जल जीवन मिशन में गड़बड़ी और भ्रष्‍टाचार के चलते हर घर में नल का स्‍वच्‍छ पेयजल पहुंचाने के लक्ष्‍य को नुकसान पहुंच रहा है। 

 

फोटो : फेसबुक

नीतियां और कानून

यूपी में ED ने शुरू की जल जीवन मिशन में गड़बड़ी की जांच, 6 IAS शक के घेरे में

जल निगम (ग्रामीण) के MD से मांगा हर घर नल से जल योजना में गिर रही टंकियों की मंजूरी से लेकर भुगतान तक का पूरा हिसाब

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

हर घर तक स्‍वच्‍छ पेयजल पहुंचाने के मकसद से शुरू किया गया जल जीवन मिशन और उसके तहत ‘हर घर नल से जल' का लक्ष्‍य कई जगहों पर तगड़े भ्रष्‍टाचार की चपेट में आकर ठेकेदारों, अधिकारियों और नेताओं के लिए अवैध कमाई का एक जरिया बनकर रह गया है। देश में सबसे ज्‍यादा आबादी वाले राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में इस योजना में कई बड़ा गड़बड़झाला के सामने आने के बाद अब केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने इसकी जांच शुरू कर दी है। योजना से जुड़े भ्रष्‍टाचार की जड़ें ठेकेदारों से लेकर उच्‍च अधिकारियों तक फैली दिख रही हैं। इसके चलते  राज्‍य के 6 वरिष्‍ठ  IAS अधिकारी भी ED इस जांच के घेरे में आ गए हैं। 

टंकी के निर्माण से लेकर भुगतान तक की होगी पड़ताल

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ईडी ने 2021 और उसके बाद योजना से जुड़े जल निगम और जल निगम (ग्रामीण) में रहे करीब आधा दर्जन आईएएस अधिकारियों से जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल से जल योजना में खराब हुईं टंकियों की मंजूरी से लेकर भुगतान तक का पूरा हिसाब मांगा है। ईडी ने इन जानकारियों के लिए  20 कॉलम का प्रारूप जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक (MD) को भेजा है। इस फॉर्मेट के तहत प्रत्येक टंकी की स्वीकृति से भुगतान तक का ब्यौरा उपलब्ध कराने को कहा गया है। इसमें जल जीवन मिशन के तहत स्‍थापित ऐसी पानी की ऐसी टंकियां शामिल हैं, जो कमीशनिंग से पहले या बाद, परीक्षण में या उपयोग के दौरान गिर गईं, फट गईं या टंकियों में दरार या रिसाव झुक जाने, धंस जाने की घटनाएं हुईं। इसके अलावा खामियों के चलते टंकियों को असुरक्षित या अनुपयोगी घोषित करने के मामले सामने आए। ईडी ने यह सूचना धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 की धारा 54 के तहत मांगी है। 

जांच में केवल टंकी की हालत नहीं, बल्कि उसकी स्वीकृति से लेकर भुगतान तक की पूरी शृंखला देखने को मिल रही है। इसमें डीपीआर, डिजाइन, मृदा परीक्षण, संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणपत्र, निविदा, कार्यादेश, ठेकेदार और उपठेकेदार का विवरण, सीमेंट-सरिया जैसी सामग्री की जांच रिपोर्ट तथा थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन की रिपोर्ट शामिल है। भुगतान से जुड़े आरए बिल, अंतिम बिल और संबंधित बैंक खातों का विवरण भी मांगा गया है। इस जांच दायरे में 2021 में जल निगम के ग्रामीण और नगरीय हिस्से अलग होने से पहले तथा उसके बाद के अधिकारियों के कार्यकाल भी आ रहे हैं। समस्या केवल भ्रष्टाचार की घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि निगरानी, ठेका प्रक्रिया, गुणवत्ता जांच और योजना पूरी होने के बाद संचालन की व्यवस्था में भी कई खामियां देखने को मिली हैं।

देशभर की 84% शिकायतें अकेले यूपी से आईं

उत्‍तर प्रदेश में जल जीवन मिशन में गड़बड़ी के स्‍तर वाकई हैरान करने वाला है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में राज्यसभा में जानकारी दी थी कि 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से वित्तीय अनियमितता और खराब गुणवत्ता से जुड़ी 17,036 शिकायतें मिली थीं। इनमें अकेले उत्तर प्रदेश की 14,264 शिकायतें, यानी कुल शिकायतों का करीब 84 प्रतिशत थीं। यूपी सरकार के अनुसार इन सभी शिकायतों में जांच शुरू की गई, 14,212 मामलों में रिपोर्ट जमा की जा चुकी थी और 52 मामलों की जांच जारी थी। 434 मामलों में कार्रवाई की गई, जिसमें 171 विभागीय अधिकारी, 120 ठेकेदार और 143 थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन एजेंसियां शामिल थीं। इन शिकायतों में वित्तीय अनियमितता के साथ खराब गुणवत्ता से जुड़े मामले भी शामिल हैं और कई शिकायतें जांच में हल या अप्रासंगिक भी पाई गईं। शिकायतों की इतनी बड़ी संख्या यह जरूर दिखाती है कि इतने बड़े पैमाने पर चल रही ग्रामीण जलापूर्ति परियोजनाओं में निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण को मजबूत करना कितना महत्वपूर्ण है।

टंकी ढहने से फर्जी भुगतान तक के मामले

हाल में यूपी में सामने आएउदाहरण जल जीवन मिशन में भ्रष्‍टाचार की अलग-अलग परतों को उजागर करते हैं। मई 2025 में सीतापुर के चुनका गांव में जल जीवन मिशन के तहत करीब 5.31 करोड़ रुपये की लागत से बनी पानी की टंकी पानी की आपूर्ति शुरू होने के महज़ दो महीने में ही ढह गई। इस घटना ने निर्माण गुणवत्ता और निगरानी पर सवाल खड़े किए। दूसरी ओर, प्रयागराज में मई 2026 में विभागीय जांच के दौरान पानी टंकी के निर्माण और पाइप लाइन बिछाने के नाम पर करीब 20 करोड़ रुपये के कथित फर्जी भुगतान का मामला सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार 112 योजनाओं में अलग-अलग कामों के नाम पर भुगतान और कुछ ऐसी योजनाओं में भी भुगतान की शिकायत सामने आई जहां पहले ही पाइपलाइन बिछ चुकी थी। इस मामले में अधीक्षण अभियंता, अधिशासी अभियंता समेत कई इंजीनियरों की जांच शुरू की गई और तकनीकी टीम को मौके पर भेजा गया। मामले की जांच जारी है।

इससे पहले 2025 में यूपी के 30 जिलों के 79 गांवों में थर्ड पार्टी जांच के दौरान ऐसे गांवों की शिकायत सामने आई थी, जहां विभागीय रिकॉर्ड में घर-घर नल कनेक्शन पूरा बताया गया, लेकिन जांच में कनेक्शन नहीं मिले। इसी जांच में कई गांवों में पानी के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए जाने के बावजूद शुद्ध पेयजल की रिपोर्ट किए जाने की बात सामने आई थी।

सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, सिस्टम की कमजोरियां भी हैं समस्या 

जल जीवन मिशन की संरचना बहुत बड़ी और बहुस्तरीय है। इसमें केंद्र, राज्य, जिला स्तर की संस्थाएं, जल निगम/पीएचईडी, ग्राम पंचायत, पानी समितियां, ठेकेदार, थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन एजेंसियां और ग्रामीण समुदाय तक शामिल हैं। इतने स्तर होने का उद्देश्य निगरानी को मजबूत करना है। हालांकि यह व्यवस्था कई जगह जिम्मेदारी के बंटने और जवाबदेही के कमजोर होने की वजह भी बन रही है।

मसलन, योजना में भुगतान से पहले थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन अनिवार्य रखने का प्रावधान है। एजेंसी को सामग्री, निर्माण गुणवत्ता, काम की मात्रा, भुगतान के दावे और ट्रायल रन तक की जांच करनी होती है। लेकिन,  थर्ड पार्टी रिपोर्ट के बावजूद कई जगह टंकियों में गंभीर खामियां देखने को मिल रही हैं, जिसके बावजूद भुगतान हो जा रहा है। ऐसे में  सवाल यह है कि इन मामलों में जिम्मेदारी किसकी होगी? यही वह जगह है जहां कागजी अनुपालन और वास्तविक निगरानी के बीच अंतर दिखाई दे रहा है।

बीते दिनों उत्‍तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 3 करोड़ रुपये से ज्‍यादा की लागत से बनी पानी की टंकी ट्रायल के दौरान ही ध्‍वस्‍त हो गई।

टेंडर से भुगतान तक कहां-कहां है गड़बड़ी की गुंजाइश?

जल जीवन मिशन के तहत टंकियों या पाइप लाइन बिछाने के कार्य के टेंडर से लेकर काम पूरा होने और उसका भुगतान किए जाने तक कई स्‍तरों पर गड़बड़ी की गुंजाइशें दिखाई देती हैं- 

  1. ठेका और निविदा प्रक्रिया : बड़ी परियोजनाओं में ठेकेदार की तकनीकी क्षमता, पिछले काम का रिकॉर्ड और एक साथ लिए गए कामों की संख्या की वास्तविक जांच जरूरी है।

  2. डीपीआर और डिजाइन : पानी की टंकी, पाइपलाइन, पंपिंग स्टेशन या इंटेक स्ट्रक्चर का डिजाइन स्थानीय मिट्टी, भूजल, पानी की उपलब्धता और आबादी के हिसाब से होना चाहिए। कागज पर एक जैसा डिजाइन जमीन पर अलग-अलग परिस्थितियों में जोखिम पैदा कर सकता है।

  3. मटेरियल और निर्माण गुणवत्ता : सीमेंट, सरिया, एग्रीगेट, पाइप और अन्य सामग्री की लैब रिपोर्ट होना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि जिस सामग्री की जांच हुई, वही सामग्री वास्तव में साइट पर इस्तेमाल हुई या नहीं।

  4. माप और भुगतान : पाइपलाइन कितनी बिछी, कितने कनेक्शन वास्तव में लगे, कितनी टंकी बनी और कितनी चालू हुई—इन सबका स्वतंत्र भौतिक सत्यापन भुगतान से पहले होना चाहिए।

  5. ‘हर घर जल’ प्रमाणन : कनेक्शन लगा देना और नियमित पानी पहुंचाना दो अलग बातें हैं। यूपी के अपने पोर्टल पर निरीक्षण रिकॉर्ड में ऐसे उदाहरण भी दर्ज हैं जहां किसी गांव में कनेक्शन पूरे होने के बावजूद नियमित पानी न मिलने की शिकायत दर्ज हुई।

घर नहीं, केवल कागज पर लग रहे नल 

जल जीवन मिशन में भ्रष्‍टाचार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कई मामलों में नल घरों में नहीं, बल्कि केवल कागजों पर ही लग रहे हैं। सितंबर 2026 के यूपी पोर्टल के अनुसार राज्य में करीब 2.67 करोड़ ग्रामीण परिवारों में 2.46 करोड़ FHTC, यानी 92.27 प्रतिशत दर्ज हैं। लेकिन केंद्र के 2024 के स्वतंत्र Functionality Assessment में देशभर के 19,812 ‘हर घर जल’ गांवों और 2.37 लाख परिवारों के सर्वे में पाया गया कि 98.1 प्रतिशत परिवारों में नल कनेक्शन उपलब्ध था, लेकिन केवल 86.5 प्रतिशत कनेक्शन काम कर रहे थे। पर्याप्त मात्रा में पानी पाने वाले परिवार 80.2 प्रतिशत और नियमित आपूर्ति पाने वाले 83.6 प्रतिशत थे। निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पानी पाने वाले परिवारों का हिस्सा 76 प्रतिशत था।

इसलिए किसी योजना की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने नल लगाए गए, बल्कि यह भी होना चाहिए कि कितने नलों से सालभर नियमित, पर्याप्त और सुरक्षित पानी आ रहा है। मतलब, नल लगाने के कार्यों मे मूल्यांकन केवल FHTC यानी Functional Household Tap Connection की संख्या से नहीं होना चाहिए। 

भ्रष्टाचार रोकने के लिए क्या हों बदलाव ?

जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कई स्‍तर पर और कई तहर के बदलाव करने की जरूरत है। इसका समाधान केवल अधिक जांच एजेंसियां लगाने में नहीं है। पूरी प्रक्रिया में डिजिटल निगरानी और संस्थागत नियंत्रण की ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए, जिनसे गड़बड़ी करना मुश्किल हो। इसके लिए जरूरी कुछ प्रमुख बदलाव इस प्रकार हो सकते हैं-

1. भुगतान को वास्तविक पानी से जोड़ना: अंतिम भुगतान का एक हिस्सा केवल निर्माण पूरा होने पर नहीं, बल्कि कम से कम एक-दो गर्मियों और मानसून चक्र के दौरान नियमित जलापूर्ति के स्वतंत्र सत्यापन से जोड़ा जा सकता है।

2. जियो-टैग और टाइम-स्टैम्प फोटो: पाइपलाइन, टंकी, पंप, कनेक्शन और जलस्रोत की प्रगति की तस्वीरों को जियो-टैग और तारीख के साथ अनिवार्य किया जाए।

3. स्वतंत्र थर्ड पार्टी ऑडिट: जिस एजेंसी ने डिजाइन या तकनीकी सलाह दी है, उसी से गुणवत्ता प्रमाणन न कराया जाए। एजेंसी चयन और निरीक्षण रिपोर्ट दोनों सार्वजनिक किए जाएं।

4. ठेकेदारों की सार्वजनिक परफॉर्मेंस हिस्ट्री: किस कंपनी ने कितने काम किए, कितने समय में पूरे किए, कितनी बार गुणवत्ता संबंधी शिकायत हुई, कितने कामों में पेनल्टी लगी—इसका राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाए।

5. एक ठेकेदार की क्षमता की सीमा: एक ही कंपनी को उसकी तकनीकी और वित्तीय क्षमता से बहुत अधिक परियोजनाएं मिलने पर स्वत: अलर्ट की व्यवस्था हो।

6. ग्राम पंचायत की वास्तविक भूमिका: JJM की मूल गाइडलाइन में ग्राम पंचायत/पानी समिति को योजना की निगरानी, सामाजिक ऑडिट, जल गुणवत्ता परीक्षण और तीसरे पक्ष की जांच में भागीदारी की जिम्मेदारी दी गई है। इसे केवल कागजी समिति न रहने देकर नियमित सार्वजनिक बैठक और सोशल ऑडिट से जोड़ा जाए।

7. शिकायत से कार्रवाई तक सार्वजनिक ट्रैकिंग: शिकायत कब मिली, किस अधिकारी को भेजी गई, स्थल निरीक्षण कब हुआ, क्या कमी मिली और क्या कार्रवाई हुई—यह जानकारी सार्वजनिक डैशबोर्ड पर दिखाई जानी चाहिए।

8. ‘हर घर जल’ की दोबारा जांच: एक बार प्रमाणित गांव को अंतिम उपलब्धि न मानकर हर साल स्वतंत्र नमूना जांच हो। क्योंकि कनेक्शन लगाने के बाद भी पंप खराब, पाइपलाइन लीक, स्रोत सूखने या बिजली की समस्या से आपूर्ति बंद हो सकती है।

9. आपूर्ति सुधारने पर जोर : जून 2026 में जारी अधिसूचना के साथ ही जल जीवन मिशन अब दूसरे चरण यानी JJM 2.0 में पहुंच चुका है। अब  मिशन का फोकस केवल नई जल संरचनाएं बनाने से आगे बढ़कर जलापूर्ति को सुधारने और उसमें निरंतरता (sustainable) पर होना चाहिए।

10. कठोरता से लागू हों नियम : योजना की मूल गाइडलाइन में भी पानी की गुणवत्ता, सामाजिक ऑडिट, जियो-टैगिंग, रियल-टाइम डैशबोर्ड और थर्ड पार्टी निरीक्षण जैसे कई सुरक्षा उपाय पहले से मौजूद हैं। समस्या इसलिए केवल नियमों की कमी की नहीं है; बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा नियम जमीन पर कितनी स्वतंत्रता और कठोरता से लागू हो रहे हैं।

निष्‍कर्ष : नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं, जल सुरक्षा और सेहत भी संकट में

जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार या खराब गुणवत्ता का असर किसी दूसरी सड़क या भवन परियोजना से अलग है। खराब सड़क को कुछ समय बाद फिर बनाया जा सकता है, लेकिन पेयजल योजना में घटिया पाइपलाइन या खराब टंकी का मतलब है कि ग्रामीण परिवारों को पानी के लिए हैंडपंप, निजी बोरवेल या दूर के स्रोत पर निर्भर होना पड़ सकता है। इससे योजना पर खर्च हुआ पैसा तो डूबता ही है, महिलाओं और बच्चों का पानी लाने में लगने वाला समय, भूजल पर निर्भरता, स्वास्थ्य और गांव की जल सुरक्षा भी प्रभावित होती है। यही वजह है कि जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार को केवल वित्तीय अपराध के रूप में नहीं, बल्कि जल सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सवाल के रूप में देखना जरूरी है।

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