मराठवाड़ा में सूखे की स्थिति

 

फोटो: सुहासजगांवकर | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

भूजल

2016 में लातूर के लिए चलानी पड़ी थी जलदूत ट्रेन, क्या फिर बन सकते हैं ऐसे हालात?

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

अप्रैल 2016 में महाराष्ट्र के लातूर शहर में पानी की कमी इतनी बढ़ गई थी कि सांगली जिले के मिरज से ट्रेन के जरिए पानी पहुंचाना पड़ा। करीब 350 किलोमीटर की दूरी तय करके पहुंची पहली ट्रेन में लगभग पाँच लाख लीटर पानी था। बाद में 50 वैगन वाली ट्रेन से करीब 25 लाख लीटर पानी पहुंचाया गया। इस विशेष व्यवस्था को जलदूत ट्रेन कहा गया। इससे लातूर को राहत मिली, लेकिन एक सवाल भी उठा। अगर पानी भेजने वाले शहर में भी पानी कम हो, तो दूसरे शहर को पानी कहाँ से मिलेगा?

लातूर के जल संकट को दस साल हो चुके हैं। महाराष्ट्र में आज भी कई इलाकों की पेयजल और सिंचाई की जरूरत नदियों, जलाशयों और भूजल से पूरी होती है। कम बारिश, भूजल का अधिक दोहन और स्थानीय जलस्रोतों में घटता पानी उन इलाकों में संकट बढ़ा सकता है, जहाँ पहले से पानी की कमी है।

फिलहाल महाराष्ट्र में दोबारा जलदूत ट्रेन चलाने की कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। लेकिन उस संकट से जुड़े कई सवाल आज भी महत्वपूर्ण हैं। आखिर वहाँ पानी की कमी इतनी गंभीर क्यों हुई थी? दूसरे शहर से पानी लाने की व्यवस्था कितनी कारगर थी? और भविष्य में ऐसे संकट से कैसे बचा जा सकता है?

2016 में क्यों चलानी पड़ी थी जलदूत ट्रेन?

लातूर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र लंबे समय से अनियमित बारिश और पानी की कमी जैसी समस्याओं का सामना करता रहा है। वर्ष 2015 में कमजोर मानसून के बाद लातूर के जलस्रोतों में पानी घटने लगा। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 2016 की गर्मियों में शहर के लिए पर्याप्त पेयजल जुटाना मुश्किल हो गया।

इस संकट से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने भारतीय रेलवे की मदद ली। रेल मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2016 को बताया था कि लातूर में पानी पहुंचाने के लिए 50-50 वैगन वाली दो विशेष मालगाड़ियाँ तैयार की जा रही थीं। इस तरह 50 वैगन वाली एक ट्रेन करीब 27.5 लाख लीटर पानी ले जा सकती थी। पेयजल की आपूर्ति के लिए वैगनों की विशेष सफाई भी कराई गई थी।

पहली जलदूत ट्रेन 12 अप्रैल 2016 को लातूर पहुंची थी। इसमें 10 वैगन थे और लगभग पाँच लाख लीटर पानी लाया गया था। इसके बाद 20 अप्रैल को 50 वैगन वाली ट्रेन करीब 25 लाख लीटर पानी लेकर लातूर पहुंची।

लातूर भेजने के लिए पानी मिरज में कृष्णा नदी से जुड़े जलस्रोत से लिया गया था। इसके लिए पानी भरने और ट्रेन से उतारने की अलग व्यवस्था करनी पड़ी। इस तरह लातूर की पानी की जरूरत दूसरे जिले से पूरी की गई। इसके लिए रेलवे और स्थानीय प्रशासन को विशेष इंतजाम करने पड़े।

लातूर में पानी की कमी के पीछे क्या कारण थे?

महाराष्ट्र की भूजल सर्वेक्षण और विकास एजेंसी (GSDA) ने लातूर जिले के विभिन्न तालुकों की भूजल संबंधी रिपोर्ट तैयार की हैं। इन रिपोर्टों में बताया गया है कि इलाके की चट्टानें कैसी हैं, जमीन के नीचे कितना पानी है और उसे कैसे बचाया जा सकता है।

महाराष्ट्र के बड़े हिस्से में बेसाल्ट की कठोर चट्टानें पाई जाती हैं। इन्हें दक्कन ट्रैप कहा जाता है। इन चट्टानों की दरारों और ऊपरी टूटे-फूटे हिस्सों में भूजल जमा हो सकता है। इसलिए किसी जगह कितना भूजल मिलेगा, यह चट्टानों की बनावट और जमीन में पहुंचने वाले बारिश के पानी पर निर्भर करता है।

बारिश का पानी जमीन के भीतर पहुंचकर भूजल भंडार को भरता है। लेकिन लगातार कम बारिश होने और कुओं तथा बोरवेल से अधिक पानी निकालने पर यह भंडार घट सकता है। इससे गर्मियों में पानी की कमी बढ़ने का खतरा रहता है।

लातूर में पानी की कमी को समझने के लिए स्थानीय भूजल की स्थिति देखना भी जरूरी है।

पानी कितना बचेगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि बारिश कब और कितनी होती है। अगर ज्यादातर बारिश कुछ ही दिनों में हो जाए, तो उसका बड़ा हिस्सा बह सकता है। जमीन में पानी का रिसाव मिट्टी और चट्टानों की बनावट पर भी निर्भर करता है। इसलिए किसी क्षेत्र में साल भर कितना पानी उपलब्ध रहेगा, इसका अनुमान केवल मानसून की कुल बारिश से नहीं लगाया जा सकता।

महाराष्ट्र में भूजल की वर्तमान स्थिति क्या है?

महाराष्ट्र के अनेक गांवों में पेयजल और सिंचाई के लिए कुओं तथा बोरवेल का इस्तेमाल होता है। लेकिन राज्य के सभी क्षेत्रों में भूजल की स्थिति एक जैसी नहीं है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के आकलन में महाराष्ट्र के 359 तालुकों में से 306 सुरक्षित श्रेणी में पाए गए। वहीं 40 तालुके अर्ध-संकटग्रस्त, पाँच संकटग्रस्त और सात अतिदोहित श्रेणी में थे। एक तालुके में भूजल खारा पाया गया। यह जानकारी 29 जनवरी 2026 को लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब में भी साझा की गई है।

वर्ष 2025 के आकलन के अनुसार, महाराष्ट्र में हर साल लगभग 33.89 अरब घन मीटर पानी जमीन के भीतर पहुंचकर भूजल भंडार को भरता है। इसमें से करीब 31.99 अरब घन मीटर भूजल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध माना गया। जबकि सालाना लगभग 16.57 अरब घन मीटर भूजल निकाले जाने का अनुमान था। इस तरह राज्य में भूजल दोहन का स्तर 51.79 प्रतिशत रहा। ये पूरे महाराष्ट्र के आंकड़े हैं। अलग-अलग तालुकों में भूजल की स्थिति इससे अलग हो सकती है।

कृष्णा नदी से पानी लेने की भी क्या सीमाएं हैं?

2016 में लातूर को पानी पहुंचाने के लिए मिरज का सहारा लिया गया था। मिरज की जलापूर्ति कृष्णा नदी से जुड़ी है। इस नदी का पानी मिरज और सांगली सहित दूसरे इलाकों में पेयजल तथा सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल होता है। इसलिए दूसरे शहर को पानी भेजने से पहले यह देखना जरूरी है कि मिरज और आसपास के इलाकों को खुद कितना पानी चाहिए। 

कृष्णा नदी में कितना पानी रहेगा, यह उसके आसपास के जलग्रहण क्षेत्र में हुई बारिश, बांधों में जमा पानी और नदी से निकाले जाने वाले पानी पर निर्भर करता है। गर्मियों में नदी में पानी का बहाव कम होने पर बांधों से पानी छोड़कर जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। लेकिन कम बारिश वाले वर्षों में जलाशयों में भी पानी घट सकता है। ऐसी स्थिति में पेयजल, सिंचाई और दूसरी जरूरतों के लिए पानी का बँटवारा मुश्किल हो सकता है।

वर्ष 2016 में मिरज से पानी मिलने के कारण लातूर को राहत पहुंची थी। लेकिन भविष्य में यदि कृष्णा नदी से जुड़े जलाशयों में भी पानी कम हो, तो दूसरे शहर को इतनी बड़ी मात्रा में पानी भेजना कठिन हो सकता है। इसलिए किसी शहर को आपात स्थिति में पानी भेजने से पहले यह भी देखना होगा कि पानी देने वाले इलाके में कितना पानी बचा है।

क्या भूजल की निगरानी से जल संकट का पहले पता चल सकता है?

भूजल स्तर की नियमित जांच से पानी की संभावित कमी का पहले पता चल सकता है। महाराष्ट्र में यह काम भूजल सर्वेक्षण और विकास एजेंसी (GSDA) करती है। एजेंसी के आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार, राज्य में 3,698 निगरानी कुएं दर्ज हैं। डिजिटल उपकरणों से भी भूजल स्तर मापा जाता है।

GSDA भूजल सूखा सूचकांक (Groundwater Drought Index) और संभावित पेयजल कमी से संबंधित रिपोर्ट भी तैयार करती है। इन रिपोर्टों से पता लगाने में मदद मिलती है कि किन इलाकों में आने वाले महीनों में पीने के पानी की कमी हो सकती है।

क्या जलदूत ट्रेन स्थायी समाधान हो सकती है?

जलदूत ट्रेन ने 2016 में लातूर को राहत पहुंचाई थी। लेकिन ट्रेन से पानी पहुंचाने की भी कुछ सीमाएं हैं। सबसे पहले उस जगह पर्याप्त पानी होना चाहिए, जहाँ से ट्रेन भरी जाएगी। फिर पानी को दूसरे शहर तक पहुंचाने, वहाँ जमा करने और लोगों के घरों तक बाँटने की व्यवस्था करनी पड़ती है।

ट्रेन से एक बार में सीमित मात्रा में ही पानी पहुंचाया जा सकता है। वर्ष 2016 में 50 वैगन वाली ट्रेन की क्षमता करीब 27.5 लाख लीटर थी। लेकिन 20 अप्रैल को इससे करीब 25 लाख लीटर पानी लातूर पहुंचाया गया था। किसी शहर को रोजाना इससे अधिक पानी की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए केवल ट्रेन के जरिए नियमित पेयजल आपूर्ति करना मुश्किल है।

इसलिए ट्रेन से पानी पहुंचाकर कुछ समय के लिए राहत दी जा सकती है, लेकिन इससे स्थानीय जलस्रोतों में पानी की कमी दूर नहीं होती।

जल संकट रोकने के लिए क्या किया जा रहा है?

महाराष्ट्र में भूजल संरक्षण के लिए अटल भूजल योजना लागू की गई। महाराष्ट्र सरकार के अनुसार, यह योजना राज्य के 13 जिलों में लागू की गई। इसके तहत 73 जलग्रहण क्षेत्रों की 1,133 ग्राम पंचायतों के कुल 1,442 गांव शामिल किए गए।

महाराष्ट्र सरकार के अनुसार, मार्च 2025 तक लगभग 2.63 लाख हेक्टेयर में ऐसी सिंचाई विधियाँ अपनाई गई थीं, जिनसे पानी की बचत होती है। योजना में शामिल 43 तालुकों में से 38 में भूजल दोहन की स्थिति बेहतर हुई। यह जानकारी 2023 और 2024 के भूजल आकलन की तुलना से सामने आई।

भूजल संरक्षण के लिए स्थानीय जलस्रोतों को बचाने के साथ पानी की खपत कम करना भी जरूरी है। तालाबों और पुराने कुओं की देखभाल, वर्षा जल संचयन और पानी की बचत करने वाली सिंचाई विधियाँ इसमें मदद कर सकती हैं। जिन क्षेत्रों में भूजल का अधिक दोहन हो रहा है, वहाँ खेती के लिए पानी की जरूरत और सिंचाई के तरीकों को भी देखना होगा।

साथ ही स्थानीय प्रशासन को यह भी देखना होगा कि किसी क्षेत्र में उपलब्ध पानी का कितना हिस्सा पेयजल, खेती और उद्योगों के लिए इस्तेमाल हो रहा है। अगर किसी इलाके में जरूरत के मुकाबले पानी कम है, तो उसके इस्तेमाल का तरीका भी बदलना होगा।

वर्ष 2016 में जलदूत ट्रेन लातूर के लिए बड़ी राहत थी। लेकिन इस घटना ने यह भी दिखाया कि किसी शहर को दूसरे इलाके से पानी पहुंचाना हमेशा आसान नहीं होता।

लातूर का अनुभव बताता है कि पानी की कमी से निपटने के लिए केवल टैंकर या ट्रेन का सहारा लेना काफी नहीं है। स्थानीय जलस्रोतों को बचाना, भूजल पर नजर रखना और आने वाले महीनों की जरूरत के हिसाब से पहले ही तैयारी करना जरूरी है।

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