अंतरिक्ष में पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे उपग्रहों (सैटेलाइट्स) के जरिये अंअब मौसम के साथ ही गांवों के जलस्रोतों और विकास योजनाओं की निगरानी हो रही है।
स्रोत : विकी कॉमंस
भारत में हर साल की तरह इस बार भी 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाया गया। यह दिन 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर की चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की बड़ी उपलब्धि को याद करने के लिए मनाया जाता है। यह उपलब्धि हासिल करके भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला और चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना। इसे देखते हुए भारत सरकार ने 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस घोषित किया था। लेकिन भारत की अंतरिक्ष यात्रा अब केवल चंद्रमा और मंगल तक पहुंचने की कहानी नहीं है। अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों से मिलने वाला डेटा अब धरती पर पानी, जंगल, खेती, मौसम, बाढ़, सूखा और ग्रामीण विकास जैसी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इस्तेमाल हो रहा है। यानी अंतरिक्ष से मिली तस्वीरें अब सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय नहीं रह गई हैं। वे यह तय करने में भी मदद कर रही हैं कि देश के किस इलाके में सूखे का असर ज्यादा है, कौन सा जलाशय कितना भरा है, बाढ़ का पानी कहां तक पहुंचा है, जंगल में आग कहां लगी है, किस इलाके में फसल की स्थिति खराब है और गांव में बनाया गया तालाब या अन्य परिसंपत्ति वास्तव में जमीन पर बनी भी है या नहीं।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर देश के युवाओं को संबोधित करते हुए एक वीडियो जारी कर कहा, राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस की शुभकामनाएं। आइए, और भी बड़े सपने देखें, अधिक नई चीजें बनाएं और नई सीमाओं को पार करें। यह नए कालचक्र की शुरुआत है। इसमें भारत ग्लोबल ऑर्डर में अपना स्पेस लगातार बड़ा बना रहा है। यह हमारे स्पेस प्रोग्राम में भी साफ-साफ दिखाई दे रहा है। हम सबने मिलकर 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का जो संकल्प लिया है, उसको सिद्धि तक पहुंचाने में स्पेस सेक्टर की भूमिका बहुत बड़ी है। भारत का युवा आज प्रोपल्शन सिस्टम से लेकर कंपोजिट मटेरियल, रॉकेट स्टेजेज, सैटेलाइट प्लेटफॉर्म्स तक के क्षेत्रों में काम कर रहा है, जिनकी कुछ साल पहले कल्पना भी संभव नहीं थी। भारत का प्राइवेट स्पेस टैलेंट पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहा है। आज ग्लोबल इंवेस्टर्स के लिए भारत का स्पेस सेक्टर एक आकर्षक जगह बन रहा है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख डॉ. वी नारायणन ने अहमदाबाद में राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारत 2035 तक अंतरिक्ष में पहला स्वदेशी भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बास) स्थापित कर लेगा। इससे भारत उन चुनिंदा अंतरिक्ष महाशक्तियों की कतार में खड़ा हो जाएगा, जिनके पास अपना अंतरिक्ष स्टेशन है। नारायणन ने बताया कि भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला प्राथमिक मॉड्यूल (बास-1) वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष में लॉन्च करने की योजना है। इसके बाद अन्य मॉड्यूलों को जोड़कर 2035 तक पूर्ण विकसित अंतरिक्ष स्टेशन तैयार किया जाएगा। करीब 52 टन वजनी यह स्पेस स्टेशन धरती से लगभग 400 किमी ऊपर स्थापित होगा, जहां भारतीय अंतरिक्ष यात्री 15 से 20 दिनों तक रहकर वैज्ञानिक शोध कर सकेंगे।
भारत जैसे 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल भूभाग वाले देश में हर गांव, नदी, जलाशय और खेत की लगातार जमीन से निगरानी करना आसान नहीं है। यहां उपग्रह रिमोट सेंसिंग एक बड़ा समाधान बनकर सामने आई है। इसरो के पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अलग-अलग स्पेक्ट्रल बैंड में धरती की तस्वीरें लेते हैं। इन तस्वीरों को दूसरी सूचनाओं और मॉडलों के साथ मिलाकर जमीन की नमी, जल निकायों, नदी चैनलों, बर्फ, फसल और वनस्पति की स्थिति का आकलन किया जा सकता है। इसरो के अनुसार उपग्रहों से जल संसाधनों की बेहतर निगरानी इसलिए संभव है, क्योंकि एक साथ बड़े क्षेत्र को देखा जा सकता है और अलग-अलग समय पर स्थितियों का मिलान या तुलना कर के इनकी स्थिति में आए बदलावों को समझा जा सकता है।
बाढ़ के समय अंतरिक्षीय निरीक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उपग्रह चित्रों से बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में पानी के फैलाव की परत तैयार की जा सकती है। इन सूचनाओं का इस्तेमाल राहत, बचाव और आपदा प्रबंधन की योजना बनाने में किया जाता है। इसरो का राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र बाढ़ संभावित क्षेत्रों के वैज्ञानिक आकलन में डिजिटल एलिवेशन मॉडल, जलस्तर और ऐतिहासिक उपग्रह आंकड़ों का इस्तेमाल करता है। बाढ़ से जुड़े वैल्यू-एडेड उत्पाद Bhuvan और National Database for Emergency Management जैसे प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध कराए जाते हैं।
सूखे के मामले में उपग्रहों से तरिक्षीय निरीक्षण के जरिये वनस्पति, मिट्टी की नमी और दूसरे संकेतकों का अध्ययन किया जाता है। कृषि सूखे के आकलन के लिए भारत में एक स्थापित उपग्रह आधारित प्रणाली काम कर रही है, जिसका उपयोग प्रभावित क्षेत्रों में राहत संबंधी निर्णयों में मदद के लिए किया जाता है।
देश के बड़े जलाशयों और जल निकायों (water bodies) की स्थिति समझने में भी उपग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उपग्रह चित्रों से जलाशय का जल-फैलाव क्षेत्र यानी Water Spread Area देखा जा सकता है। भुवन (Bhuvan) प्रणाली पर एक हेक्टेयर से बड़े जल निकायों के लिए जल-फैलाव संबंधी डेटा उपलब्ध कराया जाता है, जिसे प्रशासनिक और विश्लेषणात्मक उपयोग में लिया जा सकता है।
यह व्यवस्था केवल यह बताने तक सीमित नहीं है कि किसी जलाशय में पानी है या नहीं। अलग-अलग समय के चित्रों की तुलना करके जलाशय के जल-फैलाव में बदलाव देखा जा सकता है। इसे वर्षा, जलग्रहण क्षेत्र और अन्य हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों के साथ जोड़ने पर जल उपलब्धता की तस्वीर और बेहतर बनती है।
इसरो राष्ट्रीय स्तर पर हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग (Hydrological Modeling) के क्षेत्र में भी काम करता है। यह मॉडल जलस्रोतों से पानी के वाष्पीकरण, सतही बहाव, मिट्टी की नमी और बेस फ्लो जैसे मानकों का आकलन करते हैं और जल संसाधनों की उपलब्धता तथा उसमें समय के साथ हो रहे बदलाव को समझने में मदद करते हैं। राष्ट्रीय हाइड्रोलॉजिकल ड्राउट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (National Hydrological Drought Information System) देश में हाइड्रोलॉजिकल सूखे की निगरानी के लिए विकसित किया गया है।
ससैटेलाइट से मिले डेटा और तस्वीरों के कारण अब कृषि क्षेत्र में खेती को बेहतर और आसान बनाने भी काफी मदद मिल रही है।
ग्रामीण विकास के क्षेत्र में अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल अब और व्यापक होने जा रहा है। 1 जुलाई 2026 से MGNREGA की जगह विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी VB-G RAM G लागू हो चुका है। नई व्यवस्था में रोजगार गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन की गई है और जल सुरक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, आजीविका संबंधी परिसंपत्तियों तथा चरम मौसम की घटनाओं से बचाव वाले कार्यों पर जोर दिया गया है। योजना में हुए काम और परिणामों की निगरानी के लिए जियोस्पेशियल तकनीक (Geospatial technology) का इस्तेमाल किया गया है। कानून में जियो-रेफरेंसिंग, सैटेलाइट इमेजरी, डिजिटल मैपिंग और मोबाइल तथा डैशबोर्ड आधारित निगरानी का प्रावधान है।
इसका अर्थ यह है कि गांव में बनने वाला तालाब, जल संरक्षण संरचना, नाला, सड़क या दूसरी ग्रामीण परिसंपत्ति केवल कागज पर दर्ज रहने के बजाय डिजिटल और भौगोलिक रिकॉर्ड से भी जुड़ सकती है। काम शुरू होने से पहले, काम के दौरान और काम पूरा होने के बाद की जियो-टैग्ड सूचनाओं को संबंधित स्थान से जोड़ा जा सकता है। Bhuvan पर उपलब्ध VB-G RAM G और भूग्राम (Bhugram) प्लेटफॉर्म ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामीण परिसंपत्तियों की जियोस्पेशियल योजना, क्रियान्वयन और निगरानी के लिए विकसित किए गए हैं। इनमें सैटेलाइट से प्राप्त सूचनाओं, जियोस्पेशियल लेयर्स और ग्राम पंचायत स्तर के प्रशासनिक डेटा को जोड़ा जा रहा है।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि हर तालाब या हर छोटे काम की निगरानी का मतलब यह नहीं है कि कोई उपग्रह हर समय उसके ऊपर से लाइव तस्वीर ले रहा है। वास्तव में सैटेलाइट इमेजरी, जियो-टैगिंग, GIS मैपिंग, मोबाइल से प्राप्त फील्ड डेटा और डिजिटल डैशबोर्ड को आपस में जोड़ा जाता है। इससे काम की वास्तविक लोकेशन और उसकी प्रगति की निगरानी अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकती है। इससे ग्राम पंचायतों को कामों की पहचान और प्राथमिकता तय करने के लिए निर्णायक सूचनाएं प्राप्त होती हैं। ग्रामीण रोजगार योजना में अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल कोई बिल्कुल ही नई बात नहीं है। केंद्र सरकार के अनुसार 2025 में MGNREGA गतिविधियों की योजना और निगरानी के लिए Geospatial Technology का इस्तेमाल किया जा रहा था। यानी VB-G RAM G में इसका दायरा और संस्थागत एकीकरण आगे बढ़ाया गया है।
VB-G RAM G में पानी से जुड़े कार्यों को विशेष महत्व दिया गया है। तालाब, जल निकाय, नहर, कुएं, जल संरक्षण संरचनाएं और बाढ़ के पानी की निकासी से जुड़े कार्य ग्रामीण विकास की योजना का हिस्सा हैं।
यहां अंतरिक्ष तकनीक का महत्व केवल निगरानी तक सीमित नहीं है। किसी गांव में नया तालाब कहां बनाया जाए, किस स्थान पर जलभराव की समस्या है, कहां वर्षाजल को रोका जा सकता है और कौन सी जगह भूजल पुनर्भरण के लिहाज से उपयुक्त हो सकती है, ऐसे सवालों के जवाब देने में GIS, रिमोट सेंसिंग और भू-स्थानिक आंकड़े (geospatial data) मदद कर सकते हैं।
इसी दिशा में युक्तधारा (Yuktdhara) जैसे GIS आधारित प्लेटफॉर्म ग्राम पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की वैज्ञानिक योजना बनाने में मदद करते हैं। VB-G RAM G के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत को सहभागी प्रक्रिया से अपनी विकसित ग्राम पंचायत योजना Viksit Gram Panchayat Plan तैयार करना है और युक्तधारा इस योजना में भू-स्थानिक आंकड़ों और सूचनाओं जैसे इनपुट उपलब्ध कराता है, तो विश्लेषणात्मक (analytical) स्तर पर योजनाओं को सटीक और प्रभावी बनाने में मददगार साबित होते हैं।
भारत में मौसम की निगरानी और पूर्वानुमान की क्षमता में पिछले वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। इसका एक प्रमुख आधार अंतरिक्ष से लगातार मिलने वाला मौसम संबंधी डेटा है। भारत में मौसम पूर्वानुमान में उपग्रहों का इस्तेमाल 1970 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब IMD विदेशी NOAA और NASA मौसम उपग्रहों से तस्वीरें प्राप्त करता था; लेकिन 1980 के दशक में भारतीय उपग्रहों के आने के बाद इसमें बड़ा बदलाव आया। 18 जुलाई 1980 को रोहिणी RS-1 भारत के SLV-3 से सफलतापूर्वक कक्षा में पहुंचा, जबकि 1981 में RS-D1 और 1983 में RS-D2 जैसे रोहिणी मिशनों ने भारत की उपग्रह तकनीक और पृथ्वी-अवलोकन क्षमता को आगे बढ़ाया। 1982 में INSAT श्रृंखला की शुरुआत और 1983 में INSAT-1B के परिचालन के बाद मौसम विज्ञान को पहली बार भारतीय भूभाग और आसपास के क्षेत्र की नियमित उपग्रह निगरानी का मजबूत आधार मिला। INSAT के VHRR सेंसर से बादलों और मौसम प्रणालियों की तस्वीरें मिलने लगीं और 1984 से भारतीय उपग्रहों से नियमित इमेजरी तथा 1984-86 में हवा, वर्षा और समुद्र की सतह के तापमान जैसे उत्पाद मिलने लगे। इसके बाद INSAT-2, Kalpana-1, INSAT-3A, INSAT-3D/3DR और अब INSAT-3DS तक तकनीकी उन्नयन (technological advancement) का यह सिलसिला जारी है।
2024 में प्रक्षेपित INSAT-3DS इसी दिशा में महत्वपूर्ण कड़ी है। यह छह चैनल वाले इमेजर और 19 चैनल वाले साउंडर से लैस है। इसके जरिए बादल, वर्षा, कोहरा, जलवाष्प, तापमान, समुद्र और भूमि की सतह का तापमान, बर्फ, आग, एरोसोल और वातावरण की ऊर्ध्वाधर तापमान-नमी प्रोफाइल जैसी सूचनाएं प्राप्त की जा सकती हैं। इन आंकड़ों का इस्तेमाल IMD, NCMRWF और अन्य संस्थान बेहतर मौसम पूर्वानुमान और मौसम सेवाओं के लिए करते हैं।
आज मौसम वैज्ञानिकों के पास केवल जमीन पर लगे मौसम केंद्रों का डेटा नहीं है। उपग्रहों से बादलों की लगातार निगरानी, समुद्र की स्थिति, नमी और तापमान की जानकारी मिलती है। इसे रडार, स्वचालित मौसम केंद्रों, वर्षामापी और संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडल के साथ जोड़कर पूर्वानुमान तैयार किया जाता है। INSAT-3DS का Data Relay Transponder स्वचालित मौसम और जलवायु डेटा संग्रह प्लेटफॉर्म से आंकड़े प्राप्त कर उन्हें उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाने में भी मदद करता है।
यही वजह है कि आज चक्रवात की दिशा, मानसून की गतिविधि, भारी बारिश, आंधी-तूफान और बादल बनने की प्रक्रिया की निगरानी पहले की तुलना में कहीं अधिक लगातार और व्यापक हो गई है। मौसम विभाग की मौजूदा उपग्रह बुलेटिन में INSAT-3DS की इमेजरी से बादलों और संवहनीय गतिविधियों की निगरानी की जा रही है।
उपग्रहों के जरिये अब हज़ारों किलोमीटर दूर से रिमोट सेंसिंग तकनीक की मदद से झीलों, तालाबों और नदियों जैसे जलस्रातों की रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव हो गई है।
कृषि क्षेत्र में भी सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल काफी समय से हो रहा है। फसल का क्षेत्रफल, फसल की स्थिति, उत्पादन का अनुमान, मिट्टी संबंधी जानकारी और सूखे का आकलन जैसे अनेक कार्यों में रिमोट सेंसिंग डेटा का उपयोग किया जा रहा है।
भारत ने फसल उत्पादन के अनुमान के लिए FASAL यानी Forecasting Agricultural Output using Space, Agro-meteorology and Land-based Observations कार्यक्रम विकसित किया। इसके तहत उपग्रह आंकड़ों, मौसम संबंधी सूचनाओं और जमीन से मिलने वाले आंकड़ों को जोड़कर फसल उत्पादन का पूर्वानुमान तैयार किया जाता है। महालनोबिस नेशनल क्रॉप फोरकास्ट सेंटर राष्ट्रीय स्तर पर कई फसलों के उत्पादन का पूर्व-फसल कटाई अनुमान तैयार करने के लिए अंतरिक्ष आधारित सूचनाओं का उपयोग करता है।
उपग्रह तस्वीरों का इस्तेमाल फसल का अनुमान लगाने से आगे बढ़कर किसानों के लिए खेती-बारी से जुड़ी कई अन्य चीजों में मददगार हो सकती है। जैसे खेत की मिट्टी में नमी कितनी है, फसल पर जल तनाव का असर कहां शुरू हो रहा है, किस इलाके में सिंचाई की जरूरत ज्यादा है, किस क्षेत्र में फसल को नुकसान हुआ है और किस इलाके में उत्पादन कम होने की आशंका है, इन सबका बड़े पैमाने पर आकलन संभव है। इसका अगला चरण सैटेलाइट डेटा को AI और मशीन लर्निंग से जोड़ना हो सकता है। इससे किसानों और प्रशासन को अधिक स्थानीय स्तर पर कृषि सलाह दी जा सकती है, जैसे कब सिंचाई की जरूरत है, कहां फसल तनाव में है और कहां मौसम आधारित जोखिम अधिक है।
| समस्या/क्षेत्र | प्रणाली/तकनीक | क्या देखती है | मुख्य पैमाना/आंकड़ा | उपयोग | प्रमुख स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| सूखा | NISAR Soil Moisture Products | मिट्टी की नमी | 100 मीटर | 12 दिन के रिपीट साइकिल से मिट्टी की नमी में बदलाव; सूखे और सिंचाई जरूरत के आकलन में उपयोगी | ISRO |
| सूखा | राष्ट्रीय हाइड्रोलॉजिकल ड्राउट इन्फॉर्मेशन सिस्टम | हाइड्रोलॉजिकल सूखा | राष्ट्रीय स्तर | जल उपलब्धता और हाइड्रोलॉजिकल सूखे की निगरानी | ISRO |
| बाढ़ | NRSC Flood Mapping / Satellite-derived Inundation | बाढ़ का जल-फैलाव | घटना-आधारित | उपग्रह चित्रों से बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की मैपिंग; राहत और आपदा प्रबंधन में उपयोग | ISRO/NRSC |
| बाढ़ | NISAR | सतही जल और बाढ़ क्षेत्र में बदलाव | लगभग 240 किमी स्वाथ; 12 दिन रिपीट साइकिल | रडार आधारित ऑल-वेदर, दिन-रात अवलोकन; सतही जल की निगरानी की क्षमता | ISRO/NASA |
| जलाशय | Bhuvan Water Bodies / Water Spread Area | जल-फैलाव क्षेत्र | 1 हेक्टेयर से बड़े जल निकाय | अलग-अलग समय के उपग्रह चित्रों से जलाशय/जल निकाय के क्षेत्रफल में बदलाव की निगरानी | ISRO |
| जंगल की आग | Indian Forest Fire Response and Assessment System (INFFRAS) | सक्रिय वनाग्नि | लगभग 30 मिनट में अलर्ट उपलब्धता | MODIS उपग्रह डेटा से सक्रिय आग की पहचान और सूचना; वन विभागों के लिए अलर्ट | ISRO/NRSC/FSI |
| ग्लेशियल झील | Satellite-based Glacial Lake Monitoring | झील का क्षेत्रफल और विस्तार | 10 हेक्टेयर से बड़ी झीलों पर राष्ट्रीय/हिमालयी अध्ययन | 1984-2023 के डेटा से दीर्घकालिक बदलाव; 2,431 बड़ी झीलों में 676 के विस्तार की पहचान | ISRO |
| ग्लेशियल झील | Glacial Lake GLOF Monitoring | झील विस्तार और संभावित GLOF जोखिम | क्षेत्र-विशिष्ट | उपग्रह चित्रों से ग्लेशियल झीलों के आकार और बदलाव की निगरानी | ISRO |
| भूस्खलन | Experimental Landslide Early Warning / Hazard Mapping | भूस्खलन और संवेदनशील क्षेत्र | क्षेत्र-विशिष्ट | Landslide Hazard Zones, pre/post satellite imagery और early-warning products के जरिए निगरानी | ISRO |
| वायु प्रदूषण | EOS-6 OCM-3 Aerosol Optical Depth (AOD) | एरोसोल और प्रदूषण के संकेतक | 1 किमी | AOD के जरिए aerosol concentration/transport को समझने में मदद; PM2.5/PM10 वितरण के आकलन में उपयोग | ISRO |
पर्यावरण की निगरानी में भी उपग्रहों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। जंगलों का फैलाव, वन आवरण में बदलाव, जैव विविधता, आर्द्रभूमि, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां, भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण, ग्लेशियर और जल प्रदूषण से जुड़े अनेक पहलुओं के अध्ययन में रिमोट सेंसिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है।
जंगल की आग यानी वनाग्नि की निगरानी इसका सबसे प्रभावी उदाहरण है। उपग्रह आधारित Indian Forest Fire Response and Assessment System सक्रिय जंगल की आग का लगभग रियल-टाइम अवलोकन करता है और इसकी सूचना वन विभाग तथा संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाई जाती है। इसरो के अनुसार, कुछ सक्रिय आग की जानकारी उपग्रह से प्राप्त होने के लगभग 30 मिनट के भीतर Bhuvan और वन सर्वेक्षण से जुड़े प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई जा सकती है।
इसी तरह आर्द्रभूमियों में बदलाव, मैंग्रोव क्षेत्र का विस्तार या क्षरण, तटीय इलाकों में बदलाव और ग्लेशियरों तथा हिमनद झीलों की निगरानी में भी अंतरिक्ष तकनीक उपयोगी है। इतने बड़े और दुर्गम क्षेत्रों को जमीन से नियमित रूप से देखना मुश्किल है, जबकि उपग्रह पूरे क्षेत्र की एक समान तस्वीर उपलब्ध करा सकते हैं।
भारत और अमेरिका का संयुक्त NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) मिशन पृथ्वी अवलोकन की अगली पीढ़ी की तकनीक का उदाहरण है। 2026 में इसके S-बैंड SAR डेटा उत्पाद जारी किए गए हैं। NISAR L-बैंड और S-बैंड रडार का इस्तेमाल करता है और बादलों या रात के समय जैसी परिस्थितियों में भी पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों का अध्ययन करने की क्षमता रखता है। यह लगभग 240 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में उच्च रिजॉल्यूशन डेटा उपलब्ध करा सकता है और 12 दिन के दोहराव चक्र के साथ पृथ्वी की सतह में हो रहे बदलावों की टाइम लाइन तैयार कर देता है। यह तकनीक भविष्य में बाढ़, भूस्खलन, भू-स्खलन, मिट्टी की नमी, हिमनद, जंगल, कृषि भूमि और जल संसाधनों में हो रहे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बदलावों की पहचान में उपयोगी हो सकती है।
भारत की अंतरिक्ष तकनीक का अगला बड़ा बदलाव अलग-अलग डेटा स्रोतों को एक साथ जोड़ने में दिखाई दे रहा है। सैटेलाइट इमेजरी, मौसम डेटा, GIS, ड्रोन, जमीन से मिलने वाले सेंसर डेटा, AI और डिजिटल मैपिंग को एक साथ इस्तेमाल करके ज्यादा उपयोगी निर्णय प्रणाली बनाई जा सकती है।
जल क्षेत्र में इसका मतलब हो सकता है कि किसी गांव के लिए वर्षाजल, सतही जल, भूजल, मिट्टी की नमी और जलवायु जोखिम की एक संयुक्त तस्वीर तैयार हो। कृषि में फसल, मौसम और मिट्टी की जानकारी को जोड़कर स्थानीय सलाह विकसित की जा सकती है। आपदा प्रबंधन में बाढ़ या चक्रवात के साथ-साथ प्रभावित आबादी, सड़क, पुल और अस्पतालों की लोकेशन को जोड़कर राहत की प्राथमिकताएं तय की जा सकती हैं।
इसरो का National Information System for Climate and Environment Studies यानी NICES भी इसी दिशा का उदाहरण है। इसमें भूमि, समुद्र, वातावरण और क्रायोस्फीयर से जुड़े जलवायु संकेतकों के लिए अंतरिक्ष आधारित आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इसरो के अनुसार 51 Essential Climate Variables में से 28 ऐसे हैं जिनकी जानकारी अंतरिक्ष से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हासिल की जा सकती है।
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