समुद्र की सतह पर तापमान बढ़ने और हवा का दबाव कम होने पर होता है चक्रवात का जन्‍म। 

 

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मौसम

क्‍या होता है चक्रवात (Cyclone) कैसे बनते हैं और कैसे रखे जाते हैं इनके नाम?

हिन्‍दी महासागर से उठे दो ताकतवर चक्रवातों अर्नब और मुरासु ने बीते सप्‍ताह देश के अलग-अलग हिस्‍सों में मचाई तबाही

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

बीते हफ्ते अर्नब और मुरासु नाम के दो चक्रवातों ने देश के अलग-अलग हिस्‍सों में तबाही मचाई। इनसे हुए जान-माल के नुकसानों के बीच तूफानों व चक्रवातों को लेकर लोगों के मन में सहज ही कुछ उठ रहे हैं? चक्रवात बनते कैसे हैं और इनके अलग-अलग नाम क्‍यों होते हैं? इनके यह नाम कैसे पड़ते हैं? कौन रखता है चक्रवातों के नाम? नाम रखने की प्रक्रिया क्‍या है? इसे कैसे अंजाम दिया जाता है? इस लेख में हम आपकी इन्‍हीं जिज्ञासाओं का जवाब देने जा रहे हैं। इसे पढ़कर आप चक्रवातों और उनके नामकरण की प्रक्रिया को भली भांति समझ सकेंगे।

चक्रवात क्या है और सामान्य तूफान से कितना अलग है?

आमतौर पर तूफान और चक्रवात (Cyclone) को एक ही चीज समझा जाता है। बोलचाल में अकसर हम तेज हवाओं वाले किसी भी तूफान को चक्रवात कह देते हैं।  पर मौसम विज्ञान की दृष्टि से यह दोनों अलग-अलग चीजें हैं। दोनों की अपनी अलग-अलग श्रेणियां हैं।

चक्रवात एक ऐसा विशाल मौसमी तंत्र है, जिसके केंद्र में हवा का दबाव (वायुदाब) आसपास के क्षेत्रों की तुलना में कम होता है। इस कारण कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर आसपास की हवा तेजी से बढ़ती है और पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने (घूर्णन) की गति के प्रभाव के कारण यह हवा भी घूमने लगती है। इस तरह समुद्र के ऊपर बनने वाले शक्तिशाली चक्रवातों में तेज हवाओं के साथ ऊंची समुद्री लहरें, तेज हवाएं, भारी बारिश और तटीय इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।

हालांकि, हर चक्रवात समान रूप से शक्तिशाली नहीं होता। उसकी ताकत मुख्य रूप से हवा की रफ्तार से तय होती है। इसी आधार पर मौसम विभाग उसे मुख्‍यत: इन चार श्रेणियों में विभाजित करता है- 

  1. अवदाब (depression)

  2. गहरा अवदाब (Deep depression)

  3. चक्रवाती तूफान (Cyclonic storm)

  4. अत्यंत भीषण चक्रवाती तूफान (Extremely severe cyclonic storm)

कैसे बनता है चक्रवात

भारत में आने वाले चक्रवातों को समझने के लिए समुद्र की सतह से शुरुआत करनी होगी। समुद्र का गर्म पानी सूर्य की ऊर्जा को अपने भीतर संचित रखता है। जब समुद्र की सतह का तापमान लगभग 26.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होता है और यह गर्मी समुद्र में एक गहराई तक मौजूद रहती है, तो वहां चक्रवात बनने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा होती हैं। ऐसे में सूरज की किरणों और हवा के तापमान से गर्म होकर जब समुद्र का पानी वाष्प बनकर ऊपर उठता है, तो इसके साथ बड़ी मात्रा में नमी भी वायुमंडल में पहुंचती है। ऊपर जाकर यह नम हवा ठंडी होती है और जलवाष्प के संघनन (Condensation) से बादल बनते हैं। इस प्रक्रिया में गुप्त ऊष्मा (Latent heat) निकलती है, जो आसपास की हवा को और गर्म करती है। गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है और समुद्र की सतह पर वायुदाब और कम होने लगता है। इस कम दबाव वाले क्षेत्र में आसपास की हवा तेजी से आने लगती है। पृथ्वी के घूर्णन से पैदा होने वाला कोरिऑलिस प्रभाव इस हवा को घुमाव देता है। धीरे-धीरे बादलों, बारिश और तेज हवाओं का एक व्यवस्थित तंत्र (Organized system) विकसित होने लगता है। यदि समुद्र से लगातार ऊर्जा और नमी मिलती रहे, तो यह तंत्र और शक्तिशाली होकर चक्रवात (Cyclone) या चक्रवाती तूफान (Cyclonic storm) का रूप ले सकता है।

चक्रवातों की एक खास पहचान यह भी है कि उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में इनके चारों ओर हवा वामावर्त यानी घड़ी की सुई के उलट दिशा (Anti-clockwise) में घूमती है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) में हवा दक्षिणावर्त यानी घड़ी की सुई की दिशा में (clockwise) घूमती है। इसका कारण पृथ्वी की घूर्णन गति (Earth's rotation) के कारण पैदा होने वाला कोरिऑलिस प्रभाव (Coriolis effect) है, जो उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में हवाओं को विपरीत दिशाओं में मोड़ता है। हालांकि, चक्रवातों की दिशा और उनकी ताकत पर समुद्र, वायुमंडल और पृथ्वी के घूर्णन का संयुक्त प्रभाव (Combined effect) पड़ता है।

दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में कितने तरह के चक्रवात?

चक्रवातों को उनकी उत्पत्ति, बनने की परिस्थितियों और भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। मौसम विज्ञान में मुख्य रूप से चार प्रकार के चक्रवात होते हैं।

  1. उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones) : ये गर्म समुद्री जल के ऊपर बनते हैं और इनकी ऊर्जा का मुख्य स्रोत जलवाष्प के संघनन से निकलने वाली ऊष्मा होती है। अटलांटिक और पूर्वी प्रशांत में इन्हें हरिकेन, पश्चिमी प्रशांत में टाइफून और हिंद महासागर में साइक्लोन कहा जाता है। भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात ही आते हैं।

  2. बहिरुष्णकटिबंधीय चक्रवात (Extratropical Cyclones) : ये मुख्य रूप से मध्य और उच्च अक्षांशों में बनते हैं, जहां गर्म और ठंडी वायुराशियां आपस में मिलती हैं। उत्तरी अमेरिका, यूरोप और उत्तरी अटलांटिक में आने वाले कई शक्तिशाली शीतकालीन तूफान इसी श्रेणी में आते हैं। इनका प्रभाव कई बार बहुत बड़े क्षेत्र में फैलता है।

  3. उपोष्णकटिबंधीय चक्रवात (Subtropical Cyclones) : इनकी विशेषताएं उष्णकटिबंधीय और बहिरुष्णकटिबंधीय, दोनों तरह के चक्रवातों से मिलती-जुलती हैं। ये आमतौर पर उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बनते हैं और इनमें गर्म तथा ठंडी वायुराशियों से जुड़ी प्रक्रियाएं दोनों सक्रिय हो सकती हैं।

  4. ध्रुवीय चक्रवात (Polar Lows) : ये मुख्य रूप से आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक जैसे ठंडे समुद्री क्षेत्रों में बनते हैं। इनका आकार उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तुलना में छोटा होता है, लेकिन ये तेज हवाओं, भारी हिमपात और समुद्री परिवहन के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।

चक्रवातों की इन श्रेणियों के बीच अंतर केवल इनके बनने की जगह का नहीं है, बल्कि ऊर्जा के स्रोत और वायुमंडलीय संरचना का भी है। उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म समुद्र से मिलने वाली ऊर्जा पर निर्भर करते हैं, जबकि बहिरुष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म और ठंडी वायुराशियों के बीच तापमान के अंतर से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसलिए दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बनने वाले सभी चक्रवातों को एक ही प्रकार का तूफान मानना सही नहीं होगा।

समुद्र के ऊपर बनते चक्रवात की संरचना कुछ इस प्रकार की होती है। 

हर कम दबाव वाला क्षेत्र चक्रवात क्यों नहीं बनता?

समुद्र के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनना चक्रवात के जन्म की पहली सीढ़ी है, लेकिन इसके लिए कई दूसरी परिस्थितियों का एक साथ अनुकूल होना भी जरूरी है।

सबसे पहले, समुद्र की सतह पर्याप्त गर्म होनी चाहिए। दूसरा, वायुमंडल में नमी की उपलब्धता होनी चाहिए, ताकि बादलों का विकास हो सके। तीसरा, हवा की ऊंचाई के साथ दिशा और गति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए। इस अंतर को वर्टिकल विंड शीयर (vertical wind shear) कहा जाता है। यदि यह बहुत अधिक हो, तो चक्रवात का विकसित होता हुआ तंत्र बिखर सकता है।

इसके अलावा, पृथ्वी के घूर्णन से मिलने वाला प्रभाव (coriolis effect) भी जरूरी है। भूमध्य रेखा के ठीक आसपास यह प्रभाव बहुत कमजोर होता है, इसलिए वहां सामान्य तौर पर उष्णकटिबंधीय चक्रवात विकसित नहीं होते।

इन सभी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी चक्रवात बनना निश्चित नहीं है। समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान, हवा की ऊर्ध्वाधर गति और आसपास के मौसम तंत्र मिलकर तय करते हैं कि कोई कम दबाव वाला क्षेत्र आगे बढ़ेगा या समाप्त हो जाएगा।

समुद्र से जमीन पर आकर क्यों पड़ते हैं कमजोर?

चक्रवातों को उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा गर्म समुद्र से मिलता है। जब वे जमीन के ऊपर यानी भूभाग में पहुंचते हैं, तो समुद्र से मिलने वाली यह ऊर्जा बंद हो जाती है। साथ ही, जमीन की सतह पर मौजूद पहाड़, इमारतें, पेड़ और दूसरी बाधाएं हवा के प्रवाह को प्रभावित करती हैं। इससे चक्रवात कमजोर पड़ने लगता है।

लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि जमीन पर पहुंचते ही चक्रवात का खतरा समाप्त हो जाता है। समुद्र से आने वाली तेज हवाएं, भारी बारिश और समुद्री जल का तट की ओर बढ़ना बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकता है। कई बार चक्रवात के कमजोर पड़ने के बाद भी उसकी वजह से हुई बारिश के कारण नदियों में बाढ़ आ सकती है और भूस्खलन जैसी घटनाएं हो सकती हैं।

विशेष रूप से निचले तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल का असामान्य रूप से ऊपर उठना खतरनाक होता है। इसे स्टॉर्म सर्ज (Storm surge) यानी चक्रवाती तूफानी ज्वार कहा जाता है। तेज हवाओं और कम वायुदाब के संयुक्त प्रभाव से समुद्र का पानी तट की ओर बढ़ता है और सामान्य ज्वार से काफी अधिक ऊंचाई तक पहुंच सकता है।

चक्रवात और बवंडर में क्या अंतर है?

चक्रवात और बवंडर को अकसर लोग एक ही चीज समझते हैं, क्‍योंकि इन दोनों में हवा तेजी से घूमती है। लेकिन, ये दोनों दरअसल एक-दूसरे से अलग मौसमी घटनाएं हैं। चक्रवात एक विशाल मौसमी तंत्र होता है, जो समुद्र के ऊपर सैकड़ों से हजारों किलोमीटर तक फैल सकता है। इसके विपरीत, बवंडर हवा का एक छोटा, लेकिन बेहद शक्तिशाली घूर्णनशील स्तंभ (Rotating column) होता है, जो आमतौर पर बादलों से जमीन तक फैला होता है।

बवंडर को अंग्रेजी में टॉरनेडो (Tornado) कहते हैं। यह चक्रवात का छोटा रूप नहीं है, बल्कि इसकी उत्पत्ति और संरचना अलग होती है। बवंडर में हवा का घूमता हुआ स्तंभ बहुत संकरा होता है, लेकिन इसकी हवा की गति बेहद तेज हो सकती है। इसके कारण किसी छोटे इलाके में भी भारी तबाही हो सकती है।

चक्रवातों से होने वाला नुकसान मुख्य रूप से तेज हवाओं, भारी बारिश और समुद्री जल के तट की ओर बढ़ने से होता है। वहीं बवंडर में तेज हवाएं, उड़ता हुआ मलबा और अचानक होने वाला वायुदाब परिवर्तन प्रमुख खतरे हैं।

चक्रवात बनाम बवंडर

अंतर का आधारचक्रवातबवंडर
आकारसैकड़ों से हजारों किलोमीटर तकआमतौर पर कुछ दर्जन से कुछ सौ मीटर तक
उत्पत्तिउष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म समुद्र के ऊपर बनते हैंआमतौर पर शक्तिशाली गरज वाले बादलों से उत्पन्न होते हैं
अवधिकई दिनों से लेकर कुछ सप्ताह तकआमतौर पर कुछ मिनट से लेकर एक घंटे तक
प्रभाव क्षेत्रबड़े समुद्री और तटीय क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता हैअपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकता है
हवा की गतिशक्तिशाली चक्रवातों में लगभग 250 किमी प्रति घंटा या अधिककुछ बवंडरों में हवा की गति 300 किमी प्रति घंटा से अधिक हो सकती है

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग नाम क्यों हैं?

चक्रवात एक ही प्रकार का मौसमी तंत्र है, लेकिन दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में इनके नाम अलग-अलग तरह के होते हैं। विश्‍व मौसम संगठन यानी WMO की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक अटलांटिक महासागर और पूर्वी प्रशांत महासागर में इन्हें हरिकेन (Hurricane) कहा जाता है। पश्चिमी प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर में इन्हें टाइफून (Typhoon) कहा जाता है। हिंद महासागर और दक्षिणी प्रशांत महासागर के बड़े हिस्सों में इनके लिए साइक्लोन (Cyclone) यानी चक्रवात शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।

नाम का यह अंतर चक्रवात की प्रकृति में किसी बुनियादी अंतर को नहीं दर्शाता। हरिकेन, टाइफून और साइक्लोन तीनों ही उष्णकटिबंधीय चक्रवात हैं। इनके नाम मुख्य रूप से भौगोलिक क्षेत्र और वहां की मौसम संबंधी परंपराओं के आधार पर अलग हुए हैं।

इन क्षेत्रों में चक्रवातों के बनने और उनकी निगरानी की व्यवस्था भी अलग-अलग क्षेत्रीय मौसम केंद्रों के जिम्मे होती है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी डब्ल्यूएमओ के समन्वय में ये केंद्र चक्रवातों की पहचान, पूर्वानुमान और चेतावनी जारी करने का काम करते हैं।

चक्रवातों को नाम देने की जरूरत क्यों पड़ी?

पहले चक्रवातों की पहचान उनके बनने की जगह, अक्षांश और देशांतर के आधार पर की जाती थी। लेकिन, जैसे-जैसे मौसम की निगरानी और पूर्वानुमान की तकनीक विकसित होती गई। वैसे-वैसे यह महसूस किया जाने लगा कि हर चक्रवात को एक छोटा और आसानी से याद रखा जाने वाला नाम देना ज्यादा उपयोगी होगा। चक्रवातों को नाम देने के प्रमुख उद्देश्‍य इस प्रकार हैं।

  1. इससे क्षेत्र में एक से अधिक चक्रवात सक्रिय होने पर उनमें अंतर करना आसान हो जाता है। साथ ही इससे लोग आसानी से समझ पाते हैं कि किस तूफान की बात हो रही है। मौसम विभाग, आपदा प्रबंधन एजेंसियां, मीडिया और आम लोग एक ही नाम का इस्तेमाल करके खतरे की स्थिति पर चर्चा कर सकते हैं।

  2. नामकरण का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य लोगों को समय रहते सतर्क करना है। चक्रवात का नाम लोगों को जल्‍दी याद हो जाता है और यह उनका  ध्यान भी जल्दी आकर्षित करता है। 

  3. इसके अलावा, नाम होने से किसी चक्रवात से जुड़ी चेतावनियों, नुकसान और ऐतिहासिक घटनाओं का रिकॉर्ड रखना भी आसान हो जाता है।

  4. विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, चक्रवातों के नामकरण का मुख्य उद्देश्य उनकी पहचान को आसान बनाना, चेतावनी को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाना और एक एक साथ सक्रिय चक्रवातों के बीच भ्रम को खत्‍म करना है।

चक्रवातों के नाम कौन रखता है?

चक्रवातों के नामकरण की कोई एक वैश्विक एजेंसी नहीं है, जो दुनिया के सभी तूफानों के नाम तय करती हो। इसके बजाय अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। विश्‍व मौसम संगठन यानी WMO इन व्यवस्थाओं के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

डब्ल्यूएमओ के तहत पांच क्षेत्रीय चक्रवात निकाय काम करते हैं-

  1. दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर चक्रवात समिति (RA I Tropical Cyclone Committee)

  2. एस्कैप/डब्ल्यूएमओ टाइफून समिति (ESCAP/WMO Typhoon Committee)

  3. डब्ल्यूएमओ/एस्कैप चक्रवात पैनल (WMO/ESCAP Panel on Tropical Cyclones)

  4. आरए IV हरिकेन समिति (RA IV Hurricane Committee)

  5. दक्षिण प्रशांत और दक्षिण-पूर्व हिंद महासागर चक्रवात समिति (RA V Tropical Cyclone Committee)

ये पांचों निकाय अपने-अपने क्षेत्रों के लिए नामों की सूची तैयार करने और उन्हें मंजूरी देने का काम करते हैं। इन सूचियों में शामिल नाम सदस्य देशों की मौसम संबंधी एजेंसियों द्वारा प्रस्तावित किए जाते हैं।

भारत के लिए चक्रवातों के नामकरण की व्यवस्था उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इसमें बंगाल की खाड़ी और अरब सागर शामिल हैं। इस क्षेत्र में भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD को इसकी जिम्मेदारी मिली हुई है। नई दिल्ली स्थित क्षेत्रीय विशेष मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC) IMD की ओर से इस काम को करता है।

जब किसी समुद्री क्षेत्र में बनने वाला तूफान निर्धारित मानदंडों के अनुसार चक्रवाती तूफान की श्रेणी में पहुंच जाता है, तो आईएमडी उसे उपलब्ध सूची में से अगला नाम देता है। यानी नाम तय करने की सूची पहले से तैयार रहती है, लेकिन किसी तूफान को नाम देने का निर्णय उसकी वास्तविक स्थिति के आधार पर होता है।

भारत और आसपास के देशों में नामकरण कैसे होता है?

विश्‍व मौसम संगठन यानी WMO की ओर से उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में चक्रवातों के नामकरण की व्यवस्था वर्ष 2000 में तय की गई थी। इसके करीब चार साल बाद सितंबर 2004 से इस क्षेत्र में बनने वाले चक्रवातों को आधिकारिक नाम दिए जाने लगे। शुरुआती व्यवस्था में आठ देश शामिल थे, लेकिन बाद में पांच और देश इसमें जुड़ गए।

वर्तमान व्यवस्था में कुल 13 देश शामिल हैं। इनमें भारत, बांग्लादेश, ईरान, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, श्रीलंका, थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और यमन शामिल हैं।

इन देशों ने अपने-अपने नाम प्रस्तावित किए हैं। कुल 169 नामों की सूची तैयार की गई है, जिसमें प्रत्येक देश के 13 नाम शामिल हैं। नामों को देशों के अंग्रेजी वर्णक्रम के अनुसार व्यवस्थित किया गया है और फिर उनका इस्तेमाल एक निश्चित क्रम में किया जाता है।

इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह है कि चक्रवात का नाम इस आधार पर नहीं रखा जाता कि वह किस देश के तट से टकराने वाला है। बल्कि नामकरण सूची में अगला नाम किस देश द्वारा दिया जाना है, इसका क्रम पहले से तय होता है। इसलिए बंगाल की खाड़ी में आने वाले किसी चक्रवात का नाम भारत, बांग्लादेश या किसी अन्य देश द्वारा प्रस्तावित हो सकता है। इसी तरह अरब सागर में बनने वाले चक्रवात को भी सूची में अगला उपलब्ध नाम ही दिया जाता है। इस व्यवस्था में नाम एक बार इस्तेमाल होने के बाद दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता। यानी उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में किसी चक्रवात को दिया गया नाम भविष्य के किसी दूसरे चक्रवात के लिए फिर से इस्तेमाल नहीं होगा।

अर्नब के बाद मुरासु का नाम कैसे आया?

हाल के चक्रवातों के नामकरण को समझने के लिए अर्नब और मुरासु का उदाहरण उपयोगी है। अर्नब नाम बांग्लादेश ने प्रस्तावित किया था, जबकि मुरासु भारत द्वारा प्रस्तावित नाम है। अर्नब बांग्‍ला भाषा का शब्‍द है, जिसका मतलब समुद्र होता है। मुरासु तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ बड़े ढोल या नगाड़े से है। परंपरागत रूप से इसका इस्तेमाल युद्ध, उत्सव और लोगों को किसी खतरे के प्रति सतर्क करने के लिए किया जाता रहा है। अर्नब के बाद मुरासु नाम का इस्तेमाल इसी क्रम के अनुसार हुआ। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि चक्रवातों के नाम किसी खास देश के लिए आरक्षित नहीं होते। नाम देने का काम क्षेत्रीय सूची और उसके क्रम के अनुसार होता है। किसी तूफान का नाम भारत द्वारा प्रस्तावित होने का अर्थ यह नहीं है कि वह भारत में ही आएगा।

नाम चुनने के क्या हैं नियम?

चक्रवातों के नामकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ मानदंड तय किए गए हैं। इनका उद्देश्य नामों को सरल, स्पष्ट और सभी देशों में आसानी से समझने योग्य बनाना है, ताकि चक्रवातों से जुड़ी चेतावनियों और सूचनाओं के प्रसार में किसी तरह का भ्रम न हो।

  • नाम छोटा और आसानी से याद रखा जाने वाला होना चाहिए।

  • नाम का उच्चारण सरल होना चाहिए, ताकि अलग-अलग भाषाओं में बोलने पर भ्रम पैदा न हो।

  • नाम किसी देश की राजनीति, राजनीतिक व्यक्तियों, धर्म, संस्कृति या लिंग से जुड़ा पक्षपात पैदा करने वाला नहीं होना चाहिए।

  • नाम किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला या अपमानजनक नहीं होना चाहिए।

  • उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में नाम की अधिकतम लंबाई आठ अक्षर होनी चाहिए।

  • नाम के साथ उसका सही उच्चारण और आवाज का नमूना भी देना जरूरी है, ताकि अलग-अलग देशों में उसका उच्चारण एक जैसा रखा जा सके।

  • किसी नाम को मंजूरी देने से पहले सभी निर्धारित मानदंडों की जांच की जाती है।

  • यदि किसी सदस्य देश को किसी नाम पर उचित आपत्ति हो, तो क्षेत्रीय समिति उस नाम को अस्वीकार कर सकती है या उसकी समीक्षा कर सकती है।

हर तूफान को नाम नहीं दिया जाता

समुद्र के ऊपर बनने वाले हर कम दबाव वाले क्षेत्र को चक्रवात का नाम नहीं दिया जाता। मौसम विभाग पहले उस तंत्र की निगरानी करता है। जब उसकी तीव्रता निर्धारित सीमा तक पहुंचती है, तभी उसे आधिकारिक नाम दिया जाता है।

उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में किसी मौसम तंत्र को चक्रवाती तूफान की श्रेणी में पहुंचने के लिए उसकी अधिकतम निरंतर सतही हवा की गति कम से कम 34 नॉट यानी लगभग 62 किलोमीटर प्रति घंटा होनी चाहिए। इससे पहले वह अवदाब या गहरे अवदाब जैसी श्रेणियों में रह सकता है।

इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू है। नाम मिलने के बाद चक्रवात की तीव्रता बढ़ सकती है या घट सकती है, लेकिन उसका नाम नहीं बदलता। उदाहरण के लिए, कोई चक्रवात सामान्य चक्रवाती तूफान से गंभीर या अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान बन जाए, तो भी उसका नाम वही रहता है। इससे मौसम विभाग, मीडिया और आम लोगों के लिए उसकी पहचान लगातार एक जैसी बनी रहती है।

क्या चक्रवातों के नाम से उनकी ताकत का पता चलता है?

किसी चक्रवात का नाम उसकी ताकत, गति या उससे होने वाले नुकसान का संकेत नहीं देता। नामकरण की सूची में शामिल नाम केवल उस तूफान की पहचान के लिए होता है। चक्रवात कितना शक्तिशाली है, इसका आकलन उसकी हवा की गति, वायुदाब, समुद्र की स्थिति और उसके संभावित प्रभावों के आधार पर किया जाता है। इसलिए किसी चक्रवात का नाम सुनकर उसकी गंभीरता या ताकत का अनुमान लगाना सही नहीं होगा। एक छोटा या सामान्य लगने वाला नाम भी बहुत शक्तिशाली तूफान का हो सकता है। इसके विपरीत, किसी बड़े या प्रभावशाली नाम वाले तूफान की ताकत अपेक्षाकृत कम भी हो सकती है। चक्रवातों के नामकरण का मकसद लोगों को डराना नहीं, बल्कि खतरे की स्थिति को स्पष्ट और आसानी से समझने योग्य बनाना है। नाम के साथ मौसम विभाग की चेतावनियों, हवा की गति और संभावित प्रभावों को समझना ही सबसे जरूरी है। चक्रवात की दिशा, उसकी गति और तट से टकराने के समय में बदलाव हो सकता है। इसलिए मौसम विभाग की ताजा चेतावनियों पर ध्यान देना जरूरी है।

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