Latest

बारानी खेती में बुन्देलखण्ड की लाल मिट्टियों में संसाधन संरक्षण एवं उत्पादन हेतु अरंड और मूँग की अन्तःफसली खेती

Author: 
प्रशांत कुमार मिश्रा
Source: 
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, दतिया (मध्य प्रदेश)

परिचय


1. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत खेत खरीफ ऋतु में परती छोड़ दिये जाते हैं।
2. लगभग 53 प्रतिशत क्षेत्र में बारानी खेती की जाती है।
3. असामान्य वर्षा एवं वर्षा ऋतु में भी, बीच-बीच में लम्बे अन्तराल तक बारिश न होने के कारण सूखे की स्थितियों के कारण खरीफ में असफल फसलोत्पादन इस क्षेत्र की प्रमुख समस्या है।
4. इस क्षेत्र में लाल मिट्टियाँ 50 प्रतिशत से अधिक भू-भाग में, ऊँचाई वाले स्थानों तथा ऊँचे-नीचे धरातल पर पायी जाती हैं, जिसके कारण वर्षा के जल का एक बड़ा भाग, अपवाह के रूप में बहकर व्यर्थ चला जाता है तथा वह अपने साथ काफी मात्रा में खेत की उपजाऊ मिट्टी एवं पोषक तत्व भी बहाकर ले जाता है।
5. वर्षा ऋतु में खाली पड़े खेतों में, कम अवधि की दलहनी फसल के साथ-साथ एक सूखा प्रतिरोधी फसल को एक उचित अन्तःफसली फसल प्रणाली के अन्तर्गत उगाकर, बारानी दशा में संसाधन संरक्षण के साथ-साथ सफल उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है।
6. बारानी दशा में, बुन्देलखण्ड की लाल मिट्टियों में अरंड + मूँग की अन्तःफसली खेती, भू-अपरदन को कम करने तथा टिकाऊ उत्पादन प्राप्त करने के लिये उपयुक्त है।

अरंड + मूँग की अन्तःफसली खेती क्यों?


अरंड + मूँग की अन्तःफसली खेती के अन्तर्गत यह फसलें बहुत शीघ्र बढ़कर भूमि की सतह को ढक लेती हैं तथा वर्षा की बूँदों की मृदा कटाव करने की प्रहारक क्षमता को काफी कम कर देती हैं। परिणामस्वरूप, मृदा अपरदन कम होता है तथा बारानी दशा में भी टिकाऊ उत्पादन प्राप्त होता है।

तकनीक को अपनाने के सोपान
खेत की तैयारी


अप्रैल + मई के महीने में, खेत की मिट्टी पलटने वाले हल, तत्पश्चात हैरो से जुताई करके खेत की तैयारी करनी चाहिए। इससे खरपतवार तथा कीट एवं बीमारियों के नियंत्रण के साथ-साथ भूमि में अधिक मात्रा में वर्षाजल के संचयन में सहायता मिलती है।

प्रजातियाँ

हरी खाद द्वारा बुन्देलखण्ड की लाल मिट्टियों में संसाधन संरक्षण एवं उत्पादकता वृद्धि

Author: 
प्रशांत कुमार मिश्रा
Source: 
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, दतिया (मध्य प्रदेश)

बुन्देलखण्ड क्षेत्र मध्य भारत में स्थित है तथा इसका भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 70.4 लाख हेक्टेयर है। इस क्षेत्र में लाल मिट्टियाँ लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्रफल में पायी जाती हैं। ये मिट्टियाँ कम से मध्यम गहराई की हैं तथा कम उर्वरा शक्ति होने के कारण इनकी उत्पादन क्षमता भी कम है। लाल मिट्टियाँ मुख्यतः ऊँचे स्थानों पर पाई जाने के कारण उनसे वर्षा ऋतु में वर्षा के जल का अधिकांश भाग बहकर व्यर्थ चला जाता है। इस क्षेत्र में प्रचलित परती-गेहूँ फसल चक्र के कारण अधिकांश पोषक तत्व मिट्टी के कटाव, तत्वों के रिसाव एवं खरपतवारों द्वारा उद्ग्रहण आदि से नष्ट हो जाते हैं। सीमित संसाधनों के कारण इस क्षेत्र के किसान रासायनिक उर्वरकों पर अधिक धन व्यय नहीं कर सकते अतः हरी खाद इस क्षेत्र की मृदा की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता बढ़ाने तथा मृदा क्षरण को कम करने के लिये अच्छा विकल्प है। अतः बुन्देलखण्ड के किसान वर्षा ऋतु (खरीफ) में हरी खाद की फसल लेकर लाभान्वित हो सकते हैं।

परिचय


1. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत खेत खरीफ ऋतु में परती छोड़ दिये जाते हैं।
2. लाल मिट्टियाँ, जो इस क्षेत्र में लगभग 50 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रफल में पायी जाती हैं, की उत्पादन क्षमता, मिट्टी की कम जल धारण क्षमता, कम उर्वरता एवं मिट्टी की कम गहराई के कारण बहुत कम है।
3. मुख्यतः ये मिट्टियाँ पहाड़ियों से सटे क्षेत्रों में ऊँचाई वाले स्थानों पर पायी जाती हैं जिसके कारण वर्षा के जल का अधिकांश भाग अपवाह के रूप में बहकर व्यर्थ चला जाता है।
4. इस क्षेत्र में ‘परती-गेहूँ’ फसल चक्र मुख्य रूप से अपनाया जाता है जिसके कारण वर्षा ऋतु में काफी मात्रा में मृदा क्षरण तथा पोषक तत्वों का खेतों से ह्रास होता है।
5. इस क्षेत्र में वर्षा ऋतु में, हरी खाद की फसल को उगाकर ढालू खेतों से मृदा क्षरण को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है तथा साथ ही साथ खेत की मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक अवस्था, जल धारण क्षमता तथा उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाया जा सकता है।

हरी खाद क्यों?

सामूहिक सम्पदा पर माफियाओं का बढ़ता कब्जा


उल्लेखनीय हो कि इस पर्वतीय राज्य में 1960-64 के दौरान एक भूमि बन्दोबस्त हुआ था जिसे फिर 40 वर्ष बाद यानि 2004 में करना था। कम से कम नये राज्य में तो पहले भूमि बन्दोबस्त होना ही चाहिए था जो नहीं हुआ। इसलिए सामूहिक और व्यक्तिगत संसाधनों पर लूट मची है। यह तो स्पष्ट होता है कि भूमि के मामलों में सैटेलाइट सर्वे झूठे आंकड़े प्रस्तुत कर रहा है।

चोपड़ियाली गाँव के कृषि-कर्मयोगी मंगलानंद

Author: 
नमिता

पंतनगर यूनिवर्सिटी ने आड़ू को दिया मंगलानंद का नाम। ‘अर्ली एम रेड आड़ू’ इसमें ‘एम’ अक्षर मंगलानंद के नाम को प्रदर्शित करता है। उत्तराखण्ड के लिये वरदान साबित हो सकता है विदेशी फल ‘किवी’ को यदि स्वरोजगार का जरिया बनाया जाये तो कैसा होगा? वैसे भी स्वदेशी फल किसी किवी से कम नहीं है। इस राज्य में प्रकृति ने जैसे विविध रंग भरे हैं वैसे ही यहाँ के कुछ कर्मयोगी लोग नगदी और फलोत्पादन में ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। भले ही सरकारी बजट उनके काम ना आ रहा हो परन्तु सरकारी बजट को ये कर्मयोगी आइना बताने का काम जरूर कर रहे हैं। यह कर्मयोगी उत्तराखण्ड मसूरी-धनोल्टी-चंबा मोटर मार्ग पर स्थित चोपड़ियाली गाँव का मंगलानंद डबराल है। इनके पास ना तो कोई कृषि वैज्ञानिक जैसी डिग्री है और ना ही वे कृषि विषय में परास्नातक। परन्तु कृषि विज्ञानियों को श्री डबराल का कृषि ज्ञान मात देता है।

मंगलानंद का बगीचा पहले मसूरी-धनोल्टी-चंबा मोटर मार्ग अपनी बेमिसाल प्राकृतिक सुन्दरता और पर्यटन के लिये जाना जाता था अब नगदी फसलों और फलदार पट्टी के रूप में क्षेत्र ने नई पहचान बनाई है। पहचान बनाने में कोई सरकारी बजट और कोई योजना नहीं आई। यहाँ कर्मयोगी मंगलानंद डबराल हैं जो खेती-किसानी में नित नए प्रयोग करके न सिर्फ आम लोगों, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित कर रहे हैं। खेती में विभिन्न फसलों के सफल उत्पादन के बाद आज वे उत्तराखण्ड के पहले ऐसे किसान के रूप में पहचान बना चुके हैं, जो विदेशी फल ‘किवी’ का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं।

आ अब लौट चलें

Author: 
दीपान्विता गीता नियोगी
Source: 
डाउन टू अर्थ, नवम्बर 2017

खाद्य निर्भरता के लिये दुनिया अब कृषि की दस हजार साल पुरानी प्रारम्भिक व्यवस्था यानी पर्माकल्चर की ओर बड़ी उम्मीदों के साथ देख रही है। देश और दुनियाभर में इसके प्रयोग किए जा रहे हैं जो कामयाब भी हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पर्माकल्चर खाद्य संकट की समस्या का स्थायी समाधान पेश कर सकता है?

10 एकड़ के अरण्य फार्म में परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिये दो एकड़ में ही अनाज, दालें और तिलहन की फसल उगा ली जाती है। बाकी के आठ एकड़ में सदाबहार फलों के पेड़ और व्यवसायिक पेड़ों को उगाया गया है डाउन टू अर्थ ने जब जाहिराबाद (संगारेड्डी) के पस्तापुर गाँव में अरण्य फार्म का दौरा किया तो वहाँ आधुनिकता के कोई निशान दिखाई नहीं दिए। न तो खेती के प्रचलित उपकरण थे और न ही खाद्य उत्पादन के लिये प्रयोग होने वाला ट्रैक्टर नजर आया। हैदराबाद स्थित गैर लाभकारी अरण्य एग्रीकल्चरल ऑल्टरनेटिव इस फार्म को संचालित करता है। यह उस मोनोकल्चर (एकल कृषि) से भिन्न था जिसके हम आदी हैं।

खेत का पानी खेत में तो घर का कचरा बगीचे में क्यों नहीं

Author: 
डॉ. किशोर पंवार
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, 17 नवम्बर 2017

सुरसा की तरह विकराल होती शहरी कचरे की समस्या का कोई हल ढूँढने की आवश्यकता है। इस मानव जनित उपभोक्तावादी संकट से पार पाने के लिये नागरिकों को समन्वित प्रयास करने होंगे। कई छोटे-छोटे उपाय अपनाने होंगे। इनमें कचरे के सेग्रीगेशन से लेकर अपने घरों में कम्पोस्ट खाद बनाने के तरीके अपनाने होंगे। खेत का पानी खेत की तर्ज पर घरों का कचरा बगीचे में रखने की पैरवी करता प्रस्तुत आलेख।

खुशी की बात यह है कि म्यूनिसिपल वेस्ट का लगभग 50-60 प्रतिशत हिस्सा जैव अपघटनशील है। यानि इसका कम्पोस्ट बनाया जा सकता है। कचरा संग्रहण के विकेन्द्रीकरण की दिशा में इन्दौर नगर पालिका निगम ने एक और बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है। इसने अपने आधिपत्य के लगभग 500 से अधिक बगीचों में दो-दो कम्पोस्ट पिट बना दिये हैं। यानि अब इन बगीचों के कचरे को लैंडफिल स्थल तक परिवहन नहीं करना पड़ेगा।

फार्मर्स फील्ड - एक परिचय

Author: 
श्रीमती किरण सिंह
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

आज हमारे यहाँ कृषि उत्पादकता में जो प्रान्तीय खाई है उसे भी भरने की कोशिश की जानी चाहिए। फार्मर्स फील्ड स्कूल इसी दिशा में एक कदम है। यह किसानों को कृषि प्रसार एवं शोध के मुख्य धारा में लाने का एक मंच प्रदान करता है, जहाँ किसान अपनी समस्याओं एवं उसके समाधान की विवेचना तो करते ही हैं, साथ में नई तकनीक के विकास एवं प्रसार में भी उनकी सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित होती है। आज हम कृषि क्षेत्र में दूसरी हरित क्रान्ति की बात कर रहे हैं, पर सच यह है कि कुल कृषि योग्य भूमि के केवल 20 प्रतिशत क्षेत्र में ही पहले हरित क्रन्ति का लाभ हो पाया है। एक आकलन के अनुसार कृषि क्षेत्र में आज जितने भी तकनीक उपलब्ध हैं। उनमें से 70 प्रतिशत तकनीक का उपयोग किसानों द्वारा नहीं हो पाया है। दूसरे तरफ यह भी एक तथ्य है कि जिन तकनीकों को वैज्ञानिकों ने अपने परीक्षण में नकार दिया था आज उनमें से कुछ तकनीक का उपयोग किसान के खेतों में हो रहा है। जरूरत है शोध एवं प्रसार व्यवस्था में किसानों की अपेक्षाओं का समावेश किया जाय।

किसानों को सिर्फ तकनीक के बारे में जानकारी ही नहीं दी जाये बल्कि किसान उन तकनीकों को अपने खेतों में उपयोग में लाने की प्रवीणता भी हासिल करें। आज हमारे यहाँ कृषि उत्पादकता में जो प्रान्तीय खाई है उसे भी भरने की कोशिश की जानी चाहिए। फार्मर्स फील्ड स्कूल इसी दिशा में एक कदम है। यह किसानों को कृषि प्रसार एवं शोध के मुख्य धारा में लाने का एक मंच प्रदान करता है, जहाँ किसान अपनी समस्याओं एवं उसके समाधान की विवेचना तो करते ही हैं, साथ में नई तकनीक के विकास एवं प्रसार में भी उनकी सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित होती है।

लाख की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भागीदारी

Author: 
आर. के. सिंह एवं गोविन्द पाल
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

लाख की खेती में अन्य फसलों की अपेक्षा बहुत ही दक्षता एवं समय की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी खेती में बहुत ही आसान प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। यदि लाख की खेती को वैज्ञानिक तरीके अपना कर किया जाये तो यह अधिक आय एवं रोजगार का स्रोत होगा जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के लिये पलायन की समस्या को कम करेगा। लाख पोषक वृक्ष जो कि बहुतायत में बंजर भूमि में उपलब्ध है या ऐसी भूमि पर पोषक वृक्षों को लगाया जा सकता है जो कि खेती के लिये अनुपयुक्त समझी जाती है लाख की खेती से प्राप्त आय किसानों द्वारा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं एवं अन्य कृषि आगतों को खरीदने में प्रयोग किया जाता है।

प्राकृतिक खेती - कहानी मेरे अनुभवों की

Author: 
डॉ. आशुतोष अग्निहोत्री

यदि आप अपने बच्चों को प्यार करते हैं। उनको सुखी देखना चाहते हैं तो ये अपराध कैसे कर सकते हैं कि उनके लिये पीने का स्वच्छ पानी, स्वच्छ हवा, स्वच्छ खाद्यान्न भी छोड़कर नहीं जावें। ज्यादा उपज लेने के चक्कर में केमिकलों का उपयोग करके आखिर हम क्या कर रहे हैं? मेरे हिसाब से हमलोग तो स्वार्थी की श्रेणी में भी आने लायक नहीं हैं क्योंकि स्वार्थी इन्सान तो अपना स्व + अर्थ सिद्ध करता है।