The Climate Agenda ने ‘Just Transition on Urban Waterways: Reimagining Inland Water Transport, Tourism, and River-based Livelihoods’ विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की।

 

फ़ोटो: विजय सेहरावत

नदी और तालाब

वाटर मेट्रो और रिवर क्रूज़ से नाविकों-मछुआरों की आजीविका पर क्या असर पड़ेगा?

जलमार्गों के विस्तार के बीच नदी, उस पर निर्भर समुदायों और जलीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों पर उठ रहे हैं नए सवाल।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

भारत में नदियों और दूसरे जलमार्गों (waterways) को परिवहन, पर्यटन और आर्थिक विकास के नए रास्ते के रूप में देखा जा रहा है। वाटर मेट्रो, रिवर क्रूज़, रो-रो फेरी और हाइड्रोजन से चलने वाले जहाजों जैसी परियोजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। लेकिन इस बदलाव के बीच एक जरूरी सवाल भी है। इन नदियों पर पीढ़ियों से निर्भर मछुआरों, नाविकों और गोताखोरों की नई व्यवस्था में क्या जगह है और इन परियोजनाओं का नदी के पर्यावरण और जलीय जीवों पर क्या असर पड़ रहा है?

इन्हीं सवालों को केंद्र में रखते हुए 10 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में The Climate Agenda ने ‘Just Transition on Urban Waterways: Reimagining Inland Water Transport, Tourism, and River-based Livelihoods’ विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की। इसमें उत्तर प्रदेश, असम, गोवा, जम्मू और दिल्ली से अलग-अलग क्षेत्रों के लोग शामिल हुए। नाव संचालकों, मछुआरा समुदायों के प्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने जल परिवहन के विस्तार से जुड़े अपने अनुभव और चिंताएं साझा कीं।

चर्चा में वाराणसी से लेकर असम और कोलकाता तक विकसित हो रहे जलमार्गों की अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। इनके साथ आजीविका, सुरक्षा, नदी के पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से जुड़े सवाल भी उठे। खास तौर पर दो सवालों पर चर्चा हुई। क्या हर नदी को एक ही मॉडल पर विकसित किया जा सकता है? और क्या हर प्रस्तावित जलमार्ग की वास्तव में जरूरत है?

तेजी से बढ़ता जल परिवहन

भारत में जलमार्गों के विकास ने पिछले एक दशक में तेजी पकड़ी है। साल 2016 में राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम के तहत देश की 111 नदियों, खाड़ियों और ज्वारनदमुखों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया। इसके बाद माल ढुलाई, यात्री परिवहन और पर्यटन के लिए जलमार्गों को विकसित करने की कई परियोजनाएं आगे बढ़ी हैं।

कोच्चि वाटर मेट्रो इसका एक प्रमुख उदाहरण है। अब श्रीनगर, गुवाहाटी और कोलकाता जैसे शहरों में भी वाटर मेट्रो विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। गोवा में भी ऐसी परियोजना को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। वहीं, रिवर क्रूज़, रो-रो फेरी और हाइड्रोजन से चलने वाले जहाज भारत में जल परिवहन की बदलती तस्वीर का हिस्सा बन रहे हैं।

कार्यक्रम में जल परिवहन के इस विस्तार के दूसरे पहलू पर भी चर्चा हुई। प्रतिभागियों का कहना था कि किसी परियोजना का आकलन केवल यात्री संख्या, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि उससे नदी, जलीय जीवों और पीढ़ियों से उस पर निर्भर समुदायों पर क्या असर पड़ रहा है। 

वाराणसी में नाविकों और गोताखोरों के सामने नई चुनौती

चर्चा के दौरान वाराणसी का उदाहरण खास तौर पर सामने आया। प्रतिभागियों ने बताया कि यहां जलमार्गों और आधुनिक नौका परिवहन के विस्तार ने स्थानीय नाविकों और गोताखोरों के सामने आजीविका की नई चुनौतियां खड़ी की हैं।

वाराणसी में कई परिवार पीढ़ियों से नाव चलाने और गोताखोरी का काम करते आए हैं। वर्षों के अनुभव से उन्हें नदी की धारा, पानी की गहराई, मौसम और गंगा के बदलते मिजाज की अच्छी समझ है। इस बातचीत में वाराणसी के निषाद समुदाय के अशोक साहनी, स्नेहा साहनी और दुर्गा साहनी भी शामिल थे। 

अशोक वर्षों से नाव चलाने और गोताखोरी करके लोगों की जान बचाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि नई जल परिवहन व्यवस्था में कई बार बाहर से आए लोगों को काम दिया जा रहा है। वहीं, स्थानीय नाविकों और गोताखोरों के वर्षों के अनुभव को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा।

उनका कहना था कि बाहर से आने वाले कई लोगों को नदी और स्थानीय परिस्थितियों की वैसी समझ नहीं होती, जैसी स्थानीय नाविकों और गोताखोरों को वर्षों के अनुभव से मिली है। इसलिए यह केवल स्थानीय लोगों की आजीविका का सवाल नहीं है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा से भी जुड़ा है।

चर्चा में वाराणसी में हाइड्रोजन कैटामरैन से जुड़ी एक दुर्घटना का उदाहरण भी सामने आया। इसके संदर्भ में प्रतिभागियों ने कहा कि नई या हरित तकनीक के साथ सुरक्षित संचालन पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए प्रशिक्षित लोगों के साथ स्थानीय अनुभव और नदी की समझ को भी महत्व मिलना चाहिए।

वाराणसी में जलमार्गों और आधुनिक नौका परिवहन के विस्तार ने स्थानीय नाविकों और गोताखोरों के सामने आजीविका की नई चुनौतियां खड़ी की हैं।

मछुआरों के लिए नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं

वाराणसी अकेला उदाहरण नहीं है। असम, कोलकाता और दूसरे इलाकों से आए प्रतिभागियों ने भी जलमार्गों के विस्तार से मछुआरा समुदायों की आजीविका पर पड़ रहे असर की बात कही।

मछुआरों के लिए नदी उनके काम की जगह और रोजी-रोटी का आधार है। बड़ी नावों और यात्री सेवाओं की आवाजाही बढ़ने से मछुआरों के पारंपरिक कामकाज पर असर पड़ सकता है। नए टर्मिनल और बढ़ती पर्यटन गतिविधियां भी उनके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। कुछ जगहों पर मछली पकड़ने के पुराने इलाकों तक उनकी पहुंच भी प्रभावित हो सकती है।

मछुआरों के लिए नदी उनके काम की जगह और रोजी-रोटी का आधार है। बड़ी नावों और यात्री सेवाओं की आवाजाही बढ़ने से मछुआरों के पारंपरिक कामकाज पर असर पड़ सकता है।

चर्चा में नदी के पर्यावरण और जलीय जीवों पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंता जताई गई। प्रतिभागियों ने बड़े जहाजों से उठने वाली लहरों और शोर को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि ड्रेजिंग से मछलियों और दूसरे जलीय जीवों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि हर नदी का स्वभाव और पारिस्थितिकी अलग है। इसलिए इन प्रभावों को भी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से समझने की जरूरत है।

प्रतिभागियों का कहना था कि नई परियोजनाओं की चर्चा में आधुनिक जहाजों, पर्यटन, बेहतर कनेक्टिविटी और आर्थिक लाभ पर काफी जोर दिया जाता है। लेकिन नदी के पर्यावरण और उस पर निर्भर समुदायों की चिंताओं को उतनी जगह नहीं मिलती।

गंगा और ब्रह्मपुत्र के लिए एक जैसी नीति कैसे हो सकती है?

चर्चा के दूसरे दौर में इस बात पर जोर दिया गया कि जलमार्गों की योजना बनाते समय स्थानीय समुदायों के अनुभव और जानकारी को भी जगह मिलनी चाहिए। नदी के साथ लंबे समय से रहने और काम करने वाले लोग उसके बहाव, गहराई और मौसम के साथ आने वाले बदलावों को अपने अनुभव से समझते हैं। इसलिए परियोजना तैयार हो जाने के बाद केवल उनकी राय लेना काफी नहीं है। उन्हें योजना बनाने की शुरुआत से ही शामिल करना जरूरी है।

भारत की सभी नदियां एक जैसी नहीं हैं। गंगा और ब्रह्मपुत्र का स्वभाव अलग है, जबकि श्रीनगर की झीलों और जलमार्गों की अपनी परिस्थितियां हैं। हर जगह पानी का बहाव, गहराई, जैव विविधता और नदी पर निर्भर समुदायों की जरूरतें अलग हैं।

ऐसे में किसी एक जगह सफल हुए मॉडल को दूसरी नदी या शहर में उसी रूप में लागू करना ठीक नहीं होगा। कोच्चि वाटर मेट्रो को शहरी जल परिवहन के एक प्रमुख मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वही मॉडल गुवाहाटी, श्रीनगर या किसी दूसरे शहर में भी उसी तरह काम करेगा। हर नई परियोजना से पहले वहां की नदी, पर्यावरण और स्थानीय जरूरतों को समझना जरूरी है। 

चर्चा से एक बात साफ थी कि नदी को केवल परिवहन के रास्ते के रूप में नहीं देखा जा सकता। वह लोगों की आजीविका का आधार है और मछलियों समेत अनेक जलीय जीवों का घर भी। इसलिए जल परिवहन की कोई भी योजना बनाते समय इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

क्या हर जगह वाटरवे बनाना जरूरी है?

चर्चा में एक और अहम सवाल उठा कि क्या हर प्रस्तावित वाटरवे या वाटर मेट्रो की सचमुच जरूरत है? अक्सर किसी नई परियोजना पर चर्चा इस सवाल से शुरू होती है कि उसे कैसे बनाया जाए। लेकिन उससे पहले यह पूछना जरूरी है कि उसे बनाया ही क्यों जा रहा है।

किसी भी जल परिवहन परियोजना को शुरू करने से पहले यह देखना जरूरी है कि वहां उसकी सचमुच जरूरत है या नहीं। साथ ही नदी और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले उसके असर को भी समझना होगा। अगर किसी जगह ऐसी परियोजना की स्पष्ट जरूरत नहीं है, तो उसे आगे न बढ़ाना भी एक विकल्प हो सकता है। खासकर तब, जब उससे नदी या स्थानीय लोगों की आजीविका पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का खतरा हो। चर्चा से निकला एक महत्वपूर्ण संदेश यही था कि हर नदी को परिवहन के रास्ते में बदलना जरूरी नहीं है।

नदी के साथ रहने वालों की बात भी सुननी होगी

भारत में जल परिवहन के विस्तार से सड़क और रेल पर दबाव कम हो सकता है। कुछ इलाकों में इससे आवाजाही बेहतर हो सकती है और कम उत्सर्जन वाले परिवहन के नए विकल्प भी मिल सकते हैं। लेकिन चर्चा में यह बात भी सामने आई कि नई या हरित तकनीक अपने आप किसी परियोजना को न्यायपूर्ण नहीं बनाती।

नई जल परिवहन परियोजनाओं का असर स्थानीय नाविकों, मछुआरों और गोताखोरों की आजीविका पर भी पड़ सकता है। ऐसे में यह सवाल जरूरी है कि इस विकास से फायदा किसे मिल रहा है और उसकी कीमत कौन चुका रहा है।

नई दिल्ली में हुई चर्चा का संदेश साफ था। जलमार्गों के विकास को केवल बेहतर कनेक्टिविटी और नई तकनीक के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। नदी लोगों की आजीविका का आधार है और जलीय जीवों का घर भी। 

इसलिए किसी भी नई परियोजना से पहले नदी की अपनी परिस्थितियों और उसके साथ रहने वाले लोगों की बात सुनना जरूरी है। तभी यह भी समझा जा सकेगा कि विकास से फायदा किसे मिल रहा है और उसकी कीमत कौन चुका रहा है।

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