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खासम-खास

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

Content

Submitted by admin on Sun, 07/19/2009 - 19:24
Source:
निर्मला लक्ष्मणन/ nregaconsortium.in

एक महत्वपूर्ण सॉशल ऑडिट की रिपोर्ट से पता चला है कि राजस्थान के डूंगरपुर में जहाँ लोग रोजगार को लेकर चुनौतियों से जूझ रहे थे, वहाँ अब सार्वजनिक कार्यों में रोजगार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

देश के बेहद गरीब ग्रामीण इलाकों में एक “खामोश क्रान्ति” की शुरुआत हो चुकी है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा), देश के चुनिन्दा जिलों में 2 फ़रवरी से प्रारम्भ हो चुका है और इससे इन जिलों की तस्वीर बदलने लगी है। राजस्थान से चुने गये छः जिलों में से एक है डूंग़रपुर, जिसे नरेगा लागू करने हेतु प्रथम चरण में चुना गया है। यहाँ किये गये एक सॉशल ऑडिट के अनुसार पता चला है कि गरीब ग्रामीणों के जीवन में गत दो माह में ही सुधार हुआ है। यहां आधे से अधिक परिवारों का कम से कम एक सदस्य नरेगा के तहत रोजगार पा चुका है।

यह सामाजिक परीक्षण रिपोर्ट अप्रैल के अन्त में जाँची गई, जिसमें 11 राज्यों के 600 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। आस्था संस्थान और मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS)
Submitted by admin on Thu, 07/16/2009 - 14:05
Source:
मिहिर शाह
गरीबीउन्मूलन के कार्यक्रम उसी समय सफ़ल सिद्ध हो सकते हैं, जब ऐसे कार्यक्रम उन्हें सतत आजीविका चलाने लायक बनासकें, ताकि गरीब सरकारी मदद पर आश्रित ही न रहें। इस कार्यके लिये मजबूत जन-संस्थान, सटीक तकनीक, मानव संसाधन का हुनर विकास, बाज़ार की सहायता तथा एक पर्याप्त निवेश सभी साथ में होना चाहिये।डायरेक्ट कैश ट्रांसफ़र (DCT) नामक शब्द आजकल विकास समूहों के भीतर काफ़ी चर्चा में है। इकोनोमिस्ट अरविन्द सुब्रह्मणियन ने भारत में गरीबी दूर करने के तौर तरीकों के बारे में अपनी पुस्तक “फ़र्स्ट बेस्ट ऑप्शन” मे DCT के बारे में लिखा है (द हिन्दू, अगस्त 24, 2008)। हाल ही में प्रकाशित “इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली (अप्रैल 12, 2008)” के अंक में सुब्रह्मणियन के विचारों से देवेश कपूर और पार्थ मुखोपाध्याय (KMS) ने भी अन्य कई मुद्दों पर विस्तार से सहमति जताई है। KMS कहते हैं, खाद्य, उर्वरक और ईंधन इन तीन प्रमुख वस्तुओं पर भारत के केन्द्रीय बजट में केन्द्र प्रायोजित योजनाओं में ही लगभग 2,00,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जाती है। वे पूछते हैं कि – क्या भारत के गरीबों के विकास और उसके उन्मूलन के लक्ष्यों को केन्द्रीय तन्त्र के माध्यम से इतनी विशाल धनराशि खर्च करके भी पाया जा सका है? क्या यह एक अच्छा तरीका कहा जा सकता है? मैं कहूँगा, निश्चित ही है, बजाय इसके कि मुँह में पानी लाने लायक एक करोड़ की राशि प्रत्येक ग्राम पंचायत के खाते में सीधे डाल दी जाये।

Submitted by admin on Tue, 07/14/2009 - 13:41
Source:
द हंगर प्रोजेक्ट पंचायतीराज में महिलाओं की भूमिका पर सर्व श्रेष्ठ लेखन के लिए 2009 सरोजिनी नायडू पुरस्कार की घोषणा करता है। आपसे निवेदन है कि आपके क्षेत्र के पत्रकार बन्धुओं एवं अन्य मीडिया साथियों को उपरोक्त दी हुई जानकारी के बारे में अवगत करायें।

आज पंचायत की महिला जनप्रतिनिधियों द्वारा शासन के कामकाज में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ ही पानी, शराब के व्यसन, शिक्षा, स्वास्थ्य, घेरलू हिंसा, जेण्डर असमानता व अन्याय जैसे उन मुद्दों के प्रति राज्य को संवेदनशील बना रही है। `खामोश क्रांति` को एक आवाज़ की जरूरत है( इन महिलाओं के संघर्षों तथा सफलताओं को घरों, नागरिक समाज समूहों, शहरी अभिजात्य वर्ग, पेशेवरों, शिक्षाविदों तथा नीति निर्माताओं के दिलो-दिमाग तक पहुंचाने के लिए एक व्यवस्थित प्रयास जरूरी है।

प्रयास

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
Source:
एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 
Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
Source:
चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
Source:
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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खासम-खास

बांधों पर मंडराता खतरा: टिकाऊ माडल की तलाश

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास'
bandhon-per-mandrata-khatra:-tikau-model-ki-talash
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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डूंगरपुर की रोजगार गारंटी योजना – परिवर्तन के चिन्ह

Submitted by admin on Sun, 07/19/2009 - 19:24
Source
निर्मला लक्ष्मणन/ nregaconsortium.in

एक महत्वपूर्ण सॉशल ऑडिट की रिपोर्ट से पता चला है कि राजस्थान के डूंगरपुर में जहाँ लोग रोजगार को लेकर चुनौतियों से जूझ रहे थे, वहाँ अब सार्वजनिक कार्यों में रोजगार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

देश के बेहद गरीब ग्रामीण इलाकों में एक “खामोश क्रान्ति” की शुरुआत हो चुकी है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा), देश के चुनिन्दा जिलों में 2 फ़रवरी से प्रारम्भ हो चुका है और इससे इन जिलों की तस्वीर बदलने लगी है। राजस्थान से चुने गये छः जिलों में से एक है डूंग़रपुर, जिसे नरेगा लागू करने हेतु प्रथम चरण में चुना गया है। यहाँ किये गये एक सॉशल ऑडिट के अनुसार पता चला है कि गरीब ग्रामीणों के जीवन में गत दो माह में ही सुधार हुआ है। यहां आधे से अधिक परिवारों का कम से कम एक सदस्य नरेगा के तहत रोजगार पा चुका है।

यह सामाजिक परीक्षण रिपोर्ट अप्रैल के अन्त में जाँची गई, जिसमें 11 राज्यों के 600 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। आस्था संस्थान और मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS)

प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण कोई रामबाण इलाज नहीं है…

Submitted by admin on Thu, 07/16/2009 - 14:05
Source
मिहिर शाह
गरीबीउन्मूलन के कार्यक्रम उसी समय सफ़ल सिद्ध हो सकते हैं, जब ऐसे कार्यक्रम उन्हें सतत आजीविका चलाने लायक बनासकें, ताकि गरीब सरकारी मदद पर आश्रित ही न रहें। इस कार्यके लिये मजबूत जन-संस्थान, सटीक तकनीक, मानव संसाधन का हुनर विकास, बाज़ार की सहायता तथा एक पर्याप्त निवेश सभी साथ में होना चाहिये।डायरेक्ट कैश ट्रांसफ़र (DCT) नामक शब्द आजकल विकास समूहों के भीतर काफ़ी चर्चा में है। इकोनोमिस्ट अरविन्द सुब्रह्मणियन ने भारत में गरीबी दूर करने के तौर तरीकों के बारे में अपनी पुस्तक “फ़र्स्ट बेस्ट ऑप्शन” मे DCT के बारे में लिखा है (द हिन्दू, अगस्त 24, 2008)। हाल ही में प्रकाशित “इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली (अप्रैल 12, 2008)” के अंक में सुब्रह्मणियन के विचारों से देवेश कपूर और पार्थ मुखोपाध्याय (KMS) ने भी अन्य कई मुद्दों पर विस्तार से सहमति जताई है। KMS कहते हैं, खाद्य, उर्वरक और ईंधन इन तीन प्रमुख वस्तुओं पर भारत के केन्द्रीय बजट में केन्द्र प्रायोजित योजनाओं में ही लगभग 2,00,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जाती है। वे पूछते हैं कि – क्या भारत के गरीबों के विकास और उसके उन्मूलन के लक्ष्यों को केन्द्रीय तन्त्र के माध्यम से इतनी विशाल धनराशि खर्च करके भी पाया जा सका है? क्या यह एक अच्छा तरीका कहा जा सकता है? मैं कहूँगा, निश्चित ही है, बजाय इसके कि मुँह में पानी लाने लायक एक करोड़ की राशि प्रत्येक ग्राम पंचायत के खाते में सीधे डाल दी जाये।

सरोजिनी नायडू पुरस्कार के लिए आवेदन आमंत्रित

Submitted by admin on Tue, 07/14/2009 - 13:41
द हंगर प्रोजेक्ट पंचायतीराज में महिलाओं की भूमिका पर सर्व श्रेष्ठ लेखन के लिए 2009 सरोजिनी नायडू पुरस्कार की घोषणा करता है। आपसे निवेदन है कि आपके क्षेत्र के पत्रकार बन्धुओं एवं अन्य मीडिया साथियों को उपरोक्त दी हुई जानकारी के बारे में अवगत करायें।

आज पंचायत की महिला जनप्रतिनिधियों द्वारा शासन के कामकाज में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ ही पानी, शराब के व्यसन, शिक्षा, स्वास्थ्य, घेरलू हिंसा, जेण्डर असमानता व अन्याय जैसे उन मुद्दों के प्रति राज्य को संवेदनशील बना रही है। `खामोश क्रांति` को एक आवाज़ की जरूरत है( इन महिलाओं के संघर्षों तथा सफलताओं को घरों, नागरिक समाज समूहों, शहरी अभिजात्य वर्ग, पेशेवरों, शिक्षाविदों तथा नीति निर्माताओं के दिलो-दिमाग तक पहुंचाने के लिए एक व्यवस्थित प्रयास जरूरी है।

प्रयास

पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा - मायलम्मा

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
pani-paryavaran-andolan-key-amma---mayalamma
Source
पानी पत्रक
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

जल संसाधन प्रबंधन पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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 एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 

चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
pratirodh-ka-cinema-char-divasiya-cinema-karyashala
चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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Source
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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