उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित सुरहा ताल यानी जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार को 5 जून को भारत के 100वें रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिली है।
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विश्व पर्यावरण दिवस पर उत्तर प्रदेश के बलिया जिले को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। यहां के सुरहा ताल को रामसर साइट का दर्जा प्राप्त हो गया है। इसके साथ ही यह देश का 100वां रामसर वेटलैंड बन गया है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने से इस क्षेत्र के संरक्षण, विकास और पर्यटन संभावनाओं को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
यह उपलब्धि न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे भारत की पर्यावरण संरक्षण नीति और आर्द्रभूमियों के संवर्धन के प्रति दृढ़ संकल्प का जीवंत उदाहरण बताया है।
सुरहा ताल देश व प्रदेश के प्रमुख आर्द्रभूमि क्षेत्रों में शामिल
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में स्थित बलिया शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर बसंतपुर के समीप स्थित सुरहा ताल को देश व प्रदेश के प्रमुख आर्द्रभूमि क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। सुरहा ताल लगभग 24.9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। बरसात के मौसम में इसका दायरा तकरीबन दोगुना बढ़ कर बढ़कर 42 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक का हो जाता है। प्रचुर मात्रा में पानी की उपलब्धता रहने के कारण यह वर्षभर जलयुक्त रहने वाला क्षेत्र है, जो क्षेत्रीय जलचक्र को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाता है। इसी कारण इसे देश के सौवें रामसर स्थल के रूप में न केवल राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मानचित्र पर स्थान मिला है।
जैव विविधता से समृद्ध यह प्राकृतिक जलाशय गंगा और सरयू नदी के खादर क्षेत्र में स्थित है। यानी यह उन निचले बाढ़ मैदानों में स्थित है जहां गंगा और सरयू द्वारा लाई गई नई जलोढ़ मिट्टी और बाढ़ का प्रभाव रहता है। यह एक बड़े इलाके में प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भूगोल में खादर (Khadar) नदी द्वारा हर वर्ष या समय-समय पर बाढ़ के दौरान जमा की गई नई जलोढ़ मिट्टी (new alluvium) वाला क्षेत्र होता है। यह नदी के बिल्कुल निकट स्थित निचला मैदान होता है, जहां बाढ़ का पानी नियमित रूप से पहुंचता है। इसके विपरीत बांगर (Bhangar) पुरानी जलोढ़ मिट्टी वाला अपेक्षाकृत ऊंचा क्षेत्र होता है, जहां सामान्यतः बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता।
यह क्षेत्र पहले से ही सुरहा ताल या जय प्रकाश नारायण पक्षी विहार के नाम से पक्षी अभयारण्य के रूप में जाना जाता है, जिसकी स्थापना वर्ष 1991 में की गई थी। सर्दियों के मौसम में साइबेरिया सहित विभिन्न देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों का यहां बड़ा जमावड़ा देखने को मिलता है, जो इसे पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। देश के 100वें रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिलने के बाद सुरहा ताल देश के प्रमुख आर्द्रभूमि क्षेत्रों में शामिल हो गया है। देश के सभी रामसर स्थलों के बारे में जानने के लिए आप हमारी स्टोरी भारत में रामसर स्थलों की पूरी सूची (2026) - 100 आर्द्रभूमियों की पूरी जानकारी को पढ़ सकते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात सुरहा ताल को भारत के 100वें रामसर स्थल का दर्जा मिलने के साथ ही उत्तर प्रदेश में अब 13 रामसर स्थल हो गए हैं। वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार सक्सेना ने शुक्रवार को सुरहा ताल के रामसर साइट घोषित होने का प्रमाणपत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपा। मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता जताई।
रामसर स्थल का दर्जा मिलने से सुरहा ताल के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और संसाधनों की संभावनाएं बढ़ेंगी। साथ ही ईको-टूरिज्म को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर भी सृजित होंगे।
जैव विविधता से भरपूर है सुरहा तालरामसर साइट्स के मामले में शतक! खुशी है कि उत्तर प्रदेश के बलिया में स्थित जय प्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य (सुरहा ताल) को भारत की 100वीं रामसर साइट घोषित किया गया है। यह वेटलैंड (आर्द्रभूमि) पक्षियों की विविधता से भरपूर है और यहां कई प्रवासी और स्थानीय पक्षी आते हैं। इस उपलब्धि से हमारे प्राकृतिक परिवेश और खासकर वेटलैंड्स की सुरक्षा के प्रति भारत की अटूट प्रतिबद्धता साफ झलकती है। नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री ने (एक्स पर पोस्ट)
बलिया की पहचान केवल सुरहा ताल जैसी समृद्ध आर्द्रभूमि से ही नहीं, बल्कि देश के महान समाजवादी नेता और ‘लोकनायक’ जयप्रकाश नारायण (JP) से भी जुड़ी है। जयप्रकाश नारायण का जन्म बलिया जिले के सिताबदियारा क्षेत्र में हुआ था, जो गंगा और सरयू (घघरा) के संगम क्षेत्र में स्थित है। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह मांग उठती रही कि जिले की किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर को उनके नाम से जोड़ा जाए। इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार ने गजट अधिसूचना संख्या 1088(1)/14-3-19/89, दिनांक 24 मार्च 1991 के माध्यम से लगभग 34.4 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को "जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार" के रूप में अधिसूचित किया था। इस तरह 1991 में सुरहा ताल का नाम ‘जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार’ रखा गया। यह नामकरण केवल एक औपचारिक सम्मान नहीं था, बल्कि बलिया की प्राकृतिक विरासत और उसके सबसे प्रसिद्ध जननायक की स्मृति को जोड़ने का प्रयास भी था। हालांकि सरकारी अभिलेखों और वन विभाग के दस्तावेजों में इसका नाम जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार दर्ज है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह आज भी ‘सुरहा ताल’ के नाम से अधिक प्रसिद्ध है।
जैव विविधता से भरपूर है सुरहा ताल रामसर साइट्स के मामले में शतक! खुशी है कि उत्तर प्रदेश के बलिया में स्थित जय प्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य (सुरहा ताल) को भारत की 100वीं रामसर साइट घोषित किया गया है। यह वेटलैंड (आर्द्रभूमि) पक्षियों की विविधता से भरपूर है और यहां कई प्रवासी और स्थानीय पक्षी आते हैं। इस उपलब्धि से हमारे प्राकृतिक परिवेश और खासकर वेटलैंड्स की सुरक्षा के प्रति भारत की अटूट प्रतिबद्धता साफ झलकती है।नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री ने (एक्स पर पोस्ट)
सुरहा ताल को इसकी जैव विविधता और पर्यावरणीय महत्व के चलते रामसर स्थल का दर्जा दिया गया है।
सुरहा ताल सर्दियों के मौसम में साइबेरिया, मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों से आने वाले हजारों प्रवासी पक्षियों का प्रमुख आश्रय स्थल बनता है। यहां कई दुर्लभ पक्षी प्रजातियों के अलावा जलीय वनस्पतियां और अन्य जीव-जंतु भी पाए जाते हैं। यही कारण है कि इसे भारत की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों (Important Wetlands of India) की सूची में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सुरहा ताल की पारिस्थितिक विविधता इसे जैव विविधता संरक्षण के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार सुरहा ताल न केवल जलीय जीवों और वनस्पतियों का समृद्ध केंद्र है, बल्कि यह आसपास के क्षेत्रों के भूजल स्तर को बनाए रखने में भी सहायक है। यह आर्द्रभूमि प्राकृतिक रूप से जल शुद्धिकरण का कार्य करती है, जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहता है। मुरली मनोहर टीडी कॉलेज के भूगोल विभागाध्यक्ष प्रो. विनीत नारायण दूबे के अनुसार आर्द्रभूमियां मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके अनुसार सुरहा ताल को 'बायोलॉजिकल सुपर मार्केट' कहना उचित होगा, क्योंकि यह जल संरक्षण, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन का केंद्र है।
रामसर दर्जा मिलने के बाद अब इस क्षेत्र में पर्यटन विकास की संभावनाएं और प्रबल हो गई हैं। प्रशासन द्वारा पहले से ही यहां कई विकास कार्य कराए जा चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से यहां पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। यह उपलब्धि प्रदेश की पर्यावरणीय विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सुरहा ताल को रामसर स्थल का दर्जा मिलने से उत्तर प्रदेश को निम्नलिखित लाभ मिलने की संभावना है -
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण परियोजनाओं में सहयोग बढ़ेगा।
इको-टूरिज्म को प्रोत्साहन मिलेगा।
स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
पर्यावरणीय जागरूकता और अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा।
क्षेत्र में सतत विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी।
रामसर साइट घोषित किए गए सुरहा ताल को बड़ा पर्यटन केंद्र बनाने के लिए पर्यटन विभाग द्वारा सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। ताल के नजदीक मैरीटार गांव में 4.99 करोड़ रुपये की लागत से विकास कार्य कराए जा रहे हैं। पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश ईको पर्यटन विकास बोर्ड यहां ओपेन एयर थिएटर, पाथवे, साइनेज, चिल्ड्रेन एरिया, मल्टीपर्पज हाल, घाट विकास, बर्ड वाचिंग टावर, कियास्क, इंटरप्रेटेशन गैलरी, बेंच आदि सुविधाओं का विकास करने जा रहा है। सुरहा ताल के रामसर साइट बनने और सुविधाओं के विकास से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
उत्तर प्रदेश का 13वां रामसर स्थल – 5 जून 2026 (विश्व पर्यावरण दिवस) को इसे रामसर साइट का दर्जा मिलने के साथ ही सुरहा ताल भारत का 100वां और उत्तर प्रदेश का 13वां रामसर स्थल बन गया।
प्राकृतिक ऑक्सबो झील (Oxbow Lake) – सुरहा ताल कोई कृत्रिम जलाशय नहीं है। इसका निर्माण गंगा नदी की धारा में समय के साथ आए बदलाव से हुआ था। यह गंगा की पुरानी मेण्डर (घुमावदार धारा) का अवशेष है।
गंगा और घाघरा (सरयू) के संगम क्षेत्र के प्रभाव में – यह आर्द्रभूमि गंगा-घाघरा नदी तंत्र के बाढ़ मैदानों में स्थित है, जिससे इसकी जैव विविधता अत्यंत समृद्ध बनी रहती है।
310 से अधिक पक्षी प्रजातियों का घर – यहां 310 से ज्यादा पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें लगभग 125 प्रजातियां जलपक्षियों की हैं।
हर सर्दी में लाखों प्रवासी पक्षी – सर्दियों में यहां लगभग 2 लाख तक प्रवासी पक्षी आते हैं, जो मध्य एशिया और साइबेरिया से हजारों किलोमीटर की यात्रा करके पहुंचते हैं।
सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का महत्वपूर्ण पड़ाव – यह झील मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप आने वाले प्रवासी पक्षियों के प्रमुख मार्ग (Central Asian Flyway) पर स्थित है।
सारस का महत्वपूर्ण आवास – उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी सारस सहित अनेक दुर्लभ और संवेदनशील पक्षी यहां पाए जाते हैं।
1991 में पक्षी विहार घोषित – उत्तर प्रदेश सरकार ने 24 मार्च 1991 को इसे पक्षी विहार घोषित किया था। बाद में 2002 में इसका नाम लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर रखा गया।
45 गांवों की जीवनरेखा – सुरहा ताल के आसपास लगभग 45 गांव बसे हैं। मत्स्य पालन, कृषि और अन्य आजीविकाएं सीधे इस आर्द्रभूमि पर निर्भर हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक आर्द्रभूमियों में से एक – इसे पूर्वांचल के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण प्राकृतिक मीठे पानी के जलाशयों में गिना जाता है।
बाढ़ नियंत्रण में भूमिका – बरसात के दौरान आसपास का विशाल क्षेत्र जलमग्न हो जाता है और सुरहा ताल अतिरिक्त पानी को समाहित कर बाढ़ के प्रभाव को कम करने में मदद करता है।
आज भी ‘सुरहा ताल’ नाम ज्यादा प्रचलित – सरकारी रिकॉर्ड में नाम जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार है, लेकिन स्थानीय लोग आज भी इसे सुरहा ताल के नाम से ही जानते हैं।
क्या है रामसर कन्वेंशन : रामसर कन्वेंशन दो फरवरी 1971 को आर्द्रभूमियों के संरक्षण के उद्देश्य से शुरू किया गया था। वर्तमान में दुनिया के 170 से अधिक देश इससे जुड़े हैं और 2100 से अधिक वेटलैंड सूचीबद्ध हैं। भारत में अब तक 100 वेटलैंड इस सूची में शामिल हो चुके हैं, जिनमें अब सुरहा ताल भी शामिल हो गया है।
सुरहा ताल एक प्राकृतिक ऑक्सबो झील है। यह उत्तर प्रदेश का 13वां रामसर स्थल बना है।
उत्तर प्रदेश में कई प्राकृतिक और मानव निर्मित जलाशयों की पहचान कर उन्हें संरक्षित वेटलैंड के रूप में विकसित करने की पहल में तेजी देखने को मिल रही है। इसका मकसद जैव विविधता संरक्षण, जल संसाधन प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को बढ़ावा देना है। चित्रकूट के दो तालाबों का चयन इसी व्यापक संरक्षण अभियान का हिस्सा माना जा सकता है। चित्रकूट के दो तालाबों को संरक्षित वेटलैंड घोषित करने से पहले इस वर्ष यूपी के दो पक्षी विहारों को राष्ट्रीय स्तर का रामसर स्थल घोषित किया जा चुका है।
बीते फरवरी माह के अंतिम सप्ता में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के जलेसर के पास स्थित पटना पक्षी विहार (Patna Bird Sanctuary) को रामसर स्थल का दर्ज़ा दिया गया था। यह कदम एशियन वाटरबर्ड सेंसस–26 की पहली गणना में पटना बर्ड सेंचुरी में प्रवासी पक्षियों की रिकार्ड मौजूदगी दर्ज किए जाने के बाद उठाया गया था।
इस तरह यह पक्षी विहार उत्तर प्रदेश का 11वां रामसर स्थल बन गया और इसके साथ ही उत्तर प्रदेश का यह छोटा सा जिला पर्यावरण और पर्यटन के वर्ल्ड मैप पर आ गया। इस बारे में विस्तृत जानकारी के लिए आप हाल ही में प्रकाशित हमारी स्टोरी रामसर स्थल 'पटना पक्षी विहार' : उत्तर प्रदेश में प्रकृति का छोटा सा स्वर्ग पढ़ सकते हैं। इसके अलावा अप्रैल में अलीगढ़ के शेखा पक्षी विहार (Shekha Bird Sanctuary) को अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट का दर्ज़ा मिल गया। र्द्रभूमि प्राधिकरण द्वारा तैयार की गई रामसर सूचना पत्रक (आरआईएस) के आधार पर यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसी के तहत रामसर सचिवालय ने शेखा पक्षी विहार को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि घोषित कर दिया है। इसके साथ ही यह उत्तर प्रदेश का 12वां रामसर स्थल बन गया।
आप हाल ही में प्रकाशित हमारी स्टोरी अलीगढ़ का शेखा पक्षी विहार बना अंतरराष्ट्रीय रामसर साइट, यूपी में इको टूरिज़्म को मिलेगा बढ़ावा को पढ़कर इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यूपी के इन दो रामसर स्थल के अलावा इस साल (2026) रामसर स्थल का दर्ज़ा प्राप्त करने वाले स्थलों में गुजरात के कच्छ ज़िले में स्थित छारी-ढांड आर्द्रभूमि भी शामिल है, जिसे 31 जनवरी 2026 को रामसर स्थल घोषित किया गया।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के दो तालाबों को वेटलैंड यानी आर्द्रभूमि का दर्ज़ा दिया गया है। प्रदेश सरकार ने पहाड़ी ब्लॉक के अशोह गांव स्थित सिंघानिया तालाब और बछरन ग्राम पंचायत के बड़ा तालाब को राज्य संरक्षित वेटलैंड (आद्रभूमि) घोषित करते हुए वन एवं वन्यजीव विभाग द्वारा वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम-2017 के तहत अधिसूचना जारी की जा चुकी है। इसके साथ ही यह दोनों जलाशय अब पर्यावरणीय दृष्टि से संरक्षित धरोहर बन गए हैं। इससे इन दोनों तालाबों के 50 मीटर दायरे में अतिक्रमण, खनन, भूमि उपयोग परिवर्तन, कचरा व सीवेज डालने जैसी गतिविधियां पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगी।
अवैध ढंग से मछलियां पकड़ने और भूजल दोहन पर भी रोक लगेगी। इन जलाशयों में सर्दियों के दौरान साइबेरिया, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और तिब्बत समेत कई देशों से प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं। यहां साइबेरियन क्रेन, पेलिकन, सुरखाब, बार-हेडेड गूज और ब्लैक-हेडेड गल समेत कई दुर्लभ प्रजातियां देखी जाती हैं। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए आप हमारी हाल ही में प्रकाशित स्टोरी चित्रकूट के दो तालाबों को मिला वेटलैंड दर्ज़ा, विदेशी प्रवासी पक्षियों को मिलेगा नया सुरक्षित आवास को पढ़ सकते हैं।
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