनी भूगर्भीय परिस्थितियां हैं। इनके विस्फोट एक-दूसरे को सीधे ट्रिगर करते हैं, ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि इंडोनेशिया का Pacific Ring of Fire पर स्थित होना इस ज्वालामुखी प्रणाली को दुनिया के अन्य ज्वालामुखियों से कुछ अलग बनाती है। क्योंकि धरती के इस हिस्से में दुनिया के सबसे ज्यादार, लगभग 127 सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं। इसकी वजह भूगर्भीय स्तर पर इंडोनेशिया कई टेक्टोनिक प्लेटों के जटिल क्षेत्र में स्थित होना है। यह टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं जिससे यहां Indo-Australian प्लेट सहित कई प्लेटों का सबडक्शन और परस्पर क्रिया होती है। Indo-Australian प्लेट का हिस्सा Sunda क्षेत्र के नीचे धंसता है। इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहते हैं। जिसके कारण मैग्मा बनने और ऊपर आने की परिस्थितियां लगातार बनी रहती हैं। जब एक टेक्टोनिक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे जाती है तो गहराई में चट्टानों के पिघलने और मैग्मा बनने की परिस्थितियां पैदा होती हैं। यह मैग्मा दरारों और कमजोर क्षेत्रों से ऊपर की ओर बढ़ता है और किसी उपयुक्त रास्ते से सतह पर पहुंचने पर ज्वालामुखी विस्फोट हो सकता है।
इतनी बड़ी संख्या में सक्रिय ज्वालामुखियों वाले देश में अलग-अलग ज्वालामुखियों का एक ही दिन या कुछ दिनों के अंतराल में सक्रिय होना असामान्य जरूर दिख सकता है। इसके बावजूद यह घटना अपने आप में यह किसी एक साझा विस्फोटक प्रक्रिया का प्रमाण नहीं है। वैज्ञानिकों के मुताबिक Anak Krakatau का विस्फोट Ibu या Ili Lewotolok को सीधे सक्रिय कर रहा है, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। इन ज्वालामुखियों में एक ही समय में गतिविधि बढ़ना भूगर्भीय संयोग और उस क्षेत्र की लगातार सक्रिय टेक्टोनिक परिस्थितियों से जुड़ा हो सकता है।
आज जिस Anak Krakatau पर दुनिया की नजर है, वह खुद 1883 के विनाशकारी Krakatau विस्फोट के बाद बनी नई ज्वालामुखीय संरचना है। इसमें हुआ 1883 का विस्फोट आधुनिक इतिहास के सबसे शक्तिशाली ज्वालामुखीय विस्फोटों में गिना जाता है। इसके बाद समुद्र में हुए बड़े बदलावों और सुनामी ने आसपास के तटीय इलाकों में भारी तबाही मचाई थी। इसके अलावा दिसंबर 2018 को इसमें हुई ज्वालामुखीय गतिविधि के कारण समुद्र में भूस्खलन हुआ और सुनामी पैदा हुई थी। इस घटना में 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। इसलिए Anak Krakatau में विस्फोट को सुनामी के खतरे से भी जोड़ कर देखा जाता है। सुनामी की आशंका का एक और कारण इंडोनेशिया के आसपास के तटीय इलाकों में 'प्रलय की मछली' या 'डूम्सडे फिश' कही जाने वाली ओरफिश (सॉर्ड फिश) को देखा गया है। करीब 13 फीट लंबी इस मछली को समुद्र तट से हटाया। ओरफिश समुद्र की अतल गहराई में रहती है। इस वजह से इसे समुद्र की तलहटी में होने वाली भूगर्भीय हलचलों और तरंगों का आभास बहुत जल्दी हो जाता है। इसी वजह से इसका संबंध आपदाओं और विनाश से माना जाता है। इसीलिए ओरफिश के समुद्र तट पर पाए जाने के बाद आने वाले दिनों में सुनामी आने की आशंका भी जताई जा रही है।
हालांकि, भूवैज्ञानिकों के मुताबिक मौजूदा साक्ष्य सुनामी के पूर्वानुमान के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मौजूदा घटना में ज्वालामुखी की राख और लावे पर लगातार नजर रखनी होगी। क्योंकि समुद्र में ज्वालामुखीय ढलान का बड़ा हिस्सा गिरने की स्थिति में volcanogenic tsunami का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए सुनामी खतरे को पूरी तरह से नकारा भी नहीं गया है। आशंका को देखते हुए Anak Krakatau ज्वालामुखी के आसपास के समुद्र और ज्वालामुखीय ढलान की स्थिरता पर भी नजर रखी जा रही है।
अनाक क्राकाटाऊ ज्वालामुखी में हुए विस्फोट का नज़रा अंतरिक्ष से कुछ इस तरह का दिखाई दिया।
इंडोनेशिया इतने सारे ज्वालामुखियों के फटने की घटना को किसी एक “महाविस्फोट” के संकेत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन, इतना जरूर है कि ज्वालामुखी का खतरा केवल उसके आसपास रहने वाले लोगों तक सीमित नहीं रहता। इसकी राख हवा की गुणवत्ता खराब कर सकती है। इससे स्थानीय मौसम प्रणाली और जलवायु भी प्रभावित हो सकती है। ज्वालामुखी से निकली हानिकारक गैसें वायुमंडल में घुलकर इंसानों, जानवरों और पेड़-पौधों तक के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती हैं। इसके अलावा ज्वालामुखी की की राख बारिश के साथ नदियों और समुद्रो में पहुंच सकती है। इससे जलीय पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित हो सकता है। यानी ज्वालामुखी विस्फोट का असर हवा से पानी तक, जंगल से समुद्र तक और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र से लेकर वैश्विक जलवायु तक पर हो सकता है। इंडोनेशिया की मौजूदा घटनाएं इसी व्यापक प्राकृतिक प्रक्रिया की एक और चेतावनी हैं, जिसे संक्षेप में कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है-
ज्वालामुखीय राख वास्तव में साधारण राख नहीं होती। इसमें बेहद महीन चट्टानी और कांच जैसे कण होते हैं। तेज हवा इन्हें सैकड़ों से हजारों किलोमीटर दूर तक ले जा सकती है। यह हवा की गुणवत्ता खराब करने के अलावा पौधों की पत्तियों पर जमकर प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित कर आसपास के इलाकों में जंगलों और कृषि को नुकसान पहुंचा सकती है।
भारी राख वर्षा के पानी के साथ मिलकर नदियों और जलाशयों में तलछट बढ़ा सकती है। ज्वालामुखीय पदार्थ जब पानी के साथ बहता है तो लहार बन सकता है। लहार (Volcanic mudflow) ज्वालामुखी की राख, मिट्टी, चट्टानी मलबे और पानी से बना तेजी से बहने वाला कीचड़ जैसा प्रवाह होता है, जो ढलानों और नदी घाटियों में भारी तबाही मचा सकता है। यह बेहद तेज और भारी कीचड़ जैसा प्रवाह होता है, जो नदी घाटियों, खेतों और बस्तियों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसका असर कुछ वैसा ही हो सकता है, जैसा कि हाल में नेपाल में आई फ्लैश फ्लड के साथ भारी मात्रा में बहकर आए कीचड़ और मलबे का देखने को मिला था।
सल्फर डाइऑक्साइड यानी SO₂, कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी हानिकारक गैसें भी निकल सकती हैं। SO₂ स्थानीय स्तर पर वायु प्रदूषण बढ़ा कर लोगों के लिए सांस लेने में परेशानी पैदा सकती है। साथ ही इन गैसों और राख व धूल के कणों से त्वचा संबंधी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
भारी और मोटी राख की परत मिट्टी की रासायनिक और भौतिक स्थितियां भी बदल सकती है। हालांकि लंबे समय में ज्वालामुखीय राख खनिजों से भरपूर मिट्टी बनाकर कृषि उत्पादकता बढ़ाने में भी योगदान दे सकती है। यानी ज्वालामुखी का प्रभाव केवल विनाशकारी नहीं होता, बल्कि दीर्घकाल में ज़मीन और उसकी उपजाऊ मिट्टी के निर्माण में भी भूमिका निभाता है। ज्वालामुखी विस्फोट से निकली SO₂ की एक सीमा से अधिक मात्रा समतापमंडल तक पहुंच जाए तो यह सल्फेट एरोसोल बना सकती है। ये एरोसोल सूर्य के विकिरण का कुछ हिस्सा वापस अंतरिक्ष की ओर परावर्तित करते हैं और इससे वैश्विक तापमान में अस्थायी कमी आ सकती है।
ज्वालामुखी विस्फोट के बीच सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें विमान से बर्फ या बर्फ जैसी सामग्री गिराए जाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि मौजूदा Anak Krakatau घटना के संदर्भ में इस तरह की कार्रवाई की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे ज्वालामुखी नियंत्रण की स्थापित तकनीक के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। ज्वालामुखी के नीचे कई किलोमीटर गहराई में मैग्मा, गैस और अत्यधिक दबाव की पूरी भूगर्भीय प्रणाली होती है। सतह पर पानी या बर्फ डालने से इस विशाल तंत्र की ऊर्जा समाप्त नहीं की जा सकती। इसलिए अगर कहीं पानी या बर्फ जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है तो उसका उद्देश्य सतह पर मौजूद राख को नियंत्रित करना हो सकता है, न कि ज्वालामुखी को बुझाना।
वास्तव में इस समय असल वैज्ञानिक चुनौती भी ज्वालामुखी को ठंडा करना नहीं, बल्कि उससे निकल चुकी राख और गैसों के असर को कम करने की ही है। इसलिए संभव है कि इंडोनेशिया में भी राख के प्रसार को कम करने के लिए मौसम संबंधी उपायों और अन्य नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल किया जा रहा हो। क्योंकि पानी या बर्फ राख के महीन कणों को हवा से जमीन पर बैठाने में मदद कर सकती है। लेकिन बर्फ या पानी डालकर ज्वालामुखी के भीतर मौजूद मैग्मा को ठंडा करके उसका विस्फोट रोक देना संभव नहीं है।
Anak Krakatau के मामले में राख का गुबार लगभग 50,000 फीट यानी 15 किलोमीटर तक पहुंचा। यही राख विमानों के लिए सबसे तत्काल खतरा बनी। इसके चलते आठ हवाई अड्डों पर परिचालन प्रभावित हुआ और करीब 3.4 लाख यात्री प्रभावित हुए। इसलिए राख के फैलाव को कम करने के लिए ऐसा किए जाने की संभावना है, ताकि हवाई मार्ग को जल्द से जल्द दोबारा खोला जा सके।
| ज्वालामुखी | देश | विस्फोट/गतिविधि की अवधि | प्रकार | अधिकतम VEI | प्रमुख प्रभाव/विशेषता |
|---|---|---|---|---|---|
| Hayli Gubbi | इथियोपिया | 23 नवंबर 2025 | Explosive / Effusive | 4 | राख का गुबार लगभग 14 किमी ऊंचाई तक; उत्तर भारत तक राख का बादल पहुंचा |
| Kilauea | अमेरिका (हवाई) | 23 दिसंबर 2024 से जारी | Explosive / Effusive | 1 | लावा फाउंटेन और बार-बार विस्फोटक गतिविधि |
| Kanlaon | फिलीपींस | 19 अक्टूबर 2024 से जारी | Explosive / Effusive | 3 | बार-बार विस्फोट और राख के गुबार |
| Krasheninnikov | रूस | 2 अगस्त 2025 से जारी | Explosive / Effusive | 3 | कामचटका क्षेत्र में सक्रियता |
| Barren Island | भारत | 30 जुलाई 2025 से 11 जनवरी 2026 | Explosive / Effusive | 2 | भारत का एकमात्र पुष्ट सक्रिय ज्वालामुखी; 2025-26 में विस्फोट |
| Reykjanes | आइसलैंड | 16 जुलाई–5 अगस्त 2025 | Explosive / Effusive | 0 | दरारों से लावा निकलने की गतिविधि |
| Dempo | इंडोनेशिया | 7–29 अगस्त 2025 | Explosive / Effusive | 2 | क्रेटर झील से विस्फोट और राख के गुबार |
| Raung | इंडोनेशिया | 13 मार्च–11 जुलाई 2025 | Explosive / Effusive | 2 | राख और ज्वालामुखीय गैसों का उत्सर्जन |
| Lewotolok | इंडोनेशिया | 16 जनवरी 2025 से जारी | Explosive / Effusive | 2 | लगातार ज्वालामुखीय गतिविधि |
| Dieng Volcanic Complex | इंडोनेशिया | 18 दिसंबर 2024–6 जनवरी 2025 | Phreatic | 1 | भाप-जनित विस्फोट |
| Home Reef | टोंगा | 17 दिसंबर 2025 से मार्च 2026 तक जारी | Explosive / Effusive | 0 | समुद्र के भीतर ज्वालामुखीय गतिविधि |
| Kikai | जापान | 29 दिसंबर 2025 | Explosive / Effusive | 1 | समुद्री ज्वालामुखीय विस्फोट |
| Whakaari/White Island | न्यूजीलैंड | 28 अगस्त 2025 | Explosive / Effusive | 1 | अल्पकालिक विस्फोट और राख उत्सर्जन |
भारत पर मौजूदा इंडोनेशियाई विस्फोट का सीधा असर पड़ने की संभावना कम है। Anak Krakatau से निकली राख मुख्य रूप से इंडोनेशिया के आसपास के क्षेत्रों में फैली है और इसी वजह से वहां हवाई यातायात प्रभावित हुआ। भारत तक ज्वालामुखीय राख का पहुंचना इस घटना में तत्काल चिंता का विषय नहीं है।
भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण संभावित प्रभाव वायुमंडलीय और जलवायु संबंधी हैं। बहुत बड़े उष्णकटिबंधीय ज्वालामुखी विस्फोट अगर पर्याप्त मात्रा में SO₂ को समतापमंडल तक पहुंचाते हैं तो उनका प्रभाव क्षेत्रीय और वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पर पड़ सकता है। इससे मानसून जैसी प्रणालियों में भी बदलाव हो सकते हैं।
मौजूदा विस्फोट को भारत के मानसून या मौसम में किसी निश्चित बदलाव से जोड़ने का अभी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। लेकिन लंबे समय में इसके दीर्घकालीन असर से अभी पूरी तरह इन्कार भी नहीं किया जा सकता। इसके लिए विस्फोट से निकली SO₂ की कुल मात्रा, उसका ऊंचाई तक पहुंचना और वायुमंडल में उसका फैलाव जैसे आंकड़ों का आकलन जरूरी होगा।
अनाक क्राकाटाऊ ज्वालामुखी के फटने के कारण इंडोनेशिया और आसपास के इलाकों में करीब चार दिन तक विमानों की उड़ाने बंद रहीं।
नवंबर 2025 में इथियोपिया के Hayli Gubbi ज्वालामुखी में हुए विस्फोट ने यह दिखा दिया कि ज्वालामुखीय गतिविधि का असर हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है। 23 नवंबर को हुए इस विस्फोट से राख का गुबार करीब 14 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया और हवाओं के साथ यमन, ओमान और पाकिस्तान को पार करते हुए उत्तर भारत तक पहुंचा। इसके कारण भारतीय हवाई क्षेत्र में उड़ानों के मार्ग बदले गए और Air India ने प्रभावित हवाई क्षेत्र से गुजर चुके विमानों की जांच के लिए 11 उड़ानें रद्द की थीं। इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए के लिए आप उस समय प्रकाशित हमारी स्टोरी इथियोपिया में फटा ‘हेली गुब्बी’ ज्वालामुखी कर सकता है दिल्ली की हवा और भी खराब को पढ़ सकते हैं।
उस समय दिल्ली-NCR में पहले से ही वायु प्रदूषण बेहद खराब स्थिति में था और इस बात की आशंका जताई गई कि इथियोपिया से आया राख का बादल हवा की गुणवत्ता को और खराब कर सकता है। हालांकि IMD के मुताबिक राख का अधिकांश हिस्सा काफी ऊंचाई पर था और उसका तत्काल दिल्ली-NCR की सतही हवा तथा AQI पर कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं दिखा। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि दिल्ली का खराब AQI सीधे Hayli Gubbi की राख के कारण हुआ था। यह घटना हालांकि एक अहम चेतावनी जरूर है कि बहुत बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों से निकली राख और गैसें लंबी दूरी तय कर सकती हैं और वायु गुणवत्ता के साथ-साथ विमानन व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती हैं।
इंडोनेशिया की तरह भारत भी पूरी तरह ज्वालामुखी-मुक्त देश नहीं है। भारत का सबसे महत्वपूर्ण सक्रिय ज्वालामुखी Barren Island है, जो अंडमान सागर में स्थित है। इसे भारत का एकमात्र पुष्ट सक्रिय ज्वालामुखी माना जाता है। यहां 1991 के बाद भी कई बार ज्वालामुखीय गतिविधि दर्ज की गई है।
इसके अलावा Narcondam Island को अंडमान-निकोबार क्षेत्र का सुप्त ज्वालामुखी माना जाता है। अंडमान-निकोबार क्षेत्र दरअसल इंडोनेशिया से म्यांमार तक फैली ज्वालामुखीय पट्टी के उत्तरी हिस्से से जुड़ा है। अंडमान प्रशासन भी Narcondam को dormant inner-arc volcano के रूप में वर्णित करता है।
अंडमान के Baratang क्षेत्र में mud volcanoes भी हैं। इन्हें सामान्य मैग्मा वाले ज्वालामुखियों से अलग समझना चाहिए। यहां मुख्य रूप से गैस, पानी और महीन तलछट/कीचड़ सतह पर निकलता है।
भारत के पश्चिमी और मध्य हिस्सों में Deccan Traps जैसी विशाल प्राचीन ज्वालामुखीय संरचनाएं भी हैं। लेकिन ये आज सक्रिय ज्वालामुखी नहीं हैं।
| ज्वालामुखी/क्षेत्र | स्थान | स्थिति | मुख्य जानकारी | अंतिम/प्रमुख गतिविधि | स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| Barren Island | अंडमान सागर, अंडमान-निकोबार | सक्रिय | भारत का एकमात्र पुष्ट सक्रिय ज्वालामुखी | 2026 | Smithsonian Global Volcanism Program |
| Narcondam | अंडमान सागर, अंडमान-निकोबार | सुप्त/निष्क्रिय | ज्वालामुखीय द्वीप; होलोसीन विस्फोट का प्रमाण दर्ज नहीं | अज्ञात | Smithsonian Global Volcanism Program |
| Baratang Mud Volcano | बाराटांग, अंडमान-निकोबार | मड वोल्केनो | मैग्मा वाला सामान्य ज्वालामुखी नहीं; गैस, पानी और कीचड़/तलछट का उत्सर्जन | — | भारत सरकार/शैक्षणिक स्रोत |
| Deccan Traps | महाराष्ट्र सहित पश्चिम-मध्य भारत | प्राचीन/निष्क्रिय | लगभग 66 मिलियन वर्ष पुराना विशाल फ्लड-बेसाल्ट ज्वालामुखीय प्रांत | लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले | UNESCO / DGH |
| Dhinodhar Hills | कच्छ, गुजरात | विलुप्त/प्राचीन | प्राचीन ज्वालामुखीय संरचना | — | भारत सरकार के शैक्षणिक स्रोत |
| Dhosi Hill | हरियाणा-राजस्थान सीमा | विलुप्त/प्राचीन | प्राचीन ज्वालामुखीय संरचना | — | भारत सरकार के शैक्षणिक स्रोत |
इंडोनेशिया की मौजूदा घटनाओं को देखकर ऐसा लग सकता है कि दुनिया में ज्वालामुखी अचानक ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। लेकिन, वैज्ञानिक रिकॉर्ड इस धारणा का समर्थन नहीं करते। दुनिया में हर साल दर्ज होने वाले विस्फोटों की संख्या में उतार-चढ़ाव जरूर होता है, लेकिन लंबे समय की निगरानी से किसी लगातार बढ़ती वैश्विक प्रवृत्ति का प्रमाण नहीं मिलता। फिलहाल, इंडोनेशिया में मामला अलग इसलिए दिखाई देता है क्योंकि वहां ज्वालामुखियों की संख्या ही बहुत ज्यादा है और बड़ी आबादी इनके आसपास रहती है। एक ही समय में अलग-अलग ज्वालामुखियों की गतिविधि शुरू होने से इसका प्रभाव लोगों, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर तेजी से दिखाई देता है।
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