Latest

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से सँवरेगा भारत

Author: 
चंद्रभान यादव
Source: 
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2018

पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। यही वजह है कि प्राचीन काल में बस्तियाँ उसी स्थान पर बसती थीं, जहाँ पर्याप्त पानी होता था। ऐसे में यह साफ है कि पानी के बिना खुशहाली नहीं आ सकती है। किसान खुशहाल होंगे तो देश खुशहाल होगा। किसानों की खुशहाली के लिये सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार ने किसानों को समुचित सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। यह खुशहाली प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जरिए मिल रही है। इस योजना का उद्देश्य सिर्फ सुनिश्चित सिंचाई के लिये स्रोतों का सृजन करना नहीं है बल्कि ‘जल संचय’ और ‘जल सिंचन’ के माध्यम से सूक्ष्म-स्तर पर वर्षाजल का उपयोग करके संरक्षित सिंचाई का भी सृजन करना है। एक तरफ गाँवों में तालाब खुदवाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ स्प्रिंकलर पद्धति से भी बूँद-बूँद सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

फलोत्पादन से रुका गाँव का पलायन

Author: 
नमिता

गोविन्द वल्लभ पंतगोविन्द वल्लभ पंतउत्तराखण्ड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ के गोविन्द वल्लभ पन्त किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे पूर्व सैनिक हैं। प्रगतिशील किसान है। उद्यान पंडित हैं। इसके अलावा और जो कुछ है तो वे एक चलती-फिरती कृषि विज्ञान की संस्था भी है। गोविन्द वल्लभ पन्त कोई कृषि विशेषज्ञ जैसे वैज्ञानिक तो नहीं है पर वह जैविक उत्पादों के जानकार हैं।

जानकार का मतलब यह है कि सैनिक सेवा से निवृत्ति के बाद वह शहर की तरफ नहीं बल्कि गाँव की तरफ रुख कर गए। रुख ऐसा कि गाँव में पहुँचने के पश्चात लोगों को उनके द्वारा स्वरोजगार मिल गया। स्वरोजगार भी पहाड़ी कृषि उत्पादों से। इस हेतु गोविन्द ने गाँव में सर्वप्रथम सिंचाई और पेयजल की सुविधा दुरुस्त की है। यही वजह है कि बेरीनाग गाँव के अधिकांश किसान नगदी और फलोत्पादन से जुड़ गए हैं।

सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ के धौलकटिया गाँव निवासी गोविन्द फौजी ने ग्रामीणों को नगदी फसल और अन्य फलोत्पादन से जोड़कर स्वरोजगार की दिशा में उनकी आर्थिकी को मजबूती दी है। उनके बेरीनाग के फल बागान में गाँव के 15 ग्रामीण स्थायी रूप से यानि बारहों महीने रोजगार पा रहे हैं। जबकि, 35 से 40 लोगों को समय-समय पर रोजगार मिलता रहता है। यही नहीं वे लोग अपने खेतों को भी सरसब्ज करने में लगे हैं।

मण्डुवे की खेती से किसानों के चेहरे खिले

Author: 
नमिता

मण्डुवा की खेतीमण्डुवा की खेतीज्ञात हो कि अब बाजार में उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र का मण्डुवा उतर चुका है। भले यह रफ्तार नहीं पकड़ रहा हो पर जो लोग इस स्वरोजगार के कार्य से पुनः जुड़े हैं उनके पैर शहर में आने के लिये एक बारगी मोटे हो रहे हैं। यहाँ हम पौड़ी जनपद में हुए मण्डुवे की खेती को लेकर सरकारी प्रयास को रेखांकित कर रहे हैं। जिससे सीधा काश्तकारों को ही फायदा हुआ है। कोई राजनीतिक मुनाफाबाजी का मामला ही नहीं है। इसलिये तो वे पौड़ीवासी जो इस दौरान मण्डुवे की खेती से जुड़े हैं उनके हिस्से का पलायन रुक सा गया है।

उल्लेखनीय यह है कि पौड़ी जनपद के थलीसैण ब्लॉक में कृषि विभाग ने 21546 हेक्टेयर क्षेत्रफल में स्थानीय किसानों को नैतिक व आर्थिक सहयोग देकर मण्डुवा की खेती करवाई। किसानों को यह कार्य इसलिये सहज हो गया था कि उनकी मण्डुवे की खेती करने की पुरानी आदत थी। सो वर्ष 2016-17 में लक्ष्य के अनुसार 29750 क्विंटल उत्पादन भी हो गया।

कृषि विभाग ने भी यह कार्य थोड़ा सा तकनीक कायदे-कानून से सम्पादित किये। इस हेतु सबसे पहले 430 क्लस्टर बनाए गए और लगभग 22 हजार के कुल जोत में मण्डुवे की खेती करवाई गई। कारवाँ बढ़ता गया और बताया जाता है कि इस तरह के पहले ही प्रयास से 20 हजार किसानों को मण्डुवे की खेती का लाभांश पहुँचा। यही नहीं प्रति क्विंटल पर तीन सौ रुपए का बोनस भी किसानों को मिला।

बीज बचाओ आन्दोलन से जुड़े विजय जड़धारी का कहना है कि जब गन्ना के किसानों का बोनस मिलता है तो पहाड़ पर खेती करने वाले किसानों को क्यों नहीं। उनका सुझाव है कि पहाड़ी किसानों को पहाड़ी उत्पादों पर समर्थन मूल्य भी मिलना चाहिए ताकि लोगों की चाहत फिर से पहाड़ी उत्पादों को पैदा करने में जागृत हो उठे।

अभूतपूर्व संकट

Author: 
भागीरथ, शौरिया नियाजी, रवि कुमार, पीएस राठौर
Source: 
डाउन टू अर्थ, फरवरी 2018

गुजरात में बीजेपी को किसानों की नाराजगी झेलनी पड़ी। इस साल होने वाले विधानसभा और अगले साल लोकसभा चुनावों में कितनी भारी पड़ेगी यह नाराजगी?

दिसम्बर 2017 में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश 52 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर चुके हैं और केन्द्र सरकार से 11,186 करोड़ रुपए के संयुक्त पैकेज की माँग कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल और तमिलनाडु ने अपने 50 प्रतिशत जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है और 54,772 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद माँगी है। साफ है जिन राज्यों में चुनाव हैं वहाँ खेती पर बड़ा संकट मँडरा रहा है। पिछले साल फरवरी और अप्रैल के बीच मुआवजे और फसलों के उचित दाम की माँग को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। देश भर के किसान इस समय अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं। उनकी नाराजगी की बानगी 23 फरवरी को दिल्ली में दिखाई देने वाली है। राष्ट्रीय किसान महासंघ के बैनर तले तमाम राज्यों के किसान दिल्ली घेराव के लिये पहुँचेंगे। ऐसा पहली बार है जब करीब 60 किसान संगठन इतनी बड़ी संख्या में सत्ता तक आवाज पहुँचाने के लिये एकजुट हुए हैं।

किसानों का मर्सिया

Author: 
रिचर्ड महापात्रा
Source: 
डाउन टू अर्थ, फरवरी 2018

भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से के लिये कृषि आजीविका का स्रोत बनी रही। 2014-15 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस सेक्टर ने करीब 13 फीसदी का योगदान दिया था। 1971 से कृषि में लगे श्रमिकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। हालांकि, 2001 से 2011 के बीच किसानों की संख्या में कमी आई है। कृषि मजदूरों की संख्या 107 मिलियन से बढ़कर 144 मिलियन हो गई। इसके विपरीत, कृषि मजदूरों की संख्या 2004-05 के 92.7 मिलियन से घटकर 2011-12 में 78.2 मिलियन हो गई।

सफलता की नई कहानियाँ गढ़ती कृषक महिलाएँ

Author: 
डॉ. जगदीप सक्सेना
Source: 
कुरुक्षेत्र, जनवरी, 2018

कृषक महिलाओं के सशक्तिकरण को वर्तमान सरकार ने गम्भीरता से लिया है और माना है कि कृषि विकास की हर योजना में महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इसके लिये योजनाओं में आवश्यक प्रावधान भी किये गए हैं। भारत सरकार के महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में आवंटित बजट की 30 प्रतिशत राशि कृषक महिलाओं के लिये निर्धारित की गई है। इसका लाभ कृषक महिलाओं को उन्नत कृषि प्रणालियों का प्रशिक्षण देने में भी मिल रहा है।

रासायनिक खादों के बढ़ते खतरे

Author: 
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
Source: 
दैनिक जागरण, 03 फरवरी, 2018

पिछले 50-60 सालों में जिंक, लौह, तांबा एवं मैग्नीशियम हमारी मिट्टी से खत्म से हो गये हैं। रासायनिक खादों के उत्पादन में ऊर्जा का जो अत्यधिक उपयोग होता है उसके भी दुष्परिणाम आने लगे हैं। अमोनिया खाद बनाने के लिये दुनिया की 5 फीसद जलाऊ गैस का उपयोग किया जाता है। चूँकि नाइट्रोजन खाद की माँग अधिक है इसलिये उसके उत्पादन से नाइट्रस ऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड के बाद दूसरा बड़ा वायु प्रदूषण का कारण बन रहा है।

फसलों के लिये संजीवनी बनी ठंडक और धुंध

Author: 
फतह सिंह उजाला
Source: 
प्रयुक्ति, 30 जनवरी, 2018

मौसम में बनी ठिठुरन और धुंध ने बेशक आम आदमी की परेशानी बढ़ाने का काम किया है लेकिन यह ठंडक और धुंध का मौसम रबी की फसलों के लिये संजीवनी से कम नहीं है। रबी की फसल गेहूँ, सरसों और जौ के लिये हाल ही में हुई हल्की बूँदाबाँदी एक प्रकार से संजीवनी साबित होगी, क्योंकि फसलों की बीजाई के बाद से ही किसान कम-से-कम एक बरसात होने का इन्तजार कर रहे थे। अन्ततः किसानों की यह तमन्ना कुदरत ने पूरी कर दी। किसानों ने इस मौसम को फसलों के अधिक अनुकूल ठहराया है। हल्की फुहारों में भीगी सरसों की फसल पर लगे पीले फूल सोने की तरह से चमकने लगे हैं।

मौसम विज्ञान रबी की फसल की बीजाई के बाद से अभी तक फसलों की प्राकृतिक सिंचाई के अनुकूल बरसात नहीं हो सकी थी। नहरी पानी का अभाव है और ट्यूबवेल से फसलों की सिंचाई के लिये जरूरत के मुताबिक बिजली भी नहीं मिलती है। ऐसे में किसान पूरी तरह से या तो राम भरोसे या फिर मौसम पर ही निर्भर है। जनौला के गिरवर यादव का कहना है कि ऐसे मौसम में राम जी कम-से-कम एक बरसात कर दें तो, यह बरसात एक किला फसल में दो कट्टे खाद की खुराक का काम करती है। फिलहाल गिरा हुआ तापमान गेहूँ की फसल के लिये अधिक फायदेमन्द है।

खेड़ा खुर्रमपुर के श्रीचंद का कहना है कि मौसम में बनी ठंडक और धुंध कोहरे के रूप में गिरने वाली ओस की फुहार से एक तरह से फसलों की कुदरती सिंचाई कर रही है। खोड़ गाँव के रमेश का कहना है कि सरसों की फसल पटौदी क्षेत्र में पछेती बीजाई की जाती है।

 

कन्फेक्शनरी के काम आएगी मूंगफली की नई किस्म

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 22 जनवरी, 2018

नई दिल्ली : भारतीय वैज्ञानिकों ने मूंगफली की ऐसी किस्म विकसित की है जो किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि देश के किसान कन्फेक्शनरी उत्पादों में बहुतायत में उपयोग होने वाली तेल की उच्च मात्रा युक्त मूंगफली इस नई किस्म की खेती करके फायदा उठा सकते हैं। जल्दी ही मूंगफली की यह किस्म भारत में जारी की जा सकती है।

ग्रीनहाउस में विकसित किए गए मूंगफली के नए पौधों के साथ डॉ. जैनीला मूंगफली की इस किस्म को हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्ण-कटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (इक्रीसैट) के शोधकर्ताओं ने देश के अन्य शोध संस्थानों के साथ मिलकर विकसित किया है। इसे विकसित करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि “यह स्पेनिश एवं वर्जीनिया गुच्छे वाली मूंगफली की प्रजाति है, जिसे भारत में खेती के लिए अनुकूलित किया गया है।”

कई कन्फेक्शनरी उत्पादों में मूंगफली इस किस्म का उपयोग होता है और इसका बाजार तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन मूंगफली की खेती करने वाले भारत के किसानों को कन्फेक्शनरी के बढ़ते बाजार का फायदा नहीं मिल पा रहा था क्योंकि इस उद्योग में उपयोग होने वाली उच्च तेल की मात्रा युक्त मूंगफली वे मुहैया नहीं करा पा रहे थे। मूंगफली की इस किस्म की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए यह नई प्रजाति विकसित की गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मूंगफली की इस प्रजाति की माँग काफी अधिक है और इसकी खेती करने से देश के छोटे किसानों को खासतौर पर फायदा हो सकता है।