भूजल में यूरेनियम घुलना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकता है। इसे देखते हुए एनजीटी ने इस पर सख्‍ती दिखाई है। 

 

फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल

भूजल

दिल्ली के भूजल में यूरेनियम पर NGT सख्‍त : सरकार और DPCC से मांगा जवाब

ट्रिब्‍यूनल की प्रिंसिपल बेंच ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा मानते हुए जारी किया नोटिस

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

दिल्‍ली के भूजल में यूरेनियम पर पाए जाने के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सख्‍त रवैया दिखाया है। NGT ने इस मामले में दिल्ली प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (DPCC) और दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग को भी पक्षकार बनाया है। इस मामले में  NGT ने दोनों ही को नोटिस जारी करते हुए कोर्ट में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी।

एनजीटी ने यह आदेश बिहार में मां के दूध में यूरेनियम मिलने का दावा करने वाली एक रिपोर्ट के आधार पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में चल रही सुनवाई के दौरान दिल्‍ली के भूजल में भी यूरेनियम पाए जाने का जिक्र आने पर किया। NGT ने 28 नवंबर 2025 में सामने आई इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। इस बारे में विस्‍तृत जानकारी के लिए आप हमारी रिपोर्ट बिहार में मांओं के दूध में पहुंचा यूरेनियम: नवजातों की सेहत ख़तरे में! पढ़ सकते हैं।

ट्रिब्‍यूनल की प्रिंसिपल बेंच के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर डॉ अफरोज अहमद मामले की सुनवाई कर रहे हैं। इस तरह बिहार में मां के दूध में यूरेनियम मिलने के दावे वाली एक रिपोर्ट का मामले का दायरा अब दिल्ली के ग्राउंड वाटर में यूरेनियम के संदूषण तक बढ़ गया है। 

NGT किन सवालों के जवाब चाहता है?

NGT ने इस मामले को केवल एक तकनीकी रिपोर्ट के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना है। अधिकरण यह जानना चाहता है कि राजधानी में भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी का वास्तविक दायरा कितना है और संबंधित एजेंसियों ने अब तक क्या कार्रवाई की है। इसी उद्देश्य से NGT ने दिल्ली सरकार और DPCC से कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी है, जिनमें शामिल मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • किन इलाकों के भूजल में यूरेनियम पाया गया है।

  • मात्रा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों से कितनी अधिक या कम है।

  • नमूनों की जांच किस प्रयोगशाला में हुई।

  • क्या प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को कोई परामर्श जारी किया गया है।

  • भूजल के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने के लिए क्या योजना है।

  • दीर्घकालिक निगरानी और उपचार की क्या व्यवस्था है।

CGWB की रिपोर्ट में हुआ था खुलासा

सेंट्रल ग्राउंड वॉटर अथॉरिटी (CGWB) की सालाना भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 में बताया गया था कि दिल्ली में जांच किए गए 83 भूजल नमूनों में से 24 में यूरेनियम की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई। यह कुल सैंपलों का लगभग 13 से 15 फीसदी होता है। रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान के कुछ हिस्सों और उत्तर प्रदेश समेत उत्तर-पश्चिम भारत के कई इलाकों में भूजल में भी यूरेनियम की मात्रा ज्यादा पाई गई है।

CGWB ने इसकी वजह वहां की जमीन और चट्टानों की बनावट, भूजल का सीमा से ज्यादा दोहन और जमीन के नीचे पानी जमा करने वाली परतों यानी एक्विफर की खास बनावट को बताया है। इन तथ्यों को देखते हुए NGT ने DPCC के मेंबर सेक्रेटरी, दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को इस मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल किया है। इन्हें नोटिस जारी कर निर्देश दिए गए हैं कि इस रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लें।

दिल्‍ली के कई इलाकों के लोग अपनी पेयजल की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर हैं, जिसमें यूरेनियम घुला पाया गया है। 

क्यों अहम है दिल्ली का यह मामला?

हाल के दशकों में देश की राजधानी दिल्ली की आबादी काफी तेजी से बढ़ने के कारण आज यहां की बड़ी आबादी भूजल पर निर्भर है। खासकर दिल्‍ली के बाहरी इलाकों और अनधिकृत कॉलोनियों में तो बोरिंग का पानी यानी ग्राउंड वाटर ही पेयजल का एकमात्र जरिया है। इसके अलावा दिल्‍ली के कई अंदरूनी इलाकों में भी पानी की आपूर्ति पूरी पर्याप्‍त न होने के कारण लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बोरवेल और ट्यूबवेल का उपयोग करते हैं। यदि ऐसे स्रोतों में यूरेनियम की मात्रा अधिक पाई जाती है तो यह लाखों लोगों की सेहत को खतरा हो सकता है। बीते दिनों इस विष्‍य पर प्रकाशित हमारी स्‍टोरी दिल्ली के भूजल में घुल रहा यूरेनियम सेहत से लेकर इको सिस्‍टम तक के लिए ख़तरा को पढ़ कर आप इस बारे में विस्‍तार से जानकारी प्रप्‍त कर सकते हैं।

यही कारण है कि NGT ने केवल रिपोर्ट मांगने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि संबंधित एजेंसियों से निगरानी व्यवस्था, परीक्षण पद्धति और सुधारात्मक कदमों का पूरा ब्यौरा भी मांगा है। NGT का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि अब जल प्रदूषण के मामलों में केवल रासायनिक या जैविक प्रदूषकों ही नहीं, बल्कि रेडियोधर्मी तत्वों की उपस्थिति पर भी गंभीरता से नजर रखी जा रही है। दिल्ली जैसे महानगर में जहां जल सुरक्षा पहले से चुनौती बनी हुई है, वहां भूजल में यूरेनियम का मुद्दा पर्यावरण, स्वास्थ्य और शहरी जल प्रबंधन जैसी तीनों ही चीजों से जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में DPCC और दिल्ली सरकार की रिपोर्ट यह स्पष्ट करेगी कि समस्या कितनी व्यापक है और इससे निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। 

देश के अन्य राज्यों में भी मिल चुका है यूरेनियम

यह समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी समय-समय पर भूजल में यूरेनियम की उच्च मात्रा पाए जाने की रिपोर्टें सामने आती रही हैं। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कुछ अध्ययनों में पंजाब के मालवा क्षेत्र के कई जिलों में भूजल में यूरेनियम की मात्रा मानकों से अधिक पाए जाने का उल्लेख किया गया था। इसी प्रकार हरियाणा और राजस्थान के कुछ इलाकों में केंद्रीय भूजल बोर्ड तथा अन्य शोध संस्थानों द्वारा किए गए परीक्षणों में भी बढ़ी हुई सांद्रता दर्ज की गई।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत के कई क्षेत्रों की भूगर्भीय संरचना ऐसी है जहां प्राकृतिक रूप से यूरेनियम युक्त खनिज मौजूद हैं। जब इन चट्टानों का लंबे समय तक भूजल के संपर्क में क्षरण होता है तो यूरेनियम पानी में घुल सकता है। कुछ विशेषज्ञ औद्योगिक गतिविधियों, फ्लाई ऐश के निपटान, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और गहरे भूजल दोहन को भी संभावित सहायक कारकों के रूप में देखते हैं। हालांकि हर क्षेत्र में कारण समान नहीं होते और विस्तृत भूवैज्ञानिक जांच के बाद ही किसी विशेष स्रोत की पुष्टि की जा सकती है।

इन रिपोर्टों ने यह स्पष्ट किया है कि भूजल में यूरेनियम की समस्या किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के कई हिस्सों में जल गुणवत्ता निगरानी को और मजबूत करने की आवश्यकता की ओर संकेत करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित परीक्षण, पारदर्शी डेटा साझा करने और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यूरेनियम भूजल में पहुंचता कैसे है?

यूरेनियम एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी तत्व है जो पृथ्वी की चट्टानों और मिट्टी में विभिन्न मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भीय संरचना के कारण यह धीरे-धीरे भूजल में घुल सकता है। कुछ मामलों में औद्योगिक गतिविधियां, खनन, फ्लाई ऐश, उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग और भूजल के अनियंत्रित दोहन जैसी मानवीय गतिविधियां भी इसकी सांद्रता बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक एक ही भूजल स्रोत पर निर्भरता और गहरे ट्यूबवेलों से पानी निकालने पर ऐसे तत्वों की उपस्थिति बढ़ सकती है।

यूरेनियम की कितनी मात्रा सुरक्षित मानी जाती है : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पेयजल में यूरेनियम की सुरक्षित सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है। भारत में भी पेयजल गुणवत्ता के लिए इसी के आसपास मानक अपनाए जाते हैं। यदि किसी क्षेत्र में यह स्तर लगातार इससे अधिक पाया जाता है तो वहां के जल स्रोतों की निगरानी और उपचार आवश्यक माना जाता है।

पानी में यूरेनियम के संदूषण के प्रति लोगों को जागृत और सचेत करना जरूरी है, ताकि उनके स्‍वास्‍थ्‍य को इससे कोई जोखिम न हो। 

स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है?

यूरेनियम को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसके रासायनिक विषैले प्रभाव को लेकर होती है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में यूरेनियम युक्त पानी पीने से किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कुछ अध्ययनों में हड्डियों और अन्य अंगों पर भी असर की आशंका जताई गई है। हालांकि जोखिम की वास्तविक गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि पानी में यूरेनियम की मात्रा कितनी है और व्यक्ति कितने समय से उसे इस्‍तेमाल कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यूरेनियम का असर केवल इसकी रेडियोधर्मिता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका रासायनिक विषैला प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। लगातार दूषित पानी पीने से शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं, हालांकि जोखिम की गंभीरता व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य स्थिति और सेवन की अवधि पर निर्भर करती है।

किडनी पर सबसे गंभीर असर

यूरेनियम का सबसे अधिक प्रभाव किडनी पर पड़ने की आशंका जताई जाती है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में यूरेनियम युक्त पानी पीने से किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि इससे शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

हड्डियों पर असर

यूरेनियम शरीर में पहुंचने के बाद कुछ मात्रा में हड्डियों में जमा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक इसका संचय हड्डियों की मजबूती और संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, जिससे हड्डियां कमज़ोर और रोगग्रस्‍त हो सकती हैं। हालांकि, इस संबंध में प्रभाव व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकते हैं।

अन्य शारीरकि दुष्‍प्रभाव

कुछ शोधों में यूरेनियम के लंबे संपर्क को शरीर के अन्य अंगों और ऊतकों पर भी प्रभाव डालने वाला बताया गया है। हालांकि इन प्रभावों को लेकर अभी व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन जारी हैं। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ नियमित निगरानी और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने पर जोर देते हैं।

मात्रा और अवधि पर निर्भर करता है जोखिम

हर स्थिति में यूरेनियम युक्त पानी समान स्तर का खतरा पैदा नहीं करता। यदि पानी में इसकी मात्रा बहुत कम है और संपर्क सीमित अवधि का है तो जोखिम अपेक्षाकृत कम हो सकता है। लेकिन मात्रा बढ़ने और लंबे समय तक सेवन जारी रहने पर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बढ़ जाती हैं।

लंबे समय तक इस्‍तेमाल  से बढ़ जाता है खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार सबसे अधिक चिंता उन लोगों को लेकर होती है जो वर्षों तक एक ही दूषित भूजल स्रोत पर निर्भर रहते हैं। लगातार सेवन से शरीर में यूरेनियम का संचय बढ़ सकता है, जिससे किडनी, हड्डियों और अन्य अंगों पर प्रभाव पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि प्रभावित क्षेत्रों में नियमित जल परीक्षण और वैकल्पिक सुरक्षित जल स्रोत उपलब्ध कराना आवश्यक माना जाता है।

क्या हो सकता है समाधान ?

विशेषज्ञों के अनुसार केवल पानी में यूरेनियम मिलने का परीक्षण कर लेना पर्याप्त नहीं है। लोगों को इसके गंभीर दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में नियमित मॉनिटरिंग, सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति, भूजल दोहन पर नियंत्रण और जल उपचार तकनीकों का उपयोग जरूरी है। रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) आधारित कुछ प्रणालियां यूरेनियम की मात्रा कम करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर सामुदायिक स्तर की व्यवस्था अधिक प्रभावी मानी जाती है। इसके अलावा वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देकर गहरे भूजल स्रोतों पर निर्भरता कम करना भी दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा हो सकता है।

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