गोवा की मांडवी नदी। नदी के मुहाना क्षेत्र में अगस्त 2026 की जांच के दौरान सभी 22 जगहों पर फीकल कोलीफॉर्म निर्धारित संदर्भ सीमा से अधिक पाया गया था।

 

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नदी और तालाब

मांडवी नदी में प्रदूषण: सात साल पहले हुई थी गंदे पानी के स्रोतों की पहचान, फिर भी समस्या बरकरार

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

  • अगस्त 2026 में मांडवी नदी के 22 जगहों से लिए गए सभी 44 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म निर्धारित सीमा से अधिक मिला।

  • गोवा सरकार की 2019 की कार्ययोजना में कई घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से बिना उपचार वाला सीवेज नदी में छोड़े जाने की बात दर्ज थी।

  • राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के अध्ययनों में भी मांडवी नदी में बैक्टीरिया संबंधी प्रदूषण और उसके मौसमी बदलाव दर्ज किए गए थे।

  • बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने मई 2026 में मांडवी के पानी की जांच और प्रदूषण रोकने के लिए की गई कार्रवाई की रिपोर्ट माँगी थी।

गोवा की मांडवी नदी में एक बार फिर मलजनित प्रदूषण की समस्या सामने आई है। गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GSPCB) की अक्टूबर 2026 में सामने आई अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार, 24 अगस्त को मांडवी नदी के मुहाना क्षेत्र में 22 जगहों से पानी के 44 नमूने लिए गए थे। सभी नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा निर्धारित संदर्भ सीमा से अधिक मिली। यह नदी के पानी में मलजनित प्रदूषण का संकेत है।

मांडवी में गंदा पानी पहुंचने की समस्या नई नहीं है। गोवा सरकार की अप्रैल 2019 की नदी पुनर्जीवन कार्ययोजना में ऐसे कई जगहों का उल्लेख है, जहां घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से बिना उपचार वाला सीवेज नदी में छोड़ा जा रहा था। कार्ययोजना में सीवेज का प्रवाह रोकने और उपचार की व्यवस्था सुधारने के उपाय भी सुझाए गए थे।

सात साल बाद भी नदी में मलजनित प्रदूषण मिल रहा है। हालांकि, 2019 और 2026 की जांच अलग-अलग हिस्सों और समय पर हुई थी। इसलिए उनके नतीजों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। फिर भी सवाल है कि पहले पहचाने गए प्रदूषण के स्रोतों को रोकने के लिए कितना काम हुआ और उसका नदी के पानी पर क्या असर पड़ा?

कहां से निकलती है मांडवी नदी?

मांडवी गोवा की प्रमुख नदियों में से एक है। ऊपरी हिस्से में इसे महादयी कहा जाता है। यह कर्नाटक के पश्चिमी घाट से निकलकर गोवा में प्रवेश करती है और पणजी के पास अरब सागर में मिल जाती है।

गोवा सरकार की 2019 की नदी पुनर्जीवन कार्ययोजना के अनुसार नदी की कुल लंबाई लगभग 77 किलोमीटर है, जिसमें करीब 52 किलोमीटर हिस्सा गोवा में पड़ता है। खांडेपार, वालवंती, बिचोलिम, असोनोरा और मापुसा इसकी सहायक नदियों में शामिल हैं।

मांडवी का अंतिम हिस्सा समुद्र के ज्वार-भाटे से प्रभावित होता है। यहां नदी का मीठा पानी समुद्र के खारे पानी से मिलता है। नदी के किनारे राजधानी पणजी के अलावा कई बस्तियां, बाजार और पर्यटन से जुड़े प्रतिष्ठान हैं। नदी में मछली पकड़ने और नावों की आवाजाही जैसी गतिविधियां भी होती हैं।

इस हिस्से में गंदा पानी मिलने से मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए यहाँ पानी की नियमित जांच जरूरी है।

पानी की हालिया जांच में क्या सामने आया?

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ के निर्देश पर गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 24 अगस्त 2026 को मांडवी नदी के मुहाना क्षेत्र में पानी की जांच की। इसके लिए IFFI जेटी और मांडवी पुलों के बीच 22 स्थान चुने गए।

प्रत्येक स्थान से ज्वार और भाटे के समय अलग-अलग नमूने लिए गए। कुल 44 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा 100 MPN प्रति 100 मिलीलीटर की संदर्भ सीमा से अधिक पाई गई।

जांच में पानी के कुछ दूसरे मानक निर्धारित सीमा के भीतर पाए गए। इनमें घुली ऑक्सीजन (DO), जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) और पीएच शामिल थे। लेकिन सभी नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म अधिक मिला। इससे पता चलता है कि पानी के कुछ रासायनिक मानक ठीक होने के बावजूद उसमें मलजनित प्रदूषण मौजूद हो सकता है।

जांच का विवरणपरिणाम
जांच की तारीख24 अगस्त 2026
जांच स्थल22
कुल नमूने44
ज्वार के दौरान फीकल कोलीफॉर्म130–540 MPN/100 ml
भाटे के दौरान फीकल कोलीफॉर्म130–940 MPN/100 ml
CPCB की SW-II श्रेणी में सीमा100 MPN/100 ml

स्रोत: गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अगस्त 2026 की अंतरिम रिपोर्ट के प्रकाशित विवरण। संदर्भ मानक: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB)।

MPN यानी मोस्ट प्रोबेबल नंबर (Most Probable Number) पानी में बैक्टीरिया की संभावित संख्या का अनुमान लगाने की एक विधि है।

भाटे के दौरान कुछ जगहों पर फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा 940 MPN प्रति 100 मिलीलीटर तक पहुंची। यह निर्धारित संदर्भ सीमा से 9.4 गुना अधिक है। हालांकि, यह जांच मानसून के एक दिन की है। इसलिए इससे पूरे साल नदी में प्रदूषण की स्थिति का पता नहीं चलता।

फीकल कोलीफॉर्म अधिक मिलने का क्या मतलब है?

फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का एक समूह है, जो मनुष्यों और दूसरे गर्म रक्त वाले जीवों की आंतों और मल में पाया जाता है। पानी में इनकी अधिक मात्रा मलजनित प्रदूषण का संकेत है।

यह प्रदूषण घरेलू सीवेज या दूसरे मलयुक्त अपशिष्ट जल से हो सकता है। हालांकि, केवल फीकल कोलीफॉर्म की जांच से यह पता नहीं चलता कि गंदगी किस स्रोत से आई है।

फीकल कोलीफॉर्म की अधिक संख्या से पानी में बीमारी फैलाने वाले दूसरे सूक्ष्मजीवों के होने की आशंका भी रहती है। ऐसे पानी के सीधे संपर्क में आने या बिना उपचार के इस्तेमाल से स्वास्थ्य संबंधी खतरा बढ़ सकता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने समुद्र तटीय क्षेत्रों के पानी की गुणवत्ता के लिए अलग-अलग मानक तय किए हैं। इनमें SW-II श्रेणी नहाने, जलक्रीड़ा और व्यावसायिक मछली पकड़ने के लिए उपयोग होने वाले तटीय जल से संबंधित है। इस श्रेणी में फीकल कोलीफॉर्म की सीमा 100 MPN प्रति 100 मिलीलीटर निर्धारित है।

सात साल पहले कहां-कहां मिला था बिना उपचार वाला सीवेज?

मांडवी में घरेलू सीवेज के प्रदूषण की पहचान कई साल पहले हो चुकी थी। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के निर्देशों के तहत गोवा सरकार की नदी पुनर्जीवन समिति ने अप्रैल 2019 में मांडवी के लिए कार्ययोजना तैयार की थी।

गोवा सरकार की 2019 की कार्ययोजना में मांडवी के वोल्वोई से मार्सेल तक लगभग नौ किलोमीटर हिस्से को प्रदूषित नदी खंड के रूप में चिह्नित किया गया था। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने इसे प्राथमिकता-4 श्रेणी में रखा था। उस समय इस हिस्से में BOD का स्तर 3.3 से 6.2 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया था।

कार्ययोजना तैयार करने से पहले गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नदी के किनारे निरीक्षण किया था। इस दौरान पोम्बुर्पा-ओलाउलिम, साल्वादोर दो मुंडो और पेन्हा दे फ्रांसा में कई घरों से बिना उपचार वाला सीवेज सीधे नदी में छोड़े जाने की बात सामने आई।

रीस मागोस और नेरुल में भी घरेलू सीवेज नदी में पहुंच रहा था। कुछ क्षेत्रों में रेस्तरां और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से गंदा पानी छोड़े जाने की पहचान हुई। बोर्ड की रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि कुछ प्रतिष्ठानों के पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संचालन की आवश्यक अनुमति नहीं थी।

मालीम जेटी पर मछली बेचने और उतारने वाले जगहों का गंदा पानी सीधे नदी में जा रहा था। बोर्ड ने वहां शौचालय की कमी, नदी किनारे पेशाब किए जाने और नावों तथा मछली बाजार का कचरा नदी में फेंके जाने की समस्या भी दर्ज की थी।

ये जानकारी 2019 के निरीक्षणों पर आधारित है। इसलिए इन सभी जगहों पर आज भी वही स्थिति होने का दावा नहीं किया जा सकता। हालिया जांच के बाद यह पता लगाना जरूरी है कि पहले पहचाने गए कितने प्रदूषण स्रोत बंद हुए हैं और कहां से अब भी गंदा पानी नदी में जा रहा है।

नदी को साफ करने की योजना में क्या उपाय सुझाए गए थे?

गोवा सरकार की 2019 की कार्ययोजना में नदी और बरसाती नालों में सीधे घरेलू सीवेज छोड़े जाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव था। इसके लिए घरों में सेप्टिक टैंक और सोख्ता गड्ढों की व्यवस्था करने तथा उनकी नियमित सफाई कराने की बात कही गई थी।

कार्ययोजना में मालीम जेटी पर अतिरिक्त शौचालयों के साथ प्रतिदिन 40 हजार लीटर गंदे पानी के उपचार की व्यवस्था प्रस्तावित थी। इसे दिसंबर 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य था। पणजी के पट्टो क्षेत्र में सीवेज उपचार संयंत्र के उन्नयन का काम भी प्रस्तावित कार्यों में शामिल था।

कार्ययोजना में अलग-अलग कामों के लिए समयसीमा तय की गई थी। लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट नहीं होता कि इनमें से कौन-से काम अक्टूबर 2026 तक पूरे हो चुके हैं।

इसलिए इन योजनाओं की प्रगति की जानकारी जरूरी है। खासकर यह पता लगाना होगा कि कितने जगहों पर सीवेज का सीधा प्रवाह बंद हुआ और कहां उपचार की व्यवस्था अब भी अधूरी है।

पुराने वैज्ञानिक अध्ययन क्या बताते हैं?

मांडवी और जुआरी नदियों के पानी में बैक्टीरिया संबंधी प्रदूषण पर पहले भी शोध हो चुके हैं। गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) के वैज्ञानिक जी. एस. नागवेंकर और एन. रमैय्या ने दोनों नदियों के मुहाना क्षेत्रों में बैक्टीरिया की मौजूदगी का अध्ययन किया था। उनका शोध 2009 में Environmental Monitoring and Assessment पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

शोधकर्ताओं ने अलग-अलग मौसमों में पानी के नमूने लेकर बैक्टीरिया की जांच की थी। इससे नदी के मुहाना क्षेत्रों में बैक्टीरिया की मात्रा में मौसमी बदलाव की जानकारी मिली।

गोवा सरकार की 2019 की कार्ययोजना में भी NIO के जुलाई 2013 के तटीय क्षेत्र प्रबंधन अध्ययन का उल्लेख है। इसमें मानसून के दौरान भाटे के समय फीकल कोलीफॉर्म अधिक पाए जाने की बात दर्ज थी।

मांडवी के मुहाने पर ज्वार-भाटे के कारण पानी का बहाव बदलता रहता है। इससे नदी में मौजूद प्रदूषकों के फैलाव पर भी असर पड़ सकता है। अगस्त 2026 की जांच में भी भाटे के दौरान कई जगहों पर फीकल कोलीफॉर्म अधिक मिला। इसकी एक संभावित वजह ऊपरी हिस्सों और नालों से बहकर आने वाला दूषित पानी है। हालांकि, प्रदूषण के स्रोत की पुष्टि के लिए अलग जांच जरूरी है।

सीवेज उपचार की व्यवस्था कहां तक पहुंची?

मांडवी नदी में गंदा पानी जाने से रोकने के लिए सीवेज उपचार संयंत्रों का सही ढंग से काम करना जरूरी है। लेकिन संयंत्र बनने से ही समस्या हल नहीं होगी। घरों और प्रतिष्ठानों का गंदा पानी सीवर लाइन के जरिए इन संयंत्रों तक पहुंचना भी जरूरी है।

गोवा सरकार की 2019 की कार्ययोजना में पणजी के टोंका स्थित सीवेज उपचार संयंत्र की जांच के आंकड़े दिए गए थे। दिसंबर 2015 से अप्रैल 2018 के बीच अलग-अलग समय पर हुई जांच में उपचारित पानी का BOD और दूसरे कई मानक निर्धारित सीमा के भीतर पाए गए थे।

कार्ययोजना में पणजी के पट्टो क्षेत्र में सीवेज उपचार संयंत्र के उन्नयन का भी उल्लेख था। अब यह देखना जरूरी है कि इन संयंत्रों की वर्तमान स्थिति क्या है और इनमें प्रतिदिन कितना गंदा पानी उपचारित हो रहा है।

इसके लिए पणजी और आसपास के क्षेत्रों से प्रतिदिन निकलने वाले सीवेज और उपचार संयंत्रों तक पहुंचने वाले पानी की मात्रा का पता लगाना जरूरी है। साथ ही यह भी देखना होगा कि जो सीवेज उपचार संयंत्रों तक नहीं पहुंच रहा है, उसका निपटान कहाँ हो रहा है।

जिन घरों और प्रतिष्ठानों के सीवर कनेक्शन नहीं हैं, वहां गंदे पानी के निपटान की व्यवस्था की भी जांच होनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिए हैं?

मांडवी नदी के प्रदूषण का मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ तक पहुंचा है। पणजी की माला झील में मृत मछलियां मिलने के मामले में अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया था। सुनवाई के दौरान मांडवी नदी में मलजनित प्रदूषण का सवाल भी सामने आया।

हाईकोर्ट ने 6 मई 2026 के आदेश में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को IFFI जेटी और मांडवी पुलों के बीच पानी की गुणवत्ता जांचने का निर्देश दिया। अदालत ने नदी में खड़े कैसीनो जहाजों और पर्यटन से जुड़ी नावों के आसपास भी नमूने लेने को कहा।

अदालत ने 1 जून 2026 तक जांच और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। अगस्त 2026 में हुई जांच में सभी 22 जगहों पर फीकल कोलीफॉर्म निर्धारित सीमा से अधिक मिला। इससे प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और उन्हें रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी जरूरी हो गई है।

मांडवी नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या करना होगा?

मांडवी नदी में मलजनित प्रदूषण रोकने के लिए सबसे पहले 2019 की कार्ययोजना के तहत हुए कामों की समीक्षा जरूरी है। जिन जगहों पर बिना उपचार वाला घरेलू सीवेज नदी में जाने की पहचान हुई थी, वहां दोबारा जांच होनी चाहिए।

नदी में मिलने वाले प्रमुख नालों के पानी की मात्रा और गुणवत्ता मापनी होगी। इससे पता लगाने में मदद मिलेगी कि किन जगहों से कितना प्रदूषित पानी नदी में पहुंच रहा है। इसके साथ ही सीवेज उपचार संयंत्रों की क्षमता, उनमें प्रतिदिन आने वाले पानी और उपचार के बाद निकलने वाले पानी की नियमित जांच जरूरी है।

मांडवी का मुहाना ज्वार-भाटे से प्रभावित होता है। इसलिए नदी के पानी की जांच मानसून के अलावा दूसरे मौसमों में भी होनी चाहिए। ज्वार और भाटे के समय अलग-अलग नमूने लेने से प्रदूषण में होने वाले बदलाव का पता चल सकेगा।

मांडवी में गंदे पानी के स्रोतों की पहचान सात साल पहले हो चुकी थी। इसके बाद नदी को साफ करने के लिए कई उपाय भी सुझाए गए। लेकिन अगस्त 2026 की जांच में फिर मलजनित प्रदूषण सामने आया है।

अब यह पता लगाना जरूरी है कि इन योजनाओं के तहत कितना काम पूरा हुआ और उससे नदी के पानी की गुणवत्ता में कितना सुधार आया। नदी के संरक्षण का आकलन केवल सीवर लाइन या उपचार संयंत्र बनाने से नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता में आए बदलाव से होना चाहिए।

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