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हाथी की लीद से कागज निर्माण

Author: 
आभास मुखर्जी
Source: 
विज्ञान प्रगति, जनवरी 2018

इस कागज को बनाने के लिये चाय बागानों की देखभाल एवं रख-रखाव से जुड़े टी एस्टेटों तथा एलीफेंट पार्कों से हाथी की लीद इकट्ठा की जाती है। दिनभर में एक हाथी औसतन करीब 200 किलोग्राम तक लीद उत्पन्न करता है। इस लीद को पुनःचक्रण कर इसे विसंक्रमित यानी रोगाणुमुक्त किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त लुगदी से बिना रेसे वाले हिस्से को अलग कर उसे नरम करने के लिये उसमें रुई के फाहे और टुकड़े, कास्टिक सोडा तथा स्टार्च आदि मिलाया जाता है।

इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल 2017

Source: 
विज्ञान प्रगति, जनवरी 2018

हाल ही में चार दिवसीय तीसरे इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल का शुभारम्भ 13 अक्टूबर, 2017 को अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई में किया गया जिसका संचालन राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा किया गया। इस विज्ञान महोत्सव का विषय था ‘नये भारत के लिये विज्ञान’ इस चार दिवसीय लम्बे कार्यक्रम का आयोजन पाँच अलग-अलग स्थानों, अन्ना विश्वविद्यालय (मुख्य स्थल), राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान, सीएसआईआर-केन्द्रीय चमड़ा अनुसन्धान संस्थान, सीएसआईआर-संरचनात्मक अभियांत्रिकी अनुसन्धान केन्द्र और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास में किया गया। छात्र, शिक्षक, शोधकर्ता, विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, सामाजिक संगठन आदि विभिन्न क्षेत्रों से लोग इस आयोजन में शामिल हुए।

चार दिवसीय तीसरे इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल का शुभारम्भ करते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान तथा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा कि हमारा देश लाखों अन्वेषकों को जमीनी स्तर से ही बढ़ावा देता है और यह आधुनिक उद्यमी कौशल के साथ उन्हें सशक्त बनाता है तथा उन्हें उन्नत औद्योगिकियों से परिचित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि इनोवेटर्स समिट (Innovator’s summit) का उद्देश्य जमीनी स्तर पर तकनीकी नवाचारों को मजबूत और हमारे उत्कृष्ट परम्परागत ज्ञान को समृद्ध करना है। इससे छात्रों और शोधकर्ताओं से लेकर आविष्कारों और नीति निर्माताओं तक हितधारकों को एक आम मंच मिलेगा।

ड्रिप सिंचाई तकनीक से तैयार हो रहा दिल्ली का पहला वर्टिकल गार्डेन

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नवोदय टाइम्स, 12 जनवरी, 2018

दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे पर जहाँ तेज रफ्तार में गाड़ियों के दौड़ने के लिये सड़क तैयार की जा रही है। वहीं पर्यावरण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। पहले फेज में वर्टिकल गार्डन बनाने का काम आरम्भ करने के अलावा चौथे चरण में हरित कॉरिडोर भी विकसित करने की योजना है। डासना से मेरठ के बीच यह कॉरिडोर बनाने की योजना है। जिसमें सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे पेड़ और हरियाली होगी।

समय से पहले ही आने लगे काफल और बुरांश के फूल

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राष्ट्रीय सहारा, 11 जनवरी 2018

बुरांसबुरांसपहाड़ों में बदलते जलवायु परिवर्तन ने वैज्ञानिकों की चिन्ता बढ़ा दी है। समुद्रतल से आठ से नौ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाने वाला काफल फल तय समय से पहले ही पेड़ों पर लकदक कर पकने को तैयार हो गया है। साथ ही दिसम्बर के महीने में बुरांश के फूल भी जंगल में खिले हुए दिख रहे हैं, जो एक चिन्ता का विषय बना हुआ है।

रुद्रप्रयाग जिले के विकासखण्ड अगस्त्यमुनि के बच्छणस्यूं के बंगोली गाँव के जंगलों में इन दिनों काफल और बुरांश के पेड़ों पर फूल खिले नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों की माने तो पेड़ों पर तीन महीने पहले ही काफल लग चुके हैं। जबकि पिछले वषों में काफल का फल मार्च के आखिरी सप्ताह में गिने चुने पेड़ों पर ही दिखाई देता था और आबादी वाले क्षेत्रों में अप्रैल और मई माह में काफल पकते थे।

ठंडे क्षेत्र में तो मई से जून के आखिरी सप्ताह तक काफल पकते रहते थे, लेकिन इस समय तीन महीने पहले ही इस तरह की स्थिति पैदा हो गई है, जो कि चिन्ता का विषय बनी हुई है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद जगत सिंह चौधरी जंगली का कहना है कि विकास की दौड़ में लोगों ने जलवायु की ओर ध्यान देना ही छोड़ दिया है, जिसका परिणाम दिसम्बर के महीने में देखने को मिल रहा है। हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं हो रही तो काफल और बुरांश समय से पहले ही पेड़ों पर आ रहे हैं जोकि हमारे पर्यावरण के लिये बहुत बुरा है। जलवायु परिवर्तन से यह स्थिति पैदा हो रही है। केदारनाथ से लेकर हिमालय रेंज में जहाँ भी बर्फ गिर रही हैं वहाँ बर्फ टिक नहीं पा रही है। विकास के युग में थोड़ा बदलाव लाना होगा और गाँवों के जीवन की तकनीकी को अपनाना होगा।

1- बंगोली गाँव में बुरांश के फूलों से पेड़ लकदक
2- जलवायु में आ रहे परिवर्तन से जनता चिन्तित

उत्तराखण्ड की कोशी को जीआईएस से मिलेगा पुनर्जन्म

Author: 
दीप सिंह बोरा
Source: 
दैनिक जागरण, 09 जनवरी 2018

खोजे गए 14 रीचार्ज जोन और 1820 सहायक नाले, 25 साल के शोध के बाद आखिरकार मिल पाई सफलता

कोशी नदी उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र की एक प्रमुख नदी है। कौसानी के निकट धारपानी धार से निकलने के बाद उत्तराखण्ड में इसकी 21 सहायक नदियाँ और 97 अन्य जलधार हैं। सहायक नालों के रूप में 1820 विलुप्त जल धाराएँ भी खोज ली गई हैं। इन्हीं के बूते करीब 40 वर्ष पूर्व यह 225.6 किमी लम्बी यात्रा करती थी। मगर स्रोतों व सरिताओं को दम तोड़ते जाने से अब उत्तराखण्ड में मात्र 41.5 किमी क्षेत्रफल में सिमट कर रह गई है। कोशी जलागम की ऐसी ही 49 सहायक नदियाँ भी हैं, जो लगभग सूख चुकी हैं।

लोगों को पत्र लिख करते हैं पौधा रोपने की अपील

Author: 
वंदना वालिया बाली
Source: 
दैनिक जागरण, 07 जनवरी 2017

पर्यावरण प्रहरी के रूप में अनोखी भूमिका निभाने वाले गुरबचन सिंह अगस्त 1994 से जनवरी 1995 तक 25 हजार किलोमीटर का सफर साइकल से तय कर भारत भ्रमण कर चुके हैं। इस दौरान भी उन्होंने लोगों को पर्यावरण का सन्देश दिया। अब भी वे साइकल से ही चलते हैं। उनकी साइकल पर एक तख्ती लगी हुई है, जिस पर हर दिन एक नया सन्देश लिख देते हैं। साइकल जहाँ से भी गुजरती है, लोग इसे पढ़ते जाते हैं। जालंधर/पर्यावरण संरक्षण का यह अनूठा प्रयास पंजाब पुलिस में तैनात एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर पिछले 12 वर्ष से कर रहा है। वह स्थानीय अखबारों में हर दिन छपने वाले शोक अथवा बधाई सन्देशों से पते जुटाते हैं और उसी दिन सभी पतों पर पत्र भेज देते हैं। पत्र में शोक संवेदना अथवा शुभकामना के साथ ही एक अपील भी करते हैं। जिन्होंने परिजन कोे खोया, उनसे परिजन की याद में एक पौधा रोपने का आग्रह करते हैं और जिनका जन्मदिन है, उन्हें हर जन्मदिन पर एक पौधा रोपने के लिये प्रेरित करते हैं। पिछले 12 साल से यह काम वे हर दिन कर रहे हैं।

उत्तराखण्ड लिखेगा पानी की नई कहानी

Source: 
दैनिक जागरण, 05 जनवरी 2017

मुख्यमंत्री ने शुरू कराई अनूठी पहल, शौचालयों के फ्लश में डाली रेत से भरी बोतलें

एक समय में सूख चुकी गाड़गंगा ने सदानीरा रूप ले लिया, उससे उम्मीद जगी है कि यदि चाल-खाल की परिकल्पना पर काम किया जाये तो उत्तराखण्ड में जलक्रान्ति आ सकती है। यह प्रयास इसलिये जरूरी भी है कि प्रदेश में 200 से अधिक छोटी-बड़ी नदियाँ लगभग सूख चुकी है, या बरसाती नदी में तब्दील हो चुकी हैं। इस दिशा में शुभ संकेत भी मिल रहे हैं, क्योंकि राज्य सरकार चाल-खाल की परिकल्पना पर काम करने की तैयारी कर रही है। उत्तराखण्ड में पानी की नई कहानी लिख डालने की मजबूत शुरुआत हो चुकी है। बीते वर्ष मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक ऐसी पहल की, जिसके दम पर सूक्ष्म प्रयास से ही हर साल 14.74 लाख लीटर पानी बचाने का इन्तजाम कर लिया गया है। मुख्यमंत्री के आह्वान पर प्रदेश भर में शौचालय के फ्लश में रेत से भरी बोतल डालने की मुहिम शुरू की गई थी, जिसका असर यह हुआ कि बोतल में भरी रेत के भार के बराबर पानी हर फ्लश के बाद कम जमा होने लगा और उतना ही पानी फ्लश भी होने लगा। सरकार के ही आँकड़ों के अनुसार, राज्य में अब तक 2.73 लाख से अधिक बोतलें फ्लश में इस्तेमाल की जा रही हैं। नए साल पर यह उम्मीद है कि यह प्रयास और अधिक लोगों तक पहुँचेगा और जल संरक्षण को नया आयाम मिल सकेगा।

पर्यावरण बचाने को लिया जाएगा लोकगीतों का सहारा

Author: 
अमित कुमार
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 03 जनवरी, 2018

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा पुस्तक मेले में पर्यावरण से जुड़े विषयों पर सेमिनार का भी आयोजन किया जाएगा। इनमें पंजाब में काली नदी (व्यास की सहायक नदी) पर काम करने वाले पर्यावरणविद संत बलबीर सिंह सिचेवाल ‘पर्यावरण संरक्षण’ पर अपने विचार रखेंगे। जाने-माने पर्यावरणविद स्व. अनुपम मिश्र द्वारा पर्यावरण के क्षेत्र में किये गये काम को लेकर एक परिचर्चा का आयोजन किया जाएगा। इस परिचर्चा में स्व. मिश्र की पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पर भी चर्चा होगी।

उमंग एप (UMANG APP)

Source: 
कुरुक्षेत्र, अगस्त 2017

उमंग (यानी यूनिफाइड मोबाइल एप्लीकेशन फॉर न्यू-एज गवर्नेंस अर्थात नए युग के शासन के लिये एकीकृत मोबाइल एप्लीकेशन) का उद्देश्य ई-गवर्नेंस को ‘मोबाइल प्रथम’ बनाना है। इसका विकास इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन द्वारा किया गया है। यह एक विकासमान मंच है, जो भारत के नागरिकों को अखिल भारतीय ई-गवर्नेंस सेवाएँ प्रदान करने के लिये तैयार किया गया है। इन सेवाओं में केन्द्रीय, राज्य, स्थानीय निकायों और सरकार की एजेंसियों की सेवाएँ शामिल हैं, जिनके लिये एप, वेब, एसएमएस और आईवीआर चैनलों के जरिए एक्सेस प्रदान की जाती है।

इस एप की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं :-

यूनिफाइड प्लेटफॉर्म : यह सभी सरकारी विभागों और उनकी सेवाओं को एकल मंच पर लाता है ताकि नागरिकों को बेहतर और आसानी से सेवाएँ प्रदान की जा सकें।

मोबाइल प्रथम कार्यनीति : यह सभी सरकारी सेवाओं को मोबाइल प्रथम कार्यनीति के साथ जोड़ता है ताकि मोबाइल रखने की प्रवृत्ति का लाभ उठाया जा सके।

डिजिटल इंडिया सेवाओं के साथ एकीकरण : यह आधार, डिजी-लॉकर और पे-जीओवी जैसी अन्य डिजिटल इंडिया सेवाओं के साथ निर्बाध एकीकरण प्रदान करता है। कोई भी ऐसी नई सेवा इस प्लेटफॉर्म के साथ स्वतः जुड़ जाएगी।

एक समान अनुभव : इसका डिजाइन यह बात ध्यान में रखकर तैयार किया गया है कि इससे नागरिकों को सभी सरकारी सेवाओं को आसानी से खोजने, डाउनलोड करने, उन तक पहुँच कायम करने और उनका उपयोग करने में आसानी रहे।

सुरक्षित और सुगम : यह सेवा पहुँच के लिये आधार और अन्य प्रमाणीकरण व्यवस्थाओं से जुड़ी है। संवेदनशील प्रोफाइल डाटा एक्रिप्टिड फ़ॉर्मेट में सेव होता है और ऐसी सूचना को कोई अवांछित व्यक्ति नहीं देख सकता।

इस एप के जरिए निम्नांकित सेवाएँ उपलब्ध हैं :

सीबीएसई : केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से जुड़े सभी विद्यार्थी अपने परीक्षा केन्द्रों का पता लगा सकते हैं और अपने परीक्षा परिणाम देख सकते हैं।