मुंबई में भारी बारिश के बाद का मंजर 

 

फोटो स्रोत - एक्स 

मौसम

क्या मुंबई-पुणे में भारी बारिश के पीछे अलनीनो है? विशेषज्ञों ने बतायी असली वजह

महाराष्ट्र में भारी बारिश के पीछे कौन से मौसमीय कारण हैं? अल नीनो, मानसून, जलवायु परिवर्तन या समुद्री हीटवेव.... विशेषज्ञों से आसान भाषा में समझिए इसके पीछे की असली वजह और आने वाले समय की डिमांड।

Author : अजय मोहन

सुपर अलनीनो की वजह से भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में 40% तक कमी दर्ज होने की आशंका जताई गई, लेकिन जून के अंत तक यह कमी 20% तक दर्ज हुई। माना जा रहा है कि बारिश की यह रिकवरी केवल मुंबई और पुणे की वजह से हुई है। यहां जुलाई के पहले सप्ताह में ही पूरे महीने की बारिश हो गई। लगातार बारिश के कारण पूरे शहर का जन-जीवन अस्त-व्यस्त है। 

मुंबई की बारिश से एक तथ्‍य साफ है- “अब भारत की चिंता यह नहीं है कि कितनी बारिश हुई, अब चिंता है कि कैसे बारिश हुई।” 

चाहे अलनीनो आये या नहीं आये, पश्चिमी तट पर भारी बारिश तो निश्चित है 

भारत में अलनीनो के प्रभाव साफ दिखाई दे रहे हैं। कर्नाटक, तमिल नाडु, मध्‍य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आदि समेत कई राज्य हैं जहां अभी औसत से कम बारिश हुई है। लेकिन अगर पश्चिमी तट यानि अरब सागर से जुड़े क्षेत्रों की बात करें तो चाहे अलनीनो जैसी घटना हो या नहीं, इन राज्यों पर भारी बारिश होना लगभग निश्चित है। इसका मुख्‍य कारण समुद्री हीटवेव है।  

क्लाइमेट ट्रेंड्स की टीम द्वारा अरब सागर के बढ़ते तापमान का अध्‍ययन किया गया तो पाया गया कि समुद्री हीटवेव के कारण तटीय क्षेत्रों के वातावरण में तेजी से बदलाव हो रहे हैं और इसके परिणाम स्वरूप उच्च तीव्रता वाली बारिश हो रही है। इससे शहर में जलभराव की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। 

मुंबई और पुणे में बारिश का पैटर्न 

मुंबई और पुणे की बारिश का पैटर्न 

  • 1 से 7 जुलाई के बीच मुंबई में पूरे महीने की बारिश दर्ज हुई है। कोलाबा केंद्र में 791 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई है, जबकि पूरे जुलाई महीने का औसत 768.5 मिलीमीटर है। 

  • सेंटा क्रूज़ केंद्र पर 879 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई। यहां जुलाई का औसत 919.9 मिलीमीटर रहता है। 

  • पिछले दो दशकों में मुंबई में औसत से 14.9 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज हुई है, जबकि पुणे में यह 22.6 प्रतिशत अधिक है। 

  • मुंबई और पुणे, दोनों शहरों में बारिश की तीव्रता निरतर बढ़ती जा रही है। 

  • वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले दशकों में महाराष्‍ट्र के तटीय शहरों में मॉनसून एक सप्ताह तक बढ़ जाएगा। 

  • अगर 2001–2024 के बीच हुई कुल बारिश की तुलना 1981–2000 में हुई बारिश से करें तो पाएंगे कि मुंबई में 14 प्रतिशत और पुणे में 22 प्रतिशत अधिक बारिश हुई है।  

क्या जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रही है मुंबई में भारी बारिश? 

पैसिफिक महासागर में उपजे अलनीनो का प्रभाव जिस तरह पूरे भारत पर दिख रहा है, अगर वैसा प्रभाव अरब सागर के तट पर स्थित राज्यों में होता तो मुंबई और पुणे में इस साल बीते वर्षों की तुलना में कम बारिश होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन दोनों शहरों में फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति अचानक मूसलाधार बारिश की वजह से हो रही है और इसके पीछे का मुख्‍य कारण अरब सागर का बढ़ता तापमान है। 

वैज्ञानिकों की मानें तो बीते एक सप्ताह में मुंबई में हुई भारी बारिश सीधे तौर पर अरब सागर के तापमान से जुड़ी है। इस पर स्‍काईमेट वेदर के वाइस प्रेसिडेंट - मौसम एवं जलवायु परिवर्तन, महेश पलावट ने कहा, “वर्तमान में मॉनसून एक्टिव अवस्था में है, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग पैटर्न दिखाई दे रहा है। एक तरफ ओडिशा में हवा का दबाव है तो तो महाराष्‍ट्र के ऊपर चक्रवात जैसी स्थिति पैदा ओ रही है। ये दोनों ही पश्चिमी और पूवी हिस्से में मॉनसून को एक्टिव रखने के लिए हैं। जोकि हर साल होता है, लेकिन महाराष्‍ट्र की ओर अरब सागर से अधिक मात्रा में नमी आ रही है जो लगातार बादलों का निर्माण कर रही है। इसकी वजह से भारी बारिश हो रही है।”  

गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में भी बारिश का पैटर्न बदला 

मानसून के दौरान मुंबई और पश्चिमी तट के अन्य क्षेत्रों में 100 मिमी या उससे अधिक की वर्षा होना सामान्य बात है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षों में जुलाई और अगस्त के दौरान महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिणी राजस्थान और दक्षिण-पश्चिमी मध्य प्रदेश में इस तरह की मूसलाधार बारिश की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

मुंबई में मानसून की शुरुआत देर से हुई, जिसका एक कारण अल नीनो हो सकता है। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग के कारण पश्चिमी एशिया के बढ़ते तापमान और अरब सागर की बदलती हवाओं ने भी भारी बारिश की परिस्थितियां बनाई हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से नमी मिल रही है तथा बंगाल की खाड़ी में बना निम्न दबाव क्षेत्र (लो-प्रेशर सिस्टम) भी बारिश को बढ़ा रहा है। जब दोनों ओर से नमी और मौसम प्रणालियां सक्रिय होती हैं, तो मध्य मानसूनी क्षेत्र में भारी वर्षा होती है और उसका प्रभाव मुंबई तक पहुंचता है। वहीं, पश्चिमी घाट हवाओं को ऊपर उठने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिससे मुंबई में मूसलाधार बारिश हो रही है। ऐसे में अब अल नीनो और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अलग-अलग करके देखना मुश्किल हो गया है।
डॉ. रघु मुर्तुगुड्डे, जलवायु वैज्ञानिक, रिटायर्ड प्रोफेसर आईआईटी मुंबई 

क्या अरब सागर वाकई में गर्म हो रहा है? 

यूरोपियन जियोसाइंस यूनियन द्वारा किए गए एक अध्‍ययन के अनुसार अरब सागर में बीते 45 वर्षों में मरीन हीटवेव की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं। 1980 के दशक की तुलना में उत्तरी अरब सागर और दक्षिण-पूर्वी अरब सागर दोनों में समुद्री हीटवेव की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। 1980 से 2020 तक का वार्षिक औसत जहां 5 था वहीं 2021 से 2019 तक यह औसत बढ़ कर 8.7 हो गया। अध्‍ययन के अनुसार वर्ष 2010 में अरब सागर सबसे ज्यादा गर्म रहा। इस वर्ष उत्तरी अरब सागर में मरीन हीटवेव की 12 घटनाएं हुईं जबकि दक्षिण-पूर्व भाग में यह संख्‍या 14 थी। बढ़ती समुद्री गर्मी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अरब सागर के तेजी से गर्म होने का संकेत है।

स्‍काईमेट वेदर के महेश पलावट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में मानसून की प्रकृति में उल्लेखनीय बदलाव आया है, जिसे सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है। पहले बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम प्रणालियां उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर बढ़ती थीं, लेकिन अब वे अधिकतर पश्चिम की ओर बढ़ रही हैं। इसके अलावा, रिकॉर्ड स्तर तक गर्म हुए अरब सागर के कारण वहां से वातावरण में नमी की मात्रा भी बढ़ गई है। नतीजतन, जब कोई मौसम प्रणाली सक्रिय होती है, तो क्षेत्र में बादल लगातार बनते और पुनः विकसित होते रहते हैं, जिससे लंबे समय तक और अधिक तीव्र बारिश की स्थिति बनती है।

 अरब सागर और बंगाल की खाड़ी 

अरब सागर से अधिक मात्रा में मिल रही नमी, बन रहे भारी बारिश का कारण 

हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर होने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा के लिए आवश्यक नमी मुख्य रूप से अरब सागर से आती है। अध्ययन बताता है कि मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) दुनिया के अन्य आबादी वाले क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। इसके कारण अरब सागर के ऊपर वायुमंडलीय अस्थिरता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और नमी उत्तर की ओर अधिक मात्रा में पहुँच रही है। परिणामस्वरूप, उत्तर-पश्चिम भारत में अभूतपूर्व वर्षा की घटनाएँ बढ़ी हैं। अध्ययन के अनुसार, 1979 से 2022 के बीच उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान में वर्षा की तीव्रता बढ़ने में मध्य-पूर्व में बढ़ती भू-ताप (Land Heating) की लगभग 46 प्रतिशत भूमिका रही है।

अरब सागर 

अरब सागर के गर्म होने का सीधा कनेक्शन मुंबई, पुणे की बारिश से 

40 वर्ष के आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं कि समुद्र गर्म हो रहा है और इसका प्रभाव अरब सागर से लगे राज्यों में भी पड़ रहा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 1981–2000 की तुलना में 2001–2024 के दौरान मानसून की औसत वर्षा मुंबई में लगभग 15 प्रतिशत और पुणे में 23 प्रतिशत बढ़ी है। यह संकेत देता है कि पश्चिमी भारत के शहर गर्म होती जलवायु के बीच अत्यधिक तीव्र वर्षा की घटनाओं के प्रति लगातार अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश कहते हैं, "अल नीनो वाले वर्षों में आमतौर पर बारिश के दिनों की संख्या कम होती है। लेकिन हम जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून का स्वरूप अब स्थायी रूप से बदल चुका है। अब चाहे अल नीनो हो या न हो, बारिश कम समय में बहुत अधिक तीव्रता के साथ होगी।” 

उन्‍होंने आगे कहा कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हुई असामान्य परिस्थितियां उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा के बदलते पैटर्न में साफ दिखाई देती हैं। आजकल राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश में पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) और उससे जुड़ी मौसम प्रणालियों के कारण अच्छी बारिश हो रही है। हम जानते हैं कि अकेले पश्चिमी विक्षोभ इन क्षेत्रों में इतनी वर्षा कराने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन अरब सागर से बढ़ी हुई नमी की आपूर्ति ने इन इलाकों में बारिश के स्वरूप को बदल दिया है।

अलनीनो के वर्षों में भारत में बारिश का पैटर्न

नीचे दी गई तालिका में जब-जब अल नीनो आया तब तब भारत में बारिश का पैटर्न देखें तो डॉ. रमेश की बात इस बात की पुष्टि होती है कि मुंबई-पुणे की भारी बारिश के पीछे अलनीनो नहीं है। क्योंकि अलनीनो मॉनसून को कमजोर करता है न कि भारी बारिश का कारण बनता है।

वर्ष जूनजुलाई अगस्त सितंबरजून - सितंबर (औसत) कैसा था अलनीनो
1951-3.1-11-13.2-26.6-13.2कमजोर अलनीनो
1953-1.814.517.66.210.7कमजोर अलनीनो
1957-6.697.1-21.6-0.5मध्‍यम अलनीनो
19631-8.424.6-1.54.4कमजोर अलनीनो
1965-30.1-4-24.6-22.5-18.6मध्‍यम अलनीनो
1968-10.510-16-23.3-8कमजोर अलनीनो
1972-26.2-27.2-13.8-23.2-22.3मध्‍यम अलनीनो
1976-4.8415.1-14.91.9कमजोर अलनीनो
1982-17.4-17.88.3-24.9-11.4मध्‍यम अलनीनो
1987-21.1-21.5-4.6-10.3-14.3मध्‍यम अलनीनो
199111.1-1.22-19.1-1.4कमजोर अलनीनो
199422.925.112.2-11.313.9कमजोर अलनीनो
19973.81.53.2-10.20.2बहुत प्रभावी अलनीनो
20022.3-50.6-4.4-19-20.9कमजोर अलनीनो
20040.6-13.4-0.8-26.6-9.6कमजोर अलनीनो
201514-14.4-21.6-22.6-12.7मध्‍यम अलनीनो
2023-7.512.8-36.113.1-5.3कमजोर अलनीनो

मुंबई को वेट-बल्ब में बदलता अरब सागर का बढ़ता तापमान

हाल ही में प्रकाशित हई “इंडियन कोस्‍टल रीजन - क्‍लाइमेट प्रोजेक्शन 2021-2040” विषयक रिपोर्ट के अनुसार आने वाले वर्षों में महाराष्‍ट्र और गुजरात के तटीय क्षेत्रों में कम से कम एक सप्ताह अधिक बारिश होगी। और दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान मुंबई में भी 7 दिन अधिक बारिश होने का अनुमान है। यानि कि मुंबई की इमारतों को अब और अधिक बारिश झेलनी पड़ेगी।  

इस अध्‍ययन में तापमान में बताया गया कि आने वाले वर्षों गर्मियों के मौसम में मुंबई के न्यूनतम तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम तापमान जो औसतन 38 डिग्री है उसमें 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने की आशंका है। और वार्षिक औसत में 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज हो सकती है। इसी अध्‍ययन में मुंबई के मॉनसून में 18 प्रतिशत की वृद्धि होने की बात कही गई है। 

अब अरब सागर के बढ़ते तापमान की वजह से मुंबई को अधिक नमी प्राप्त हो रही है और ऊपर से तापमान में भी वृद्धि हो रही है। इस कारण मुंबई गर्मियों में वेट-बल्ब बनता नज़र आ रहा है। आपको बता दें कि ‘वेट बल्ब तापमान’ की वजह से भारत के 50 शहर हाई रिस्क में हैं। इस सूची में तमिलनाडु का तिरुनवेली शहर सबसे ऊपर आता है। चेन्नई दूसरे नंबर पर और तिरुचिरापल्ली तीसरे पर। मुंबई 13वें स्थान पर आता है। 

महाराष्‍ट्र के वो शहर जहां खतरनाक उमस (वेट-बल्‍ब) भरे दिनों की संख्या बढ़ रही है 

शहर1970-19792016-2025
डोम्‍बीवली182222
ठाणे182222
कल्याण152210
मुंबई136206
नवी मुंबई136206

समुद्री तट से दूर स्थित महाराष्‍ट्र के शहरों में बारिश का पैटर्न   

महाराष्‍ट्र के अंदर के जिलों की बात करें तो यहां बारिश की तीव्रता और आवृत्ति दोनों ही कम है। इस बारे में संभाजीनगर के निवासी व वरिष्‍ठ पत्रकार नागो राव बताते हैं कि छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर व आस-पास के जिलों व विदर्भ क्षेत्र में बारिश कम हो रही है। इन शहरों में फिलहाल जल-भराव जैसी स्थिति नहीं होती है। बारिश के पैटर्न पर नागो राव ने कहा, “पहले की तुलना में संभाजीनगर में बारिश कम हो गई है। जून खाली निकल गया, तीन दिन पहले बारिश हुई वो भी मूसलाधार नहीं थी। बारिश की इंटेंसिटी भी कम थी जिसकी वजह से शहर में जल भराव जैसी समस्या नहीं आयी।”

बीते पॉंच वर्षों में जुलाई माह में महाराष्‍ट्र में बारिश का हाल  

महाराष्‍ट्र में बारिश का पैटर्न आम तौर पर जुलाई माह में बहुत तीव्र नहीं होता है। बीते पॉंच वर्षों का डाटा साफ दर्शा रहा है कि जुलाई माह में मुंबई के तटीय शहरों में औसत से कम बारिश हुई, यह भारी बारिश आम तौर पर जुलाई के बाद होती है। लेकिन 2026 में तटीय इलाकों में पहले 8 दिनों में ही 100 प्रतिशत से अधिक बारिश दर्ज हुई। 

2021 से 2025 तक जुलाई माह में महाराष्‍ट्र में बारिश का पैटर्न 

जुलाई 2026 में महाराष्‍ट्र में बारिश का पैटर्न  

शहरी जलभराव के पीछे केवल कॉन्‍क्रीटीकरण नहीं 

मुंबई में जब-जब भारी बारिश होती और सड़कें पानी से लबालब भर जातीं, तब तब लोग नगर-निकाय को बारिश से निपटने में नाकाम साबित करने में जुट जाते हैं साथ ही कॉन्‍क्रीट की इमारतों को दोष देने लगते हैं। सच पूछिए तो नगर निकाय बारिश के पानी से निपटने के लिए जो इंतजाम करते हैं, वो सभी बीते वर्षों के आंकड़ों के आधार पर करते हैं। अब चूंकि जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक भारी मात्रा में बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं, इसलिए शहरी जलभराव (Urban flooding) की घटनाएं भी बढ़ेंगी।  

विशेषज्ञों का कहना है कि मुंबई, पुणे जैसे शहरों को अब एक्‍स्‍ट्रीम क्‍लाइमेट रेज़ीलियंट इंफ्रास्‍ट्रक्चर विकसित करने की जरूरत है। डॉ. के. जे. रमेश ने बताया कि अब मौसम विभाग समय रहते ही भारी बारिश की चेतावनी जारी कर देती है। अब जरूरत है कि मॉनसून के पहले ही नालों की साफ-सफाई कर ली जाये। कॉन्क्रीट की बिल्डिंगों और बढ़ते शहरीकरण के कारण पेड़ों की जड़ों को फैलने की जगह नहीं मिलती है इस कारण तेज़ हवा और बारिश में पेड़ों के गिरने की घटनाएं होती हैं।  

मुंबई और अब तेजी से पुणे में भी बाढ़ का जोखिम केवल बारिश की मात्रा पर निर्भर नहीं करता। भले ही जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की संभावना बढ़ रही हो, लेकिन बाढ़ का वास्तविक प्रभाव कई अन्य कारकों से तय होता है। इनमें कंक्रीट और पक्की सतहों का बढ़ना, जल निकासी (नालों) व्यवस्था की क्षमता, भूमि उपयोग में बदलाव, बाढ़ मैदानों और आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण, तथा घनी आबादी और बुनियादी ढांचे का अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में होना शामिल है।

मुंबई में भारी बारिश

जलभराव के लिए मुंबई का इंफ्रास्‍ट्रक्चर भी जिम्मेदार 

इंडिया वॉटर पोर्टल में बतौर कंटेंट क्रिएटर कार्यरत, मुंबई निवासी शरत चंद्र प्रसाद का कहना है कि पहले भी बारिश बहुत अधिक होती थी, लेकिन बीच-बीच में दो से तीन घंटे का ब्रेक होता था। लेकिन इस बीच लगातार तीन दिन बिना ब्रेक बारिश हुई। अगर बूंदा-बंदी निरंतर हो तो चल जाता है लेकिन भारी मात्रा में पानी गिरना साफ दर्शा रहा है कि मुंबई में बारिश का पैटर्न अब बदल गया है। जल भराव पर शरत चंद्र ने कहा, “मुंबई का भूगोल ऐसा है कि भारी बारिश के बाद सारा पानी नाले में जा ही नहीं सकता। ऐसे में सड़कों पर पानी भरना तो निश्चित है। जल भराव का दूसरा कारण यहां का अरबन इंफ्रास्ट्रक्चर ऐसा है। इतनी पास-पास मकान बने हैं, कि पानी को निकलने के लिए जगह ही नहीं मिलती। ”  

लगातार भारी बारिश ने बढ़ाया शहरी बाढ़ का खतरा

भारत के कई शहर इस समय जलवायु कार्य योजना (क्लाइमेट एक्शन प्लान) तैयार कर रहे हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य पूरे वर्ष शहरों की आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाना होना चाहिए। इसके लिए अत्यधिक मौसम संबंधी घटनाओं से निपटने हेतु तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया और जोखिम कम करने के स्पष्ट प्रोटोकॉल विकसित किए जाने चाहिए।

ठाणे नगर निगम और काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) द्वारा तैयार ठाणे बाढ़ जोखिम प्रबंधन योजना में शहर स्तर पर फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने, राहत एवं पुनर्वास, तथा पुनर्निर्माण और बहाली जैसे महत्वपूर्ण उपाय सुझाए गए हैं, ताकि शहरों को बाढ़ के प्रति अधिक लचीला बनाया जा सके।

सीईईडब्ल्यू (CEEW) के फेलो डॉ. विश्वास चिताले का कहना है कि शहरी बाढ़ का बेहतर प्रबंधन करने के लिए अब हमें ज़मीनी स्तर पर व्यावहारिक और प्रभावी समाधान लागू करने होंगे।

वहीं क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने इंडिया वाटर पोर्टल से कहा, “जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के मानसून का स्वरूप बदल रहा है, जिसे हम अभी पूरी तरह समझना शुरू ही कर रहे हैं। अब सवाल यह नहीं रह गया है कि अत्यधिक वर्षा की घटनाएं होंगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारे शहर उनका सामना करने के लिए कितने तैयार हैं। शहरी विकास के केंद्र में जलवायु अनुकूलन रखना होगा। भविष्य में मौसम की अध‍िक तीव्रता वाली घटनाएं और बढ़ेंगी, इसलिए हमें अपनी तैयारी उसी के हिसाब से और मजबूत रखनी चाहिए।“

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

SCROLL FOR NEXT