जाड़े में धुएं का प्रदूषण कोहरे से मिलकर दिल्ली की फिज़ाओं को धुंधला और हवाओं को ज़हरीला बना देता है।
फोटो : विकी कॉमंस
सर्दियों की आहट के साथ ही देश की राजधानी नई दिल्ली की लोगों की टेंशन बढ़ जाती है। कोहरे, धुएं और धूल के मेल से बनने वाला 'स्मॉग' हवाओं में इस कदर ज़हर घोल देता है कि लोगों में सांस और त्वचा से जुड़ी समस्याएं बढ़ जाती हैं। हवा की गुणवत्ता यानी AQI (Air Quality Index) में अचानक से आई गिरावट की खबरें देश ही नहीं, दुनिया भर में समाचारों की सुर्खियों छा जाती हैं। वायु प्रदूषण के मुद्दे के तूल पकड़ते ही सरकार की ओर से आनन-फानन में कई तरह के कदम उठाए जाते हैं। पर, यह कवायदें कोई खास कारगर होती नहीं दिखतीं। इसकी दो वजहें होती हैं। एक, तो इनमें से बहुत से काम दिखावटी होते हैं। दूसरे, देर से उठाए गए इन कदमों तक AQI इतना बिगड़ चुका होता है कि उसे सुधारा नहीं जा पाता। इन सब नकारात्मकताओं के बीच राहत की खबर यह है कि इस बार सरकार जाड़े की दस्तक से पहले ही वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने को लेकर सक्रिय होती नज़र आ रही है। पिछले एक हफ्ते में इससे जुड़ी कई खबरें विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई हैं। इनमें वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए गाडि़यों को PUC (Pollution Under Control) प्रमाणपत्र के बिना ईंधन न दिया जाना। वाहनों की भीड़ कम करने के लिए पार्किंग शुल्क में बढ़ोतरी, भवनों के निर्माण (Construction) और गिराने (Demolition) की गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगाना और कंपनियों में 50% वर्क फ्रॉम होम (WFH) लागू करने जैसी तैयारियां सबसे अहम हैं। इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर में औद्योगिक प्रदूषण पर निगरानी बढ़ाने के लिए कमीशन फॉर एयर क्वॉलिटी मैनेजमेंट (CAQM) ने इंडस्ट्री में पैन-टिल्ट-जूम (PTZ) कैमरे लगाने का आदेश दिया है। यह कैमरे फ्यूल स्टोरेज और चार्जिंग पॉइंट पर लगाए जाएंगे। उद्योगों को 31 अक्टूबर तक व्यवस्था पूरी करनी होगी। देखना होगा कि यह घोषणाएं और तैयारियां इन सर्दियों में दिल्ली वासियों को ज़हरीले वायु प्रदूषण की मार से किस हद तक निजात दिला पाएंगी।
दिल्ली के वायु प्रदूषण से निपटने की इस बार की रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकार ने सिर्फ AQI बिगड़ने के बाद पाबंदियां लगाने के बजाय कुछ कदमों को पहले से लागू करने का फैसला किया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आस-पास के इलाकों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी COMMISSION FOR AIR QUALITY MANAGEMENT IN NATIONAL CAPITAL REGION AND ADJOINING AREAS (CAQM) इसे लेकर 29 सितंबर को विस्तृत निर्देश भी जारी कर चुका है। इसमें एक अहम बात यह है कि सरकार ने इन निर्देशों को एक स्थायी व्यवस्था के रूप में तैयार किया है, ताकि हर साल सर्दियां शुरू होने के बाद अलग-अलग आदेश जारी करने की जरूरत कम हो। यह व्यवस्था CAQM के संशोधित GRAP और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के साथ लागू होगी। यानी इस बार कोशिश यह है कि प्रदूषण बढ़ने का इंतजार करने के बजाय नवंबर से ही यातायात, निर्माण, धूल और कार्यालयों से जुड़े उत्सर्जन को कम किया जाए।
एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली सरकार के स्थायी Winter Pollution Master Plan के तहत हर साल 1 नवंबर से 28 फरवरी तक प्रदूषण नियंत्रण के उपाय लागू रहेंगे। इनमें बिना वैध PUC प्रमाणपत्र वाले वाहनों को ईंधन नहीं देने, पार्किंग शुल्क दोगुना करने, कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम देने और कार्यालयों के समय में बदलाव जैसे उपाय शामिल हैं। 1 नवंबर से 31 जनवरी तक धूल पैदा करने वाले निर्माण और तोड़फोड़ के कामों पर रोक का प्रावधान है, जबकि गंभीर प्रदूषण की आशंका वाले समय में और कड़े प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
पिछली सर्दियों के आंकड़े इस बार की चिंता को समझने के लिए काफी हैं। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर CREA की रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच दिल्ली का औसत PM2.5 स्तर करीब 163 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। इस अवधि में दिल्ली में 18 दिन AQI 'Severe', 87 दिन 'Very Poor', 24 दिन 'Poor', 15 दिन 'Moderate', छह दिन 'Satisfactory' और केवल एक दिन 'Good' रहा। यानी पिछले जाड़े में पांच महीने की अवधि में दिल्ली की हवा अधिकांश समय खराब से लेकर गंभीर श्रेणी में रही। यह विश्लेषण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के Continuous Ambient Air Quality Monitoring Stations के आंकड़ों पर आधारित था।
इन आंकड़ों की तुलना अगर WHO की 2021 की वायु गुणवत्ता गाइडलाइन के मानकों से करें तो करें तो स्थिति खासी गंभीर दिखाई देती है। क्योंकि WHO की गाइडलाइन PM2.5 की वार्षिक औसत सांद्रता 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 24 घंटे की औसत सांद्रता 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के दायरे में रखने की सिफारिश करती है। दिल्ली में पिछले जाड़े का औसत 163 माइक्रोग्राम तक पहुंचना इसकी वायु गुणवत्ता की गंभीर स्थिति को साफ दिखाता है। हालांकि WHO की गाइडलाइन और भारत के राष्ट्रीय मानक अलग-अलग हैं, लेकिन यह तुलना बताती है कि दिल्ली की समस्या केवल कुछ दिनों के 'स्मॉग एपिसोड' तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने की भी है।
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग द्वारा जारी हालिया एयर क्वालिटी बुकलेट में अक्टूबर से फरवरी की सर्दियों के आंकड़े भी स्थिति की एक लंबी तस्वीर देते हैं। 2016-17 की सर्दियों में दिल्ली में केवल 8 दिन Good, Satisfactory या Moderate श्रेणी में रहे थे, जबकि 143 दिन Poor, Very Poor या Severe श्रेणी में थे। 2024-25 में कुछ सुधार होने से अच्छी से Moderate श्रेणी वाले दिनों की संख्या 35 तक पहुंची, जबकि खराब से Severe श्रेणी वाले दिन 115 रहे। यानी नौ साल में स्थिति में मामूली सुधार के बावजूद सर्दियों के कुल दिनों का बड़ा हिस्सा अब भी खराब हवा की श्रेणियों में गुजर रहा है। Severe और Severe+ दिनों को देखें, तो 2018-19 में ऐसे 24 Severe दिन थे। 2019-20 में 15 Severe और पांच Severe+ दिन रहे। 2022-23 में यह संख्या घटकर आठ Severe दिन रह गई, लेकिन 2023-24 में फिर 14 Severe और दो Severe+ दिन दर्ज किए गए, जबकि 2024-25 में 11 Severe और तीन Severe+ दिन रहे। इन आकड़ों से पता चलता है कि केवल औसत AQI में सुधार को प्रदूषण की समस्या खत्म होने का संकेत नहीं माना जा सकता। कुछ बेहद खराब दिनों में प्रदूषण का स्तर अब भी बहुत ऊंचा पहुंच जाता है।
दिल्ली के प्रदूषण को लेकर सबसे आम सवाल यह है कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण, सड़क की धूल, उद्योगों का प्रदूषण या पराली जलाने से उठने वाला धुआं। वास्तव में इसका कोई एक जवाब नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययनों और सरकारी रिपोर्टों से पता चलता है कि दिल्ली की हवा में अलग-अलग स्रोतों का योगदान मौसम के अनुसार बदलता रहता है।
CAQM के दस्तावेज में IIT कानपुर और TERI-ARAI के अध्ययन के आधार पर सर्दियों में PM2.5 के स्रोतों में secondary particles, वाहन, biomass burning, उद्योग तथा dust/construction को प्रमुख माना गया है। एक आकलन में सर्दियों के PM2.5 में secondary particles का योगदान करीब 30 प्रतिशत, वाहनों का 25 प्रतिशत और पराली जलाने (biomass burning) का 26 प्रतिशत बताया गया था। TERI-ARAI के आकलन में क्रमशः ये हिस्सेदारी 26, 23 और 22 प्रतिशत थी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि दिल्ली का जहरीला वायु प्रदूषण केवल वाहनों या केवल पराली जलाने से पैदा होता है। वास्तव में दिल्ली के वायु प्रदूषण को स्थानीय गतिविधियां और NCR व आसपास के राज्यों से आने वाला प्रदूषण मिलकर बढ़ाते हैं। TERI के अध्ययन में सर्दियों के दौरान दिल्ली की अपनी emissions का औसत योगदान करीब 36 प्रतिशत आंका गया था। इसका मतलब यह हुआ कि बाकी प्रदूषण के लिए दिल्ली से बाहर के स्रोतों और क्षेत्रीय वायु प्रवाह को भी देखना जरूरी है।
दिल्ली में हवा की गुणवत्ता चिंताजनक स्तर पर पहुंच जाने पर वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए पानी के छिड़काव जैसे तात्कालिक इंतज़ाम अकसर नाकाफी साबित होते हैं।
दिल्ली-NCR में प्रदूषण नियंत्रण का सबसे चर्चित ढांचा Graded Response Action Plan यानी GRAP है। इसके तहत AQI के आधार पर चार स्तर बनाए गए हैं-
Stage-I : 201-300 AQI पर Poor
Stage-II : 301-400 पर Very Poor
Stage-III : 401-450 पर Severe
Stage-IV ➕ 450 से ऊपर Severe+
हवा के हालात बिगड़ने की असली वजह GRAP को सही ढंग से लागू करने की व्यवस्था न होना है। समझने वाली बात यह है कि GRAP केवल AQI बहुत बिगड़ जाने की स्थिति में लागू करने की व्यवस्था नहीं है। बल्कि, AQI को ठीक स्थिति में रखने के लिए इसे स्थायी तौर पर अमल में लाना जरूरी है। ऊपर बताए गए Stage-I में मशीनी सफाई (mechanised sweeping), पानी का छिड़काव, खुले में कचरा जलाने पर रोक और construction sites पर उड़ने वाली धूल पर नियंत्रण (dust control) जैसे उपाय करने होते हैं। इसी तरह Stage-II में parking fees बढ़ाने, ट्रैफिक कम करने और डीजल जेनरेटरों पर कड़े नियंत्रण जैसे कदम शामिल हैं। Stage-III में construction और demolition पर और पूरी तरह रोक और वाहनों की संख्या से जुड़ी सख्त पाबंदियां लागू करनी होती हैं, जिसकी मिसाल बीते वर्षों में ऑड-इवेन की व्यवस्था के रूप में देखी गई है। इसके अलावा Stage-IV में दिल्ली में ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों जैसे trucks के प्रवेश पर रोक और स्कूलों में छुट्टी और दफ्तरों में एक निश्चित अनुपात में कर्मचारियों से वर्क फ्रॉम होम (WFH) करवाने जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती है।
यहां असली चुनौती इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने की होती है। क्योंकि केवल आदेश जारी कर देना और जमीन पर उसका पालन होना दो अलग बातें हैं। इसीलिए इस बार दिल्ली में Integrated Command and Control Centre के जरिए प्रदूषण स्रोतों की real-time निगरानी, AI आधारित विश्लेषण, GPS वाली field teams और निर्माण स्थलों पर CCTV कैमरे व AI monitoring की व्यवस्था जरूरी है। इसे लेकर CAQM ने सभी इंडस्ट्री में पैन-टिल्ट-जूम (PTZ) कैमरे लगाने का आदेश जारी किया है। उद्योगों को एक्स्ट्रा कैमरे 31 अक्टूबर 2026 तक लगाने होंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार 700 से अधिक construction sites सरकार की निगरानी के दायरे में हैं और सर्दियों में 78 field teams तैनात की जाएंगी।
दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण अचानक बढ़ने की एक बड़ी वजह मौसम भी है। दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के मुताबिक हवा की गति, हवा की दिशा, नमी (humidity) और तापमान जैसे मौसमी कारक (meteorological factors) भी सर्दियों में वायु प्रदूषण के स्तर में अहम भूमिका निभाते हैं। सर्दियों में तापमान में गिरावट और हवा की रफ्तार में कमी प्रदूषकों को जमीन के पास रोक देते हैं। इसके विपरीत तेज हवाएं प्रदूषकों को फैलाने में मदद करती हैं। यही कारण है कि समान मात्रा में प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियां अलग-अलग मौसम में समान AQI नहीं बनातीं। जब वातावरण में हवा का vertical mixing कम हो जाता है, तो वाहन, उद्योग, निर्माण और biomass burning से निकले निलंबित कण नीचे की परत में जमा होने लगते हैं। इसके साथ वातावरण में नमी (आर्द्रता) बढ़ने पर particles के आकार और atmospheric chemistry में भी बदलाव आता है। यह स्थिति स्मॉग (smog) को और घना कर सकती है।
इसीलिए सरकार की तैयारियों की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि नवंबर से फरवरी के दौरान मौसम कैसा रहता है। यदि हवा की गति कम और inversion लंबे समय तक बना रहा, तो उत्सर्जन में कुछ कमी के बावजूद AQI तेजी से बिगड़ सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब और हरियाणा में खेतों में पराली जलाने की घटनाओं में काफी हद तक कमी आई है। CAQM के उपरोक्त आंकड़ों के अनुसार पंजाब में धान की पराली जलाने की घटनाएं 2020 में 83,002 के मुकाबले 2024 में घटकर 10,909 रह गईं। हरियाणा में इसी अवधि में घटनाएं 4,202 से घटकर 1,406 रह गईं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के NCR जिलों, राजस्थान के NCR जिलों और दिल्ली को मिलाकर कुल fire counts 2020 के 87,632 से घटकर 2024 में 12,750 रह गए। यह गिरावट अगले वर्ष भी जारी रही। 2025 में इन क्षेत्रों में पराली जलाने के मामले 6,080 रहे। आयोग ने माना किइस कमी ने दिल्ली-NCR में पराली से होने वाली प्रदूषण की संभावित वृद्धि को कम करने में मदद की। इसके पीछे निगरानी और क्रियान्वयन में सख्ती, मशीनों के जरिये पराली को नष्ट करना और उसके औद्योगिक एवं व्यावसायिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने जैसे उपायों को प्रमुख कारण रहे। इसका मतलब यह है कि इस साल पराली को लेकर तस्वीर पहले की तुलना में बेहतर हो सकती है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करना अभी भी जरूरी है। साथ ही, पराली की घटनाएं कम होने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली का प्रदूषण अपने आप खत्म हो जाएगा। क्योंकि वाहन, धूल, निर्माण, कचरा जलाना और द्वितीयक कणों (secondary particles) जैसे स्थानीय और क्षेत्रीय प्रदूषक लगातार मौजूद रहते हैं।
दिल्ली के प्रदूषण में धूल (dust) खासकर PM10 का योगदान सबसे ज्यादा होता है। निर्माण स्थलों से निकलने वाली धूल के अलावा सड़कों पर जमा धूल वाहनों की आवाजाही से दोबारा हवा में पहुंचती है। यही वजह है कि इस बार MCD और PWD road dust पर ज्यादा जोर दे रहे है। इस बार जाड़े में MCD की ओर से दिल्ली एनसीआर में करीब 6,127 किलोमीटर सड़कों की सफाई लगभग 57,000 सफाई कर्मचारियों के जरिए की जा रही है। इसके अलावा 167 water sprinklers और anti-smog guns का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा PWD ने भी दिल्ली के 47 pollution hotspots के आसपास तीन किलोमीटर के दायरे में dust sources को चिन्हित कर कार्रवाई की योजना बनाई है। यह महत्वपूर्ण कदम इसलिए हैं, क्योंकि प्रदूषण को पूरे शहर में एक समान समस्या मानने के बजाय hotspot आधारित कार्रवाई स्थानीय स्तर पर अधिक प्रभावी हो सकती है। हालांकि anti-smog guns और पानी का छिड़काव स्थायी समाधान नहीं हैं। अगर सड़क की सतह, निर्माण सामग्री, मलबा और खुले स्थानों से लगातार धूल उठती रहे तो केवल पानी छिड़कने से समस्या लंबे समय तक नहीं सुलझेगी। इसलिए निर्माण स्थल को ढकना, कचरे और मलबे का सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन, मशीनों से सड़क की नियमित सफाई और खुले में मिट्टी या मलबा न छोड़ना बेहद जरूरी उपाय हैं।
वाहनों के उत्सर्जन पर लगाम लगाने को लेकर इस बार सरकार ने दो मोर्चों पर कार्रवाई की तैयारी की है। पहला, नियंत्रित प्रदूषण प्रमाणपत्र यानी PUCC के बिना वाहनों को पेट्रोल-डीजल नहीं देना और दूसरा, वाहनों की संख्या कम करने के लिए पार्किंग शुल्क बढ़ाना। 1 अक्टूबर से PUCC जांच को तकनीकी माध्यमों से सख्ती से लागू करने की तैयारी है। इसके लिए petrol pumps पर CCTV तथा scanners के जरिए वाहनों की पहचान की जाएगी। हालांकि यह कदम तभी प्रभावी होगा जब यह सब महज़ कागजी कार्रवाई और अवैध वसूली का जरिया बनकर न रह जाए।
इस बार की तैयारियों में पिछले वर्षों की तुलना में एक सकारात्मक बदलाव जरूर दिखता है। सरकार ने नवंबर के बाद की स्थिति का इंतजार करने के बजाय पहले से स्थायी Winter Pollution Master Plan बनाया है। देखना होगा कि इसे कितनी मुश्तैदी से और कितनी कुशलतापूर्वक लागू किया जाता है। क्योंकि उपायों या घोषणाओं को सही ढंग से अमल में लाना ही उन्हें कामयाब बना सकता है।
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