राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) भारत में नदी प्रदूषण नियंत्रण की सबसे बड़ी योजना है।

 

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नीतियां और कानून

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP): भारत में नदी प्रदूषण नियंत्रण की सबसे बड़ी योजना

1995 में शुरू हुई राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) की कार्यप्रणाली, उपलब्धियां, चुनौतियां और नमामि गंगे से इसके अंतर को सरल भाषा में समझिए।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

भारत में नदियों का प्रदूषण केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पेयजल, कृषि और आजीविका से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। शहरों से निकलने वाला बिना उपचार का सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और ठोस कचरा आज अधिकांश शहरी नदियों के प्रमुख प्रदूषण स्रोत हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, देश में हर दिन लगभग 72,000 मिलियन लीटर शहरी सीवेज पैदा होता है, लेकिन उसके उपचार की क्षमता इससे काफी कम है।

इसका अर्थ है कि हर दिन बड़ी मात्रा में बिना उपचार वाला सीवेज नदियों और अन्य जल स्रोतों तक पहुंच जाता है।

1980 के दशक में बढ़ते नदी प्रदूषण और शहरी सीवेज की इसी चुनौती के जवाब में केंद्र सरकार ने पहले गंगा एक्शन प्लान और बाद में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) की शुरुआत की।

इस योजना का उद्देश्य केवल नदी की सफाई नहीं, बल्कि नदियों में जाने वाले प्रदूषण को कम करना और जल गुणवत्ता में सुधार लाना है।

करीब तीन दशक बाद यह देखना जरूरी है कि इस योजना ने नदी प्रदूषण नियंत्रण में क्या हासिल किया, इसकी सीमाएं क्या रहीं और भविष्य की नदी संरक्षण नीति में इसकी क्या भूमिका हो सकती है।

नदी संरक्षण केवल प्रदूषण का प्रश्न नहीं, बल्कि संपूर्ण नदी संरक्षण का विषय है।
राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्रबंधन योजना (आईआईटी कंसोर्टियम)

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) क्या है?

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) भारत सरकार की नदी प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी प्रमुख योजनाओं में से एक है। इसकी शुरुआत 1995 में उन नदियों के लिए की गई थी, जो बढ़ते शहरीकरण, बिना उपचार वाले सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के कारण तेजी से प्रदूषित हो रही थीं।

इसका उद्देश्य नदियों को साफ करना भर नहीं, बल्कि उनमें जाने वाले प्रदूषण को कम करना और जल गुणवत्ता में सुधार लाना है।

इस योजना की जड़ें 1985 में शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान में हैं। उस कार्यक्रम ने पहली बार नदी प्रदूषण को राष्ट्रीय स्तर पर नीति का विषय बनाया। लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि समस्या केवल गंगा तक सीमित नहीं है।

यमुना, गोमती, साबरमती, कावेरी और कई अन्य नदियां भी इसी तरह के दबाव का सामना कर रही थीं। इसी अनुभव के आधार पर 1995 में NRCP शुरू की गई और अगले वर्ष गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण को भी इसमें शामिल कर लिया गया।

NRCP एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है। इसमें केंद्र सरकार परियोजनाओं के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता देती है, जबकि उनका क्रियान्वयन राज्य सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होता है। योजना का मुख्य जोर उन शहरों पर रहता है, जहां से बड़ी मात्रा में बिना उपचार वाला सीवेज नदियों में पहुंचता है।

इसी उद्देश्य से योजना के तहत सीवेज उपचार संयंत्र (STP), सीवर नेटवर्क, नालों का इंटरसेप्शन और डायवर्जन, नदी तट से जुड़े कुछ बुनियादी कार्य तथा जनजागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इनका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रदूषण को नदी तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सके।

हालांकि समय के साथ इस योजना की भूमिका भी बदली है। 2009 में गंगा के लिए अलग संस्थागत व्यवस्था बनने और 2014 में नमामि गंगे शुरू होने के बाद NRCP मुख्यतः गंगा बेसिन के बाहर की नदियों पर केंद्रित हो गई।

आज यह योजना उन नदियों में प्रदूषण नियंत्रण की परियोजनाओं का समर्थन करती है, जहां राज्य सरकारें केंद्र की सहायता से सीवेज प्रबंधन और जल गुणवत्ता सुधार के लिए काम कर रही हैं।

1995 में शुरू हुई NRCP आज गंगा के अलावा देश की अनेक नदियों में प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं का आधार है। गंगा से जुड़ी अधिकांश परियोजनाएं अब नमामि गंगे के तहत संचालित होती हैं।

यह योजना कैसे लागू होती है?

NRCP केवल केंद्र सरकार की योजना नहीं है, बल्कि इसमें केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की साझा भूमिका होती है।

सबसे पहले राज्य सरकारें उन शहरों और नदी खंडों की पहचान करती हैं जहां प्रदूषण की समस्या गंभीर है। इसके बाद वे विस्तृत परियोजना प्रस्ताव (Detailed Project Report) तैयार करके केंद्र सरकार को भेजती हैं। प्रस्तावों का मूल्यांकन नदी में प्रदूषण की स्थिति, परियोजना की आवश्यकता और अन्य तकनीकी पहलुओं के आधार पर किया जाता है।

मंज़ूरी मिलने के बाद परियोजनाओं के लिए केंद्र और राज्य मिलकर वित्त उपलब्ध कराते हैं। परियोजनाओं का निर्माण आमतौर पर राज्य की कार्यान्वयन एजेंसियां करती हैं। लेकिन उनके संचालन और रखरखाव की ज़िम्मेदारी स्थानीय निकायों या संबंधित एजेंसियों की होती है।

इस पूरी प्रक्रिया के समन्वय की जिम्मेदारी लंबे समय तक राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय (NRCD) के पास थी।

नदियों की सफाई और पुनर्जीवन एक सतत प्रक्रिया है। यह राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों, स्थानीय निकायों और औद्योगिक इकाइयों की जिम्मेदारी है कि वे सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का निर्धारित मानकों के अनुसार उपचार सुनिश्चित करें, ताकि उसे नदियों और अन्य जल निकायों में छोड़ा जा सके।
जल शक्ति मंत्रालय, लोकसभा में लिखित उत्तर, PIB, 7 अप्रैल 2022

राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय (NRCD) की भूमिका

लंबे समय तक NRCP के संचालन और समन्वय की जिम्मेदारी NRCD के पास थी। यह निदेशालय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अंतर्गत काम करता था। 

इसका काम राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देना, परियोजनाओं की समीक्षा करना और उनकी प्रगति की निगरानी करना था। इसके अलावा उनकी प्रगति की निगरानी और नदी संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों के समन्वय की ज़िम्मेदारी भी इसी की होती है।

समय के साथ गंगा संरक्षण के लिए अलग व्यवस्था विकसित की गई। 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (NGRBA) बनाई गई। बाद में नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) ने इसकी जिम्मेदारी संभाली।

भारत सरकार गंगा बेसिन के बाहर की नदियों के लिए राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) के माध्यम से राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देकर उनके प्रयासों को सहयोग देती है।

इसके बाद NRCP मुख्य रूप से गंगा के अलावा अन्य नदियों में प्रदूषण नियंत्रण पर केंद्रित हो गया। NRCP की सफलता काफी हद तक राज्यों और शहरी स्थानीय निकायों पर निर्भर करती है। केवल सीवेज उपचार संयंत्र (STP) बना देना काफी नहीं है। 

उनका नियमित संचालन और रखरखाव भी जरूरी है। इसके लिए बिजली, प्रशिक्षित कर्मचारी और पर्याप्त बजट की भी आवश्यकता होती है। 

कई सरकारी समीक्षा रिपोर्टों में पाया गया है कि जहां इन व्यवस्थाओं में कमी रही, वहां नदियों की जल गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।

इसलिए अब सिर्फ नई परियोजनाएं बनाने पर नहीं, बल्कि उन्हें लंबे समय तक प्रभावी ढंग से चलाने पर भी अधिक जोर दिया जा रहा है।

भारत में नदी संरक्षण नीति का विकास
वर्षप्रमुख घटनाक्रम
1985गंगा एक्शन प्लान (प्रथम चरण) की शुरुआत
1993यमुना एक्शन प्लान शुरू
1995National River Conservation Plan (NRCP) लागू
1996गंगा एक्शन प्लान (द्वितीय चरण) को NRCP में शामिल किया गया
2009National Ganga River Basin Authority (NGRBA) का गठन
2014नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू

NRCP का विकास कैसे हुआ?

1985 में गंगा एक्शन प्लान शुरू होने के बाद यह स्पष्ट होने लगा कि नदी प्रदूषण केवल गंगा तक सीमित नहीं है। यमुना, गोमती, साबरमती और अन्य नदियां भी तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, बिना उपचार वाले सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के दबाव में थीं।

इसी पृष्ठभूमि में 1993 में जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) के सहयोग से यमुना एक्शन प्लान शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य दिल्ली, आगरा और मथुरा जैसे शहरों से यमुना में पहुंचने वाले प्रदूषण को कम करना था।

यमुना एक्शन प्लान के अनुभव ने यह संकेत दिया कि अलग-अलग नदियों के लिए अलग योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। इसी आवश्यकता के जवाब में 1995 में NRCP शुरू किया गया।

पहलूजानकारी
पूरा नामराष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan -NRCP)
शुरुआत1995
पृष्ठभूमि1985 के गंगा एक्शन प्लान (GAP) के अनुभवों के आधार पर शुरू की गई।
मुख्य उद्देश्यनदियों में जाने वाले प्रदूषण, विशेषकर बिना उपचार वाले शहरी सीवेज, को कम करना और जल गुणवत्ता में सुधार लाना।
मुख्य कार्यसीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP), सीवर नेटवर्क, नालों का इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन, नदी तट विकास, स्वच्छता सुविधाएँ और जनजागरूकता।
क्रियान्वयनकेंद्र सरकार वित्तीय एवं तकनीकी सहायता देती है, जबकि परियोजनाओं का निर्माण और संचालन राज्य सरकारें तथा शहरी स्थानीय निकाय करते हैं।
वर्तमान फोकस2014 में नमामि गंगे शुरू होने के बाद NRCP मुख्यतः गंगा बेसिन के बाहर की नदियों में प्रदूषण नियंत्रण पर केंद्रित है।
वित्तपोषणसामान्य राज्यों के लिए 60:40 (केंद्र : राज्य) तथा पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों के लिए 90:10।
सबसे बड़ी चुनौतीSTP और सीवर नेटवर्क का दीर्घकालिक संचालन एवं रखरखाव (O&M), नगर निकायों की क्षमता और पर्याप्त वित्तीय संसाधन।
मुख्य सीखनदी संरक्षण केवल सीवेज उपचार तक सीमित नहीं है; इसके लिए पूरे नदी बेसिन, पर्यावरणीय प्रवाह, आर्द्रभूमियों, भूजल और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को साथ लेकर चलना आवश्यक है।

इसका उद्देश्य गंगा के बाहर की प्रदूषित नदियों में भी प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक साझा राष्ट्रीय व्यवस्था विकसित करना था। इसके तहत विभिन्न राज्यों में सीवेज प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी परियोजनाएं शुरू की गईं और समय के साथ इसका दायरा कई प्रमुख नदियों तक बढ़ा।

इसके एक वर्ष बाद, 1996 में गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण को भी NRCP के दायरे में शामिल कर लिया गया। इससे नदी संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं को एक साझा प्रशासनिक ढांचे के तहत संचालित करने की कोशिश की गई।

हालांकि इस दौरान यह भी स्पष्ट होता गया कि केवल सीवेज उपचार संयंत्र बनाना पर्याप्त नहीं है; उनके संचालन, रखरखाव और स्थानीय संस्थागत क्षमता पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

NRCP कैसे काम करती है?

NRCP केवल वित्तीय सहायता देने वाली योजना नहीं है, बल्कि केंद्र, राज्य और स्थानीय संस्थाओं के बीच समन्वय पर आधारित कार्यक्रम है। इसकी प्रक्रिया परियोजना की पहचान से शुरू होकर निर्माण, संचालन और नियमित निगरानी तक कई चरणों में पूरी होती है।

पहला चरण: प्रदूषित नदी और शहरों की पहचान

सबसे पहले उन नदी खंडों और शहरों की पहचान की जाती है, जहां प्रदूषण सबसे अधिक है। यह आकलन राज्य सरकारें, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निकाय और अन्य तकनीकी एजेंसियां मिलकर करती हैं। इसमें यह देखा जाता है कि किन शहरों से सबसे अधिक बिना उपचार वाला सीवेज नदी में पहुंच रहा है।

इसके बाद संबंधित शहर के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार किया जाता है। इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट में शहर में उत्पन्न होने वाले सीवेज की मात्रा, उपलब्ध उपचार क्षमता, आवश्यक अवसंरचना और प्रस्तावित परियोजनाओं का विवरण दिया जाता है।

दूसरा चरण: परियोजना की स्वीकृति

राज्य सरकारें DPR पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को भेजती हैं। इन प्रस्तावों की तकनीकी जाँच पहले NRCD करती थी। किसी परियोजना को स्वीकृति देते समय कई पहलुओं पर विचार किया जाता है।

मंज़ूरी के दौरान नदी में प्रदूषण का स्तर, उसका निर्धारित उपयोग (Designated Best Use), परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता और धन की उपलब्धता जैसे पहलुओं का आकलन किया जाता है।

राज्य सरकार को अपनी वित्तीय हिस्सेदारी के साथ परियोजना के संचालन और रखरखाव (O&M) की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होती है।

तीसरा चरण: परियोजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन

मंज़ूरी मिलने के बाद राज्य सरकारों की नामित एजेंसियां परियोजनाओं का निर्माण शुरू करती हैं। इनमें जल निगम, शहरी विकास एजेंसियां और अन्य परियोजना इकाइयां शामिल हो सकती हैं।

स्थानीय आवश्यकता के अनुसार सीवेज उपचार संयंत्र (STP), सीवर नेटवर्क, पंपिंग स्टेशन, नालों का इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन तथा अन्य प्रदूषण नियंत्रण कार्य किए जाते हैं। इनका उद्देश्य बिना उपचार वाले सीवेज को नदी तक पहुंचने से रोकना है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि किसी परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती केवल उसका निर्माण नहीं, बल्कि उसे समय पर पूरा करना और प्रभावी ढंग से संचालित करना है।

यदि सीवर नेटवर्क अधूरा रह जाए या आवश्यक अवसंरचना समय पर तैयार न हो, तो आधुनिक STP भी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते।

चौथा चरण: संचालन और रखरखाव

निर्माण पूरा होने के बाद परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी शुरू होती है। STP और सीवेज नेटवर्क का संचालन आमतौर पर नगर निगम, नगर परिषद या अन्य शहरी स्थानीय निकाय करते हैं।

यहीं से कई परियोजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है। CAG और अन्य समीक्षा रिपोर्टों में पाया गया कि कई शहरों में संयंत्र बनने के बावजूद बिजली, कर्मचारियों और रखरखाव बजट की कमी से वे पूरी क्षमता पर नहीं चल सके। परिणामस्वरूप अपेक्षित जल गुणवत्ता सुधार नहीं हो पाया।

पांचवां चरण: जल गुणवत्ता की निगरानी

परियोजनाएं बनने के बाद यह देखना भी जरूरी होता है कि उनका नदी पर वास्तविक प्रभाव पड़ा या नहीं। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) विभिन्न नदी खंडों की जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी करते हैं।

निगरानी के दौरान जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD), घुलित ऑक्सीजन (DO), फीकल कोलीफॉर्म जैसे मानकों का परीक्षण किया जाता है। इन आँकड़ों से नदी की जल गुणवत्ता में हुए बदलाव का आकलन किया जाता है।

यही जानकारी आगे की परियोजनाओं की योजना बनाने और उनकी प्रभावशीलता का आकलन करने में भी उपयोगी होती है।

NRCP के तहत कौन-कौन से कार्य होते हैं?

इस योजना का मुख्य उद्देश्य नदियों में जाने वाले प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही रोकना है। इसलिए योजना केवल सीवेज उपचार संयंत्र (STP) बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें सीवेज संग्रह, नदी तट प्रबंधन, स्वच्छता और जन भागीदारी जैसे कई उपाय शामिल हैं।

योजना के तहत स्थानीय जरूरतों के अनुसार विभिन्न प्रकार की प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाएं लागू की जाती हैं।

सीवेज इंटरसेप्शन और डायवर्जन (Interception and Diversion): भारत के अधिकांश शहरों में कई बड़े नाले सीधे नदियों में गिरते हैं। इन नालों में घरेलू सीवेज, वर्षा जल और कई जगहों पर औद्योगिक अपशिष्ट भी मिला होता है। 

यदि इस गंदे पानी को सीधे नदी में जाने दिया जाए, तो नदी की जल गुणवत्ता तेजी से खराब होती है। इसी समस्या को रोकने के लिए NRCP के तहत इंटरसेप्शन और डायवर्जन (I&D) का काम किया जाता है। 

इसमें नालों के पानी को नदी में गिरने से पहले पाइपलाइन या पंपिंग स्टेशन के माध्यम से STP तक पहुंचाया जाता है। इसे नदी प्रदूषण रोकने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का निर्माण: नालों का पानी मोड़ने के साथ उसका उपचार भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाए जाते हैं, जहां गंदे पानी का उपचार किया जाता है। 

इसके बाद ही उसे नदी या किसी अन्य जल स्रोत में छोड़ा जाता है। हालांकि STP की सफलता उनके नियमित संचालन और रखरखाव पर निर्भर करती है।

सीवर नेटवर्क का विस्तार: कई शहरों में STP तो बन जाते हैं, लेकिन बड़ी आबादी सीवर नेटवर्क से जुड़ी ही नहीं होती। ऐसी स्थिति में गंदा पानी उपचार संयंत्र तक पहुंचने के बजाय खुले नालों से नदी में चला जाता है।

इसी कारण योजना के तहत नई सीवर लाइनें, पुराने नेटवर्क का विस्तार और पंपिंग स्टेशन बनाए जाते हैं। इससे अधिक से अधिक घरों और बस्तियों का सीवेज उपचार प्रणाली से जुड़ पाता है।

नदी तट विकास (River Front Development): नदी संरक्षण में जल गुणवत्ता के साथ नदी तटों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए योजना के तहत कई शहरों में घाटों का विकास, नदी तटों की मरम्मत, पैदल मार्ग, प्रकाश व्यवस्था और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाती हैं।

इसका उद्देश्य नदी तटों को अधिक सुरक्षित और स्वच्छ बनाना है, ताकि लोग खुले में शौच या कचरा फेंकने के बजाय निर्धारित सुविधाओं का उपयोग करें। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि नदी तट विकास का अर्थ केवल सौंदर्यीकरण नहीं होना चाहिए। इसमें नदी के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र और पारिस्थितिकी का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

कम लागत वाली स्वच्छता सुविधाएं (Low Cost Sanitation): जब NRCP शुरू हुई थी, तब कई नदी किनारे बसे शहरों और कस्बों में खुले में शौच एक बड़ी समस्या थी। इससे मानव मल सीधे नदी तक पहुंच जाता था और जल प्रदूषण बढ़ता था।

इसी कारण योजना में सामुदायिक शौचालय और अन्य कम लागत वाली स्वच्छता सुविधाओं को शामिल किया गया। 

बाद के वर्षों में स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं के आने के बाद इस घटक का स्वरूप बदला, लेकिन नदी प्रदूषण रोकने में इसकी भूमिका आज भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

विद्युत एवं उन्नत शवदाह गृह (Electric and Improved Crematoria): कई शहरों में पारंपरिक दाह संस्कार के बाद अधजले अवशेष और राख नदी में प्रवाहित कर दिए जाते थे, जिससे जल प्रदूषण बढ़ता था। 

इसे कम करने के लिए NRCP के तहत विद्युत शवदाह गृह और बेहतर लकड़ी आधारित शवदाह गृह बनाए गए। इनका उद्देश्य लकड़ी की खपत कम करना और अधजले अवशेषों को नदी में जाने से रोकना था। कई जगह सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से इनका उपयोग अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सका।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और अन्य स्थानीय उपाय: कुछ शहरों में नदी प्रदूषण केवल सीवेज से नहीं, बल्कि ठोस कचरे, पशुओं के नदी में उतरने, कपड़े धोने वाले घाटों (धोबी घाट) और वाहनों की धुलाई जैसी गतिविधियों से भी होता है। इसी कारण स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, धोबी घाटों के सुधार और अन्य स्थान-विशेष उपाय भी योजना में शामिल किए जा सकते हैं।

जन-जागरूकता और स्थानीय भागीदारी: विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सरकारी परियोजनाओं के भरोसे नदी संरक्षण संभव नहीं है। यदि स्थानीय लोग नदी में कचरा डालना जारी रखें या सीवर कनेक्शन न लें, तो महंगे बुनियादी ढांचे का भी पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इसी कारण योजना में जनजागरूकता, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की गतिविधियां भी शामिल हैं। 

इनमें स्कूलों, स्थानीय समुदायों, स्वयंसेवी संस्थाओं और नगर निकायों की भागीदारी पर जोर दिया जाता है। उद्देश्य यह है कि नदी संरक्षण केवल सरकारी योजना न रह जाए, बल्कि स्थानीय समाज की साझा जिम्मेदारी बने।

किन नदियों को NRCP में शामिल किया जाता है?

NRCP की शुरुआत 1995 में कुछ चुनिंदा प्रदूषित नदियों और शहरों के साथ हुई थी। समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। दिसंबर 2023 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, NRCP के तहत 16 राज्यों की 38 नदियों के 82 शहरों में प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाएं स्वीकृत की जा चुकी हैं। इन परियोजनाओं के लिए लगभग 8,241 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी गई है, जिनसे 2,910.50 MLD सीवेज उपचार क्षमता विकसित हुई है।

हालांकि शुरुआती वर्षों में NRCP का दायरा इससे बड़ा था। उदाहरण के लिए, 2013 में सरकार ने बताया था कि NRCP के तहत 20 राज्यों की 42 नदियों के 195 शहर शामिल थे। 

बाद के वर्षों में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू होने के बाद गंगा और उसकी सहायक नदियों से जुड़ी अधिकांश परियोजनाएं अलग कार्यक्रम के तहत चली गईं। इसी कारण आज NRCP मुख्य रूप से गंगा बेसिन के बाहर की नदियों पर केंद्रित है।

यानी समय के साथ NRCP का दायरा बदला है, लेकिन इसका उद्देश्य अब भी गंगा के बाहर की प्रदूषित नदियों में प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं को समर्थन देना है।

किस आधार पर किसी नदी को NRCP में शामिल किया जाता है?

हर नदी इस योजना में स्वतः शामिल नहीं होती। इसके लिए कुछ प्रमुख मानदंड होते हैं:

  • नदी के किसी हिस्से में प्रदूषण का स्तर अधिक होना।

  • शहरों से बड़ी मात्रा में बिना उपचार वाला सीवेज नदी में गिरना।

  • राज्य सरकार द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के लिए विस्तृत परियोजना प्रस्ताव (DPR) भेजा जाना।

  • परियोजना का NRCP के दिशा-निर्देशों और तकनीकी मानकों के अनुरूप होना।

  • केंद्र सरकार द्वारा तकनीकी और वित्तीय स्वीकृति मिलना।

किन नदियों में संरक्षण कार्य हुए हैं?

NRCP के तहत देश के विभिन्न हिस्सों की कई नदियों में प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाएं लागू की गई हैं। इनमें गोदावरी, साबरमती, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्राह्मणी, स्वर्णरेखा, सतलुज, मांडवी, पंबा, मूला-मुठा, ताप्ती, मूसी और अन्य कई नदियां शामिल हैं।

इन नदियों के किनारे बसे शहरों में स्थानीय जरूरतों के अनुसार विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाएं लागू की गई हैं। 

NRCP का वित्तपोषण कैसे होता है?

NRCP एक केंद्रीय प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) है। इसका खर्च केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर उठाती हैं। कई मामलों में शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) भी इसमें भागीदार होते हैं। पिछले तीन दशकों में इसकी फंडिंग व्यवस्था राज्यों की जरूरतों के अनुसार कई बार बदली गई है।

समय के साथ कैसे बदला फंडिंग पैटर्न?

जब गंगा एक्शन प्लान (1985) शुरू हुआ था, तब यह पूरी तरह केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित (100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता) योजना थी। लेकिन 1995 में NRCP शुरू होने पर इसे 50:50 लागत साझेदारी (केंद्र और राज्य) के आधार पर लागू किया गया।

इसके बाद 1998 में इसे फिर से 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता वाली योजना बना दिया गया। हालांकि भूमि (Land) की व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के पास ही रही।

मार्च 2001 में राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण की बैठक में 70:30 लागत साझेदारी मॉडल अपनाने का निर्णय लिया गया। इसके तहत 70 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार और 30 प्रतिशत राज्य सरकार तथा स्थानीय निकाय वहन करते हैं। स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर भी जोर दिया गया, ताकि परियोजनाओं के प्रति स्वामित्व की भावना विकसित हो।

बाद में केंद्र प्रायोजित योजनाओं की नई व्यवस्था लागू होने के बाद 1 अप्रैल 2016 से सामान्य राज्यों के लिए फंडिंग पैटर्न 60:40 कर दिया गया। यानी परियोजना लागत का 60 प्रतिशत केंद्र और 40 प्रतिशत राज्य सरकार देती है। वहीं पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 रखा गया है। कुछ विशेष परियोजनाओं, जैसे पुणे की मूला-मुठा नदी संरक्षण योजना, के लिए अलग फंडिंग व्यवस्था भी अपनाई गई।

परियोजना बनने के बाद खर्च कौन उठाता है?

NRCP का सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा संचालन और रखरखाव (Operation and Maintenance - O&M) है।

योजना के अनुसार परियोजना बनने के बाद STP, पंपिंग स्टेशन, सीवर नेटवर्क और अन्य परिसंपत्तियों के संचालन व रखरखाव की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों की होती है। 

निर्माण के लिए केंद्र सहायता देता है, लेकिन बिजली, कर्मचारियों, मरम्मत और नियमित संचालन का खर्च राज्यों और नगर निकायों को उठाना पड़ता है।

यही वजह है कि कई शहरों में परियोजनाएं बनने के बाद भी वे अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पातीं। 

यदि नगर निकायों के पास पर्याप्त बजट या तकनीकी क्षमता नहीं हो, तो सीवेज उपचार संयंत्र बंद पड़ जाते हैं या आंशिक क्षमता पर चलते हैं।

इसी वजह से बढ़ता है नगर निकायों पर वित्तीय दबाव:

अधिकांश नगर निकाय पहले से ही जलापूर्ति, ठोस कचरा प्रबंधन, सड़क और सफाई जैसी सेवाओं पर बड़ा खर्च करते हैं। ऐसे में बड़े STP का संचालन उनके लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ बन जाता है। इसके लिए लगातार बिजली, रसायन, प्रशिक्षित कर्मचारी और नियमित रखरखाव की आवश्यकता होती है।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) :CAG के प्रदर्शन ऑडिट में पाया गया कि कई राज्यों में संचालन और रखरखाव के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं थे। परिणामस्वरूप कई STP अपनी स्थापित क्षमता से कम क्षमता पर चले, जबकि कुछ लंबे समय तक पूरी तरह चालू ही नहीं हो सके।

इस चुनौती से निपटने के लिए किए गए प्रयास हुए: इन चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ समझौते (MoA), नगर निकायों की स्पष्ट जिम्मेदारी और परिसंपत्तियों के दीर्घकालिक रखरखाव पर अधिक जोर देना शुरू किया। 2009 में राज्यों के साथ हुई बैठक में O&M के लिए वित्त आयोग से विशेष सहायता का सुझाव भी दिया गया।

क्या यह मॉडल पर्याप्त है?

विशेषज्ञों का मानना है कि नदी संरक्षण केवल परियोजनाएं बनाने का विषय नहीं है। यदि परियोजना बनने के बाद उसके संचालन के लिए स्थायी वित्तीय व्यवस्था न हो, तो करोड़ों रुपये की लागत से बनी परिसंपत्तियां भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं। इसी अनुभव को देखते हुए नमामि गंगे जैसी बाद की योजनाओं में परिसंपत्तियों के दीर्घकालिक संचालन और रखरखाव पर अधिक ध्यान दिया गया। कई नई परियोजनाओं में निर्माण के साथ कई सालों तक O&M की व्यवस्था भी शामिल की गई।

क्या NRCP सफल रही है?

एक नज़र में: NRCP की प्रमुख उपलब्धियां
उपलब्धिस्थिति
शामिल राज्य17
शामिल नदियां53
शामिल शहर98
स्वीकृत परियोजना लागत₹8,649.67 करोड़
जारी केंद्रीय सहायता₹3,483.23 करोड़
विकसित सीवेज उपचार क्षमता2,910.50 MLD

करीब तीन दशकों से लागू NRCP ने भारत में नदी प्रदूषण नियंत्रण के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस योजना के तहत अनेक शहरों में STP बने, सीवर नेटवर्क का विस्तार हुआ और कई नालों को सीधे नदियों में गिरने से रोका गया। इन प्रयासों ने नदी प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा तैयार किया।

हालांकि इस योजना की सफलता को केवल बने हुए बुनियादी ढांचे से नहीं आँका जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या इन परियोजनाओं से नदियों की जल गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार हुआ। इस पर सरकारी ऑडिट, संसदीय समितियों और विशेषज्ञों की राय मिश्रित रही है। उनके अनुसार NRCP ने प्रदूषण नियंत्रण का आधारभूत ढांचा तो तैयार किया, लेकिन संचालन, रखरखाव और संस्थागत कमजोरियों के कारण कई जगह अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।

नदी प्रदूषण नियंत्रण का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ

जल शक्ति मंत्रालय की 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, गंगा और उसकी सहायक नदियों को छोड़कर NRCP के तहत 17 राज्यों के 98 शहरों में 53 नदियों के प्रदूषित हिस्सों पर परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इनके लिए ₹8,649 करोड़ से अधिक की लागत स्वीकृत की गई है, जबकि 3,483 करोड़ रुपये से ज़्यादा की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है। योजना के तहत अब तक 2,910.50 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) सीवेज उपचार क्षमता विकसित की गई है। मंत्रालय के अनुसार, इससे नदियों में जाने वाले प्रदूषण भार (Pollution Load) को कम करने में मदद मिली है।

सीवेज उपचार क्षमता में वृद्धि

NRCP की प्रमुख उपलब्धियों में से एक देश के कई शहरों में सीवेज उपचार का बुनियादी ढांचा विकसित करना रही है। योजना के तहत नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाए गए, पुराने संयंत्रों का उन्नयन किया गया और नालों को इंटरसेप्ट कर उपचार संयंत्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं के बिना कहीं अधिक बिना उपचार वाला सीवेज सीधे नदियों में पहुंचता। इस लिहाज से NRCP ने शहरी नदी प्रदूषण को नियंत्रित करने की आधारभूत क्षमता विकसित की।

नदी प्रदूषण को राष्ट्रीय नीति का विषय बनाया

NRCP की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी रही कि इसने नदी प्रदूषण को केवल स्थानीय निकायों का मुद्दा न मानकर राष्ट्रीय पर्यावरणीय नीति के केंद्र में ला दिया। गंगा एक्शन प्लान के बाद पहली बार देश की अनेक नदियों के लिए एक साझा नीति ढांचा तैयार हुआ। इससे राज्यों को परियोजनाएं तैयार करने, वित्तीय सहायता प्राप्त करने और संस्थागत व्यवस्था विकसित करने का एक साझा ढांचा मिला। आगे चलकर इसी अनुभव के आधार पर National Ganga River Basin Authority (NGRBA) और बाद में नमामि गंगे जैसे व्यापक कार्यक्रम विकसित किए गए।

स्थानीय स्तर पर बदलाव: कई शहरों में STP के साथ सीवर नेटवर्क, नदी तट विकास, घाटों का सुधार, विद्युत शवदाह गृह, सार्वजनिक शौचालय और जनजागरूकता कार्यक्रम भी शुरू किए गए। इन उपायों से कुछ स्थानों पर नदी किनारों की स्वच्छता और शहरी स्वच्छता व्यवस्था में सुधार देखने को मिला।

लेकिन जल गुणवत्ता में सुधार हर जगह समान नहीं रहा

कई सरकारी समीक्षा रिपोर्टों और CAG के प्रदर्शन ऑडिट में पाया गया कि कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हुईं। कुछ परियोजनाएं पूरी होने के बाद भी अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो सकीं। इसके कारण अनेक शहरों में अपेक्षित स्तर पर जल गुणवत्ता में सुधार नहीं हो पाया। विशेषज्ञों का कहना है कि नदी संरक्षण केवल STP बनाने से संभव नहीं है। य

दि पूरा सीवर नेटवर्क तैयार न हो या संयंत्रों का नियमित रखरखाव न हो, तो प्रदूषण का बड़ा हिस्सा नदी तक पहुंचता रहता है। नगर निकायों के पास पर्याप्त संसाधन न होने पर यह चुनौती और बढ़ जाती है।

इसीलिए आज NRCP की सफलता केवल बने हुए STP की संख्या से नहीं आँकी जाती। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे कितनी क्षमता से चल रहे हैं और उनसे नदी की जल गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ है।

लेकिन चुनौतियां क्यों बनी रहीं?

करीब तीन दशकों के अनुभव बताते हैं कि NRCP ने नदी प्रदूषण नियंत्रण का बुनियादी ढांचा तो तैयार किया, लेकिन हर जगह नदियों की जल गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।

CAG, CPCB और केंद्र सरकार की विभिन्न समीक्षा रिपोर्टों ने ऐसी कई चुनौतियों की पहचान की है, जिनसे योजना का प्रभाव सीमित रहा।

STP बन गए, लेकिन क्या वे पूरी क्षमता से चल रहे हैं: NRCP के तहत अनेक शहरों में सीवेज उपचार संयंत्र (STP) बनाए गए। लेकिन कई जगह समस्या निर्माण के बाद शुरू हुई।

CAG की 2011 की प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हुईं। कुछ परियोजनाएं पूरी होने के बाद भी उपयोग में नहीं लाई जा सकीं। 

रिपोर्ट के अनुसार 82 प्रतिशत परियोजनाएं तय समय के बाद पूरी हुईं। वहीं 251 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली 28 परियोजनाएं निर्माण के बाद भी उपयोग में नहीं लाई जा सकीं।

इसके पीछे भूमि अधिग्रहण, तकनीकी समस्याएं, वन स्वीकृति में देरी और अधूरे सीवर नेटवर्क जैसे कारण बताए गए।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पूरा सीवर नेटवर्क STP से जुड़ा न हो, तो संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। ऐसे में बड़ी मात्रा में सीवेज अब भी नदियों तक पहुंच जाता है।

CAG की 2011 की प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हुईं। कुछ परियोजनाएं पूरी होने के बाद भी उपयोग में नहीं लाई जा सकीं। 

बिजली और रखरखाव की समस्या: किसी STP का निर्माण एक बार का काम है, लेकिन उसे रोज़ चलाना एक सतत प्रक्रिया है। इसके लिए बिजली, प्रशिक्षित कर्मचारी, रसायन, मशीनों की मरम्मत और नियमित निगरानी की आवश्यकता होती है।

केंद्र सरकार ने भी संसद में माना है कि संचालन और रखरखाव (O&M) के लिए अपर्याप्त संसाधन, अनियमित बिजली आपूर्ति और STP का कम उपयोग नदी संरक्षण की प्रमुख चुनौतियां हैं।

यही कारण है कि कई शहरों में आधुनिक STP होने के बावजूद उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाया। विशेषज्ञों का मानना है कि O&M के लिए स्थायी वित्तीय व्यवस्था के बिना नई परियोजनाएं भी लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकतीं।

शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies) की सीमित क्षमता: NRCP के तहत परियोजनाओं का निर्माण प्रायः राज्य सरकारों की एजेंसियां करती हैं, लेकिन उनका संचालन नगर निकायों को करना होता है। यहीं सबसे अधिक चुनौतियां सामने आती हैं।

नगर निकायों पर पहले से जलापूर्ति, ठोस कचरा प्रबंधन, सड़क, सफाई और अन्य सेवाओं की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में महंगे सीवेज उपचार संयंत्रों के संचालन के लिए पर्याप्त धन और तकनीकी विशेषज्ञता जुटाना आसान नहीं होता।

CAG ने भी पाया कि कई राज्यों में संचालन और रखरखाव के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं थे। इससे कई संयंत्र अपनी क्षमता से कम चले और कुछ परियोजनाएं निष्क्रिय हो गईं।

इस अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि नदी संरक्षण केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि स्थानीय संस्थाओं की क्षमता पर भी निर्भर करता है।

नदी नहीं, पूरे नदी बेसिन पर ध्यान देने की जरूरत: विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सीवेज उपचार से नदी को पूरी तरह पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

किसी नदी की सेहत केवल सीवेज पर निर्भर नहीं करती। उसका जलग्रहण क्षेत्र, पर्यावरणीय प्रवाह, आर्द्रभूमियां, बाढ़ क्षेत्र और सहायक नदियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। यदि नदी में पर्याप्त प्राकृतिक प्रवाह नहीं होगा या उसके बाढ़ क्षेत्र पर अतिक्रमण होगा, तो केवल STP बनाकर नदी को स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता।

गैर-बिंदु प्रदूषण (Non-point Source Pollution) की अनदेखी: NRCP का मुख्य फोकस उन प्रदूषण स्रोतों पर रहा जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है, जैसे नाले, सीवर आउटफॉल और औद्योगिक निकास। इन्हें Point Sources कहा जाता है।

लेकिन नदी प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा ऐसे स्रोतों से भी आता है जिन्हें किसी एक स्थान पर रोकना आसान नहीं होता। उदाहरण के लिए:

  • खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक और कीटनाशक,

  • वर्षा के दौरान शहरों की सड़कों से बहने वाला प्रदूषित पानी,

  • खुले में फेंका गया ठोस कचरा,

  • नदी किनारे अवैध निर्माण और अतिक्रमण।

इन्हें Non-point Source Pollution कहा जाता है।

CAG ने भी बताया कि नदी प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम मुख्यतः बिंदु स्रोतों पर केंद्रित रहे, जबकि गैर-बिंदु प्रदूषण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। यही कारण है कि कई स्थानों पर सीवेज उपचार क्षमता बढ़ने के बावजूद जल गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा।

निगरानी और जल गुणवत्ता आकलन की कमजोरी: किसी भी नदी संरक्षण कार्यक्रम की सफलता इस बात से तय होती है कि नदी की जल गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ। CAG के अनुसार कई नदियों पर पर्याप्त मॉनिटरिंग स्टेशन नहीं थे। 

रियल-टाइम निगरानी सीमित थी और उपलब्ध आँकड़े भी व्यापक रूप से सार्वजनिक नहीं किए जाते थे। इससे परियोजनाओं के वास्तविक प्रभाव का आकलन कठिन हो जाता था।

NRCP के अनुभव बताते हैं कि नदी संरक्षण केवल STP बनाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए मजबूत नगर निकाय, पर्याप्त संचालन बजट, नियमित निगरानी, पूरे नदी बेसिन की योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी है। 

यही कारण है कि हाल के वर्षों में नदी संरक्षण की नीति प्रदूषण नियंत्रण से आगे बढ़कर नदी पुनर्जीवन और समग्र नदी बेसिन प्रबंधन की ओर बढ़ रही है।

NRCP और नमामि गंगे में क्या अंतर है?

पहलूNRCPनमामि गंगे
शुरुआत19952014-15
योजना का प्रकारकेंद्रीय प्रायोजित योजनाकेंद्रीय क्षेत्र योजना
दायरागंगा बेसिन के बाहर की नदियांगंगा और उसकी सहायक नदियां
प्रमुख उद्देश्यप्रदूषण नियंत्रणप्रदूषण नियंत्रण के साथ नदी पुनर्जीवन
प्रमुख गतिविधियाँSTP, सीवर नेटवर्क, इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन, घाट विकासSTP, नदी पुनर्जीवन, ई-फ्लो, जैव विविधता, वनीकरण, ग्रामीण स्वच्छता, जनभागीदारी
कार्यान्वयनराज्यों के सहयोग सेNational Mission for Clean Ganga (NMCG)
फंडिंगकेंद्र-राज्य साझेदारी100% केंद्रीय वित्तपोषण

अक्सर NRCP और नमामि गंगे को एक ही योजना समझ लिया जाता है। इसकी एक वजह यह है कि दोनों का उद्देश्य नदी प्रदूषण कम करना और जल गुणवत्ता में सुधार लाना है। हालांकि दोनों की भौगोलिक सीमा, संस्थागत व्यवस्था, वित्तपोषण और कार्यप्रणाली अलग-अलग है।

सबसे बड़ा अंतर

NRCP एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जो गंगा बेसिन के बाहर की नदियों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देती है।

वहीं नमामि गंगे एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है, जिसे 2014-15 में गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए शुरू किया गया। इसका क्रियान्वयन National Mission for Clean Ganga (NMCG) करता है। 

क्या गंगा अब NRCP का हिस्सा है?

यह सबसे आम भ्रम है। शुरुआत में गंगा भी राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) का हिस्सा थी, क्योंकि 1995 में गंगा एक्शन प्लान (द्वितीय चरण) को इसमें शामिल कर लिया गया था।

लेकिन 2009 में NGRBA के गठन और 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू होने के बाद गंगा संरक्षण के लिए अलग व्यवस्था विकसित हुई।

आज गंगा और उसकी सहायक नदियों के अधिकांश संरक्षण कार्य NMCG के तहत होते हैं, जबकि NRCP गंगा बेसिन के बाहर की नदियों पर केंद्रित है।

दृष्टिकोण में भी है बड़ा अंतर

NRCP का मुख्य फोकस शहरी सीवेज, STP, सीवर नेटवर्क और प्रदूषण नियंत्रण पर रहा। इसके विपरीत, नमामि गंगे को नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम के रूप में विकसित किया गया।

इसमें सीवेज प्रबंधन के साथ पर्यावरणीय प्रवाह, जैव विविधता, वनीकरण, जनभागीदारी और नदी बेसिन प्रबंधन जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया।

फंडिंग व्यवस्था भी अलग है

NRCP में सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य 60:40 तथा पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में 90:10 के अनुपात में लागत वहन करते हैं। नमामि गंगे एक केंद्रीय क्षेत्र योजना (Central Sector Scheme) है, जिसमें परियोजनाओं के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्तपोषण किया जाता है।

क्या दोनों योजनाएं साथ-साथ चलती हैं?

हां। दोनों योजनाएं आज भी लागू हैं, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र अलग है। गंगा और उसकी सहायक नदियों से जुड़ी परियोजनाएं नमामि गंगे के तहत आती हैं।

वहीं, गंगा बेसिन के बाहर की नदियों के लिए सामान्यतः NRCP के तहत वित्तीय और तकनीकी सहायता दी जाती है। यही व्यवस्था वर्तमान में देश की नदी संरक्षण नीति का आधार है।

क्या केवल सीवेज उपचार से नदियां स्वच्छ हो सकती हैं?

NRCP ने भारत में नदी प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। लेकिन पिछले तीन दशकों में विशेषज्ञों, सरकारी समितियों और ऑडिट रिपोर्टों ने इसकी कुछ बुनियादी सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया है।

उनके अनुसार NRCP का मुख्य जोर STP, सीवर नेटवर्क और नालों के इंटरसेप्शन जैसी इंजीनियरिंग परियोजनाओं पर रहा। ये उपाय जरूरी हैं, लेकिन केवल इनके सहारे किसी नदी को पूरी तरह स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता।

नदियों का संरक्षण केवल सीवेज उपचार तक सीमित नहीं हो सकता। शहरी नालों का प्रबंधन, उपचारित जल का पुनः उपयोग, छोटी नदियों का संरक्षण और नदी को शहरी नियोजन का हिस्सा बनाना, इन सभी पर एक साथ काम करना होगा।
प्रो. विनोद तारे, संस्थापक, cGanga, IIT कानपुर

आज जल विशेषज्ञ नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र मानते हैं। जलधारा, बाढ़ क्षेत्र, आर्द्रभूमियां, भूजल, जैव विविधता और जलग्रहण क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इनमें से किसी एक की उपेक्षा भी नदी की सेहत को प्रभावित करती है।

इंजीनियरिंग समाधान बनाम नदी पुनर्जीवन

NRCP ऐसे समय में शुरू हुई थी, जब देश के अधिकांश शहरों में बिना उपचार वाला सीवेज नदी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण था। इसलिए योजना का फोकस सीवेज को रोकने और उसका उपचार करने पर रखा गया।

समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि नदी की सफाई और नदी का पुनर्जीवन दो अलग-अलग बातें हैं। यदि नदी में पर्याप्त प्रवाह न हो, बाढ़ क्षेत्र सिकुड़ जाएं या आर्द्रभूमियां नष्ट हो जाएं, तो केवल STP बनाकर नदी को स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता।

पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow) की अनदेखी

नदी को स्वस्थ रखने के लिए केवल साफ पानी नहीं, बल्कि पर्याप्त प्राकृतिक प्रवाह भी जरूरी है। इसे पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow या E-flow) कहा जाता है।

यदि किसी नदी का अधिकांश पानी सिंचाई, उद्योग या शहरों की जलापूर्ति के लिए निकाल लिया जाए, तो नदी की स्वयं को साफ करने (Self-purification) की क्षमता भी कम हो जाती है। ऐसे में उपचारित पानी भी नदी की गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होता।

बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) पर बढ़ता दबाव

नदी का बाढ़ क्षेत्र भी उसके पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होता है। यही क्षेत्र अतिरिक्त पानी को समाहित करता है, भूजल रिचार्ज में मदद करता है और कई प्रजातियों का आवास बनता है। 

अधिकांश नदी संरक्षण परियोजनाओं में बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। वहीं कई शहरों में अतिक्रमण और कंक्रीटीकरण बढ़ता गया। इससे नदी की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हुई।

आर्द्रभूमियां (Wetlands) भी हैं नदी की प्राकृतिक सफाई प्रणाली

नदी से जुड़ी आर्द्रभूमियां प्रदूषकों को रोकने, अतिरिक्त पानी को संग्रहित करने और जैव विविधता को सहारा देने का काम करती हैं। इसलिए इन्हें नदी का प्राकृतिक फिल्टर भी कहा जाता है।

हालांकि NRCP में आर्द्रभूमियों के संरक्षण पर विशेष जोर नहीं था। बाद में यह समझ विकसित हुई कि इनके बिना नदी की पारिस्थितिक क्षमता कमजोर पड़ सकती है।

नदी केवल सीवेज उपचार से स्वच्छ नहीं होती, क्योंकि वह एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है।

भूजल और नदी का क्या संबंध है?

अक्सर नदी संरक्षण योजनाओं में नदी और भूजल को अलग-अलग देखा जाता है, जबकि दोनों गहराई से जुड़े होते हैं। गर्मियों में कई नदियों का प्रवाह भूजल से ही बना रहता है। यदि किसी क्षेत्र में भूजल का अत्यधिक दोहन हो, तो नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी घट सकता है।

NRCP का मुख्य फोकस शहरी सीवेज प्रबंधन पर रहा, जबकि भूजल प्रबंधन को इसमें अपेक्षाकृत कम महत्व मिला। आज विशेषज्ञों का मानना है कि नदी और भूजल को एक साथ समझे बिना दीर्घकालिक नदी संरक्षण संभव नहीं है।

जलग्रहण क्षेत्र महत्वपूर्ण क्यों है?

नदी की स्थिति केवल शहर के भीतर नहीं तय होती। उसके जलग्रहण क्षेत्र में होने वाले बदलाव, जैसे वनों की कटाई, खनन, मिट्टी का कटाव और अनियोजित विकास, भी नदी की सेहत को प्रभावित करते हैं।

यदि ऊपरी हिस्से से अधिक गाद (Sediment) आए या वर्षा का पानी तेजी से बह जाए, तो नदी का स्वरूप बदल सकता है। इसी कारण अब पूरे नदी बेसिन को एक इकाई मानकर योजना बनाने पर जोर दिया जा रहा है। यह दृष्टिकोण केवल प्रदूषण नियंत्रण से आगे बढ़कर नदी संरक्षण को समग्र रूप में देखने पर जोर देता है।

क्या NRCP भविष्य की चुनौतियों के लिए पर्याप्त है?

पिछले तीन दशकों में नदी संरक्षण की चुनौतियां बदल गई हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते शहरी दबाव ने नदी संरक्षण को पहले की तुलना में अधिक जटिल बना दिया है।

बदलती चुनौतियां, बदलती सोच

जब 1995 में NRCP शुरू हुई थी, तब इसका मुख्य उद्देश्य शहरों के सीवेज को नदियों में जाने से रोकना था। यह उस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता थी। लेकिन अब यह स्पष्ट है कि नदी की सफाई और नदी का पुनर्जीवन अलग-अलग बातें हैं।

जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अनियमित मानसून, कम समय में अत्यधिक वर्षा, लंबे सूखे और बढ़ता तापमान नदियों के प्रवाह और जल गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रहे हैं।

एक ओर तेज़ बारिश के दौरान गाद, ठोस कचरा और अन्य प्रदूषक बड़ी मात्रा में नदियों में पहुंचते हैं, वहीं गर्मियों में घटता प्रवाह नदी की स्वयं को साफ करने की क्षमता कम कर देता है।

दिल्ली से गुजरने वाली यमुना इस बात का सबसे चर्चित उदाहरण है कि बड़े निवेश और अनेक परियोजनाओं के बावजूद नदी को स्वच्छ बनाए रखना कितना कठिन है।

केस स्टडी: यमुना - बुनियादी ढांचा बना, लेकिन नदी अब भी प्रदूषण से जूझ रही है

तीन दशक से अधिक समय और हजारों करोड़ रुपये के निवेश के बावजूद दिल्ली का यमुना खंड आज भी देश के सबसे प्रदूषित नदी हिस्सों में गिना जाता है।

यमुना भारत की उन नदियों में है जिन पर सबसे पहले बड़े पैमाने पर नदी संरक्षण कार्यक्रम लागू किए गए। यमुना एक्शन प्लान 1993 में शुरू हुआ और बाद में इसके विभिन्न चरण NRCP का हिस्सा बने।

इस दौरान दिल्ली, आगरा, मथुरा और उत्तर प्रदेश व हरियाणा के कई शहरों में STP, सीवर नेटवर्क और नालों के इंटरसेप्शन जैसी परियोजनाएं लागू की गईं। इनका उद्देश्य था कि बिना उपचार वाला सीवेज सीधे नदी में न पहुंचे।

इसके बावजूद यमुना आज भी देश की सबसे प्रदूषित नदियों में गिनी जाती है। CAG की प्रदर्शन ऑडिट के अनुसार, कई हिस्सों में BOD, DO और टोटल कोलीफॉर्म (TC) के मानक तय सीमा से काफी खराब रहे। यानी नदी सफाई कार्यक्रमों के बावजूद प्रदूषण का स्तर चिंताजनक बना रहा।

विकास केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि नदियों और अन्य पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए भी होना चाहिए।
प्रो. विनोद तारे, cGanga, IIT कानपुर

समस्या केवल STP की नहीं थी

CAG ने यह भी पाया कि कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हुईं। कुछ सीवेज उपचार संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो सके और कई स्थानों पर सीवर नेटवर्क अधूरा रहने के कारण बड़ी मात्रा में सीवेज उपचार संयंत्रों तक पहुंच ही नहीं पाया। परिणामस्वरूप अनेक नाले पहले की तरह सीधे यमुना में गिरते रहे।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की निगरानी रिपोर्ट भी लगातार दिखाती रही हैं कि विशेषकर दिल्ली के भीतर यमुना का लगभग 22 किलोमीटर का हिस्सा नदी का सबसे अधिक प्रदूषित खंड बना हुआ है। 

इसी हिस्से में शहर का अधिकांश सीवेज और कई बड़े नालों का पानी नदी में मिलता है, जिससे जल गुणवत्ता पर सबसे अधिक असर पड़ता है।

इस उदाहरण से क्या सीख मिलती है?

यमुना का अनुभव बताता है कि नदी संरक्षण केवल अवसंरचना बनाने तक सीमित नहीं है। सीवर नेटवर्क, STP के नियमित संचालन और नदी में पर्याप्त प्राकृतिक प्रवाह, तीनों का साथ होना जरूरी है। इनमें से कोई एक कड़ी कमजोर पड़ने पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। इसलिए किसी भी नदी को स्वच्छ बनाने के लिए पूरी नदी प्रणाली का समग्र प्रबंधन आवश्यक है।

नदी पुनर्जीवन कार्यक्रमों की सफलता का आकलन केवल जल गुणवत्ता से नहीं, बल्कि नदी के समग्र स्वास्थ्य (River Health) के आधार पर किया जाना चाहिए।
cGanga, IIT कानपुर (India Water Impact Summit, 2022)

आगे क्या होना चाहिए?

पिछले तीन दशकों के अनुभवों ने यह स्पष्ट किया है कि नदी संरक्षण की सफलता केवल अवसंरचना निर्माण से तय नहीं होती। इसके लिए वित्तीय, संस्थागत और पारिस्थितिक, तीनों स्तरों पर सुधार ज़रूरी हैं।

संचालन और रखरखाव को प्राथमिकता: STP के निर्माण के साथ उनके दीर्घकालिक संचालन, पर्याप्त बजट और तकनीकी क्षमता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

पूरे नदी बेसिन के आधार पर योजना: नदी संरक्षण में जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, बाढ़ क्षेत्र, आर्द्रभूमियां और पर्यावरणीय प्रवाह को भी शामिल किया जाना चाहिए।

सभी प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण: केवल शहरी सीवेज ही नहीं, बल्कि कृषि अपवाह, औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरे और वर्षाजल से होने वाले प्रदूषण पर भी समान ध्यान देना होगा।

पारदर्शी निगरानी और जनभागीदारी: रियल-टाइम जल गुणवत्ता निगरानी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और नगर निकायों की क्षमता बढ़ाए बिना नदी संरक्षण की योजनाएं लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकतीं।

करीब तीन दशकों के अनुभव बताते हैं कि NRCP ने भारत में नदी प्रदूषण नियंत्रण की मजबूत नींव रखी। अब चुनौती केवल नदियों को साफ करने की नहीं, बल्कि उन्हें स्वस्थ और जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में सुरक्षित रखने की है। यही दिशा भविष्य की नदी संरक्षण नीतियों का आधार बन सकती है।

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