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खासम-खास

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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Submitted by Shivendra on Mon, 12/27/2021 - 11:00
Source:
एएफआर
चीड़ के जंगल एक पर्यावरणीय समस्या
चीड़ के पौधे उत्तराखंड में ब्रिटिश काल में लाए गए और आज एक पर्यावरणीय समस्या के रूप में हैं। आज पहाड़ में चौड़ी पत्ती वाले पौधे जैसे बांज, बुरांश आदि को विकसित करने की आवश्यकता है जिससे भूजल में वृद्धि होगी और नौले, धारे में पर्याप्त जल होगा। पहाड़ी धारे ही गंगा, यमुना, पिंडर, कोसी आदि नदियों को जल आपूर्ति करते है जिससे इन नदियों में वर्ष भर जल रहता है।
Submitted by Shivendra on Thu, 12/23/2021 - 12:35
Source:
विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएगी बेतवा नदी
देश की बड़ी नदियों को विशालता देने का कार्य उनकी सहायक छोटी नदियां ही करती है। लेकिन आज ऐसी ही कई  हज़ारो नदियां लुप्त हो चुकी या उसके कगार पर खड़ी  है। आखिर ऐसा क्यों और कैसे नदियों की स्थिति बनी। तो आइए हम आपको बताते है ऐसा क्यों हो रहा है । दरअसल, इसका सबसे बड़ा कारण अवैध खनन है। आज भी  इन छोटी  मौसमी  नदियों से बेहताशा रेत निकालने का काम  नाहि बंद हुआ नाहि  कम । जिसके चलते इन नदियों का उदगम और बड़ी नदियों को मिलने का रास्ता बंद हो रहा है।
Submitted by Shivendra on Tue, 12/21/2021 - 11:27
Source:
जल संवाद
परंपरागत जल संरक्षण और मेड़बंदी अभियान के सिलसिले में 22 दिसंबर 2021 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में सायं 3 बजे से "जल संवाद" का आयोजन जलग्राम जखनी की ओर से किया जा रहा है  । इस अवसर पर "परम्परागत जल संरक्षण : जखनी का मेड़बंदी अभियान" विषय के अंतर्गत विशिष्ट  व्यक्तियों व्याख्यान के साथ कृषि क्षेत्र से जुड़े लगभग 50 सक्रिय कर्मयोगियों को "कृषिजीवी" सम्मान से सम्मानित किया जाएगा । केंद्र जल मंत्रालय ,ग्रामीण विकास मंत्रालय और नीति आयोग की और से  इस परंपरागत जल संरक्षण विधि को एकदम सही माना है ।

प्रयास

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
Source:
एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 
Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
Source:
चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
Source:
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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खासम-खास

बांधों पर मंडराता खतरा: टिकाऊ माडल की तलाश

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
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कृष्ण गोपाल 'व्यास'
bandhon-per-mandrata-khatra:-tikau-model-ki-talash
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन है चीड़

Submitted by Shivendra on Mon, 12/27/2021 - 11:00
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Source
एएफआर
चीड़ के जंगल एक पर्यावरणीय समस्या
चीड़ के पौधे उत्तराखंड में ब्रिटिश काल में लाए गए और आज एक पर्यावरणीय समस्या के रूप में हैं। आज पहाड़ में चौड़ी पत्ती वाले पौधे जैसे बांज, बुरांश आदि को विकसित करने की आवश्यकता है जिससे भूजल में वृद्धि होगी और नौले, धारे में पर्याप्त जल होगा। पहाड़ी धारे ही गंगा, यमुना, पिंडर, कोसी आदि नदियों को जल आपूर्ति करते है जिससे इन नदियों में वर्ष भर जल रहता है।

विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएगी बेतवा नदी

Submitted by Shivendra on Thu, 12/23/2021 - 12:35
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विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएगी बेतवा नदी
देश की बड़ी नदियों को विशालता देने का कार्य उनकी सहायक छोटी नदियां ही करती है। लेकिन आज ऐसी ही कई  हज़ारो नदियां लुप्त हो चुकी या उसके कगार पर खड़ी  है। आखिर ऐसा क्यों और कैसे नदियों की स्थिति बनी। तो आइए हम आपको बताते है ऐसा क्यों हो रहा है । दरअसल, इसका सबसे बड़ा कारण अवैध खनन है। आज भी  इन छोटी  मौसमी  नदियों से बेहताशा रेत निकालने का काम  नाहि बंद हुआ नाहि  कम । जिसके चलते इन नदियों का उदगम और बड़ी नदियों को मिलने का रास्ता बंद हो रहा है।

कृषिजीवी" सम्मान से समानित होंगे 50 कृषि कर्मयोगी

Submitted by Shivendra on Tue, 12/21/2021 - 11:27
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जल संवाद
परंपरागत जल संरक्षण और मेड़बंदी अभियान के सिलसिले में 22 दिसंबर 2021 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में सायं 3 बजे से "जल संवाद" का आयोजन जलग्राम जखनी की ओर से किया जा रहा है  । इस अवसर पर "परम्परागत जल संरक्षण : जखनी का मेड़बंदी अभियान" विषय के अंतर्गत विशिष्ट  व्यक्तियों व्याख्यान के साथ कृषि क्षेत्र से जुड़े लगभग 50 सक्रिय कर्मयोगियों को "कृषिजीवी" सम्मान से सम्मानित किया जाएगा । केंद्र जल मंत्रालय ,ग्रामीण विकास मंत्रालय और नीति आयोग की और से  इस परंपरागत जल संरक्षण विधि को एकदम सही माना है ।

प्रयास

पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा - मायलम्मा

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
pani-paryavaran-andolan-key-amma---mayalamma
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पानी पत्रक
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

जल संसाधन प्रबंधन पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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 एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 

चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
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चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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Source
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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