आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित श्रीशैलम बांध का नाम इसके इंजीनियरिंग डिजाइन और जलविद्युत उत्पादन क्षमता के लिए लंदन की वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स शामिल किया गया है।
फोटो : विकी कॉमंस
आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित श्रीशैलम बांध का नाम इसके इंजीनियरिंग डिजाइन और जलविद्युत उत्पादन क्षमता के लिए लंदन की वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स शामिल किया गया है। इस नामांकन के जरिये कृष्णा नदी पर निर्मित इस परियोजना की अनूठी विशेषताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। संगठन ने बांध को इसकी अनूठी इंजीनियरिंग, डिजाइन और जलविद्युत उत्पादन में इसके योगदान को देखते हुए यह मान्यता दी है। यह उपलब्धि हासिल करने वाला यह देश का पहला बांध है।
हाल ही में लंदन से संचालित वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के एक प्रतिनिधि ने आंध्र प्रदेश का दौरा कर राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग और बांध से बिजली जलविद्युत उत्पादन व वितरण से जुड़ी कंपनी एपी जेनको और ट्रांसको के अधिकारियों की उपस्थिति में इस बांध का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल किए जाने का प्रमाण पत्र श्रीशैलम के विधायक बुद्धा राजशेखर रेड्डी को दिया। इस मौके पर राजशेखर रेड्डी ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सिंचाई और बिजली की आवश्यकताओं को पूरा करने में जलाशय की भूमिका को पहचानने के लिए संगठन को धन्यवाद दिया।
आंध्र प्रदेश के ऊर्जा मंत्री गोट्टीपति रवि कुमार ने इस मान्यता को दोनों तेलुगु राज्यों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए एक गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया। मंत्री ने कहा कि यह मान्यता परियोजना की इंजीनियरिंग क्षमताओं, भीषण बाढ़ का सामना करने की इसकी क्षमता और बिजली उत्पादन, सिंचाई और पेयजल आपूर्ति में दशकों से दिए गए इसके योगदान को उजागर करती है।
उन्होंने बांध को इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का प्रतीक और पानी और बिजली का एक महत्वपूर्ण स्रोत बताते हुए कहा कि इस परियोजना ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में लाखों लोगों की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका जलाशय कई दशकों से किसानों, परिवारों और उद्योगों को पानी और बिजली मुहैया कराता आ रहा है।
नदी और स्थान: कृष्णा, नल्लामला की एक घाटी में, नंद्याल (आंध्र प्रदेश) और नागरकुर्नूल (तेलंगाना) की सीमा पर।
ढांचे का निर्माण: गुरुत्व बांध, 145 मीटर ऊंचा और 512 मीटर लंबा, CWC रजिस्टर के मुताबिक 1982 में पूरा हुआ।
जलाशय क्षमता: FRL 885 फुट, जिस पर कुल भंडारण 215.81 TMC है, जबकि ड्रॉ-डाउन की सीमा सिंचाई के लिए 854 फुट और बिजली के लिए 834 फुट।
बिजली उत्पादन: दायां किनारा, आंध्र प्रदेश, 7 x 110 मेगावाट; बायां किनारा, तेलंगाना, 6 x 150 मेगावाट, रिवर्सिबल।
संचालन : 2014 के अधिनियम की धारा 85 के तहत KRMB; 15 जुलाई 2021 की अधिसूचना की अनुसूची-2 में श्रीशैलम।
सुरक्षा की चिंता : बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 के तहत NDSA, और 2009 की बाढ़ के बाद से प्लंज पूल में कटाव।
2020 की आग : 20 अगस्त 2020 को बाएं किनारे के स्टेशन में, जिसमें नौ लोगों की मौत हुई।
रात को रंगीन रोशनी में नहा कर कुछ ऐसा दिखता है श्रीशैलम डैम का दिलकश नज़ारा।
श्रीशैलम बांध का औपचारिक नाम नीलम संजीव रेड्डी श्रीशैलम परियोजना है। यहनल्लामला की घाटी में बना कृष्णा का बिजली वाला बांध है। दो पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इसे साझा करते हैं, जबकि इसका नियंत्रण कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड (KRMB) नाम के एक केंद्रीय नदी बोर्ड के पास है।
श्रीशैलम डैम के ढांचे की बात करें, तो एक गुरुत्व बांध (gravity dam) है। यानी ऐसा बांध दीवार जो पानी को अपने वजन के दम पर रोकता है, घाटी की दीवारों पर मेहराब की तरह टिककर नहीं। इस बांध में पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए कुल 12 रेडियल क्रेस्ट गेट हैं। ये स्टील के घुमावदार गेट हैं, जो बाढ़ का पानी निकालने के लिए ऊपर की ओर घूमकर खुलते हैं। हर गेट का आकार 18.3 मीटर बाय 16.7 मीटर है। यह बांध 145 मीटर ऊंचा और 512 मीटर लंबा है। पूरा भरने पर इसका जलाशय करीब 216 TMC (thousand million cubic feet) पानी जमा कर सकता है। बांध 1980 के दशक की शुरुआत में पूरा हुआ, और दाएँ किनारे का स्टेशन 1987 में अपनी पूरी क्षमता पर पहुंचा। बांध की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) 885 फुट : झील का सामान्य ऊपरी स्तर। इस स्तर पर कुल भंडारण 215.81 TMC होता है।
सिंचाई के लिए न्यूनतम ड्रॉ-डाउन स्तर 854 फुट : जब पानी नहरों के लिए रोककर रखा जाता है, तब झील को इससे नीचे नहीं जाना चाहिए। इस स्तर पर भी 89.29 TMC पानी जमा रहता है।
बिजली बनाने के लिए न्यूनतम ड्रॉ-डाउन स्तर 834 फुट : टरबाइन चलाने के लिए तय की गई निचली सीमा। इस स्तर पर 53.85 TMC पानी बचता है।
डेड स्टोरेज 705 फुट : सबसे निचले निकास से नीचे का पानी, यानी 3.42 TMC, जिसे छोड़ा ही नहीं जा सकता।
अब बीच के दोनों आँकड़ों को साथ रखकर देखिए। 854 फुट और 834 फुट के बीच 89.29 घटा 53.85, यानी करीब 35.4 TMC पानी है। नियम के हिसाब से इस हिस्से से टरबाइन चलाई जा सकती हैं।
जैसे ही यह पानी इस्तेमाल होता है, झील सिंचाई के लिए तय स्तर से नीचे चली जाती है। यानी जो टरबाइन चलाता है, वही इन 35 TMC का भविष्य तय करता है। पूरा झगड़ा बस एक घटाव में समा जाता है।
कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड (KRMB) के मुताबिक बांध के डिजाइन की मुख्य खूबी इसकी 19 लाख क्यूसेक की बाढ़ को संभालने की क्षमता (design flood) है। मतलब, इसका जलाशय इतने पानी को सुरक्षित रूप से रोक कर बाहर जाने वाले बहाव को करीब 13.56 लाख क्यूसेक तक घटा सकता है। हालांकि अपनी बेहतरीन डिजाइन, इंजीनियरिंग और मजबूती के चलते वास्तव में यह इससे अधिक पानी को भी संभाल लेता है। रिपोर्टें बताती हैं कि 2009 में बांध को करीब 25 लाख क्यूसेक पानी संभाल लिया था, जो इसकी आधिकारिक क्षमता से कहीं ज्यादा था। पिछले साल ज्यादा पानी के बहाव के कारण बांध के निचले हिस्से में दरारें आने की समस्या भी देखी गई थी। जिसकी मरम्मत को लेकर भी दोनों राज्यों के बीच गतिरोध देखने को मिला था। इसकी विस्तृत जानकारी आप हमारी पूर्व में प्रकाशित स्टोरी दो राज्यों की तकरार में ढह सकता है श्रीशैलम बांध, लाखों लोगों के सिर पर मंडरा रहा खतरा को पढ़कर प्राप्त कर सकते हैं।
श्रीशैलम बांध की योजना मूलत: एक जलविद्युत परियोजना के रूप में ही बनी थी। केंद्रीय जल आयोग का बड़े बांधों के राष्ट्रीय रजिस्टर (National Register of Large Dams) में आज भी इसका उद्देश्य केवल जलविद्युत उत्पादन बताया गया है। सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने की भूमिका को बाद में इस परियोजना में जोड़ा गया। जिसके तहत नहरों और लिफ्ट योजनाओं के जरिए अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के एक बड़े इलाके को इस जलाशय से पानी दिया जा रहा है।
बांध के दाएं किनारे पर स्थित पावर स्टेशन आंध्र प्रदेश के अधिकार में आता है और इसे आंध्र प्रदेश पावर जनरेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (APGENCO) चलाती है। यह APGENCO की सुन्नीपेंटा इकाई के तहत संचालित होता है। इसमें 110 मेगावाट की 7 इकाइयां हैं, यानी इस पावर प्लांट की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 770 मेगावाट है। इस अर्ध-भूमिगत प्लांट में फ्रांसिस टरबाइन लगी हैं, जो सिर्फ बिजली बनाती हैं।
बांध के बाएं किनारे का पर स्थित पावर स्टेशन तेलंगाना के अधिकार में है और इसे तेलंगाना पावर जनरेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (TGENCO) चलाती है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता करीब 900 मेगावाट की है। इस तरह दाएं और बाएं किनारे पर दोनों संयंत्रों को मिलाकर श्रीशैलम डैम की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 1,670 मेगावाट की है। KRMB के अनुसार यह हाइड्रो पावर प्लांट पूरी तरह भूमिगत है, और इसमें 150 मेगावाट की 6 रिवर्सिबल (दोनों दिशाओं में चलने वाली) मशीनें लगी हैं। जब पानी इनसे होकर नीचे गिरता है, तो हर मशीन टरबाइन की तरह बिजली बनाती है। और आवश्यकता के मुताबिक बिजली बन जाने पर यही मशीन पंप बनकर पानी को वापस ऊपर श्रीशैलम डैम में पहुंचा देती है। इसको पंप्ड स्टोरेज कहते हैं, यानी पानी से बनी एक ऐसी बैटरी जिसे बार-बार चार्ज किया जा सके। इसमें श्रीशैलम ऊपर की टंकी है, और नीचे की ओर अगला बड़ा जलाशय नागार्जुनसागर नीचे की टंकी।
दोनों राज्यों के बीच विवाद इसके पानी के दो इस्तेमाल को लेकर है। इसका पानी दो तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता है। पहल तरीका यह कि पानी तेलंगाना के बाएं किनारे की टरबाइन चलाकर आगे नागार्जुन सागर की ओर बह जाए, या पानी नहरों और लिफ्ट योजनाओं के लिए झील में ही रुका रहे। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि कृष्णा बेसिन से बाहर पानी ले जाने वाली यानी पानी को नियंत्रित करने का नियंत्रण आंध्र प्रदेश के पास है। इसे लेकर तेलंगाना का कहना है कि श्रीशैलम बांध एक जलविद्युत परियोजना के रूप में बना था। इसलिए बिजली बनाना इसका पहला इस्तेमाल है, जबकि आंध्र प्रदेश पानी का नियंत्रण अपने इलाके में सिंचाई और पेयजल जैसी चीजों को ध्यान में रखकर कर रहा है। दोनों राज्यों के बीच विवाद को सुलझाने के लिए आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत एक व्यवस्था बनाई गई थी। इसकी सबसे प्रमुख चार धाराएं इस प्रकार है:
धारा 84 के तहत दोनों नदी बोर्डों की निगरानी के लिए एक शीर्ष परिषद (Apex Council) का गठन हुआ। अक्टूबर 2020 में हुई इसकी दूसरी बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने की थी।
धारा 85 के तहत KRMB का गठन 28 मई 2014 को हुआ और जो 2 जून 2014 से प्रभावी हुआ। इसी दिन तेलंगाना आंध्र प्रदेश से अलग होकर एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया थ।
धारा 87 के तहत केंद्र की यह शक्ति कि वह अधिसूचना जारी करके तय किया कि बोर्ड किन परियोजनाओं को नियंत्रित करेगा।
अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत 2 अप्रैल 2004 कोगठित कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण-II (KWDT-II) का कार्यकाल धारा 89 के तहत बढ़ाया गया, ताकि वह परियोजनाओं के अनुसार पानी का बंटवारा करे और कम बहाव वाले वर्षों में पानी छोड़ने का एक संचालन प्रोटोकॉल तय करे।
कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड (KRMB) और न्यायाधिकरण (KWDT-II) के काम अलग-अलग हैं । KRMB साझा बांध के ढांचों का संचालन संभालता है, जबकि KWDT-II यह तय करता है कि किसे कितना पानी मिलेगा। अक्टूबर 2023 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने KWDT-II के लिए और संदर्भ शर्तों (terms of reference) को मंजूरी दी, ताकि वह अनुच्छेद 262 के तहत दोनों राज्यों के बीच फैसला कर सके।
दोनों राज्यों के बीच परियोजना से जुड़े क्षेत्राधिकार का बरसों तक अटका रहा मामला आखिरकार 15 जुलाई 2021 को जारी हुई गजट अधिसूचना S.O. 2842(E) से तय हुआ। यह अधिसूचना 14 अक्टूबर 2021 से लागू हुई। इसने श्रीशैलम बांध के स्पिलवे यानी अतिरिक्त पानी निकालने के रास्ते और दोनों पावर हाउस को अनुसूची-2 में रखा। कागज पर दोनों पावर हाउस एक केंद्रीय बोर्ड के पास चले गए, लेकिन असल में राज्य ही उन्हें चलाते रहे। तब से अब तक का कागजी आदेश धीमी रफ्तार से आगे बढ़े हैं। इसके अहम पड़ाव इस प्रकार रहे :
29-30 नवंबर 2023: आंध्र प्रदेश पुलिस नीचे की ओर बने नागार्जुनसागर बांध पर पहुँच गई और पानी छोड़ दिया। केंद्रीय गृह सचिव की बुलाई बैठक के बाद दोनों राज्य CRPF की निगरानी में 28 नवंबर वाली स्थिति पर लौटने को राजी हुए।
1 फरवरी 2024: KRMB की एक बैठक में दोनों राज्य श्रीशैलम, नागार्जुनसागर और 15 आउटलेट संचालन के लिए बोर्ड को सौंपने पर सहमत हुए।
12 फरवरी 2024: तेलंगाना विधानसभा ने किसी भी बिना शर्त हस्तांतरण के खिलाफ प्रस्ताव पास किया। उसने माँग की कि श्रीशैलम से बेसिन के बाहर जाने वाले पानी की सीमा 34 TMC तय हो: 15 TMC चेन्नई की जलापूर्ति के लिए और 19 TMC श्रीशैलम राइट ब्रांच कैनाल के लिए।
22 फरवरी 2025: KRMB की एक बैठक में, जिसमें आंध्र प्रदेश शामिल नहीं हुआ, तेलंगाना ने आरोप लगाया कि श्रीशैलम और नागार्जुनसागर जलाशयों से बिना इजाजत पानी ले जाया गया।
दोनों राज्यों के बीच विवाद के संदर्भ में मूल पेचीदगी इस बात को लेकर है कि श्रीशैलम डैम को बिजली उत्पादन के प्राथमिक उद्देश्य के लिए चलाया जाए या पानी नहरों के लिए रोककर रखा जाए। गौर करने वाली बात यह है कि इन दोनों ही हालात में किसी न किसी राज्य के हिस्से कम पानी आएगा। ऐसे में समझदारी भरा बीच का रास्ता यह हो सकता है कि एक निष्पक्ष संचालक तय नियमों के हिसाब से दोनों राज्यों के लिए बांध का पानी छोड़े। KRMB को इसी भूमिका के लिए बनाया गया था, पर इससे बात नहीं बन सकी।
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