ग्रामीणों की जल संकट से जुड़ी समस्याओं को सुनते चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग।
फोटो : जियाउलहक़
एक पंथ दो काज की कहावत आपने सुनी ही होगी। कुछ ऐसा ही होने जा रहा है उत्तर प्रदेश के जल संकट से जूझते चित्रकूट जिले के पाठा क्षेत्र में पानी की समस्या को दूर करने के लिए जिला प्रशासन ने एक ऐसी तरकीब इस्तेमाल की है, जिससे यहां के लोगों को मुफ्त में तालाब मिल जाएगा। दूसरी ओर, सड़क निर्माण के लिए मिट्टी का इंतज़ाम भी बिना किसी अतिरिक्त खर्च के हो जाएगा।
इस तालाब की खुदाई यहां सड़क चौड़ीकरण का कार्य कर रही एयरपोर्ट अथॉरिटी की कार्यदायी संस्था RITES द्वारा अपनी मशीनों के ज़रिये की जाएगी। जिससे क्षेत्र की प्यास बुझाने में मदद मिलेगी। चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग की पहल पर यह अनूठे प्रयोग वाले इस प्रोजेक्ट का काम शुरू हो गया है। मानिकपुर तहसील के मड़ैयन गांव में गाटा संख्या 513 रकबा 1.819 हेक्टेयर भूमि पर यह तालाब बन रहा है। बताया जाता है कि इस स्थान पर दशकों पहले एक उथला सा तालाब हुआ करता था। समय के साथ मिट्टी भर जाने के कारण यह तालाब समतल होकर पूरी तरह खत्म हो गया था। तालाब के न रहेने से यहां के लोगों को पिछले कई वर्षों से पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा था। चित्रकूट में पड़ने वाली प्रचंड गर्मी के दिनों में खासतौर पर यहां का जल संकट और भी गंभीर हो जाता था।
इसी दौरान कुछ ऐसा हुआ कि जिलाधिकारी पुलकित गर्ग की एक पहल से यहां के जल संकट को दूर करने और सड़क निर्माण की लागत घटाने का दोहरा उपाय निकल आया। यहां सड़क चौड़ीकरण का कार्य कर रही एयरपोर्ट अथॉरिटी की कार्यदायी संस्था RITES को सड़क निर्माण के लिए मिट्टी की आवश्यकता थी। इसपर जिलाधिकारी ने संस्था को संख्या 513 रकबा 1.819 हेक्टेयर भूमि पर समतल हो चुके तालाब की खुदाई कर उससे निकलने वाली मिट्टी निःशुल्क उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया। बदले में संस्था ने तालाब का निर्माण निःशुल्क करने पर सहमति जताई। इस तरह दोनो पक्षों के लिए लाभदायक व्यवस्था बनाते हुए तालाब और सड़के के निर्माण की राह आसान हो गई।
चित्रकूट के इतिहास में यह पहला अवसर है जब कोई सरकारी तालाब बिना किसी सरकारी खर्चे के आम जनता के लिए तैयार किया जा रहा है। इस पहल से न केवल पानी की समस्या का समाधान होगा, बल्कि यह एक अनूठी मिसाल भी पेश करेगा।
जल्द ही बनकर तैयार होने वाला यह तालाब आसपास के निवासियों की पानी की जरूरतों को पूरा करने में सहायक होगा। भीषण गर्मी में यह तालाब विशेष रूप से उपयोगी साबित होगा, जिससे क्षेत्र में जल उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
विडंबना यह है कि पवित्र मंदाकिनी नदी के किनारे बसे चित्रकूट को आज भी गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, नदी के सिकुड़ते प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्रों के क्षरण, चट्टानी भूगर्भीय संरचना, अनियमित वर्षा और भूजल पुनर्भरण की कमी ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। ऐसे में तालाबों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल जैव विविधता ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है।
मंदाकिनी नदी को कभी चित्रकूट की जीवनरेखा माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसका प्राकृतिक प्रवाह काफी कम हुआ है। गर्मियों में कई स्थानों पर नदी का जलस्तर तेजी से घट जाता है और कुछ हिस्सों में पानी केवल गहरे कुंडों तक सिमट जाता है। कम वर्षा, जलग्रहण क्षेत्रों में बदलाव और बढ़ते दोहन ने नदी को पहले की तुलना में अधिक मौसमी बना दिया है। ऐसे में नदी सालभर क्षेत्र की जल आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं रह गई है।
चित्रकूट की पहाड़ियां, छोटे नाले और प्राकृतिक जलधाराएं कभी मंदाकिनी को निरंतर पानी पहुंचाने का काम करती थीं। लेकिन जंगलों की कटाई, निर्माण गतिविधियों, खनन और अतिक्रमण के कारण इन जलग्रहण क्षेत्रों की क्षमता कमजोर हुई है। परिणामस्वरूप बारिश का पानी धीरे-धीरे जमीन में समाने के बजाय तेजी से बहकर निकल जाता है। इससे नदी और भूजल दोनों का पुनर्भरण प्रभावित हो रहा है।
चित्रकूट बुंदेलखंड के उस हिस्से में स्थित है जहां कठोर चट्टानी भू-संरचना पाई जाती है। यहां जमीन के नीचे पानी जमा होने की क्षमता मैदानी इलाकों की तुलना में काफी कम है। वर्षा का बड़ा हिस्सा सतह पर बह जाता है और सीमित मात्रा में ही भूजल भंडार तक पहुंच पाता है। यही कारण है कि थोड़ी सी कम बारिश होने पर भी क्षेत्र में हैंडपंप और कुएं जल्दी सूखने लगते हैं।
बुंदेलखंड देश के उन क्षेत्रों में शामिल है जो लगातार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं। यहां कभी अत्यधिक वर्षा होती है तो कभी लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है। वर्षा का यह असमान वितरण जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की प्राकृतिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है। परिणामस्वरूप नदी, तालाब और भूजल स्रोत सभी पर दबाव बढ़ जाता है।
मंदाकिनी में कई स्थानों पर नालों और सीवेज का पानी मिलने से इसकी जल गुणवत्ता प्रभावित हुई है। धार्मिक और शहरी गतिविधियों से पैदा होने वाला कचरा भी नदी पर अतिरिक्त दबाव डालता है। इससे नदी में उपलब्ध पानी का एक हिस्सा पेयजल या घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं रह जाता। यानी नदी में पानी होने के बावजूद उसका पूरा लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच पाता।
चित्रकूट और पूरे बुंदेलखंड में सदियों पुरानी तालाब संस्कृति रही है, जो वर्षा जल को संचित कर भूजल को पुनर्भरित करती थी। लेकिन कई तालाबों में गाद भर गई, कुछ पर अतिक्रमण हो गया और कई की नियमित देखभाल नहीं हो सकी। इससे वर्षा जल संग्रहण की स्थानीय व्यवस्था कमजोर हुई और नदी तथा भूजल पर निर्भरता बढ़ती चली गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि तालाबों और वेटलैंड्स का संरक्षण इस संकट के समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
अपनी टीम के साथ तालाब के कार्य का निरीक्षण करते चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग।
चित्रकूट के मानिकपुर ब्लाक अंतर्गत आने वाले सुदूर के गांव रानीपुर, गिदुराहा, सकरौहा, कुबरी गांव के इलाके में एक समय डकैतों का बोलबाला हुआ करता था। यहां की दूसरी पहचान पानी की किल्लत हुआ करती थी। पर, अब इन गावों के आलात बदल गए हैं, क्योंकि हर घर नल योजना के तहत अब यहां लोगों के घर में नल का पानी पहुंच गया है। कुबरी ग्राम पंचायत में लगभग 5000 लोगों की बस्ती है। गर्मी के समय में लोगों को पानी लेने के लिए साइकिल या बैलगाड़ीसे लगभग 1 से 2 किलोमीटर दूर दूसरे गावों के कुएं या में नदी तक जाना पड़ता था। लेकिन, अब हर घर नल योजना के तहत घरों में पानी आने लगा है। इससे लोगों की पानी की समस्या हल हो गई है।
अनेक पौराणिक प्रसंगों से जुड़ा होने के कारण धर्मनगरी कहे जाने वाले चित्रकूट में ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर सोमवार को एक लाख से ज़्यादा श्रद्धालुओं ने मंदाकिनी नदी में स्नान किया। नदी के रामघाट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया, जो सूर्यास्त तक चलता रहा। श्रद्धालुओं ने स्नान के बाद भगवान कामतानाथ का जलाभिषेक किया और कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। रामघाट, परिक्रमा मार्ग और मंदिरों में दिनभर भारी भीड़ और चहल-पहल देखने को मिली। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए थे। भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था, चिकित्सा, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं की समुचित व्यवस्था की गई। इस तरह ज्येष्ठ पूर्णिमा स्नान का धार्मिक आयोजन शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के दो तालाबों को वेटलैंड यानी आर्द्रभूमि का दर्ज़ा दिया गया है। प्रदेश सरकार ने पहाड़ी ब्लॉक के अशोह गांव स्थित सिंघानिया तालाब और बछरन ग्राम पंचायत के बड़ा तालाब को राज्य संरक्षित वेटलैंड (आद्रभूमि) घोषित करते हुए वन एवं वन्यजीव विभाग द्वारा वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम-2017 के तहत अधिसूचना जारी की जा चुकी है। इसके साथ ही यह दोनों जलाशय अब पर्यावरणीय दृष्टि से संरक्षित धरोहर बन गए हैं। इससे इन दोनों तालाबों के 50 मीटर दायरे में अतिक्रमण, खनन, भूमि उपयोग परिवर्तन, कचरा व सीवेज डालने जैसी गतिविधियां पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगी। अवैध ढंग से मछलियां पकड़ने और भूजल दोहन पर भी रोक लगेगी। इन जलाशयों में सर्दियों के दौरान साइबेरिया, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और तिब्बत समेत कई देशों से प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं। यहां साइबेरियन क्रेन, पेलिकन, सुरखाब, बार-हेडेड गूज और ब्लैक-हेडेड गल समेत कई दुर्लभ प्रजातियां देखी जाती हैं। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए आप हमारी हाल ही में प्रकाशित स्टोरी चित्रकूट के दो तालाबों को मिला वेटलैंड दर्ज़ा, विदेशी प्रवासी पक्षियों को मिलेगा नया सुरक्षित आवास को पढ़ सकते हैं।
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