पश्चिम बंगाल के सुंदरबन बायोस्फीयर रिजर्व में मैंग्रोव वन

 

फोटो: पिनकपानी | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

पर्यावरण

यूनेस्को की सूची में भारत के 13 बायोस्फीयर रिजर्व, संरक्षण से स्थानीय लोगों को कितना फायदा?

भारत के 18 बायोस्फीयर रिजर्व में से 13 को यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में जगह मिल चुकी है। लेकिन क्या इस अंतरराष्ट्रीय मान्यता से जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय समुदायों की स्थिति में सुधार हुआ है? जानिए संरक्षण की सरकारी योजनाओं, स्थानीय आजीविका और जमीनी बदलाव की चुनौतियों के बारे में।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

  • भारत के 18 बायोस्फीयर रिजर्व में से 13 को यूनेस्को की मान्यता मिली है। सितंबर 2025 में कोल्ड डेजर्ट इस सूची में शामिल हुआ।

  • मन्नार की खाड़ी और सुंदरबन जैसी जगहों पर संरक्षण के प्रयासों से पर्यावरण बचाने के साथ स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है।

  • अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बावजूद जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय लोगों की स्थिति में कितना सुधार हुआ है, इसे जानने के लिए सरकारी योजनाओं के जमीनी असर का आकलन जरूरी है।

किसी जंगल के संरक्षण की सफलता कैसे तय की जाए? क्या वहां वन्यजीवों की संख्या या जंगल का क्षेत्रफल बढ़ना ही काफी है? या यह भी देखा जाना चाहिए कि आसपास रहने वाले लोगों के जीवन में कितना सुधार हुआ है? दरअसल, जंगलों की स्थिति और उन पर निर्भर लोगों की आजीविका को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। खासकर उन इलाकों में, जहां खेती, पशुपालन, मछली पकड़ने और पानी की जरूरतों के लिए लोग सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं।

बायोस्फीयर रिजर्व की अवधारणा इसी सोच पर आधारित है। भारत में इस समय 18 अधिसूचित बायोस्फीयर रिजर्व हैं। इनमें से 13 को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क में शामिल किया गया है। सितंबर 2025 में हिमाचल प्रदेश के कोल्ड डेजर्ट बायोस्फीयर रिजर्व को मान्यता मिलने के बाद यह संख्या 13 हुई।

केंद्र सरकार ने 2 नवंबर 2026 को जारी जानकारी में इन क्षेत्रों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए चल रही योजनाओं का विवरण दिया है। लेकिन सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय पहचान और सरकारी योजनाओं से जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय लोगों की स्थिति में कितना सुधार हुआ है?

बायोस्फीयर रिजर्व में जंगलों के साथ लोगों की आजीविका भी जरूरी

यूनेस्को ने वर्ष 1971 में मैन एंड द बायोस्फीयर (Man and the Biosphere) कार्यक्रम शुरू किया था। इसका उद्देश्य जैव विविधता बचाने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना है।

बायोस्फीयर रिजर्व को आमतौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता है। सबसे भीतर का कोर क्षेत्र वन्यजीवों और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के लिए होता है। उसके आसपास बफर क्षेत्र होता है, जहां निर्धारित नियमों के तहत शोध और पर्यावरण के अनुकूल गतिविधियां हो सकती हैं। बाहरी ट्रांजिशन क्षेत्र में स्थानीय लोगों की आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग पर ध्यान दिया जाता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य स्थानीय लोगों को केवल जंगलों पर निर्भर समुदाय मानना नहीं, बल्कि संरक्षण के काम में उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित करना है।

हालांकि, यूनेस्को की मान्यता किसी क्षेत्र के प्राकृतिक महत्व और संरक्षण व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय पहचान देती है। इससे यह साबित नहीं होता कि वहां के जंगलों, जलस्रोतों या स्थानीय लोगों की आजीविका में सुधार हो चुका है। इसके लिए नियमित अध्ययन और तुलनात्मक आंकड़ों की जरूरत होती है।

यूनेस्को की सूची में भारत के 13 बायोस्फीयर रिजर्व

बायोस्फीयर रिजर्वराज्य/केंद्रशासित प्रदेशमान्यता वर्ष
नीलगिरितमिलनाडु, केरल, कर्नाटक2000
मन्नार की खाड़ीतमिलनाडु2001
सुंदरबनपश्चिम बंगाल2001
नंदा देवीउत्तराखंड2004
नोकरेकमेघालय2009
पचमढ़ीमध्य प्रदेश2009
सिमिलिपालओडिशा2009
अचानकमार-अमरकंटकछत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश2012
ग्रेट निकोबारअंडमान और निकोबार द्वीपसमूह2013
अगस्त्यमलाईकेरल, तमिलनाडु2016
कंचनजंगासिक्किम2018
पन्नामध्य प्रदेश2020
कोल्ड डेजर्टहिमाचल प्रदेश2025

स्रोत: यूनेस्को का विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क, भारत की आधिकारिक सूची

मन्नार की खाड़ी: कचरे से उपयोगी उत्पाद और महिलाओं के लिए रोजगार

तमिलनाडु का मन्नार की खाड़ी बायोस्फीयर रिजर्व समुद्री जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यहां प्रवाल भित्तियां, समुद्री घास के मैदान और मैंग्रोव वन पाए जाते हैं। ये मछलियों और दूसरे समुद्री जीवों के प्राकृतिक आवास हैं। आसपास रहने वाले अनेक परिवारों की आजीविका भी समुद्री संसाधनों से जुड़ी है।

यहां मंदिरों से निकलने वाले फूलों के कचरे के प्रबंधन की एक परियोजना पर्यावरण संरक्षण को स्थानीय आजीविका से जोड़ने का उदाहरण है। इस परियोजना में मंदिरों से फूल एकत्र कर उनसे उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

यूनेस्को की 15 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, मई से अगस्त 2025 के बीच 849 किलोग्राम फूलों के कचरे का प्रसंस्करण किया गया, जिससे 155 किलोग्राम उपयोगी पाउडर मिला। अक्टूबर 2025 में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 60 महिलाओं को कचरे से उत्पाद बनाने, पैकेजिंग और बिक्री से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया।

फूलों का कचरा जलस्रोतों में पहुंचने पर पानी की गुणवत्ता प्रभावित कर सकता है। इसे अलग इकट्ठा कर उपयोग में लाने से जलस्रोतों में कचरा पहुंचने की आशंका कम हो सकती है।

यह पहल दिखाती है कि प्रदूषण कम करने के साथ महिलाओं के लिए आय के अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि, परियोजना से जल प्रदूषण में कितनी कमी आई और महिलाओं की आय कितनी बढ़ी, इसके तुलनात्मक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

सुंदरबन: मैंग्रोव संरक्षण में कितना सुधार हुआ?

पश्चिम बंगाल का सुंदरबन बायोस्फीयर रिजर्व दिखाता है कि जंगलों का संरक्षण स्थानीय आजीविका और तटीय सुरक्षा से कितना जुड़ा है। गंगा के डेल्टा में फैले इस क्षेत्र में नदियों, ज्वारीय जलधाराओं और मैंग्रोव वनों का विशाल तंत्र है।

मैंग्रोव समुद्री लहरों और तूफानों के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं। इनके बीच मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को प्राकृतिक आवास मिलता है। इसलिए मैंग्रोव का नुकसान केवल पेड़ों की संख्या घटने का मामला नहीं है। इसका असर मछली संसाधनों, तटीय सुरक्षा और स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।

भारतीय वन सर्वेक्षण की भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मैंग्रोव वन क्षेत्र वर्ष 2013 के 2,097 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2023 में 2,119.16 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी दस वर्षों में 22.16 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इन आंकड़ों में सुंदरबन सहित पूरे पश्चिम बंगाल का मैंग्रोव क्षेत्र शामिल है।

केंद्र सरकार ने 11 अगस्त 2025 को लोकसभा में दिए जवाब में बताया था कि इस बढ़ोतरी में वनीकरण और पर्यावरण बहाली के प्रयासों की भूमिका रही है। इनमें मैंग्रोव संरक्षण के लिए शुरू की गई मिष्टी (MISHTI) योजना और अन्य सरकारी पहलें शामिल हैं।

हालांकि, मैंग्रोव क्षेत्र में बढ़ोतरी को सीधे यूनेस्को की मान्यता का परिणाम नहीं माना जा सकता। यह जानना भी जरूरी है कि इस बदलाव से तटीय सुरक्षा, मछली संसाधनों और स्थानीय लोगों की आजीविका पर क्या असर पड़ा है।

कोल्ड डेजर्ट: जलस्रोतों को बचाने की चुनौती

सितंबर 2025 में यूनेस्को की सूची में शामिल हिमाचल प्रदेश का कोल्ड डेजर्ट बायोस्फीयर रिजर्व करीब 7,770 वर्ग किलोमीटर में फैला है। लाहौल-स्पीति के इस क्षेत्र में हिमनदी घाटियां, ऊंचे पहाड़ और शुष्क प्राकृतिक इलाके हैं।

यूनेस्को की 27 सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, यहां लगभग 12 हजार लोग रहते हैं। खेती और पशुपालन उनकी आजीविका के प्रमुख साधन हैं। यहां हिम तेंदुए जैसे दुर्लभ वन्यजीव भी पाए जाते हैं।

इस इलाके में पानी की उपलब्धता सीमित है। खेती, पशुपालन और पर्यटन की जरूरतों के बीच पानी का संतुलित उपयोग एक बड़ी चुनौती है। बढ़ता तापमान और बर्फ तथा बारिश के बदलते स्वरूप इस समस्या को और गंभीर बना सकते हैं।

ऐसे में यहां वन्यजीवों के साथ जलस्रोतों का संरक्षण और स्थानीय लोगों की जरूरतों का ध्यान रखना भी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता से शोध और संरक्षण में सहयोग के अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन इससे जल उपलब्धता में कितना सुधार होगा, इसका आकलन आने वाले वर्षों में ही किया जा सकेगा।

संरक्षण पर खर्च हो रहा पैसा, लेकिन परिणाम कैसे मापे जाएं?

भारत में बायोस्फीयर रिजर्व के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय सहायता देती है। सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य के बीच खर्च का अनुपात 60:40 तथा पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में 90:10 है।

केंद्र सरकार की 2 नवंबर 2026 की जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022-23 से चार बायोस्फीयर रिजर्व में पांच वर्षीय एकीकृत प्रबंधन योजनाएं पायलट आधार पर लागू की जा रही हैं। इनमें नंदा देवी, पचमढ़ी, देहांग-दिबांग और अगस्त्यमलाई शामिल हैं।

इन योजनाओं में प्राकृतिक आवासों की बहाली, जैव विविधता की निगरानी, वैज्ञानिक शोध और स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इनमें प्रबंधन अधिकारियों, शोध संस्थानों और स्थानीय समुदायों को साथ लेकर काम करने की व्यवस्था है।

लेकिन केवल बजट और योजनाओं के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि संरक्षण की स्थिति में सुधार हुआ है। यह भी देखना जरूरी है कि कितने परिवारों को रोजगार मिला, जलस्रोतों और प्राकृतिक आवासों की स्थिति कितनी बदली तथा स्थानीय लोगों को फैसलों में कितनी भागीदारी मिली।

यूनेस्को के नियमों के अनुसार, विश्व नेटवर्क में शामिल बायोस्फीयर रिजर्व की हर दस वर्ष में समीक्षा की जाती है। इसमें संरक्षण के प्रयासों, प्रबंधन व्यवस्था और स्थानीय समुदायों की भागीदारी का मूल्यांकन किया जाता है।

भारत में भी ऐसी नियमित समीक्षा के साथ उसके नतीजे सार्वजनिक करना जरूरी है। इससे पता चल सकेगा कि सरकारी योजनाएं कितनी कारगर रहीं और किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय पहचान के बाद जमीनी बदलाव की चुनौती

भारत के 13 बायोस्फीयर रिजर्व को यूनेस्को की मान्यता मिलना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मन्नार की खाड़ी जैसी पहलें दिखाती हैं कि पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं। वहीं सुंदरबन और कोल्ड डेजर्ट जैसे क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।

अब जरूरी है कि संरक्षण योजनाओं के परिणाम नियमित रूप से जांचे जाएं। जंगलों और जलस्रोतों की स्थिति के साथ यह जानकारी भी सामने आए कि स्थानीय लोगों की आजीविका में क्या बदलाव हुआ है और संरक्षण से जुड़े फैसलों में उनकी कितनी भागीदारी है। तभी यह समझा जा सकेगा कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता से आगे बढ़कर इन क्षेत्रों में वास्तव में क्या हासिल हुआ है।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

SCROLL FOR NEXT