स्रोत : विकी कॉमंस

भूजल

भूजल रिचार्ज को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने लॉन्च किया ‘पुन:भरण’ मोबाइल ऐप

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय
  • सैटेलाइट और भू-स्थानिक आंकड़ों पर आधारित ऐप की मदद से ग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान अब होगी आसान

  • तीन किलोमीटर के दायरे में संभावित रिचार्ज क्षेत्रों की खोज कर की जा सकेगी कृत्रिम भूजल पुनर्भरण की वैज्ञानिक प्लानिंग

  • स्थानीय स्‍तर जल प्रबंधन को बेहतर बनाने में 'गेम चेंजर’ साबित हो सकता है केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय का नया ऐप

भारत दुनिया में सबसे ज्‍यादा भूजल दोहन करने वाले देश है। भारत अकेले वैश्विक भूजल निकासी का लगभग 25% चानी एक चौथाई हिस्सा निकालता है। भारत हर साल लगभग 240 से 250 अरब घन मीटर (BCM) भूजल जमीन से निकालता है। यह अमेरिका और चीन के कुल भूजल दोहन से भी अधिक है। भूजल का यह अंधाधुंध दोहन ही देश में बढ़ते जल संकट की सबसे बड़ी वजह है। इसे देखते हुए अब सरकार भूजल रिचार्ज को बढ़ावा देने पर फोकस कर रही है। इसी दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने 28 अक्‍टूबर को ‘पुन:भरण’ मोबाइल ऐप लॉन्‍च किया है। सैटेलाइट और भू-स्थानिक आंकड़ों पर आधारित इस ऐप की मदद से ग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान करना अब आसान हो जाएगा। इससे तीन किलोमीटर के दायरे में संभावित रिचार्ज क्षेत्रों की खोज कर कृत्रिम भूजल पुनर्भरण की वैज्ञानिक ढंग से प्लानिंग की जा सकेगी। 

देश में भूजल के तेजी से घटते स्तर को एक बड़ी पर्यावरणीय समस्‍या और जल सुरक्षा के लिए कठिन चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में भूजल रिचार्ज (Groundwater Recharge) की जिम्‍मेदारी को केवल प्राकृतिक वर्षा जल संचय (Natural Rainwater Harvesting) के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भूमिगत जल स्रोतों तक पर्याप्‍त मात्रा में पानी पहुंचाने के लिए अब भूजल रिचार्ज संरचनाएं बनाना ज़रूरी हो गया है। इसके लिए यह जानना भी जरूरी है कि भूजल रिचार्ज के लिए कौन-सी जगह सबसे उपयुक्त है और वहां किस तरह की संरचना बनाई जानी चाहिए। अब तक कई स्थानों पर रिचार्ज पिट, सोख्ता गड्ढे, चेक डैम और अन्य जल संचयन संरचनाओं का निर्माण स्थानीय जानकारी या सामान्य अनुमान के आधार पर किया जाता रहा है। इसलिए जमीन की बनावट, ढलान, जल निकासी और भूजल की स्थिति को ध्यान में रखे बिना बनाई गई यह संरचनाएं अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं दे पातीं।

इसी समस्या के समाधान की दिशा में केंद्र सरकार ने एक नई डिजिटल पहल की है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने 28 अक्टूबर 2026 को ‘पुन:भरण’ (Punah Bharan) मोबाइल एप्लिकेशन लॉन्च किया। सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक इस ऐप का उद्देश्य भू-स्थानिक तकनीक और वैज्ञानिक आंकड़ों की मदद से कृत्रिम भूजल पुनर्भरण के संभावित स्थलों की पहचान करना और वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रिचार्ज संरचनाओं के चयन में मदद करना है। उपयोगकर्ता इस ऐप के जरिए अपने आसपास तीन किलोमीटर तक के दायरे में संभावित भूजल रिचार्ज क्षेत्रों की जानकारी हासिल कर सकेंगे। इससे जल संरक्षण की योजनाओं को ज्‍यादा सटीक बना कर बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

कैसे काम करेगा ‘पुन:भरण’ ऐप ?

‘पुन:भरण’ ऐप की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल जमीन की ऊपरी आकृति को ही नहीं देखता, बल्कि वहां की भौगोलिक और जलवैज्ञानिक परिस्थितियों के आधार पर वहां के आधार पर पानी जमा करने की संभावना का आकलन करके भूजल पुनर्भरण की उपयुक्तता सुनिश्चित करने में मदद करता है। इसके लिए यह ऐप अपने डेटाबेस में मौजूद विभिन्न प्रकार के भू-स्थानिक आंकड़ों का इस्तेमाल करता है। इनमें सैटेलाइट से प्राप्‍त भू-स्थानिक आंकड़े, वहां वर्षा की स्थिति, भूजल स्तर, भूजल की उपलब्धता और उपज (Groundwater Yield), जमीन की ढलान तथा जल निकासी (Drainage) से संबंधित जानकारियां शामिल हैं।

इन अलग-अलग आंकड़ों को एक साथ देखने से किसी क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों को समझना आसान होता है। उदाहरण के लिए, किसी स्थान पर वर्षा अच्छी होती है, लेकिन वहां जमीन की ढलान अधिक होने के कारण पानी तेजी से बहकर निकल जाता है। दूसरी ओर, किसी स्थान पर पानी के जमीन में समाने की संभावना अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है। ऐसे में केवल बारिश की मात्रा देखकर रिचार्ज संरचना बनाने का निर्णय लेना उचित नहीं होगा। ऐप में उपलब्ध आंकड़े इन पहलुओं को समझने और संभावित रिचार्ज स्थलों की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं।

3 किमी दायरे में रिचार्ज की संभावनाओं की जानकारी

इस ऐप की एक बड़ी खासियत यह है कि यह तीन किलोमीटर के दायरे में संभावित भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करता है। इससे किसी गांव, कस्बे या शहरी क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए उपयुक्त स्थानों की तलाश कर वहा सोख्‍ता गड्ढे, कंटूर ट्रेंच या चेक डैम जैसी कृत्रिम भूजल रिचार्ज संरचनाएं बनाने का काम सटीकता से किया जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र में वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज के लिए नए स्थान चिह्नित करने हैं, तो वह इस ऐप की मदद से बेहतर भूजल रिचार्ज वाले संभावित स्थलों का पता लगा सकती है।इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस स्थान पर किस तरह की रिचार्ज संरचना बनाना अधिक उपयोगी होगा। इस ऐप से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल स्थानीय निकायों, ग्राम पंचायतों, जल संरक्षण से जुड़ी सरकारी एजेंसियों और योजनाकारों द्वारा किया जा सकता है। इसके साथ ही ऐप के सहयोगी वेब पोर्टल पर गांव स्तर के कृत्रिम भूजल पुनर्भरण संरचना (Artificial Recharge Structure-ARS) के जोनिंग मैप, जीआईएस (Geographic Information System) और विभिन्न विषयों से संबंधित डेटा उपलब्ध कराया गया है। इस तरह यह मोबाइल ऐप और उससे जुड़ा वेब पोर्टल स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन की योजना तैयार करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

भारत में भूजल से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े (Groundwater Statistics in India)

पैरामीटर (Parameter)आंकड़े (Statistics / Share)विवरण (Description)
कुल वार्षिक भूजल रिचार्ज (Total Annual Groundwater Recharge)448.52 BCMदेश में साल भर में प्राकृतिक रूप से जमीन के नीचे पहुंचने वाला कुल पानी।
वार्षिक उपयोग योग्य भूजल (Annual Extractable Groundwater)407.75 BCMप्राकृतिक नुकसान को घटाकर तकनीकी रूप से निकाला जाने योग्य कुल पानी।
वार्षिक भूजल निकासी/दोहन (Annual Groundwater Extraction)247.22 BCMसभी जरूरतों (कृषि, घरेलू, उद्योग) के लिए सालाना जमीन से निकाला जाने वाला पानी।
राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की दर (Stage of Groundwater Extraction)60.63%उपयोग योग्य कुल संसाधन के मुकाबले वास्तविक निकासी का राष्ट्रीय औसत।
कृषि/सिंचाई में भूजल उपयोग का हिस्सा (Share in Agriculture/Irrigation)~87% - 89%निकाले गए भूजल का सबसे बड़ा हिस्सा, जो मुख्य रूप से सिंचाई में जाता है।
घरेलू और औद्योगिक उपयोग का हिस्सा (Share in Domestic & Industrial)~11% - 13%पीने के पानी, घरेलू कामों और औद्योगिक इकाइयों में होने वाली खपत।
पंजाब में भूजल दोहन की दर (Extraction Stage in Punjab)~160%रिचार्ज की तुलना में अत्यधिक दोहन, जिससे जल स्तर तेजी से गिर रहा है।
हरियाणा में भूजल दोहन की दर (Extraction Stage in Haryana)~134%उपलब्ध रिचार्ज संसाधन से कहीं अधिक पानी निकालने वाला दूसरा शीर्ष राज्य।
राजस्थान में भूजल दोहन की दर (Extraction Stage in Rajasthan)~109%कम बारिश और अत्यधिक निर्भरता के कारण गंभीर जल संकट से जूझ रहा राज्य।
भूजल रिचार्ज में मानसून/बारिश का योगदान (Rainfall Contribution to Recharge)~61%भारत में भूजल रिचार्ज का सबसे प्राथमिक और बड़ा प्राकृतिक स्रोत।

जमीन की बनावट के अनुसार रिचार्ज संरचना का चुनाव

भूजल रिचार्ज के लिए हर जगह एक जैसी संरचना कारगर नहीं होती। इसका निर्धारण इस बात से होता है कि वहां पर जमीन की सतह कैसी है, मिट्टी और चट्टानें किस तरह की हैं, पानी जमीन के भीतर किस तरह पहुंचता है और भूजल का स्तर कितना है। उदाहरण के लिए, जहां सतह के नीचे जलभृत (Aquifer) तक पानी के पहुंचने का रास्ता खुला है, वहां पर्कुलेशन टैंक, चेक डैम या नाला बंध जैसी संरचनाएं उपयोगी हो सकती हैं। वहीं, जहां सतह के नीचे कठोर या अभेद्य चट्टानों की परतें पानी के रिसाव में बाधक बनती हैं, वहां रिचार्ज शाफ्ट या रिचार्ज वेल जैसे विकल्पों को अपनाया जा सकता है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के कृत्रिम भूजल पुनर्भरण संबंधी दिशा-निर्देशों की पुस्तिका में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि रिचार्ज संरचनाओं का चयन क्षेत्र की भूगर्भीय और भूजल संबंधी परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। सतही जल को जमीन में पहुंचाने के लिए पर्कुलेशन टैंक (Percolation Tank) , गली प्लग (Gully Plug) और नाला बंध (Check Dam) जैसी संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुछ विशेष भूगर्भीय परिस्थितियों में रिचार्ज शाफ्ट और कुओं की जरूरत पड़ सकती है।

ऐसे में ‘पुन:भरण’ ऐप का महत्व केवल रिचार्ज के संभावित स्थानों की पहचान तक सीमित नहीं है। यह स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त संरचना चुनने की योजना बनाने में भी मदद कर सकता है। इससे जल संरक्षण के लिए उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और गलत स्थानों पर संरचनाएं बनाने से बचने की संभावना बढ़ेगी।

BISAG-N और NWM ने मिलकर बनाया ऐप

‘पुन:भरण’ मोबाइल ऐप को भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान यानी BISAG-N ने राष्ट्रीय जल मिशन (NWM) के सहयोग से विकसित किया है। यह जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग के अंतर्गत आने वाली पहल है।

BISAG-N भू-स्थानिक तकनीक, रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट आधारित अनुप्रयोगों के क्षेत्र में काम करने वाला एक स्वायत्त वैज्ञानिक संस्थान है। इसका पूरा नाम Bhaskaracharya National Institute for Space Applications and Geo-informatics है। यह प्राकृतिक और मानव निर्मित संसाधनों की मैपिंग, विकास संबंधी योजना निर्माण और निगरानी के लिए भू-स्थानिक तकनीक का इस्तेमाल करता है। इस विशेषज्ञता को भूजल प्रबंधन के साथ जोड़ कर पुन:भरण’ को एक ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया गया है, जो भौगोलिक और जलवैज्ञानिक आंकड़ों को एक साथ उपलब्ध कराकर रिचार्ज संबंधी निर्णय लेने में मदद कर सकता है। हालांकि इसमें इस्‍तेमाल की जाने वाली सैटेलाइट सर्वे या सेंसर की विशिष्ट जानकारी का विस्‍तृत विवरण अभी मंत्रालय ने साझा नहीं किया है।

क्यों जरूरी है भूजल रिचार्ज की वैज्ञानिक योजना?

भारत में भूजल का इस्तेमाल कृषि, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर होता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्य सरकारों के संयुक्त आकलन के अनुसार, वर्ष 2025 में देश में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 448.52 अरब घन मीटर (BCM) आंका गया, जबकि वार्षिक निष्कर्षण योग्य भूजल संसाधन 407.75 अरब घन मीटर था। इस दौरान कुल भूजल दोहन 247.22 अरब घन मीटर रहा। भूजल दोहन का स्तर उपलब्ध निष्कर्षण योग्य संसाधन का 60.63 प्रतिशत था।

इस आकलन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि देश की 6,762 आकलन इकाइयों (ब्लॉक, तालुका और मंडल) में से 730 इकाइयों को अति-दोहित (Over-exploited) श्रेणी में रखा गया। इन क्षेत्रों में भूजल का दोहन सालाना उपलब्ध पुनर्भरण से अधिक है। इसके अलावा 206 इकाइयां गंभीर (Critical) श्रेणी में हैं, जहां भूजल दोहन का स्तर 90 से 100 प्रतिशत के बीच है। ये आंकड़े बताते हैं कि भूजल संरक्षण के लिए केवल पानी की खपत कम करना ही नहीं, बल्कि वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाने के लिए उपयुक्त स्थानों और संरचनाओं की पहचान करना भी जरूरी है। ‘पुन:भरण’ ऐप इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

बेहतर होंगी जल संरक्षण योजनाएं

देश विभिन्‍न भागों में कई तरह की जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के लिए योजनाएं और अभियान केंद्र व राज्‍य सरकारों की ओर से चलाए जा रहे हैं। इनमें जल शक्ति मंत्रालय का ‘कैच द रेन’ अभियान, अटल भूजल योजना तथा विभिन्न राज्यों की वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज संबंधी पहल शामिल हैं। इनके तहत तालाबों के पुनरुद्धार, चेक डैम, सोख्ता गड्ढों, रिचार्ज कुओं और अन्य जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण किया जाता है।

ऐसी योजनाओं में सबसे बड़ी जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि जहां संरचनाएं बनाई जा रही हैं, वहां वास्तव में भूजल पुनर्भरण की पर्याप्त संभावना भी हो। ‘पुन:भरण’ ऐप के माध्यम से मिलने वाली स्थान आधारित जानकारी इस दिशा में उपयोगी साबित हो सकती है। उदाहरण के लिए, किसी ग्राम पंचायत में अगर मनरेगा या अन्य सरकारी योजनाओं के तहत जल संरक्षण के कार्य किए जाने हैं, तो इस ऐप के जरिये उपलब्ध भू-स्थानिक आंकड़ों के आधार पर संभावित स्थलों की प्राथमिकता तय करने में मदद मिल सकती है। इससे अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर समन्वय और जल संरक्षण के लिए उपलब्ध बजट का बेहतर ढंग से  इस्तेमाल कर अच्‍छे नतीजे प्राप्‍त किए जा सकते हैं। हालांकि, इसके लिए ऐप से मिलने वाली जानकारी के साथ ही किसी संरचना के निर्माण से पहले संबंधित स्थल का भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, मिट्टी और चट्टानों की प्रकृति, जल की उपलब्धता तथा स्थानीय परिस्थितियों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करना भी जरूरी होगा।

सुधर सकता है स्थानीय स्‍तर जल प्रबंधन 

‘पुन:भरण’ ऐप भूजल रिचार्ज के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। हालां‍कि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसका इस्तेमाल सरकारी विभागों, ग्राम पंचायतों, शहरी निकायों और जल संरक्षण से जुड़े अन्य हितधारकों द्वारा कितने प्रभावी ढंग से किया जाता है। साथ ही, ऐप के बेहतर उपयोग के लिए इसे स्थानीय स्तर पर तैयार की जाने वाली जल संरक्षण योजनाओं के साथ जोड़ना भी जरूरी होगा। इसके अलावा यह भी ध्यान रखना होगा कि भूजल संकट का समाधान केवल रिचार्ज संरचनाएं बनाने से नहीं हो सकता। इसके लिए जिन क्षेत्रों में भूजल का दोहन पुनर्भरण की तुलना में अधिक है, वहां पानी की मांग और खपत को नियंत्रित करना, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना, सिंचाई में दक्षता बढ़ाना और पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना भी उतना ही जरूरी है।

इसलिए ‘पुन:भरण’ ऐप को भूजल प्रबंधन के व्यापक प्रयासों की कड़ी में एक तकनीकी सहयोगी के रूप में देखना ही अधिक उचित होगा। यदि इसके जरिए वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर सही स्थानों पर रिचार्ज संरचनाएं बनाई जाती हैं और उनके रखरखाव तथा प्रभाव का नियमित आकलन किया जाता है, तो यह देश में भूजल संरक्षण की योजनाओं को अधिक परिणामोन्मुख बनाने में यह ऐप एक 'गेम चेंजर’ साबित हो सकता है।

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