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Submitted by UrbanWater on Fri, 06/05/2020 - 07:47
नदियाँ समाज का आइना होती हैं। फोटो - NeedPix.com
इन दिनों बिहार राज्य में पानी और जंगल के लिए पानी रे पानी अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के अंतर्गत 5 जून से 27 सितम्बर 2020 के बीच नदी चेतना यात्रा निकाली जावेगी। इस यात्रा का शुभारंभ एक जून 2020 अर्थात गंगा दशहरा के दिन कमला नदी के तट पर जनकपुर में हो चुका है।

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Submitted by Hindi on Fri, 07/13/2012 - 16:53
Source:
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2012
Pesticide spraying

वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

रासायनिक खेती, नदियों और भूजल स्तर जैसे पर्यावरणीय विषयों पर लिखना किसी अंधेरे में चीख की तरह लगता है। टी.वी. और समाचारपत्रों में बढ़ता तापमान प्रतिदिन हेडलाइन्स बनता है। उसके साथ ही पंखों, कूलरों और एयरकंडीशनर के विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं और उनकी बिक्री भी। परन्तु ओजोन-परत और घटता वन क्षेत्र हमारी चिन्ता का विषय नहीं बनता। शहरों और गांवों में नित नई खुलती दवाई की दुकानें अब हमें नहीं डरातीं। सिने अभिनेता आमिर खान ने 24 जून के ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम में रासायनिक खेती के ‘अभिशापों’ और जैविक खेती के ‘वरदानों’ को देश के सम्मुख रखा। लेकिन अभी तक समाज और सरकार की ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है कि कोई रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से चितिंत हो। पंजाब को आधुनिक कृषि का मॉडल मानकर उसका अनुकरण करने से पूरे देश में भी रासायनिक और यांत्रिक खेती के दोष फैल गए हैं। किसी भी राज्य के आन्तरिक, आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक चरित्र को समझे बिना उसका अनुगमन करना खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुओं और ताकत की दवाईयों की तरह पंजाब की खेती भी एक झूठा विज्ञापन है। पंजाब में व्यास नदी के ऊपर का क्षेत्र जो पाकिस्तान की सीमा के पास है मांझा कहलाता है। व्यास नदी और सतलुज नदी के बीच का क्षेत्र दोआब कहलाता है। पंजाब के दक्षिण-पश्चिम का क्षेत्र मलवा या मालवा कहलाता है। यहां के फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तसर, बठिंडा, मांसा और संगरुर जिले रासायनिक खेती और प्रदूषित जल से सर्वाधिक प्रभावित हैं। अब यह रोग पटियाला और अमृतसर की ओर फैल रहा है। वैसे पूरा पंजाब ही रसायनों से अटा पड़ा है।

गठन के समय पंजाब में 12 जिले थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 22 हो गई है। दोआब क्षेत्र में विदेशों में रहने वाले भारतीयों (एनआरआई) की संख्या सबसे अधिक है और यहीं रसायनों और कीटनाशकों के उपयोग को सर्वाधिक प्रोत्साहन भी मिला है। एनआरआई द्वारा विदेशों से भेजे गये धन से आई समृद्धि को भी पंजाब में खेती से आयी समृद्धि समझने की भूल भी होती है। यहां ठेके पर खेती की नई परम्परा में बड़े किसान छोटे-छोटे किसानों की जमीन ठेके पर लेते हैं खेती की बढ़ती लागत भी इसके लिए जिम्मेदार है। जमीन के मालिक अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को बाध्य हैं। एक आश्चर्यजनक सत्य ही जानकारी हुई कि यहां जानबूझकर आलू की फसल बड़े पैमाने पर लेकर इसके दाम गिरा दिये जाते हैं। आलू से नकली ग्रीस बनाने का धंधा बड़े पैमाने पर होता है। आलूओं को गलाकर उसमें मोबिल-आईल के मिश्रण से नकली ग्रीस बनता है। मैं अभी पंजाब की यात्रा पर था। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों का नया स्वरूप देखकर दुख ही होता है। यहां ग्रामीण क्षेत्रों में मुश्किल से 2 घंटे खेतों को बिजली उपलब्ध होती है।

मेरी यात्रा तीन रिश्तेदारों की मृत्यु से होने वाले भोगों और अंतिम-अरदास से जुड़ी थी। इनमें दो की मृत्यु खेती के पर्यावरणीय खतरों से घटित हुई थी। बरनाला शहर में एक लोकप्रिय शिक्षिका रिश्तेदार की मृत्यु कैंसर से हुई थी। बरनाला शहर में ठाठ गुरुद्वारे में 18 जून को सम्पन्न अंतिम अरदास में पंजाब और हरियाणा के अकाली, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, स्थानीय दलों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ लेखक संघ के प्रतिनिधि भी श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित थे। प्रारंभ में ही श्रद्धांजलि सभा के तेज तर्रार संचालक ने रासायनिक खेती और जल प्रदूषण से होने वाली मौतों का विवरण दिया। कार्यक्रम के संचालक ने कहा ‘‘हम इसी तरह हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी की कैंसर से हुई मृत्यु पर एकत्रित होते है। हम स्वर्गवासी को श्रद्धांजलि देकर अपने-अपने घर चले आते हैं, पर खेती और पानी के प्रदूषण पर चर्चा भी नहीं करते हैं।’’

इसके बाद अकाली दल के एक क्षेत्रीय बडे़ नेता ने अपने उद्बोधन में डपटते हुए कहा ‘‘यह अवसर ‘राजनीति’ करने का नहीं है। हमें मृत्यु के अवसर पर मृत-आत्मा के गुणों और कामों के बारे में ही बोलना चाहिए।’’ इसके बाद उन्हीं के आदेशानुसार सभा चलती रही। वर्तमान एवं पूर्व विधायक और सांसद अपनी-अपनी बात कह चलते बने। सभी ने मृतका को गौरवान्वित किया लेकिन जीवन शर्मिन्दा सा बैठा रहा। गुरुद्वारे के हॉल में लंगर चल रहा था और सभी आर.ओ. के कन्टेनरों से पानी पी रहे थे। रिवर्स-आस्मोसिस (आर.ओ.) के पानी के साथ चलता लंगर आधुनिक पंजाब का एक दृश्य बना रहा था। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। फरीदकोट के बाबा फरीद मंदबुद्धि बच्चों के संस्थान में भरती होने वाले बच्चों के शरीर में ये धातुएं और यूरेनियम पाये गये हैं। मां के दूध के साथ प्रदूषित पानी बच्चों तक पहुंच रहा है। सतलुज नदी लुधियाना जैसे महानगर के औद्योगिक क्षेत्र से होकर मालवा में पहुंचती हुई जल प्रदूषण के कारण काली पड़ जाती है।

पंजाब के कई जिलों विशेषकर जालंधर और लुधियाना के आसपास के कई गांवों के खेतों में कई-कई फुट गहरे खेत मिलते हैं। बढ़ते शहरीकरण और आधुनिक गांवों में पक्के मकानों के लिए करोड़ों की संख्या में ईंटों की आवश्यकता होती है। जमीनें बहुत महंगी होने के कारण चिमनी-भट्टे तो एक निर्धारित स्थान पर हैं। पर ईंट बनाने के लिए मिट्टी खेतों से प्राप्त की जाती है। यहीं पंजाब के ईंट-उद्योग की परम्परा है। खेतों की एक बित्ता (करीब 12 इंच) गहरी एक एकड़ में फैली मिट्टी 3 वर्ष के लिए एक लाख रु. में बिकती है। अधिकांश खेत तीन से चार फीट गहरे कटे मिलते हैं। इस प्रकार ऊँचे-नीचे खेतों से सिंचाई की समस्या भी उत्पन्न होती है। अधिकांश छोटे किसान अपने खेत ईंट बनाने के लिए ठेके पर दे देते हैं। किसानों को यह समझाया जाता है कि तीन-चार फीट गहरी मिट्टी हटा लेने से नयी और अधिक उपजाऊ मिट्टी मिलती है जिससे फसल अधिक होती है। जबकि प्रमाण इसके विरुद्ध हैं।

बरनाला से टैक्सी द्वारा अमृतसर की ओर जाते हुए जीरा नामक कस्बे में सैकड़ों ट्रैक्टर सड़क मार्ग पर दोनों तरफ खड़े थे। ये ट्रैक्टर किश्त न चुका पाने के कारण और लागत बढ़ने से खेती महंगी होने के कारण बिकने और नीलाम होने के लिए खड़े थे। किसान अपने पशु और ट्रैक्टर बेचकर कर्ज चुकाने को बाध्य हैं। इस वर्ष जून माह तक वर्षा न होने से धान की बोनी उतनी ही जमीन पर हो सकी है जितनी 2 घंटे में प्राप्त बिजली से खेत पानी से भरे जा सकते हैं। पंजाब की कृषि के अनुभव से लगता है कि पंजाब के किसान किसी बड़े संकट की तरफ बढ़ रहे हैं। पंजाब की आधुनिक कृषि-क्रान्ति के इस असफल मॉडल से हम सीख सकते हैं कि झूठ पर आधारित व्यवस्था अधिक दिन नहीं चल पाती है। पंजाबी संस्कृति का उद्घोष वाक्य ‘सत् श्री अकाल’ अर्थात सत्य की विजय हर समय (काल) में होती है। प्रश्न है पंजाब के किसानों को और कितनी अग्नि- परीक्षाएं देनी होगीं?

Submitted by Hindi on Thu, 07/12/2012 - 17:21
Source:
जनसत्ता, 12 जुलाई 2012
अंग्रेजों ने भी गंगा की अविरलता का सम्मान किया लेकिन दुर्भाग्य है कि आज की सरकारें गंगा जैसी नदी को भी नाला बनाने पर तुली है। उसके शरीर से एक-एक बूंद निचोड़ लेना चाहते हैं। कानपुर जैसे शहरों में चमड़ा फैक्ट्रियों का पानी गंगाजल को गंदाजल ही बना देता है। अपने उद्गम प्रदेश में हर-हर बहने वाली गंगा अब सुरंगों और बांधों में कैद हो रही है। उद्गम के कैचमेंट में खनन, सुरंगों के बनने से हजारों लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं जिससे हिमालय की कच्ची मिट्टी गाद बनकर गंगाजल को गंधला बना रही है। शहरों के कचरे, नैसर्गिक बहाव का कम होना और सरकारों की लापरवाही और बेइमानी गंगा पूर्णाहुति के जिम्मेदार हैं बता रहे हैं स्वामी आनंदस्वरूप।

दुर्भाग्य तो यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सिंचाई के लिए लिया जाने वाला यह गंगाजल, दिल्ली में विदेशी कंपनियों द्वारा पीने के लिए बेचा जा रहा है। साथ ही पवित्र गंगाजल कार और शौचालय साफ करने के काम आ रहा है। बाणगंगा और काली नदी जैसी सहायक नदियों के द्वारा उत्तर प्रदेश की चीनी, कागज और अन्य मिलों के साथ घरेलू मल-मूत्र गंगा नदी में डाल कर पूरी नदी की हत्या कर देते हैं। रही-सही कसर कानपुर के छब्बीस हजार से भी अधिक छोटे-बड़े उद्योग पूरी कर देते हैं, जिनमें करीब चार सौ चमड़ा शोधन कारखाने भी शामिल हैं।

गंगा का नाम लेने मात्र से पवित्रता का बोध होता है। यह देश की एकता और अखंडता का माध्यम और भारत की जीवन रेखा के अतिरिक्त और बहुत कुछ है। गंगा जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी दोनों है। आज भी लगभग तीस करोड़ लोगों की जीविका का माध्यम है। मगर पिछली डेढ़ सदी से गंगा पर हमले पर हमले किए जा रहे हैं और हमें जरा भी अपराध-बोध नहीं है। एक समय में हमारी आस्था इतनी प्रबल थी कि फिरंगी सरकार को भी झुकना पड़ा था। अंग्रेजी हुकूमत ने गंगा के साथ आगे और छेड़छाड़ न करने का वचन दिया था। उसने बहुत हद तक उसका पालन करते हुए हरिद्वार में भागीरथ बिंदु से अविरल प्रवाह छोड़ कर गंगा की अविरलता बनाए रखी। देश आजाद तो हुआ, पर अंग्रेजों की सांस्कृतिक संतानें भारत में ही थीं और उन्होंने भारत की संस्कृति की प्राण, मां गंगा पर हमले करने शुरू किए।
Submitted by Hindi on Thu, 07/12/2012 - 13:04
Source:
Ganga river Uttarakhand

एक तरफ कांग्रेस का एक मंत्री धारी देवी को डुबाने वाली परियोजना को चालू करने की मांग करे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री धारी देवी मंदिर को बचाने का आश्वासन दें, तो इस दोतरफा खेल को आप क्या कहेंगे? शाह से कहो-जागते रहो और चोर से कहो-चोरी करो। गंगा, अब एक कारपोरेट एजेंडा बन चुकी है। गंगाजल का जल और उसकी भूमि अब निवेशकों के एजेंडे में है। किए गये निवेश की अधिक से अधिक कीमत वसूलने के लिए निवेशक कुछ भी करने पर आमादा हैं। अब चूंकि निर्णय राजनेता करते हैं, अतः दिखावटी तौर पर नेता आगे हैं और निवेशक उनके पीछे।

देश की राष्ट्रीय नदी की कम से कम अविरलता तो फिलहाल पूरी तरह एक प्रदेश की स्वार्थपरक व एकपक्षीय राजनीति में फंस चुकी है। उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादाओं के उल्लंघन से भी कोई परहेज नहीं किया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने गंगा को पूरी तरह क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बना डाला है। अभी विधानसभा का सदस्य बनकर मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित करने का काम बाकी है, उससे पहले ही उन्होंने बिजली बांध परियोजनाओं जैसे विवादित मसले को सड़क पर उतरकर निबटने के आक्रामक अंदाज से जो संकेत दिए हैं, वे अच्छे नहीं हैं। गंगा मुक्ति संग्राम समेत गंगा के पक्ष में आंदोलित तमाम समूहों की टक्कर में मुख्यमंत्री ने जैसे बांध बनाओ मुहिम ही छेड़ दी है। इस मामले में वह पूर्ववर्ती सरकार के सहयोगी उत्तराखंड क्रांतिदल ‘उक्रांद’ से आगे निकल गये हैं।

प्रयास

Submitted by UrbanWater on Sat, 05/30/2020 - 11:25
सुखना झील, फोटो: Needpix
अदालत ने सुखना-झील के संरक्षण के लिए दायर सात याचिकाओं पर विचार करते हुए सुखना-झील को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है और चंडीगढ़ के समाज और प्रशासन की जवाबदेही करते करते हुए उन्हें सुखना झील के अभिभावक की संज्ञा दी है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है।

नोटिस बोर्ड

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 15:04
Source:
वेबिनारः कोरोनार संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 
कोरोना संकट और लॉकडाउन को हिमालय क्षेत्र के परिप्रेक्ष में समझने के लिए 21 मई, गुरुवार 4 बजे हमारे पेज Endangered Himalaya में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के साथ लाइव बातचीत में जुड़ें।  आप Zoom में https://bit.ly/2zmjhHs लिंक में पंजीकरण करके भी जुड़ सकते हैं। इसका आयोजन हिम धारा और रिवाइटललाइज़िग रेनफेड एग्रीकल्चर द्वारा किया जा रहा है।
Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 14:52
Source:
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ विषय पर सहगल फाउंडेशन और सीएडब्ल्यूएसटी ऑनलाइन वर्कशाप का आयोजन करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य वाॅश के प्रति लोगों को जागरुक करना और प्रेरित करना है। ये वेबिनार निन्मलिखित विषयों से संबंधित रहेगा - 
Submitted by UrbanWater on Wed, 05/13/2020 - 11:11
Source:
पंकज मालवीय अक्षधा फाउंडेशन
पानी रे पानी
विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून 2020

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि |
प्रविष्टि रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि – 30 मई 2020
ई-प्रतियोगिता की तिथि – 5 जून 2020,
समय 10 बजे प्रात: से 4 बजे तक

Latest

खासम-खास

पर्यावरण दिवस से नदी दिवस तक

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/05/2020 - 07:47
Author
कृष्ण गोपाल व्यास
Environment-Day-2020
नदियाँ समाज का आइना होती हैं। फोटो - NeedPix.com
इन दिनों बिहार राज्य में पानी और जंगल के लिए पानी रे पानी अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के अंतर्गत 5 जून से 27 सितम्बर 2020 के बीच नदी चेतना यात्रा निकाली जावेगी। इस यात्रा का शुभारंभ एक जून 2020 अर्थात गंगा दशहरा के दिन कमला नदी के तट पर जनकपुर में हो चुका है।

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उपजाऊ मिट्टी खाते शहर

Submitted by Hindi on Fri, 07/13/2012 - 16:53
Author
डॉ. कश्मीर उप्पल
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2012
Pesticide spraying

वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

रासायनिक खेती, नदियों और भूजल स्तर जैसे पर्यावरणीय विषयों पर लिखना किसी अंधेरे में चीख की तरह लगता है। टी.वी. और समाचारपत्रों में बढ़ता तापमान प्रतिदिन हेडलाइन्स बनता है। उसके साथ ही पंखों, कूलरों और एयरकंडीशनर के विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं और उनकी बिक्री भी। परन्तु ओजोन-परत और घटता वन क्षेत्र हमारी चिन्ता का विषय नहीं बनता। शहरों और गांवों में नित नई खुलती दवाई की दुकानें अब हमें नहीं डरातीं। सिने अभिनेता आमिर खान ने 24 जून के ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम में रासायनिक खेती के ‘अभिशापों’ और जैविक खेती के ‘वरदानों’ को देश के सम्मुख रखा। लेकिन अभी तक समाज और सरकार की ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है कि कोई रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से चितिंत हो। पंजाब को आधुनिक कृषि का मॉडल मानकर उसका अनुकरण करने से पूरे देश में भी रासायनिक और यांत्रिक खेती के दोष फैल गए हैं। किसी भी राज्य के आन्तरिक, आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक चरित्र को समझे बिना उसका अनुगमन करना खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुओं और ताकत की दवाईयों की तरह पंजाब की खेती भी एक झूठा विज्ञापन है। पंजाब में व्यास नदी के ऊपर का क्षेत्र जो पाकिस्तान की सीमा के पास है मांझा कहलाता है। व्यास नदी और सतलुज नदी के बीच का क्षेत्र दोआब कहलाता है। पंजाब के दक्षिण-पश्चिम का क्षेत्र मलवा या मालवा कहलाता है। यहां के फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तसर, बठिंडा, मांसा और संगरुर जिले रासायनिक खेती और प्रदूषित जल से सर्वाधिक प्रभावित हैं। अब यह रोग पटियाला और अमृतसर की ओर फैल रहा है। वैसे पूरा पंजाब ही रसायनों से अटा पड़ा है।

गठन के समय पंजाब में 12 जिले थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 22 हो गई है। दोआब क्षेत्र में विदेशों में रहने वाले भारतीयों (एनआरआई) की संख्या सबसे अधिक है और यहीं रसायनों और कीटनाशकों के उपयोग को सर्वाधिक प्रोत्साहन भी मिला है। एनआरआई द्वारा विदेशों से भेजे गये धन से आई समृद्धि को भी पंजाब में खेती से आयी समृद्धि समझने की भूल भी होती है। यहां ठेके पर खेती की नई परम्परा में बड़े किसान छोटे-छोटे किसानों की जमीन ठेके पर लेते हैं खेती की बढ़ती लागत भी इसके लिए जिम्मेदार है। जमीन के मालिक अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को बाध्य हैं। एक आश्चर्यजनक सत्य ही जानकारी हुई कि यहां जानबूझकर आलू की फसल बड़े पैमाने पर लेकर इसके दाम गिरा दिये जाते हैं। आलू से नकली ग्रीस बनाने का धंधा बड़े पैमाने पर होता है। आलूओं को गलाकर उसमें मोबिल-आईल के मिश्रण से नकली ग्रीस बनता है। मैं अभी पंजाब की यात्रा पर था। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों का नया स्वरूप देखकर दुख ही होता है। यहां ग्रामीण क्षेत्रों में मुश्किल से 2 घंटे खेतों को बिजली उपलब्ध होती है।

मेरी यात्रा तीन रिश्तेदारों की मृत्यु से होने वाले भोगों और अंतिम-अरदास से जुड़ी थी। इनमें दो की मृत्यु खेती के पर्यावरणीय खतरों से घटित हुई थी। बरनाला शहर में एक लोकप्रिय शिक्षिका रिश्तेदार की मृत्यु कैंसर से हुई थी। बरनाला शहर में ठाठ गुरुद्वारे में 18 जून को सम्पन्न अंतिम अरदास में पंजाब और हरियाणा के अकाली, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, स्थानीय दलों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ लेखक संघ के प्रतिनिधि भी श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित थे। प्रारंभ में ही श्रद्धांजलि सभा के तेज तर्रार संचालक ने रासायनिक खेती और जल प्रदूषण से होने वाली मौतों का विवरण दिया। कार्यक्रम के संचालक ने कहा ‘‘हम इसी तरह हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी की कैंसर से हुई मृत्यु पर एकत्रित होते है। हम स्वर्गवासी को श्रद्धांजलि देकर अपने-अपने घर चले आते हैं, पर खेती और पानी के प्रदूषण पर चर्चा भी नहीं करते हैं।’’

इसके बाद अकाली दल के एक क्षेत्रीय बडे़ नेता ने अपने उद्बोधन में डपटते हुए कहा ‘‘यह अवसर ‘राजनीति’ करने का नहीं है। हमें मृत्यु के अवसर पर मृत-आत्मा के गुणों और कामों के बारे में ही बोलना चाहिए।’’ इसके बाद उन्हीं के आदेशानुसार सभा चलती रही। वर्तमान एवं पूर्व विधायक और सांसद अपनी-अपनी बात कह चलते बने। सभी ने मृतका को गौरवान्वित किया लेकिन जीवन शर्मिन्दा सा बैठा रहा। गुरुद्वारे के हॉल में लंगर चल रहा था और सभी आर.ओ. के कन्टेनरों से पानी पी रहे थे। रिवर्स-आस्मोसिस (आर.ओ.) के पानी के साथ चलता लंगर आधुनिक पंजाब का एक दृश्य बना रहा था। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। फरीदकोट के बाबा फरीद मंदबुद्धि बच्चों के संस्थान में भरती होने वाले बच्चों के शरीर में ये धातुएं और यूरेनियम पाये गये हैं। मां के दूध के साथ प्रदूषित पानी बच्चों तक पहुंच रहा है। सतलुज नदी लुधियाना जैसे महानगर के औद्योगिक क्षेत्र से होकर मालवा में पहुंचती हुई जल प्रदूषण के कारण काली पड़ जाती है।

पंजाब के कई जिलों विशेषकर जालंधर और लुधियाना के आसपास के कई गांवों के खेतों में कई-कई फुट गहरे खेत मिलते हैं। बढ़ते शहरीकरण और आधुनिक गांवों में पक्के मकानों के लिए करोड़ों की संख्या में ईंटों की आवश्यकता होती है। जमीनें बहुत महंगी होने के कारण चिमनी-भट्टे तो एक निर्धारित स्थान पर हैं। पर ईंट बनाने के लिए मिट्टी खेतों से प्राप्त की जाती है। यहीं पंजाब के ईंट-उद्योग की परम्परा है। खेतों की एक बित्ता (करीब 12 इंच) गहरी एक एकड़ में फैली मिट्टी 3 वर्ष के लिए एक लाख रु. में बिकती है। अधिकांश खेत तीन से चार फीट गहरे कटे मिलते हैं। इस प्रकार ऊँचे-नीचे खेतों से सिंचाई की समस्या भी उत्पन्न होती है। अधिकांश छोटे किसान अपने खेत ईंट बनाने के लिए ठेके पर दे देते हैं। किसानों को यह समझाया जाता है कि तीन-चार फीट गहरी मिट्टी हटा लेने से नयी और अधिक उपजाऊ मिट्टी मिलती है जिससे फसल अधिक होती है। जबकि प्रमाण इसके विरुद्ध हैं।

बरनाला से टैक्सी द्वारा अमृतसर की ओर जाते हुए जीरा नामक कस्बे में सैकड़ों ट्रैक्टर सड़क मार्ग पर दोनों तरफ खड़े थे। ये ट्रैक्टर किश्त न चुका पाने के कारण और लागत बढ़ने से खेती महंगी होने के कारण बिकने और नीलाम होने के लिए खड़े थे। किसान अपने पशु और ट्रैक्टर बेचकर कर्ज चुकाने को बाध्य हैं। इस वर्ष जून माह तक वर्षा न होने से धान की बोनी उतनी ही जमीन पर हो सकी है जितनी 2 घंटे में प्राप्त बिजली से खेत पानी से भरे जा सकते हैं। पंजाब की कृषि के अनुभव से लगता है कि पंजाब के किसान किसी बड़े संकट की तरफ बढ़ रहे हैं। पंजाब की आधुनिक कृषि-क्रान्ति के इस असफल मॉडल से हम सीख सकते हैं कि झूठ पर आधारित व्यवस्था अधिक दिन नहीं चल पाती है। पंजाबी संस्कृति का उद्घोष वाक्य ‘सत् श्री अकाल’ अर्थात सत्य की विजय हर समय (काल) में होती है। प्रश्न है पंजाब के किसानों को और कितनी अग्नि- परीक्षाएं देनी होगीं?

जय हो गंगा माई, बेटे हुए कसाई

Submitted by Hindi on Thu, 07/12/2012 - 17:21
Author
स्वामी आनंदस्वरूप
Source
जनसत्ता, 12 जुलाई 2012
अंग्रेजों ने भी गंगा की अविरलता का सम्मान किया लेकिन दुर्भाग्य है कि आज की सरकारें गंगा जैसी नदी को भी नाला बनाने पर तुली है। उसके शरीर से एक-एक बूंद निचोड़ लेना चाहते हैं। कानपुर जैसे शहरों में चमड़ा फैक्ट्रियों का पानी गंगाजल को गंदाजल ही बना देता है। अपने उद्गम प्रदेश में हर-हर बहने वाली गंगा अब सुरंगों और बांधों में कैद हो रही है। उद्गम के कैचमेंट में खनन, सुरंगों के बनने से हजारों लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं जिससे हिमालय की कच्ची मिट्टी गाद बनकर गंगाजल को गंधला बना रही है। शहरों के कचरे, नैसर्गिक बहाव का कम होना और सरकारों की लापरवाही और बेइमानी गंगा पूर्णाहुति के जिम्मेदार हैं बता रहे हैं स्वामी आनंदस्वरूप।

दुर्भाग्य तो यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सिंचाई के लिए लिया जाने वाला यह गंगाजल, दिल्ली में विदेशी कंपनियों द्वारा पीने के लिए बेचा जा रहा है। साथ ही पवित्र गंगाजल कार और शौचालय साफ करने के काम आ रहा है। बाणगंगा और काली नदी जैसी सहायक नदियों के द्वारा उत्तर प्रदेश की चीनी, कागज और अन्य मिलों के साथ घरेलू मल-मूत्र गंगा नदी में डाल कर पूरी नदी की हत्या कर देते हैं। रही-सही कसर कानपुर के छब्बीस हजार से भी अधिक छोटे-बड़े उद्योग पूरी कर देते हैं, जिनमें करीब चार सौ चमड़ा शोधन कारखाने भी शामिल हैं।

गंगा का नाम लेने मात्र से पवित्रता का बोध होता है। यह देश की एकता और अखंडता का माध्यम और भारत की जीवन रेखा के अतिरिक्त और बहुत कुछ है। गंगा जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी दोनों है। आज भी लगभग तीस करोड़ लोगों की जीविका का माध्यम है। मगर पिछली डेढ़ सदी से गंगा पर हमले पर हमले किए जा रहे हैं और हमें जरा भी अपराध-बोध नहीं है। एक समय में हमारी आस्था इतनी प्रबल थी कि फिरंगी सरकार को भी झुकना पड़ा था। अंग्रेजी हुकूमत ने गंगा के साथ आगे और छेड़छाड़ न करने का वचन दिया था। उसने बहुत हद तक उसका पालन करते हुए हरिद्वार में भागीरथ बिंदु से अविरल प्रवाह छोड़ कर गंगा की अविरलता बनाए रखी। देश आजाद तो हुआ, पर अंग्रेजों की सांस्कृतिक संतानें भारत में ही थीं और उन्होंने भारत की संस्कृति की प्राण, मां गंगा पर हमले करने शुरू किए।

देवभूमि में उड़ी लोकतांत्रिक मर्यादाओं की धज्जियां

Submitted by Hindi on Thu, 07/12/2012 - 13:04
Author
अरुण तिवारी
Ganga river Uttarakhand

एक तरफ कांग्रेस का एक मंत्री धारी देवी को डुबाने वाली परियोजना को चालू करने की मांग करे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री धारी देवी मंदिर को बचाने का आश्वासन दें, तो इस दोतरफा खेल को आप क्या कहेंगे? शाह से कहो-जागते रहो और चोर से कहो-चोरी करो। गंगा, अब एक कारपोरेट एजेंडा बन चुकी है। गंगाजल का जल और उसकी भूमि अब निवेशकों के एजेंडे में है। किए गये निवेश की अधिक से अधिक कीमत वसूलने के लिए निवेशक कुछ भी करने पर आमादा हैं। अब चूंकि निर्णय राजनेता करते हैं, अतः दिखावटी तौर पर नेता आगे हैं और निवेशक उनके पीछे।

देश की राष्ट्रीय नदी की कम से कम अविरलता तो फिलहाल पूरी तरह एक प्रदेश की स्वार्थपरक व एकपक्षीय राजनीति में फंस चुकी है। उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादाओं के उल्लंघन से भी कोई परहेज नहीं किया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने गंगा को पूरी तरह क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बना डाला है। अभी विधानसभा का सदस्य बनकर मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित करने का काम बाकी है, उससे पहले ही उन्होंने बिजली बांध परियोजनाओं जैसे विवादित मसले को सड़क पर उतरकर निबटने के आक्रामक अंदाज से जो संकेत दिए हैं, वे अच्छे नहीं हैं। गंगा मुक्ति संग्राम समेत गंगा के पक्ष में आंदोलित तमाम समूहों की टक्कर में मुख्यमंत्री ने जैसे बांध बनाओ मुहिम ही छेड़ दी है। इस मामले में वह पूर्ववर्ती सरकार के सहयोगी उत्तराखंड क्रांतिदल ‘उक्रांद’ से आगे निकल गये हैं।

प्रयास

'सुखना झील' को मिले ‘जीवित प्राणी’ के अधिकार और कर्तव्य

Submitted by UrbanWater on Sat, 05/30/2020 - 11:25
Author
मीनाक्षी अरोड़ा
'sukhna-jhil'-ko-miley-‘jivit-prani’-kay-adhikar-aur-kartavya
सुखना झील, फोटो: Needpix
अदालत ने सुखना-झील के संरक्षण के लिए दायर सात याचिकाओं पर विचार करते हुए सुखना-झील को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है और चंडीगढ़ के समाज और प्रशासन की जवाबदेही करते करते हुए उन्हें सुखना झील के अभिभावक की संज्ञा दी है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है।

नोटिस बोर्ड

वेबिनारः कोरोना संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 15:04
corona-and-lockdown-in-context-of-himalayas
वेबिनारः कोरोनार संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 
कोरोना संकट और लॉकडाउन को हिमालय क्षेत्र के परिप्रेक्ष में समझने के लिए 21 मई, गुरुवार 4 बजे हमारे पेज Endangered Himalaya में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के साथ लाइव बातचीत में जुड़ें।  आप Zoom में https://bit.ly/2zmjhHs लिंक में पंजीकरण करके भी जुड़ सकते हैं। इसका आयोजन हिम धारा और रिवाइटललाइज़िग रेनफेड एग्रीकल्चर द्वारा किया जा रहा है।

‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 14:52
WASH-for-healthy-homes-india
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ विषय पर सहगल फाउंडेशन और सीएडब्ल्यूएसटी ऑनलाइन वर्कशाप का आयोजन करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य वाॅश के प्रति लोगों को जागरुक करना और प्रेरित करना है। ये वेबिनार निन्मलिखित विषयों से संबंधित रहेगा - 

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि

Submitted by UrbanWater on Wed, 05/13/2020 - 11:11
participateepaintingwinaward
Source
पंकज मालवीय अक्षधा फाउंडेशन
पानी रे पानी
विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून 2020

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि |
प्रविष्टि रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि – 30 मई 2020
ई-प्रतियोगिता की तिथि – 5 जून 2020,
समय 10 बजे प्रात: से 4 बजे तक

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