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प्रदूषण और जलगुणवत्ता

भूजल में यूरेनियम बन रहा बड़ी चुनौती, 132 जिलों के पानी में पाया गया ये भारी धातु

इस लेख में जानिए यूरेनियम क्या है और कैसे यह भूजल में बड़ी चुनौती बनते जा रहा है? कैसे यह भूजल में आता है और इससे कैसे बचाव किया ज सकता है ?

Author : सयाली पराते

हमारे देश में जल संकट की चर्चा अक्सर सूखे, गिरते भूजल स्तर और फ्लोराइड या नाइट्रेट जैसे प्रदूषकों तक सीमित रहती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सबका ध्यान एक ऐसे प्रदूषक पर गया है, जो दिखाई नहीं देता, स्वाद या गंध नहीं बदलता, लेकिन लंबे समय तक शरीर में पहुंचने पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है, यह यूरेनियम है।

हाल ही में दिल्ली और बिहार में यूरेनियम चर्चा का विषय बना हुआ है। बिहार में माताओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी का दावा करने वाली एक रिपोर्ट सामने आई है। इस मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने दिल्ली के भूजल में भी यूरेनियम की मौजूदगी का संज्ञान लिया और इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा मानते हुए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) तथा दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। 

हालांकि यूरेनियम का नाम सुनते ही परमाणु ऊर्जा और परमाणु हथियारों की छवि सामने आती है, लेकिन यह एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रेडियोधर्मी तत्व भी है, जो चट्टानों और मिट्टी में मौजूद रहता है। कई क्षेत्रों में भूजल इन चट्टानों के संपर्क में आने से स्वाभाविक रूप से यूरेनियम घुल जाता है। यही कारण है कि भारत के कई राज्यों के साथ-साथ मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी दर्ज की गई है।

क्या है मामला?

भारत में भूजल में यूरेनियम प्रदूषण को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही है। इसकी गंभीरता तब और स्पष्ट हुई जब बिहार में माताओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी का दावा करने वाली एक रिपोर्ट सामने आई, जिसने संभावित स्वास्थ्य जोखिमों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी। 

इसी मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने दिल्ली के भूजल में भी यूरेनियम की मौजूदगी का संज्ञान लिया और इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा मानते हुए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) तथा दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। 

इस घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि यूरेनियम प्रदूषण अब केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल की गुणवत्ता और सुरक्षित पेयजल व्यवस्था के सामने उभरती हुई चुनौती बन चुका है। ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि यूरेनियम क्या है, यह भूजल में कैसे पहुंचता है, इसके स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय प्रभाव क्या हैं और भारत में इसकी स्थिति कितनी गंभीर है।

यूरेनियम क्या है?

यूरेनियम एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रेडियोधर्मी तत्व है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से परमाणु ऊर्जा उत्पादन और परमाणु ईंधन के रूप में किया जाता है। यह ग्रेनाइट, फॉस्फेट और अन्य चट्टानों में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता है। वर्षा, चट्टानों के क्षरण और भू-रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण इसकी थोड़ी मात्रा भूजल में पहुंच सकती है।

भूजल में यूरेनियम कैसे आता है?

विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मामलों में भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी भूवैज्ञानिक कारणों से होती है। ग्रेनाइट, फॉस्फेट और अन्य यूरेनियम युक्त चट्टानों के लंबे समय तक पानी के संपर्क में रहने से यूरेनियम धीरे-धीरे पानी में घुल जाता है। 

हालांकि  मानव गतिविधियां भी इस प्रक्रिया को तेज कर सकती है। अत्यधिक भूजल दोहन, जलस्तर में गिरावट, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग और भूजल की रासायनिक संरचना में बदलाव यूरेनियम की घुलनशीलता बढ़ा सकते है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है।  

  • यूरेनियम युक्त चट्टानों से प्राकृतिक रिसाव 

  • भूजल स्तर में बदलाव

  • खनन गतिविधियां

  • कुछ क्षेत्रों में फॉस्फेट युक्त चट्टानों का घुलना

  • भूजल का अत्यधिक दोहन, जिससे गहरे जलभृतों का पानी उपयोग में आने लगता है

एक रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश मामलों में भूजल में यूरेनियम की उपस्थिति का प्रमुख कारण प्राकृतिक भूगर्भीय संरचना है। 

राष्ट्रीय तस्वीर कितनी चिंताजनक है?

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में भूजल की गुणवत्ता की निगरानी और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना राज्यों की जिम्मेदारी है, क्योंकि जल राज्य का विषय है। हालांकि, Central Ground Water Board ने वर्ष 2019 में देशभर में भूजल में यूरेनियम की उपस्थिति का अध्ययन किया। 

भारत सरकार ने संसद में बताया था कि वर्ष 2019 में किए गए अध्ययन के दौरान 14,377 भूजल नमूनों में से 409 नमूनों में यूरेनियम की मात्रा अनुशंसित सीमा से अधिक पाई गई। ये नमूने लगभग 18 राज्यों से थे। जिसमें  यूरेनियम की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित अनुमेय सीमा 0.03 मिलीग्राम प्रति लीटर (0.03 mg/L) से अधिक पाई गई। 

इन निष्कर्षों को संबंधित राज्य सरकारों के साथ साझा किया गया ताकि आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें। केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 से जल जीवन मिशन के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को निर्धारित गुणवत्ता का सुरक्षित नल जल उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया।

मिशन के अंतर्गत रासायनिक प्रदूषण और भारी धातुओं से प्रभावित बस्तियों को प्राथमिकता दी जाती है। वहीं Department of Atomic Energy के अनुसार आंध्र प्रदेश के तुम्मलापल्ले यूरेनियम खनन क्षेत्र के आसपास किए गए वैज्ञानिक एवं जलभूवैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि भूजल में यूरेनियम की अधिक मात्रा का खनन गतिविधियों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक भूवैज्ञानिक कारणों से मौजूद है। 

विभाग ने यह भी कहा है कि वैज्ञानिक जांच में यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की गतिविधियों से बोरवेलों या फसलों को किसी प्रकार के नुकसान के प्रमाण नहीं मिले है। 

सुरक्षित सीमा कितनी है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल में यूरेनियम की अस्थायी सुरक्षित सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर 30 µg/L या 0.03 mg/L है। भारत के भारतीय मानक ब्यूरो ने भी पेयजल मानकों में यही सीमा अपनाई है।

क्या यूरेनियम खनन ही इसका कारण है?

यह एक आम धारणा है कि जहां यूरेनियम की खदानें होती है, वहीं भूजल प्रदूषित होता है। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन इससे पूरी तरह सहमत नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार Department of Atomic Energy के अनुसार आंध्र प्रदेश के तुम्मलापल्ले यूरेनियम परियोजना क्षेत्र में किए गए जलभूवैज्ञानिक और समस्थानिक अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला कि भूजल में यूरेनियम की अधिक मात्रा का खनन गतिविधियों से सीधा संबंध नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक भूवैज्ञानिक परिस्थितियों के कारण है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि खनन से कभी कोई पर्यावरणीय प्रभाव नहीं हो सकता, बल्कि यह कि हर क्षेत्र में कारण अलग-अलग हो सकते हैं और वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।

यूरेनियम शरीर में कैसे प्रवेश करता है?

यूरेनियम शरीर में मुख्य रूप से चार माध्यमों से प्रवेश कर सकता है -

  • पीने का पानी

  • भोजन

  • हवा (धूल के रूप में)

  • खनन या उद्योगों में व्यावसायिक संपर्क, इनमें सामान्य लोगों के लिए सबसे बड़ा स्रोत पीने का पानी माना जाता है।

स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?

बहुत से लोग मानते हैं कि यूरेनियम का खतरा केवल रेडियोधर्मिता है, जबकि पीने के पानी में मौजूद यूरेनियम का प्रमुख जोखिम उसकी रासायनिक विषाक्तता है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में यूरेनियम युक्त पानी पीने से -

  • गुर्दों को नुकसान

  • नेफ्राइटिस

  • हड्डियों पर प्रभाव

  • आंतरिक अंगों को क्षति

  • लंबे समय में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते है

WHO और CGWB दोनों बताते है कि पीने के पानी के माध्यम से शरीर में प्रवेश करने वाला यूरेनियम मुख्यतः किडनी को प्रभावित करता है।

वर्ष 2023 में भूजल में यूरेनियम प्रदूषण का राज्यवार विवरण

क्र. सं.राज्य/केंद्रशासित प्रदेशयूरेनियम की जांच किए गए नमूनों की संख्या30 माइक्रोग्राम/लीटर से अधिक यूरेनियम वाले नमूनों का प्रतिशत30 माइक्रोग्राम/लीटर से अधिक यूरेनियम वाले पृथक क्षेत्रों वाले जिलों की संख्या
1अरुणाचल प्रदेश1200
2असम15500
3बिहार7520.11
4चंडीगढ़ (केंद्रशासित प्रदेश)800
5छत्तीसगढ़7830.63
6दिल्ली10310.76
7गोवा600
8हरियाणा85718.716
9जम्मू एवं कश्मीर25000
10झारखंड34200
11कर्नाटक1254.83
12केरल34200
13मध्य प्रदेश1,0640.53
14महाराष्ट्र1,5670.23
15मेघालय3900
16मिजोरम300
17नागालैंड600
18ओडिशा9040.33
19पुडुचेरी400
20पंजाब90832.620
21राजस्थान62721.221
22तमिलनाडु9152.39
23त्रिपुरा8100
24उत्तर प्रदेश1,3868.343
25उत्तराखंड2060.51
कुल योग11,4456.6132
Parts of 132 districts in 13 States/UTs

जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, केंद्रीय भूजल बोर्ड देशभर में यूरेनियम और आर्सेनिक सहित विभिन्न प्रदूषकों के लिए नियमित रूप से भूजल गुणवत्ता की निगरानी करता है। 

वर्ष 2023 के आंकड़ों में कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अलग-अलग क्षेत्रों में भूजल में यूरेनियम और आर्सेनिक की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई। पेयजल में आर्सेनिक की 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित है।

रिपोर्ट के अनुसार, भूजल प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण मुख्य रूप से राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, जबकि केंद्र सरकार CGWB के माध्यम से गुणवत्ता संबंधी आंकड़े साझा करने, आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित जलभृतों के लिए आर्सेनिक-मुक्त कुएं विकसित करने और राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम के तहत भूजल गुणवत्ता का अध्ययन करने जैसे प्रयास कर रही है। 

इसके अलावा जल जीवन मिशन के तहत BIS के मानकों के अनुरूप पेयजल उपलब्ध कराने, रासायनिक प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों को अतिरिक्त वित्तीय प्राथमिकता देने तथा जल शक्ति अभियान, PMKSY-वाटरशेड विकास, मनरेगा और अटल भूजल योजना जैसी पहल चलायी ज रही है। 

बचाव कैसे करें?

यदि आपके क्षेत्र में भूजल पर निर्भरता अधिक है, तो ये सावधानियां उपयोगी हो सकती है -

  • समय-समय पर पानी की गुणवत्ता की जांच कराएं।

  • केवल प्रमाणित पेयजल स्रोतों का उपयोग करें।

  • वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दें।

  • भूजल का अत्यधिक दोहन कम करें।

  • जल गुणवत्ता से जुड़ी सरकारी रिपोर्टों पर नज़र रखें।

  • यदि स्थानीय प्रशासन किसी क्षेत्र को रासायनिक प्रदूषण से प्रभावित घोषित करे, तो वैकल्पिक जल स्रोत अपनाएं।

यूरेनियम एक प्राकृतिक तत्व है, लेकिन जब इसकी मात्रा पीने के पानी में सुरक्षित सीमा से अधिक हो जाती है, तो यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन जाती है। भारत में अब तक के वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि अधिकांश मामलों में इसका स्रोत प्राकृतिक भूवैज्ञानिक परिस्थितियां है, फिर भी नियमित निगरानी और सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। जल संकट के इस दौर में केवल पानी की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 

भारत में जल संकट अब केवल पानी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता का भी संकट बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता भूजल दोहन और बदलती भू-रासायनिक परिस्थितियां आने वाले वर्षों में यूरेनियम जैसे प्रदूषकों की चुनौती को और बढ़ा सकती है।

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