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Submitted by UrbanWater on Thu, 06/25/2020 - 09:08
नदी चेतना यात्रा : बिहार में राज-समाज की कोशिश से नदियों को जिंदा करने की कवायद, फोटो: Needpix.com
पिछले तीन दिनों (22 जून से 24 जून) से बिहार में बीस-पच्चीस संवेदनशील लोग नदी चेतना यात्रा के लिए होमवर्क कर रहे हैं। यह समूह रोज सबेरे 8.30 बजे मोबाईल पर एक दूसरे से कनेक्ट होता है और डिजिटल सम्वाद के तरीके से प्रातः लगभग नौ बजे तक होमवर्क करता है। होमवर्क का लक्ष्य है, चेतना यात्रा को प्रभावी बनाना। चयनित नदियों की समस्याओं के कारणों को पहचाना और कछार में निवास करने वाले समाज की मदद से समाज सम्मत हल तलाशना और जन अपेक्षाओं को मूर्त स्वरुप प्रदान करने के लिए राज से सम्वाद करना।

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Submitted by admin on Fri, 08/30/2013 - 10:07
Source:
तहलका, अगस्त 2013
Hiware Bazar
हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीब से बने गुलाबी मकान दिखेंगे। साफ और चौड़ी सड़कें भी। नालियां बंद हैं और जगह-जगह कूड़ेदान लगे हैं। हर जगह एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होते हैं। शराब और तंबाकू के लिए अब गांव में कोई जगह नहीं रही। हर घर में पक्का शौचालय है। खेतों में मकई, ज्वार, बाजरा, प्याज और आलू की फसलें लहलहा रही हैं। सूखे से जूझते किसी इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं। 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं। ताराबाई मारुति कभी दिहाड़ी मजदूर थीं। आज उनके पास 17 गायें हैं और वे ढाई सौ से तीन सौ लीटर दूध रोज बेचती हैं। वे बताती हैं, 'पहले मजदूरी करते थे। पांच-दस रुपये रोज मिलते थे तो खाना मिलता था। आज आमदनी बढ़ गई है।' हिवड़े बाजार नाम के जिस गांव में ताराबाई रहती हैं वहां के ज्यादातर लोगों का अतीत कभी उनके जैसा ही था। वर्तमान भी उनके जैसा ही है। आज राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में जिस युवा शक्ति को अवसर देने की बात हो रही है वह युवा शक्ति कैसे समाज की तस्वीर बदल सकती है, इसका उदाहरण है हिवड़े बाजार। दो दशक पहले तक महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसे इस गांव की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजदूरी करने आस-पास के शहरों में चला जाता था। यानी उन साढ़े छह करोड़ लोगों में शामिल हो जाता था जो 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 4000 शहरों और कस्बों में नारकीय हालात में जी रहे हैं। बहुत-से परिवार ऐसे भी थे जो पुणे या मुंबई जैसे शहरों में ही बस गए थे। जो गांव में बचे थे उनके लिए भी हालात विकट थे। ज़मीन पथरीली थी। बारिश काफी कम होती थी। सूखा सिर पर सवार रहता था। 90 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे। शराब का बोलबाला था। झगड़ा, मार-पिटाई आम बात थी। मोहन छत्तर बताते हैं, ‘कॉलेज में पढ़ते थे तो बताने में शर्म आती थी कि हम हिवड़े बाजार के हैं।’

लेकिन आज शर्म की जगह गर्व ने ले ली है। हिवड़े बाजार आज अपनी खुशहाली के लिए देश और दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है। पलायन तो रुक ही गया है, जो लोग हमेशा के लिए शहर चले गए थे वे भी वापस आकर गांव में बसने लगे हैं। आज गांव की प्रति व्यक्ति आय औसतन 30 हजार रु सालाना है। 1995 में यह महज 830 रु थी। गांव के उपसरपंच पोपट राव पवार कहते हैं, 'तब ज्वार-बाजरा भी मुश्किल से होता था। आज हम हर साल एक करोड़ रुपये की नगदी फसल उगाते हैं। डेयरी का काम भी फैला है। गांव में रोज 4000 लीटर दूध का कलेक्शन हो रहा है।'

हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीब से बने गुलाबी मकान दिखेंगे। साफ और चौड़ी सड़कें भी। नालियां बंद हैं और जगह-जगह कूड़ेदान लगे हैं। हर जगह एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होते हैं। शराब और तंबाकू के लिए अब गांव में कोई जगह नहीं रही। हर घर में पक्का शौचालय है। खेतों में मकई, ज्वार, बाजरा, प्याज और आलू की फसलें लहलहा रही हैं। सूखे से जूझते किसी इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं। 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं। महात्मा गांधी ने कहा था, 'सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए 20 लोग नहीं चला सकते। वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।' हिवड़े बाजार ने यही कर दिखाया है। युवा शक्ति कैसे ग्राम स्वराज ला सकती है यह सिखाता है हिवड़े बाजार। 85 साल के रावसाहेब राऊजी पवार याद करते हैं, 'हमारे गांव में गरीबी थी। हालांकि हम अपनी सीधी-सादी जिंदगी से खुश थे। लेकिन 1972 के अकाल ने हमारे गांव की शांति छीन ली। ज़मीन पथरीली थी। पानी न होने से हालात और खराब हो गए। वह सामाजिक ताना-बाना बिखर गया जो गरीबी के बावजूद लोगों को एक रखता था। लोग शराब के चक्कर में पड़ गए। जरा-सी बात पर झगड़ा हो जाता। जिंदगी चलाना मुश्किल हो गया सो गांव के कई लोग मजदूरी करने पास के शहरों में जाने लगे।'

फिर एक दिन गांव के कुछ नौजवानों ने सोचा कि क्यों न हालात बदलने की एक कोशिश की जाए। किसी ऐसे युवा को सरपंच बनाकर देखा जाए जो एक जोश और नई सोच लेकर आए। पोपटराव पवार तब हिवड़े बाजार के अकेले युवा थे जो पोस्ट ग्रेजुएट थे। नौजवानों ने उनसे आग्रह किया कि वे सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ें। यह 1989 की बात है। लेकिन पवार का परिवार यह मानने को तैयार नहीं था। उनके घरवाले चाहते थे कि वे शहर जाएं और कोई अच्छी नौकरी करें। पवार क्रिकेट के खिलाड़ी थे और वे इस खेल में करियर बनाना चाहते थे। लेकिन नौजवानों के बहुत आग्रह पर वे चुनाव लड़ने के लिए राजी हो गए। पहले तो बुजुर्गों का रवैया कुछ ऐसा रहा कि कल के लड़के हैं, ये क्या करेंगे। लेकिन फिर सहमति बनी कि चलो एक साल इन्हें भी देख लेते हैं। सरपंच पद पर पवार का चयन निर्विरोध हुआ। फिर शुरू हुआ बदलाव। पवार ने गांववालों से कहा कि अपना विकास उन्हें खुद करना होगा। गांव में शराब की 22 भट्टियां थीं। फसाद की यह जड़ खत्म की गई। पवार की कोशिशों से ग्राम सभा का बैंक ऑफ महाराष्ट्र के साथ तालमेल हुआ जिसने गरीब परिवारों को कर्ज देना शुरू किया। इनमें वे परिवार भी शामिल थे जो पहले शराब बना रहे थे। 71 साल के लक्ष्मण पवार कहते हैं, 'पानी की कमी ने खेत बंजर कर दिए थे। हताश होकर लोगों ने शराब पीना, जुआ खेलना, लड़ना-झगड़ना शुरू कर दिया। शराब ने हमें बर्बाद कर दिया था, इसलिए जब भट्टियां बंद हुईं तो हमें लगा कि कुछ उम्मीद है।'

फिर पानी सहेजने और बरतने की व्यवस्था बनाने का काम शुरू हुआ। पवार का मंत्र था कि यह सबका काम है इसलिए सबको इसमें जुटना होगा। जल्द ही गांव में चेक डैमों और तालाबों का जाल बिछ गया। पवार कहते हैं, 'हमने सरकारी योजनाओं के पैसे का सही इस्तेमाल किया। लोगों ने खुद मेहनत की तो इसके दो फायदे हुए--मजदूरी बची और काम की क्वालिटी भी बढ़िया हुई और हम भी तो यह सब अपने और अपने बच्चों के लिए ही कर रहे थे।' मकसद यह था कि बरसने वाले पानी की एक-एक बूंद सहेजी जाए। हिवड़े बाजार जिस भौगोलिक क्षेत्र में है उसे वृष्टि छाया क्षेत्र यानी रेन शैडो जोन कहा जाता है। यहां साल भर में 15 इंच से ज्यादा बरसात नहीं होती। तालाब बने तो बारिश का पानी ठहरा। धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी। 1995 से पहले गांव में 90 खुले कुएं थे और पानी का स्तर 80-125 फुट नीचे था। आज गांव में 294 खुले कुएं हैं और पानी का स्तर 15-40 फुट तक आ गया है। इसी अहमदनगर जिले में दूसरे गाँवों को पानी के लिए 200 फुट तक बोरिंग करनी पड़ती है। गांव के ही हबीब सैयद बताते हैं, '2010 में 190 मिमी ही बारिश हुई लेकिन पानी की व्यवस्था होने से हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।'

पानी आया तो खुशहाली आने में ज्यादा देर नहीं लगी। पहले मानसून के बाद ही गांव में सिंचित क्षेत्र 20 हेक्टेयर से 70 हेक्टेयर हो गया। जहां ज्वार-बाजरा उगना भी मुश्किल था वहां कई फसलें होने लगीं। किसानी बढ़ी तो काम भी बढ़ा। मजदूरी महंगी थी तो पवार ने एक तरीका निकाला। उन्होंने सामूहिकता पर जोर देना शुरू किया। एक किसान की बुआई में पूरे गांव के लोग शामिल हो जाते। फिर मज़दूरों की क्या जरूरत। मजदूरी तो बची ही, आपसदारी की भावना भी मजबूत हुई। पवार कहते हैं, 'बदलाव पैसे से नहीं आया। यह आया क्योंकि लोग जाति और राजनीति की तमाम दीवारें तोड़कर एक साझा मकसद के लिए साथ आए।' खेती के बाद पवार ने आजीविका के लिए एक और स्रोत पर ध्यान दिया। उन्होंने पशुओं की जंगल में मुक्त चराई बंद करवाई। क्योंकि इसका पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा था। उन्होंने किसानों को प्रोत्साहित किया कि वे चारे का उत्पादन बढ़ाएं। चारे का उत्पादन बढ़ा तो पशुओं की संख्या भी बढ़ी और धीरे-धीरे दुग्ध उत्पादन भी। 1990 में गांव में दुग्ध उत्पादन का आंकड़ा डेढ़ सौ लीटर प्रतिदिन था। आज यह चार हजार लीटर रोज पर पहुंच गया है। 1995 में गांव के 182 परिवारों में से 168 लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। आज सरकारी रिकॉर्ड यह संख्या तीन बताते हैं। पवार कहते हैं, 'गांव को बीपीएल फ्री बनाने के लिए हमें बस एक साल और चाहिए।'

तो आश्चर्य क्या कि देश के दूसरे गाँवों में जहां लोग पलायन करके शहर जा रहे हैं वहीं हिवड़े बाजार में उल्टी बल्कि कहा जाए तो सीधी गंगा बहने लगी है। 1997 से लेकर आज तक 93 परिवार अलग-अलग शहरों से गांव वापस लौट चुके हैं। इस उल्टे पलायन ने उन्हें सुखी बनाया है। चर्चित पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते हैं, 'पलायन इसलिए हो कि अपने यहां कुछ नहीं बचा और इसलिए पेट पालने के लिए दिल्ली, मुंबई या जयपुर चले जाते हैं तो यह उस व्यक्ति और मिट्टी दोनों का अपमान है। हिवड़े बाजार ने इस अपमान का कलंक अपने माथे से हटा दिया है।' यह खुशहाली आगे भी चलती रहे इसके लिए भी बीज बोए गए हैं। यहां प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए जल प्रबंधन का अनिवार्य कोर्स रखा गया है। पानी जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न हो इसके लिए जल बजट बनाया जाता है। कितना पानी उपलब्ध है इसके लिए हर महीने रीडिंग ली जाती है। वॉटरशेड कमेटी के साथ काम करने वाले शिवाजी थांगे कहते हैं, 'वॉटर ऑडिट के जरिए फैसला किया जाता है कि किस मौसम में कौन-सी फसल बोनी है।'

अच्छी चीजें कई मोर्चों पर आई हैं। ग्राम पंचायत ने अब फैसला किया है कि परिवार की दूसरी लड़की की शिक्षा और शादी का खर्च पूरा गांव उठाएगा। सात सदस्यों वाली पंचायत में तीन महिलाएं हैं। सुनीता शंकर इस साल सरपंच बनी हैं और पवार ने उपसरपंच की ज़िम्मेदारी संभाली है। गांव में दहेज नहीं लिया जाता। किसी भी तरह का नशा बंद है। गांव का स्कूल एक वक्त सिर्फ नाम के लिए रह गया था। आज यह अच्छे से चल रहा है। यहां बच्चों की एक संसद है जो इस पर निगाह रखती है कि शिक्षक नियमित रूप से आ रहे हैं या नहीं और यह भी कि छात्रों की क्या शिकायतें हैं। ग्राम संसद भी है जहां सब लोग मिल बैठकर चर्चा करते हैं। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ने का सिलसिला भी मजबूत हुआ है। गांव के 32 विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। गांव में सिर्फ एक मुस्लिम परिवार है। उसके लिए कोई मस्जिद नहीं थी तो गाँववालों ने खुद एक मस्जिद बना दी। परिवार के मुखिया बनाभाई सैयद अपने परिवार के साथ हिंदू त्योहारों में भी शामिल होते हैं और भजन गाते हैं।

भविष्य की सोचने में भी हिवड़े बाजार आगे रहा है। 2008 में ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पारित किया। इसके मुताबिक गांव के भीतर कार की जगह साइकिल के इस्तेमाल को कहा गया ताकि ईंधन की बचत हो सके। 17 किलोमीटर दूर अहमदनगर जाना हो तो गांव के लोग कारपूल कर लेते हैं। पवार अब सौर ऊर्जा के इस्तेमाल की सोच रहे हैं। वे यह भी चाहते हैं कि गांव में पूरी तरह से जैविक खाद का इस्तेमाल हो। वे कहते हैं, 'हालांकि अभी भी सिर्फ 20 फीसदी ही रासायनिक खाद का इस्तेमाल होता है। इसके बाद हम जैविक उत्पादों का अपना मार्केट बनाएंगे।' युवा शक्ति से छह लाख गाँवों या कहें तो देश की तस्वीर कैसे बदल सकती है, हिवड़े बाजार इसका सबक है।

Submitted by admin on Thu, 08/29/2013 - 11:53
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आपदा के बाद पुनः निर्माण से पहाड़ बचाए जाएं।
जहाँ उत्तराखंड की सरकार आपदा के बाद पुनःनिर्माण की योजना बना रही है वहीं आपदाग्रस्त क्षेत्रों में इन दिनों पलायन की भी चर्चा जोरों पर है। सरकार को सावधानी से इससे निपटने के सुझाव दे रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई की एक रिपोर्ट-

चर्चा गहरी हो गई है कि यहाँ से कहीं दूसरी जगह ही पलायन हो। इससे सावधान रहने के लिए वर्तमान में राज्य को कठिन प्रतिज्ञा करनी चाहिए। राज्य सरकार ने यह निर्णय लेकर कि नदियों के किनारे कोई निर्माण नहीं होगा, इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सका है। क्या इसका अर्थ इस नाम पर लिया जाय कि नदियों के किनारों की दूर तक की आबादी को खाली करवाना है, या नदियों के किनारों को सुदृढ़ ही नहीं करना है। यदि ऐसा है तो जो नदियों के किनारों की आबादी है वह भविष्य में अधिक खतरे की जद में आने वाली है। ऐसी स्थिति पैदा करने से पलायन बढ़ेगा। गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा जैसी पवित्र नदियों के संगम व इनके तटों पर निवास करने वाले लोग कभी बड़े भाग्यशाली माने जाते थे। इसमें ऐसी भी कहावत है कि इन नदियों के तटों पर जो एक रात्रि भी विश्राम करे, वह पुण्य का भागीदार माना जाता है। लेकिन अब स्थिति भिन्न होती नजर आ रही है। नदियों के पास रहने वाले समाज को अनुभव हो रहा है कि उनके आने वाले दिन संकट में गुजरेंगे। हर बरसात में औसत दो गांव और दो ऐसी आबादी वाले क्षेत्र तबाह होते नजर आ रहे हैं, जहाँ पर लोग तीर्थ स्थलों तक पहुँचने से पहले चाय, पानी पीकर विश्राम लेते थे। बरसात में पहाड़ी राज्यों में खासकर उत्तराखंड़, हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी लोगों को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन असुरक्षित नजर आ रही है। आखिर ऐसा पिछले वर्षों में क्या हो गया कि लोग अकस्मात पहाड़ी क्षेत्रों में अब अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।
Submitted by admin on Fri, 08/23/2013 - 16:48
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तहलका, अगस्त 2013
महाराष्ट्र के मेंढा गांव का उदाहरण बताता है कि स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ आजीविका का अवसर मिले तो नक्सलवाद से जूझते इलाकों में खुशहाली का नया अध्याय शुरू हो सकता है..

देवाजी टोफा वह शख्स हैं जिन्होंने अधिकारों के लिए इस क्रांति की अलख जगाई थी। अंग्रेजों ने 1927 में भारतीय वन अधिनियम बनाकर एक तरह से जंगल पर निर्भर समाज को उससे बेदखल कर दिया था। 2006 में केंद्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून पास करने के साथ ही यह अधिकार एक बार फिर से बहाल हुआ। लेकिन हक की यह बहाली सिर्फ फाइलों में हुई थी। वन विभाग के अधिकारियों ने मेंढावासियों को उनका हक देने की राह में जमकर रोड़े अटकाए, मेंढा के पास बांस का अकूत भंडार था। इसके अलावा उसके 1,800 हेक्टेयर के जंगलों में चिरौंजी, महुआ, तेंदू पत्ता, हर्र, बरड़ आदि भी खूब होते हैं। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली की सबसे बड़ी पहचान फिलहाल यही है कि यह नक्सल प्रभावित जिला है। आदिवासी और जंगल की बहुलता वाले इस जिले की धनौरा तहसील में एक गांव है मेंढा। मेंढा और लेखा नाम के दो टोलों का यह गांव देखने में कहीं से भी विशेष नहीं लगता। लेकिन अपनी करनी से इसने वह मिसाल कायम की है जिसमें नक्सलवाद से जूझते देश के कई इलाकों में खुशहाली का एक नया अध्याय कैसे शुरू हो, इसका संकेत छिपा है। मेंढा के नाम दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं। यह देश का पहला गांव है जिसने सामुदायिक वनाधिकार हासिल किया और जिसकी ग्राम सभा को ट्रांजिट परमिट (टीपी) रखने का अधिकार मिला। इस अधिकार ने गांववालों को अपने जंगल का बांस अपनी मर्जी से बेचने की आजादी दी है। इससे वे न सिर्फ स्वाभिमान के साथ आजीविका कमा रहे हैं बल्कि वनों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहे हैं।

सबल, स्वावलंबी, अपने हित के फैसले खुद ले सकने वाला और स्वाभिमानी, महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की यही आत्मा थी। लेकिन विकास की आधुनिक परिभाषा में गांधी और उनके सिद्धांत पीछे छूटते गए।

प्रयास

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/18/2020 - 05:54
सिंचाई-तालाब ही कृषिजल का समाधान, प्रतीकात्मक फोटो: Needpix.com
तालाब हेतु खोदी हुई मिट्टी का उपयोग श्री चौधरी के खेतों में बने निचले, असमतल क्षेत्रों में भरकर उन्हें एक समतल-आकार देने का प्रयास किया गया। साथ ही अन्य मिट्टी का उपयोग खेतों की पहुंच सड़कों ठीक करने में लिया गया। कड़ी मेहनत के बाद मई माह में तालाब निर्मित हुआ और उसका आकार 1 हेक्टेयर में होकर उसमें लगभग 80000 घन मीटर पानी का संग्रहण किया जा सकता था। चूँकि इस तालाब में प्राकृतिक निकास मार्ग (जो कि मुख्य राजमार्ग से लगा हुआ था) से जल का प्रवेश तालाब में कराया गया था, इस कारण अतिरिक्त निकास द्वार न बनाकर ऐसा प्रयास किया गया कि तालाब भरने के उपरान्त पुनः जल अपवाह अपने प्राकृतिक निकास मार्ग से आगे चला जाए।

नोटिस बोर्ड

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 15:04
Source:
वेबिनारः कोरोनार संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 
कोरोना संकट और लॉकडाउन को हिमालय क्षेत्र के परिप्रेक्ष में समझने के लिए 21 मई, गुरुवार 4 बजे हमारे पेज Endangered Himalaya में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के साथ लाइव बातचीत में जुड़ें।  आप Zoom में https://bit.ly/2zmjhHs लिंक में पंजीकरण करके भी जुड़ सकते हैं। इसका आयोजन हिम धारा और रिवाइटललाइज़िग रेनफेड एग्रीकल्चर द्वारा किया जा रहा है।
Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 14:52
Source:
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ विषय पर सहगल फाउंडेशन और सीएडब्ल्यूएसटी ऑनलाइन वर्कशाप का आयोजन करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य वाॅश के प्रति लोगों को जागरुक करना और प्रेरित करना है। ये वेबिनार निन्मलिखित विषयों से संबंधित रहेगा - 
Submitted by UrbanWater on Wed, 05/13/2020 - 11:11
Source:
पंकज मालवीय अक्षधा फाउंडेशन
पानी रे पानी
विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून 2020

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि |
प्रविष्टि रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि – 30 मई 2020
ई-प्रतियोगिता की तिथि – 5 जून 2020,
समय 10 बजे प्रात: से 4 बजे तक

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खासम-खास

नदी चेतना यात्रा : राज से सम्वाद के लिए होमवर्क करता समाज 

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/25/2020 - 09:08
Author
कृष्ण गोपाल व्यास
nadi-chetna-yatra-bihar-nadiyan
नदी चेतना यात्रा : बिहार में राज-समाज की कोशिश से नदियों को जिंदा करने की कवायद, फोटो: Needpix.com
पिछले तीन दिनों (22 जून से 24 जून) से बिहार में बीस-पच्चीस संवेदनशील लोग नदी चेतना यात्रा के लिए होमवर्क कर रहे हैं। यह समूह रोज सबेरे 8.30 बजे मोबाईल पर एक दूसरे से कनेक्ट होता है और डिजिटल सम्वाद के तरीके से प्रातः लगभग नौ बजे तक होमवर्क करता है। होमवर्क का लक्ष्य है, चेतना यात्रा को प्रभावी बनाना। चयनित नदियों की समस्याओं के कारणों को पहचाना और कछार में निवास करने वाले समाज की मदद से समाज सम्मत हल तलाशना और जन अपेक्षाओं को मूर्त स्वरुप प्रदान करने के लिए राज से सम्वाद करना।

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युवाबल से युगपरिवर्तन

Submitted by admin on Fri, 08/30/2013 - 10:07
Author
तहलका
Source
तहलका, अगस्त 2013
Hiware Bazar
हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीब से बने गुलाबी मकान दिखेंगे। साफ और चौड़ी सड़कें भी। नालियां बंद हैं और जगह-जगह कूड़ेदान लगे हैं। हर जगह एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होते हैं। शराब और तंबाकू के लिए अब गांव में कोई जगह नहीं रही। हर घर में पक्का शौचालय है। खेतों में मकई, ज्वार, बाजरा, प्याज और आलू की फसलें लहलहा रही हैं। सूखे से जूझते किसी इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं। 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं। ताराबाई मारुति कभी दिहाड़ी मजदूर थीं। आज उनके पास 17 गायें हैं और वे ढाई सौ से तीन सौ लीटर दूध रोज बेचती हैं। वे बताती हैं, 'पहले मजदूरी करते थे। पांच-दस रुपये रोज मिलते थे तो खाना मिलता था। आज आमदनी बढ़ गई है।' हिवड़े बाजार नाम के जिस गांव में ताराबाई रहती हैं वहां के ज्यादातर लोगों का अतीत कभी उनके जैसा ही था। वर्तमान भी उनके जैसा ही है। आज राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रों में जिस युवा शक्ति को अवसर देने की बात हो रही है वह युवा शक्ति कैसे समाज की तस्वीर बदल सकती है, इसका उदाहरण है हिवड़े बाजार। दो दशक पहले तक महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसे इस गांव की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजदूरी करने आस-पास के शहरों में चला जाता था। यानी उन साढ़े छह करोड़ लोगों में शामिल हो जाता था जो 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 4000 शहरों और कस्बों में नारकीय हालात में जी रहे हैं। बहुत-से परिवार ऐसे भी थे जो पुणे या मुंबई जैसे शहरों में ही बस गए थे। जो गांव में बचे थे उनके लिए भी हालात विकट थे। ज़मीन पथरीली थी। बारिश काफी कम होती थी। सूखा सिर पर सवार रहता था। 90 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे। शराब का बोलबाला था। झगड़ा, मार-पिटाई आम बात थी। मोहन छत्तर बताते हैं, ‘कॉलेज में पढ़ते थे तो बताने में शर्म आती थी कि हम हिवड़े बाजार के हैं।’

लेकिन आज शर्म की जगह गर्व ने ले ली है। हिवड़े बाजार आज अपनी खुशहाली के लिए देश और दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है। पलायन तो रुक ही गया है, जो लोग हमेशा के लिए शहर चले गए थे वे भी वापस आकर गांव में बसने लगे हैं। आज गांव की प्रति व्यक्ति आय औसतन 30 हजार रु सालाना है। 1995 में यह महज 830 रु थी। गांव के उपसरपंच पोपट राव पवार कहते हैं, 'तब ज्वार-बाजरा भी मुश्किल से होता था। आज हम हर साल एक करोड़ रुपये की नगदी फसल उगाते हैं। डेयरी का काम भी फैला है। गांव में रोज 4000 लीटर दूध का कलेक्शन हो रहा है।'

हिवड़े बाजार जाने पर आपको तरतीब से बने गुलाबी मकान दिखेंगे। साफ और चौड़ी सड़कें भी। नालियां बंद हैं और जगह-जगह कूड़ेदान लगे हैं। हर जगह एक अनुशासित व्यवस्था के दर्शन होते हैं। शराब और तंबाकू के लिए अब गांव में कोई जगह नहीं रही। हर घर में पक्का शौचालय है। खेतों में मकई, ज्वार, बाजरा, प्याज और आलू की फसलें लहलहा रही हैं। सूखे से जूझते किसी इलाके में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं। 235 परिवारों और 1,250 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 60 करोड़पति हैं। महात्मा गांधी ने कहा था, 'सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए 20 लोग नहीं चला सकते। वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।' हिवड़े बाजार ने यही कर दिखाया है। युवा शक्ति कैसे ग्राम स्वराज ला सकती है यह सिखाता है हिवड़े बाजार। 85 साल के रावसाहेब राऊजी पवार याद करते हैं, 'हमारे गांव में गरीबी थी। हालांकि हम अपनी सीधी-सादी जिंदगी से खुश थे। लेकिन 1972 के अकाल ने हमारे गांव की शांति छीन ली। ज़मीन पथरीली थी। पानी न होने से हालात और खराब हो गए। वह सामाजिक ताना-बाना बिखर गया जो गरीबी के बावजूद लोगों को एक रखता था। लोग शराब के चक्कर में पड़ गए। जरा-सी बात पर झगड़ा हो जाता। जिंदगी चलाना मुश्किल हो गया सो गांव के कई लोग मजदूरी करने पास के शहरों में जाने लगे।'

फिर एक दिन गांव के कुछ नौजवानों ने सोचा कि क्यों न हालात बदलने की एक कोशिश की जाए। किसी ऐसे युवा को सरपंच बनाकर देखा जाए जो एक जोश और नई सोच लेकर आए। पोपटराव पवार तब हिवड़े बाजार के अकेले युवा थे जो पोस्ट ग्रेजुएट थे। नौजवानों ने उनसे आग्रह किया कि वे सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ें। यह 1989 की बात है। लेकिन पवार का परिवार यह मानने को तैयार नहीं था। उनके घरवाले चाहते थे कि वे शहर जाएं और कोई अच्छी नौकरी करें। पवार क्रिकेट के खिलाड़ी थे और वे इस खेल में करियर बनाना चाहते थे। लेकिन नौजवानों के बहुत आग्रह पर वे चुनाव लड़ने के लिए राजी हो गए। पहले तो बुजुर्गों का रवैया कुछ ऐसा रहा कि कल के लड़के हैं, ये क्या करेंगे। लेकिन फिर सहमति बनी कि चलो एक साल इन्हें भी देख लेते हैं। सरपंच पद पर पवार का चयन निर्विरोध हुआ। फिर शुरू हुआ बदलाव। पवार ने गांववालों से कहा कि अपना विकास उन्हें खुद करना होगा। गांव में शराब की 22 भट्टियां थीं। फसाद की यह जड़ खत्म की गई। पवार की कोशिशों से ग्राम सभा का बैंक ऑफ महाराष्ट्र के साथ तालमेल हुआ जिसने गरीब परिवारों को कर्ज देना शुरू किया। इनमें वे परिवार भी शामिल थे जो पहले शराब बना रहे थे। 71 साल के लक्ष्मण पवार कहते हैं, 'पानी की कमी ने खेत बंजर कर दिए थे। हताश होकर लोगों ने शराब पीना, जुआ खेलना, लड़ना-झगड़ना शुरू कर दिया। शराब ने हमें बर्बाद कर दिया था, इसलिए जब भट्टियां बंद हुईं तो हमें लगा कि कुछ उम्मीद है।'

फिर पानी सहेजने और बरतने की व्यवस्था बनाने का काम शुरू हुआ। पवार का मंत्र था कि यह सबका काम है इसलिए सबको इसमें जुटना होगा। जल्द ही गांव में चेक डैमों और तालाबों का जाल बिछ गया। पवार कहते हैं, 'हमने सरकारी योजनाओं के पैसे का सही इस्तेमाल किया। लोगों ने खुद मेहनत की तो इसके दो फायदे हुए--मजदूरी बची और काम की क्वालिटी भी बढ़िया हुई और हम भी तो यह सब अपने और अपने बच्चों के लिए ही कर रहे थे।' मकसद यह था कि बरसने वाले पानी की एक-एक बूंद सहेजी जाए। हिवड़े बाजार जिस भौगोलिक क्षेत्र में है उसे वृष्टि छाया क्षेत्र यानी रेन शैडो जोन कहा जाता है। यहां साल भर में 15 इंच से ज्यादा बरसात नहीं होती। तालाब बने तो बारिश का पानी ठहरा। धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी। 1995 से पहले गांव में 90 खुले कुएं थे और पानी का स्तर 80-125 फुट नीचे था। आज गांव में 294 खुले कुएं हैं और पानी का स्तर 15-40 फुट तक आ गया है। इसी अहमदनगर जिले में दूसरे गाँवों को पानी के लिए 200 फुट तक बोरिंग करनी पड़ती है। गांव के ही हबीब सैयद बताते हैं, '2010 में 190 मिमी ही बारिश हुई लेकिन पानी की व्यवस्था होने से हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।'

पानी आया तो खुशहाली आने में ज्यादा देर नहीं लगी। पहले मानसून के बाद ही गांव में सिंचित क्षेत्र 20 हेक्टेयर से 70 हेक्टेयर हो गया। जहां ज्वार-बाजरा उगना भी मुश्किल था वहां कई फसलें होने लगीं। किसानी बढ़ी तो काम भी बढ़ा। मजदूरी महंगी थी तो पवार ने एक तरीका निकाला। उन्होंने सामूहिकता पर जोर देना शुरू किया। एक किसान की बुआई में पूरे गांव के लोग शामिल हो जाते। फिर मज़दूरों की क्या जरूरत। मजदूरी तो बची ही, आपसदारी की भावना भी मजबूत हुई। पवार कहते हैं, 'बदलाव पैसे से नहीं आया। यह आया क्योंकि लोग जाति और राजनीति की तमाम दीवारें तोड़कर एक साझा मकसद के लिए साथ आए।' हिवरे बाजारखेती के बाद पवार ने आजीविका के लिए एक और स्रोत पर ध्यान दिया। उन्होंने पशुओं की जंगल में मुक्त चराई बंद करवाई। क्योंकि इसका पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा था। उन्होंने किसानों को प्रोत्साहित किया कि वे चारे का उत्पादन बढ़ाएं। चारे का उत्पादन बढ़ा तो पशुओं की संख्या भी बढ़ी और धीरे-धीरे दुग्ध उत्पादन भी। 1990 में गांव में दुग्ध उत्पादन का आंकड़ा डेढ़ सौ लीटर प्रतिदिन था। आज यह चार हजार लीटर रोज पर पहुंच गया है। 1995 में गांव के 182 परिवारों में से 168 लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। आज सरकारी रिकॉर्ड यह संख्या तीन बताते हैं। पवार कहते हैं, 'गांव को बीपीएल फ्री बनाने के लिए हमें बस एक साल और चाहिए।'

तो आश्चर्य क्या कि देश के दूसरे गाँवों में जहां लोग पलायन करके शहर जा रहे हैं वहीं हिवड़े बाजार में उल्टी बल्कि कहा जाए तो सीधी गंगा बहने लगी है। 1997 से लेकर आज तक 93 परिवार अलग-अलग शहरों से गांव वापस लौट चुके हैं। इस उल्टे पलायन ने उन्हें सुखी बनाया है। चर्चित पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते हैं, 'पलायन इसलिए हो कि अपने यहां कुछ नहीं बचा और इसलिए पेट पालने के लिए दिल्ली, मुंबई या जयपुर चले जाते हैं तो यह उस व्यक्ति और मिट्टी दोनों का अपमान है। हिवड़े बाजार ने इस अपमान का कलंक अपने माथे से हटा दिया है।' यह खुशहाली आगे भी चलती रहे इसके लिए भी बीज बोए गए हैं। यहां प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए जल प्रबंधन का अनिवार्य कोर्स रखा गया है। पानी जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न हो इसके लिए जल बजट बनाया जाता है। कितना पानी उपलब्ध है इसके लिए हर महीने रीडिंग ली जाती है। वॉटरशेड कमेटी के साथ काम करने वाले शिवाजी थांगे कहते हैं, 'वॉटर ऑडिट के जरिए फैसला किया जाता है कि किस मौसम में कौन-सी फसल बोनी है।'

अच्छी चीजें कई मोर्चों पर आई हैं। ग्राम पंचायत ने अब फैसला किया है कि परिवार की दूसरी लड़की की शिक्षा और शादी का खर्च पूरा गांव उठाएगा। सात सदस्यों वाली पंचायत में तीन महिलाएं हैं। सुनीता शंकर इस साल सरपंच बनी हैं और पवार ने उपसरपंच की ज़िम्मेदारी संभाली है। गांव में दहेज नहीं लिया जाता। किसी भी तरह का नशा बंद है। गांव का स्कूल एक वक्त सिर्फ नाम के लिए रह गया था। आज यह अच्छे से चल रहा है। यहां बच्चों की एक संसद है जो इस पर निगाह रखती है कि शिक्षक नियमित रूप से आ रहे हैं या नहीं और यह भी कि छात्रों की क्या शिकायतें हैं। ग्राम संसद भी है जहां सब लोग मिल बैठकर चर्चा करते हैं। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ने का सिलसिला भी मजबूत हुआ है। गांव के 32 विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। गांव में सिर्फ एक मुस्लिम परिवार है। उसके लिए कोई मस्जिद नहीं थी तो गाँववालों ने खुद एक मस्जिद बना दी। परिवार के मुखिया बनाभाई सैयद अपने परिवार के साथ हिंदू त्योहारों में भी शामिल होते हैं और भजन गाते हैं।

भविष्य की सोचने में भी हिवड़े बाजार आगे रहा है। 2008 में ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पारित किया। इसके मुताबिक गांव के भीतर कार की जगह साइकिल के इस्तेमाल को कहा गया ताकि ईंधन की बचत हो सके। 17 किलोमीटर दूर अहमदनगर जाना हो तो गांव के लोग कारपूल कर लेते हैं। पवार अब सौर ऊर्जा के इस्तेमाल की सोच रहे हैं। वे यह भी चाहते हैं कि गांव में पूरी तरह से जैविक खाद का इस्तेमाल हो। वे कहते हैं, 'हालांकि अभी भी सिर्फ 20 फीसदी ही रासायनिक खाद का इस्तेमाल होता है। इसके बाद हम जैविक उत्पादों का अपना मार्केट बनाएंगे।' युवा शक्ति से छह लाख गाँवों या कहें तो देश की तस्वीर कैसे बदल सकती है, हिवड़े बाजार इसका सबक है।

आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पलायन

Submitted by admin on Thu, 08/29/2013 - 11:53
Author
सुरेश भाई

आपदा के बाद पुनः निर्माण से पहाड़ बचाए जाएं।


जहाँ उत्तराखंड की सरकार आपदा के बाद पुनःनिर्माण की योजना बना रही है वहीं आपदाग्रस्त क्षेत्रों में इन दिनों पलायन की भी चर्चा जोरों पर है। सरकार को सावधानी से इससे निपटने के सुझाव दे रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई की एक रिपोर्ट-

चर्चा गहरी हो गई है कि यहाँ से कहीं दूसरी जगह ही पलायन हो। इससे सावधान रहने के लिए वर्तमान में राज्य को कठिन प्रतिज्ञा करनी चाहिए। राज्य सरकार ने यह निर्णय लेकर कि नदियों के किनारे कोई निर्माण नहीं होगा, इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सका है। क्या इसका अर्थ इस नाम पर लिया जाय कि नदियों के किनारों की दूर तक की आबादी को खाली करवाना है, या नदियों के किनारों को सुदृढ़ ही नहीं करना है। यदि ऐसा है तो जो नदियों के किनारों की आबादी है वह भविष्य में अधिक खतरे की जद में आने वाली है। ऐसी स्थिति पैदा करने से पलायन बढ़ेगा। गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा जैसी पवित्र नदियों के संगम व इनके तटों पर निवास करने वाले लोग कभी बड़े भाग्यशाली माने जाते थे। इसमें ऐसी भी कहावत है कि इन नदियों के तटों पर जो एक रात्रि भी विश्राम करे, वह पुण्य का भागीदार माना जाता है। लेकिन अब स्थिति भिन्न होती नजर आ रही है। नदियों के पास रहने वाले समाज को अनुभव हो रहा है कि उनके आने वाले दिन संकट में गुजरेंगे। हर बरसात में औसत दो गांव और दो ऐसी आबादी वाले क्षेत्र तबाह होते नजर आ रहे हैं, जहाँ पर लोग तीर्थ स्थलों तक पहुँचने से पहले चाय, पानी पीकर विश्राम लेते थे। बरसात में पहाड़ी राज्यों में खासकर उत्तराखंड़, हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी लोगों को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन असुरक्षित नजर आ रही है। आखिर ऐसा पिछले वर्षों में क्या हो गया कि लोग अकस्मात पहाड़ी क्षेत्रों में अब अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।

‘हमारे गांव में हम ही सरकार’

Submitted by admin on Fri, 08/23/2013 - 16:48
Author
अतुल चौरसिया
Source
तहलका, अगस्त 2013
महाराष्ट्र के मेंढा गांव का उदाहरण बताता है कि स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ आजीविका का अवसर मिले तो नक्सलवाद से जूझते इलाकों में खुशहाली का नया अध्याय शुरू हो सकता है..

देवाजी टोफा वह शख्स हैं जिन्होंने अधिकारों के लिए इस क्रांति की अलख जगाई थी। अंग्रेजों ने 1927 में भारतीय वन अधिनियम बनाकर एक तरह से जंगल पर निर्भर समाज को उससे बेदखल कर दिया था। 2006 में केंद्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून पास करने के साथ ही यह अधिकार एक बार फिर से बहाल हुआ। लेकिन हक की यह बहाली सिर्फ फाइलों में हुई थी। वन विभाग के अधिकारियों ने मेंढावासियों को उनका हक देने की राह में जमकर रोड़े अटकाए, मेंढा के पास बांस का अकूत भंडार था। इसके अलावा उसके 1,800 हेक्टेयर के जंगलों में चिरौंजी, महुआ, तेंदू पत्ता, हर्र, बरड़ आदि भी खूब होते हैं। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली की सबसे बड़ी पहचान फिलहाल यही है कि यह नक्सल प्रभावित जिला है। आदिवासी और जंगल की बहुलता वाले इस जिले की धनौरा तहसील में एक गांव है मेंढा। मेंढा और लेखा नाम के दो टोलों का यह गांव देखने में कहीं से भी विशेष नहीं लगता। लेकिन अपनी करनी से इसने वह मिसाल कायम की है जिसमें नक्सलवाद से जूझते देश के कई इलाकों में खुशहाली का एक नया अध्याय कैसे शुरू हो, इसका संकेत छिपा है। मेंढा के नाम दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं। यह देश का पहला गांव है जिसने सामुदायिक वनाधिकार हासिल किया और जिसकी ग्राम सभा को ट्रांजिट परमिट (टीपी) रखने का अधिकार मिला। इस अधिकार ने गांववालों को अपने जंगल का बांस अपनी मर्जी से बेचने की आजादी दी है। इससे वे न सिर्फ स्वाभिमान के साथ आजीविका कमा रहे हैं बल्कि वनों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहे हैं।

सबल, स्वावलंबी, अपने हित के फैसले खुद ले सकने वाला और स्वाभिमानी, महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की यही आत्मा थी। लेकिन विकास की आधुनिक परिभाषा में गांधी और उनके सिद्धांत पीछे छूटते गए।

प्रयास

जल संग्रहण तालाब के निर्माण से भरपूर उत्पादन - एक सफल गाथा 

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/18/2020 - 05:54
jal-sangrahan-talab-tal
Source
जल चेतना, खण्ड 7, अंक 2, जुलाई 2018, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की-247667
सिंचाई-तालाब ही कृषिजल का समाधान, प्रतीकात्मक फोटो: Needpix.com
तालाब हेतु खोदी हुई मिट्टी का उपयोग श्री चौधरी के खेतों में बने निचले, असमतल क्षेत्रों में भरकर उन्हें एक समतल-आकार देने का प्रयास किया गया। साथ ही अन्य मिट्टी का उपयोग खेतों की पहुंच सड़कों ठीक करने में लिया गया। कड़ी मेहनत के बाद मई माह में तालाब निर्मित हुआ और उसका आकार 1 हेक्टेयर में होकर उसमें लगभग 80000 घन मीटर पानी का संग्रहण किया जा सकता था। चूँकि इस तालाब में प्राकृतिक निकास मार्ग (जो कि मुख्य राजमार्ग से लगा हुआ था) से जल का प्रवेश तालाब में कराया गया था, इस कारण अतिरिक्त निकास द्वार न बनाकर ऐसा प्रयास किया गया कि तालाब भरने के उपरान्त पुनः जल अपवाह अपने प्राकृतिक निकास मार्ग से आगे चला जाए।

नोटिस बोर्ड

वेबिनारः कोरोना संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 15:04
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वेबिनारः कोरोनार संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 
कोरोना संकट और लॉकडाउन को हिमालय क्षेत्र के परिप्रेक्ष में समझने के लिए 21 मई, गुरुवार 4 बजे हमारे पेज Endangered Himalaya में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के साथ लाइव बातचीत में जुड़ें।  आप Zoom में https://bit.ly/2zmjhHs लिंक में पंजीकरण करके भी जुड़ सकते हैं। इसका आयोजन हिम धारा और रिवाइटललाइज़िग रेनफेड एग्रीकल्चर द्वारा किया जा रहा है।

‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 14:52
WASH-for-healthy-homes-india
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ विषय पर सहगल फाउंडेशन और सीएडब्ल्यूएसटी ऑनलाइन वर्कशाप का आयोजन करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य वाॅश के प्रति लोगों को जागरुक करना और प्रेरित करना है। ये वेबिनार निन्मलिखित विषयों से संबंधित रहेगा - 

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि

Submitted by UrbanWater on Wed, 05/13/2020 - 11:11
participateepaintingwinaward
Source
पंकज मालवीय अक्षधा फाउंडेशन
पानी रे पानी
विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून 2020

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि |
प्रविष्टि रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि – 30 मई 2020
ई-प्रतियोगिता की तिथि – 5 जून 2020,
समय 10 बजे प्रात: से 4 बजे तक

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