अलीगढ़ के शेखा पक्षी विहार में पर्यटकों का आनाजाना सालभर लगा रहता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
अपने मजबूत ताले और अलीगढ़ मस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के लिए देशभर में मशहूर उत्तर प्रदेश शहर अलीगढ़ (Aligarh) ने अब अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण के नक्शे पर अपनी एक नई पहचान बना ली है। प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन चुके यहां के शेखा पक्षी विहार (Shekha Bird Sanctuary) को अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट का दर्जा मिल गया है।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने उत्तर प्रदेश के 'शेखा झील पक्षी अभ्यारण्य' को 'रामसर स्थल' का दर्जा दिए जाने की घोषणा की। इसके चलते अब इस बर्ड सेंक्चुअरी को "अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि" के रूप में वैश्विक स्तर पर संरक्षण और प्रबंधन के लिए सहायता प्राप्त होगी। इसके साथ ही यह उत्तर प्रदेश का 12वां रामसर स्थल बन गया है। इससे अलीगढ़ में पर्यावरण-पर्यटन (Eco-tourism) और स्थानीय रोजगार को भी नई उड़ान मिलने की उम्मीद है।
बीते सप्ताह राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण द्वारा तैयार की गई रामसर सूचना पत्रक (आरआईएस) के आधार पर यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसी के तहत रामसर सचिवालय ने शेखा पक्षी विहार को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि घोषित कर दिया है।
वर्ष 2026 की शुरुआत में देश में कुल 97 रामसर स्थल थे। 31 जनवरी, 2026 को एटा जिले के पटना पक्षी विहार को अब अलीगढ़ के शेखा पक्षी विहार के इस सूची में शामिल होने के साथ देश में कुल रामसर स्थलों की संख्या 99 हो गई है।
उत्तर प्रदेश इस सूची में दूसरे स्थान पर है। राज्य में अब कुल 12 रामसर स्थल हैं। इन सभी का कुल क्षेत्रफल 39,914.27 हेक्टेयर है, जो प्रदेश के कुल आर्द्रभूमि क्षेत्र का लगभग 3.21 प्रतिशत है। रामसर स्थलों के मामले में तमिलनाडु देश में पहले नंबर पर है, जहां सबसे अधिक 20 रामसर साइटें हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार शेखा पक्षी विहार को अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट का दर्जा मिलने से न केवल जैव विविधता और प्रवासी पक्षियों का संरक्षण मजबूत होगा, बल्कि जल सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी नया संबल मिलेगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि यह स्थल पारिस्थितिकी संतुलन को सुदृढ़ करने के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और पर्यटन के नए अवसर भी पैदा करेगा। राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. अरुण कुमार सक्सेना ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति आभार जताते हुए प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि इससे पर्यटन के रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
अलीगढ़ का यह पक्षी विहार देश-विदेश के हजारों पक्षियों का मौसमी आशियाना बन चुका है। शेखा पक्षी विहार (शेखा झील) लगभग 25 हेक्टेयर (लगभग 62 एकड़) के क्षेत्र में फैली हुई है। यह एक ताजे पानी की झील है जो अपर गंगा नहर के पास स्थित है। यह देश की चुनिंदा आर्द्र भूमियों में शामिल है। रामसर साइट का दर्जा मिलने से अब इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होगी। यह अभयारण्य संकटग्रस्त प्रजातियों और प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण आश्रय स्थल है, जो राज्य की जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण को मजबूती देता है। यहां का प्राकृतिक वातावरण विदेशी पक्षियों को भी प्रवास के लिए आकर्षित करता है। इसके चलते ही यह पक्षी विहार देश और उत्तर प्रदेश के नेचर टूरिज़्म के नक्शे पर एक नए पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है।
हाल के वर्षों में यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में तेज बढ़ोतरी देखी गई है, क्योंकि यहां पक्षियों का कलरव और उथले पानी में जलक्रीड़ा के नज़ारे लोगों को कुदरत के करीब होने का अहसास कराते हैं और हरियाली से भरा शांत माहौल दौड़भाग भरी जि़ंदगी से हटकर मन को सुकून देता है। यहां खजूर के वृक्षों के बीच पक्षियों का कलरव और झील में इठलाते जलचर परिंदों का नजारा अद्भुत आनंद देता है।
वृक्षों पर उनके छोटे-छोटे घोंसले और झील में अठखेलियां करते परिंदे प्रकृति की जीवंत तस्वीर पेश करते हैं। पक्षियों के बड़े-बड़े झुंड़ों के एक साथ उड़ान भरने का नज़ारा अपने आप में अद्भुत होता है। यही कारण है कि यह स्थल केवल प्रकृति प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि परिवार संग पिकनिक मनाने वालों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। यदि आप भी प्रकृति की शांति के साथ ही पक्षियों की अतरंगी दुनिया के रोमांच को देखना-महसूस करना चाहते हैं, तो यह ठिकाना आपकी अगली यात्रा सूची के लिए लिए एक उपयुक्त पड़ाव हो सकता है। यूं तो यहां साल भर कई प्रजातियों के पक्षी देखने को मिलते हैं, पर यहां जाने का सबसे उपयुक्त समय नवंबर से फरवरी के बीच माना जाता है। इस दौरान झील में भरपूर पानी, भरपूर भोजन और सुहावने मौसम के कारण बड़ी संख्या में यहां विदेशी पक्षी देखने को मिलते हैं।
शेखा पक्षी विहार की झील और वेटलैंड में भरपूर मात्रा में भोजन और अनुकूल माहौल मिलने के कारण यह प्रवासी पक्षियों का मनपसंद ठिकाना बना हुआ है।
शेखा पक्षी विहार अलीगढ़ शहर से करीब 17 किलोमीटर दूर कोइल तहसील में स्थित है। एक आर्द्रभूमि के रूप में यह सन 1852 में ऊपरी गंगा नहर के निर्माण के बाद अस्तित्व में आया था।
वर्ष 1977 में प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी डॉ. सालिम अली ने एएमयू दौरे के दौरान इसके पारिस्थितिक महत्व को चिन्हित किया, जिसके बाद वर्ष 2016 में इसे पक्षी विहार घोषित किया गया।
केवल 40 हेक्टेयर के क्षेत्रफल वाला शेखा पक्षी विहार उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा रामसर स्थल है।
यह पक्षी विहार अपनी विशिष्ट जैव विविधता के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पक्षी विहार का मुख्य आकर्षण यहां की स्वच्छ जल की झील है, जो 249 पक्षी प्रजातियों का एक महत्त्वपूर्ण आवास है। इसमें से 62 ऐसी प्रजातियां ऐसी हैं, जो पूरी तरह से आर्द्रभूमि पर निर्भर हैं।
यह झील सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (Central Asian Flyway) पर प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव (stopover) के रूप में कार्य करती है। यहां सर्दियों में प्रवासी पक्षी जैसे बार-हेडेड गूज़ और पेंटेड स्टॉर्क पाए जाते हैं।
इसे बर्डलाइफ इंटरनेशनल (BirdLife International) द्वारा एक 'महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र' (Important Bird Area) के रूप में भी मान्यता दी गई है।
जैव विविधता के अलावा यह आर्द्रभूमि स्थानीय आजीविका को समर्थन देती है। साथ ही यह भूजल पुनर्भरण में भी सहायता करती है, जो स्थानीय कृषि के लिये काफी महत्वपूर्ण है। क्षेत्रीय जलवायु को सुरक्षित रखने में भी इसकी अहम भूमिका है।
रामसर कन्वेंशन (1971) के तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता मिलने के बाद यह स्थल आर्द्रभूमि संरक्षण, जैव विविधता सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन को और भी बेहतर ढंग से सुदृढ़ करेगा।
उत्तर प्रदेश के सभी रामसर स्थलों का कुल क्षेत्रफल 39914.27 हेक्टेश है, जो कि प्रदेश के कुल वेटलैंड क्षेत्रफल 12,42,530 हेक्टेयर (नेशनल वेटलैंड एटलस के अनुसार) का लगभग 3.21% भाग है। पटना पक्षी विहार को भी रामसर साइट घोषित किए जाने के साथ ही अब उत्तर प्रदेश में अब कुल 12 रामसर स्थल हो गए हैं। राज्य के रामसर स्थलों के नाम इस प्रकार हैं -
शेखा झील (अलीगढ़) - नवीनतम (12वीं)
पटना पक्षी अभयारण्य (एटा)
बखीरा वन्य जीव अभयारण्य (संतकबीर नगर)
हैदरपुर वेटलैंड (बिजनौर/मुजफ्फरनगर)
सूर सरोवर झील (आगरा)
सरसई नावर झील (इटावा)
समन पक्षी अभयारण्य (मैनपुरी)
समसपुर पक्षी अभयारण्य (रायबरेली)
सांडी पक्षी अभयारण्य (हरदोई)
नवाबगंज पक्षी अभयारण्य (उन्नाव)
पार्वती अरगा पक्षी अभयारण्य (गोंडा)
ऊपरी गंगा नदी (ब्रजघाट से नरौरा)
भारत के रामसर स्थलों की पूरी सूची
अलीगढ़ के शेखा पक्षी विहार बना अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट का दर्जा मिलने के साथ ही उत्तर प्रदेश में ऐसे रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है।
आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के अनुसार आर्द्रभूमि की परिभाषा इस प्रकार है, '’आर्द्रभूमि दलदल, कीचड़युक्त भूमि, पीटभूमि या जल के ऐसे क्षेत्र हैं, जो प्राकृतिक या कृत्रिम, स्थायी या अस्थायी हो सकते हैं, जिनमें स्थिर या बहता हुआ जल होता है जो मीठा, खारा या नमकीन हो सकता है, जिसमें कम ज्वार के समय छह मीटर तक की गहराई वाले उथले समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं।'’
आर्द्रभूमियों का संरक्षण जैव विविधता, जल संसाधनों और पारिस्थितिक संतुलन के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसी उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर कन्वेंशन के तहत महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों की पहचान और संरक्षण का कार्य किया जाता है। ईरान के रामसर शहर में 2 फरवरी 1971 को दुनिया भर के वेटलैंड सुरक्षित व संरक्षित करने के लिए कन्वेंशन हुआ था। इसी के उपलक्ष्य में हर साल 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है। इस समझौते में दुनिया के 170 देश शामिल हुए और फिलहाल रामसर कनवेंशन के 173 सदस्य हैं। रामसर कन्वेंशन की संधि 21 दिसंबर 1975 से लागू हुई। इसका मुख्यालय स्विटजरलैंड के के ग्लैंड शहर में है। संधि के मुताबिक इसमें ऐसे वेटलैंड का चयन किया जाता है जो जल प्रवाही हो, पशु पक्षियों का प्राकृतिक आवास हो एवं जैव विविधता की संभावनाएं हों। संरक्षण की जिम्मेदारी संबंधित राज्य एवं देश की होती है। भारत ने 1982 में रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद से भारत में रामसर स्थलों का नेटवर्क सबसे तेजी से बढ़ रहा है। 22 अप्रैल 2026 तक भारत में कुल 99 रामसर स्थल हैं।
1990 में स्थापित , मॉन्ट्रो रिकॉर्ड रामसर स्थलों का एक रजिस्टर है, जहाँ तकनीकी विकास, प्रदूषण या अन्य मानवीय हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप पारिस्थितिक विशेषताओं में परिवर्तन हुए हैं, हो रहे हैं या होने की संभावना है। इसे रामसर कन्वेंशन ऑन वेटलैंड्स के तहत रामसर सूची के भाग के रूप में बनाए रखा जाता है। वर्तमान में, मॉन्ट्रो रिकॉर्ड में दुनिया भर में 46 रामसर स्थल शामिल हैं। भारत के दो रामसर स्थल केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान और लोकटक झील को इस सूची में शामिल किया गया है।
आर्द्रभूमियां अपने खास तरह के पारिस्थितिक तंत्र के ज़रिये प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह जल सुरक्षा, जैव विविधता को बचाए रखने के साथ ही जलवायु परिवर्तन पर भी नियंत्रण रखती हैं। सके अलावा वेटलैंड्स से बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर पर लोगों को कृषि, पर्यटन, होटल, व ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में रोज़गार भी मिलता है। उत्तर प्रदेश को भी अपनी आर्द्रभूमियों से इसी तरह कई प्रकार के लाभ मिल रहे हैं -
बाढ़ नियंत्रण: आर्द्रभूमि अतिरिक्त वर्षा जल को अवशोषित करके प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करती है। उदाहरण के लिए, ऊपरी गंगा नदी आर्द्रभूमि।
जल सुरक्षा कवच: जल का भंडारण करके और धीरे-धीरे उसे छोड़कर बस्तियों, कृषि क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे की रक्षा करना।
भूजल पुनर्भरण: आर्द्रभूमि वर्षा और अपवाह को जलोढ़ जलभंडारों में रिसने देती है, जिससे भूजल के पुनर्भरण यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज में मदद मिलती है। यह राज्य में पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
जल शुद्धिकरण: आर्द्रभूमि प्राकृतिक जैव-फ़िल्टर के रूप में कार्य करती है जो कृषि अपवाह यानी बारिश में खेतों से बह कर आने वाले से फास्फोरस, नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्वों को अवशोषित करके जल की गुणवत्ता में सुधार करती है । इसके अलावा आर्द्रभूमि में पाए जाने वाले जलकुंभी, अजोला, डकवीड जैसे पौधे भारी धातुओं को अवशोषित कर पानी को खतरनाक प्रदूषण से बचाते हैं।
जैव विविधता संरक्षण: आर्द्रभूमि विभिन्न प्रकार की मछलियों, मेंढक व टोड जैसे उभयचरों, कीटों और जलीय वनस्पतियों को भोजन, प्रजनन और विश्राम के लिए आवास प्रदान करती हैं। ये मध्य एशियाई फ्लाईवे के महत्वपूर्ण पारिस्थितिक केंद्र के रूप में भी कार्य करती हैं , जहां साइबेरिया और मध्य एशिया से प्रवासी पक्षी प्रतिवर्ष आते हैं, उदाहरण के लिए पार्वती-अर्गा पक्षी अभयारण्य, पटना पक्षी विहार आदि।
मृदा संरक्षण : आर्द्रभूमि तलछट को रोककर मिट्टी के कटाव को कम करती है। उत्तर प्रदेश में बढ़ते मृदा क्षरण के मद्देनजर यह महत्वपूर्ण है।
पर्यटन और आजीविका : आर्द्रभूमि मत्स्य पालन, सिंघाड़ा (पानी शाहबलूत) और कमल की खेती जैसी जलीय कृषि, मोती की खेती और पर्यावरण पर्यटन पर आधारित रोजगार को सहारा देती है ।
आर्द्रभूमि संसाधन: आर्द्रभूमि उत्तर प्रदेश में स्थानीय समुदायों के लिए मछली, चारा, जलीय पौधे और औषधीय प्रजातियों की आपूर्ति करती है , जिससे घरेलू जरूरतों और छोटे ग्रामीण उद्यमों को सहायता मिलती है।
शिक्षा और अनुसंधान: उत्तर प्रदेश में आर्द्रभूमि पारिस्थितिक शिक्षा व अनुसंधान, जैव विविधता निगरानी और जागरूकता कार्यक्रमों के लिए प्राकृतिक प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करती है।
जलवायु और आपदा प्रतिरोधक क्षमता: आर्द्रभूमियां जैव द्रव्यमान और मिट्टी में कार्बन संग्रहित यानी कार्बन कैप्चर (Carbon Capture) करके धरती को ग्लोबल वॉर्मिंग से बचाने में मदद करती हैं। साथ ही जलवायु की चरम स्थितियों के प्रति सुरक्षा कवच का काम करती हैं, जैसे बाढ़ के दौरान पानी को रोककर रखना और सूखे के दौरान उसे छोड़ना।
नवंबर से फरवरी के बीच शेखा पक्षी विहार में पक्षियों की गतिविधियां चरम पर रहती हैं।
पारिस्थितिक तंत्र को खतरा : उत्तर प्रदेश में आर्द्रभूमि मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव में हैं , जिससे पर्यावास का क्षरण, जैव विविधता का नुकसान और पारिस्थितिक तंत्र में गिरावट आ रही है।
जलवैज्ञानिक व्यवस्था में परिवर्तन: बांधों और बैराजों के कारण जल प्रवाह में कमी से आर्द्रभूमि का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा हा है। उदाहरण के लिए, ऊपरी गंगा क्षेत्र पर अवरोध के कारण सरसाई नवार झील की स्थिति बिगड़ रही है।
जलग्रहण क्षेत्र का क्षरण: उत्तर प्रदेश में अनुपचारित कचरे के डंपिंग, कृषि विस्तार और तीव्र शहरीकरण के कारण आर्द्रभूमि सिकुड़ रही है ।
आक्रामक वनस्पति प्रजातियां: ये सूर्य के प्रकाश को रोकती हैं और घुलित ऑक्सीजन के स्तर को कम करती हैं, जिससे उत्तर प्रदेश के आर्द्रभूमि में जलीय जीवों को नुकसान पहुंचता है। उदाहरण: जलकुंभी, साल्विनिया।
आर्द्रभूमि संसाधनों का अत्यधिक दोहन: छोटे जालों का उपयोग करके अत्यधिक मछली पकड़ना, अत्यधिक चराई, अत्यधिक जल निकासी और स्थानीय संसाधन खनन आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी को बदल देते हैं।
कृषि अपवाह: उत्तर प्रदेश के फसल क्षेत्रों से पोषक तत्वों (रासाचनिक उर्वरक, खरपतवार नाशक और कीटनाशक) के बहाव के कारण आर्द्रभूमियों में शैवाल का अत्यधिक विकास और मछलियों की मृत्यु होती है। मैनपुरी के समन पक्षी अभयारण्य में पोषक तत्वों का अत्यधिक जमाव होना इसका प्रमुख उदाहरण है।
अस्थिर पर्यटन: पारिस्थितिक नियोजन के बिना बढ़ते पर्यटन से आर्द्रभूमि में पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवासों को नुकसान होता है। पर्यटन सुविधाओं और मनोरंजक गतिविधियों के चलते अकसर पारिस्थितिक वहन क्षमता की अनदेखी की जाती, जिससे आर्द्रभूमि को नुकसान पहुंचता है।
जलवायु परिवर्तन: बढ़ते तापमान से पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ता है। अनियमित वर्षा और चरम मौसम की घटनाएं जल चक्रों को बदल देती हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने आर्द्रभूमि क्षेत्रों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण योजनाओं के अनुरूप कई पहलें शुरू की हैं।
“एक जिला, एक आर्द्रभूमि” पहल : 2022 में घोषित इस पहल का उद्देश्य उत्तर प्रदेश की आर्द्रभूमियों में सतत पर्यावरण-पर्यटन को बढ़ावा देना और उन्हें अतिक्रमण से बचाना है।
उत्तर प्रदेश आर्द्रभूमि प्रबंधन एवं अनुसंधान केंद्र (UPWMRC) : यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए तकनीकी हस्तक्षेपों का नेतृत्व करता है। उदाहरण के लिए, हैदरपुर आर्द्रभूमि में जलकुंभी को बायोगैस में परिवर्तित करना।
अमृत धरोहर योजना : केंद्र सरकार द्वारा 2023 में शुरू की गई यह योजना मुख्य रूप से रामसर स्थलों के संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश में लागू की गई है।
पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) : उत्तर प्रदेश राज्य आर्द्रभूमि के पास अतिक्रमण से सुरक्षा के लिए ESZ घोषित करता है। उदाहरण के लिए, पार्वती-अर्गा पक्षी अभयारण्य को 2025 में ESZ का दर्जा प्राप्त हुआ।
उत्तर प्रदेश राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (UPSWA) : आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत 2017 में गठित , यह उत्तर प्रदेश में आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
राज्य आर्द्रभूमि एटलस : 2019 में, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा UPSWA को राज्य के लिए एक आर्द्रभूमि एटलस तैयार करने का कार्य सौंपा गया था।
रामसर स्थलों की संख्या बढ़ाना : उत्तर प्रदेश ने 31 जनवरी, 2026 को पटना पक्षी अभयारण्य (एटा) को अपना 11वां रामसर स्थल घोषित करके एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की ।
जागरूकता अभियान : उत्तर प्रदेश सरकार विश्व आर्द्रभूमि दिवस (2 फरवरी) पर राज्यव्यापी कार्यक्रम आयोजित करती है ताकि लोगों में आर्द्रभूमि के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
कुल मिलाकर अलीगढ़ के शेखा पक्षी विहार को मिला अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट का दर्जा मिलना राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इससे प्रदेश में पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अब ज़रूरत है कि राज्य सरकार इस रामसर स्थल को बेहतर ढंग से उसके प्राकृतिक स्वरूप में संरक्षित करे और राज्य के इस सबसे छोटे रामसर स्थल का यथासंभव विस्तार और विकास किया जाए। अगर यहां संतुलित ढंग से इको टूरिज़्म की सुविधाएं विकसित की जाएं तो यह दुनिया के बेहतरीन रामसर स्थलों में अपनी जगह बना सकता है। पर, इस बात का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है कि पर्यटन और रोज़गार को बढ़ावा देने की कोशिश में इस अनूठे रामसर स्थल का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ने न पाए।
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