बाँस मिशन आर्थिक समृद्धि का जरिया

Author: 
नीरेन्द्र देव
Source: 
योजना, अप्रैल 2018

पारम्परिक किसानों का तजुर्बा यह कहता है कि मक्का या बाजरे के साथ चावल की खेती करने पर प्रदर्शन बेहतर रहता है। आमतौर पर विभिन्न समुदाय के लोग अलग-अलग तरीके से खेती करते हैं। मसलन झूम खेती और दूसरी प्रणाली सीढ़ीनुमा खेती की है। सीढ़ीनुमा खेती को घाटियों और पहाड़ियों में अंजाम दिया जाता है, जबकि जंगल और आसपास के इलाकों में सिफ्टिंग या झूम सिस्टम के जरिए खेती की जाती है। यह खेती की बेहद पुरानी परम्परा है।

सोयाबीन में सुनहरा मौका

Author: 
संदीप सेन
Source: 
डाउन टू अर्थ, मई, 2018

सोयाबीन की खेतीसोयाबीन की खेती (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ आमने-सामने हैं जिसके कारण व्यापार युद्ध की प्रबल सम्भावना पैदा हो गई है।

2 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर लागू होने वाले व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत अल्युमिनियम और इस्पात के आयात पर भारी शुल्क लगा दिया। उन्होंने वाशिंगटन में उद्योग जगत के उपस्थित लोगों के बीच घोषणा करते हुए कहा, “यदि आप करों का भुगतान नहीं करना चाहते हैं तो अपने संयंत्र अमेरिका में लगाएँ।” बिजनेस न्यूज चैनल सीएनबीसी के एंकर जिम क्रैमर ने टिप्पणी करते हुए कहा, “ट्रम्प सरकार द्वारा आयातित स्टील पर प्रतिबन्ध लगाया गया है जिसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों के द्वारा समर्थन मिलना एक दुर्लभ उदाहरण है।”

हालांकि ट्रम्प ने इस छूट की घोषणा कनाडा और मैक्सिको के लिये ही की है और कहा है कि अन्य सहयोगियों के लिये भी अपवाद तैयार किये जा सकते हैं। कई लोगों का मानना है कि इस टैरिफ- स्टील पर 25 फीसदी और अल्युमिनियम पर 10 फीसदी का वास्तविक लक्ष्य चीन है, जो पूरे विश्व का आधा स्टील का निर्माण करता है और अक्सर इसे अन्य बाजारों में खपाने का आरोप भी लगाता रहा है, जिससे कीमतों में गिरावट होती है।

घर की जरूरतों ने गाँव की हुलिया बदल दिया

Author: 
राजकुमारी
Source: 
अमर उजाला, 11 मई 2018

मैं अपनी मेहनत से अपने परिवार की दशा बदलना चाहती थी। और इसके लिये मेरे पास जरिया सिर्फ खेती ही था। इसी प्रयास में मैं राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय गई, जहाँ से मैंने अपनी जमीन के अनुकूल खेती की उन्नत जानकारी हासिल की। फिर मैंने पपीते के साथ ओल (जिमीकंद) की खेती भी शुरू की। अपनी फसल को सीधे बाजार में बेचने के बजाय मैंने दूसरा रास्ता अपनाया। इस घटना को साढ़े तीन दशक से भी ज्यादा वक्त बीत चुका है। मैंने दसवीं की पढ़ाई पूरी ही की थी कि मेरी शादी कर दी गई। मैं अपने पति के साथ संयुक्त परिवार में रहने लगी। मेरे पति परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ तम्बाकू की खेती करते थे।

शादी को कुछ ही वक्त बीता था कि परिवार का बँटवारा हो गया, और मेरे पति के हिस्से में जमीन का एक टुकड़ा आया। जमीन का वही टुकड़ा हम पति-पत्नी के जीवन का सहारा था। मेरे पति अब भी तम्बाकू की खेती करते थे। चूँकि मैं थोड़ा पढ़ी-लिखी थी, सो मेरे दिमाग में समाज पर तम्बाकू के दुष्प्रभाव की बात चलती रहती थी।

मैंने अपने पति से भी यह साल पूछा कि आप तम्बाकू ही क्यों उगाते हैं। पर शायद मेरी चिन्ताएँ पति पर कोई असर डालने में नाकाम रहीं। यह देख मैंने खुद फावड़ा उठाने का फैसला लिया और अपने खेत के एक हिस्से में सब्जियों की खेती शुरू कर दी। इससे पहले मुझे खेती करने का कोई अनुभव नहीं था, मगर इच्छाशक्ति के बल पर मैं एक झटके में शर्मीली गृहिणी से महिला किसान में बदल गई।

स्मार्ट ग्रामीण जीवन के लिये गोबर धन योजना

Author: 
निमिष कपूर
Source: 
कुरुक्षेत्र, मार्च, 2018

गोबर धन योजनागोबर धन योजना देश के गाँवों में अब गोबर और कृषि अवशेष से ऊर्जा और समृद्धि का आगाज होने वाला है। बजट 2018 में ग्रामीणों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये सरकार ने एक अनूठा प्रयास किया है। ग्रामीण विकास के लिये एक नई योजना की घोषणा की गई है जिसका शीर्षक है गोबर धन योजना। यदि गोबर धन योजना देश के ग्रामीण अंचलों में समय से और वैज्ञानिक तरीके से लागू की जाती है तो देश के 155 गाँव सफलता की नई इबारत लिखेंगे, जिसमें किसान और पशुपालकों की आय के साधन बढ़ेंगे और वे वैज्ञानिक सोच के साथ देश की आर्थिकी में योगदान देंगे।

ग्रामीणों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये 2018-19 के बजट में गोबर-धन यानी गैलवनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्स धन योजना की घोषणा की गई है। इस योजना में खेती और पशुपालन से जुड़े एक बड़े जनसमूह की भागीदारी, उनका आर्थिक लाभ और समग्र विकास की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा इस योजना में परिलक्षित होती है।

गोबर धन योजना के अन्तर्गत पशुओं के गोबर और खेतों के ठोस अपशिष्ट पदार्थों को कम्पोस्ट, बायोगैस और बायो-सीएनजी में परिवर्तित किया जाएगा। समावेशी समाज निर्माण के दृष्टिकोण के तहत सरकार ने विकास के लिये 115 आकांक्षायुक्त जिलों की पहचान की है। इन जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, सिंचाई, ग्रामीण विद्युतीकरण, पेयजल, शौचालय तक पहुँच आदि में निवेश करके निश्चित समयावधि में विकास की गति को तेज किया जाएगा। सरकार जिन 115 जिलों को विकास का मॉडल बनाने की तैयारी में है, वहाँ गैलवनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्स धन योजना मुख्य भूमिका निभाएगी।

एमएसपी नहीं कृषि संकट का समाधान

Author: 
रिचर्ड महापात्रा
Source: 
डाउन टू अर्थ, अप्रैल 2018

50 प्रतिशत मूल्य तय कर देने से लागत पर किसानों का मुनाफा निर्धारित हो जाएगा। अगर लागत में 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़ भी दिया जाता है तब भी अधिकांश फसलों का थोक भाव और किसानों के मिलने वाले मूल्य में भारी अन्तर रहेगा। किसी भी उत्पाद का मूल्य निर्धारित करते वक्त इस तथ्य को ध्यान में रखना जरूरी है। इसका लाभ किसानों को मिलना चाहिए। अभी बाजार आधारित विक्रय पर जोर दिया गया है। इस मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। पिछले एक महीने से राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच केन्द्र सरकार एक अन्य संकट से गुजर रही है। इस संकट के लक्षण बहुत पहले से दिखाई दे रहे थे लेकिन अब लग रहा है कि सरकार की चुनावी महत्त्वाकांक्षा पर यह असर डालेगा। वह संकट कृषि का है। सरकार के सामने बम्पर उत्पादन के वक्त किसानों को कृषि उत्पादों की सही कीमत देने की चुनौती है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस संकट से निपटने के लिये उच्च स्तर पर बातचीत चल रही है। आगे चुनावों को देखते हुए किसानों के लिये किसी बड़ी राहत की घोषणा की जा सकती है।

यह जरूरी भी है। दरअसल मई 2019 में नई सरकार बनने तक भारत में बुआई के दो मौसम ही बचे हैं। प्रधानमंत्री ने विशेषज्ञों से मुलाकात की है और एक प्रतिष्ठित कृषि संस्थान में एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम का उद्घाटन किया है। उधर, नीति आयोग भी 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की जुगत में है।

जानकार बताते हैं कि सरकार फिलहाल इस लक्ष्य के प्रति गम्भीर नहीं है बल्कि सरकार कुछ उपायों द्वारा यह सन्देश देना चाहती है कि वह कृषि संकट के प्रति गम्भीर है। ऐसे में किसान एक बार फिर छले जाएँगे और ये उपाय राजनीतिक केन्द्रित होने के कारण कृषि के लिये लाभकारी नहीं होंगे।

कुपोषण और घाटे का इलाज है स्पिरुलिना शैवाल की खेती

Author: 
अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
डाउन टू अर्थ, अप्रैल, 2018

स्पिरुलिना शैवाल की खेती दिल्ली की बावड़ियों में भी सम्भव हैस्पिरुलिना शैवाल की खेती दिल्ली की बावड़ियों में भी सम्भव है (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)खेती में नुकसान, अधर में लटका भविष्य और कर्ज के बोझ से दबे किसान को अगर कम समय, कम लागत और अधिक लाभ का फार्मूला मिल जाये तो उसके दिन फिर जाएँगे। पर भारत जैसे देश में इस पेशे के प्रति जागरुकता की कमी और सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि हमारे पास कम लागत में अधिक कमाई का तरीका होते हुए भी उससे इस देश के किसान अनजान हैं। जी हाँ, स्पिरुलिना नामक शैवाल की खेती वह रास्ता है, जिससे किसानों के वारे-न्यारे हो सकते हैं। पर भारत में इसके बारे में 95 फीसदी लोगों को जानकारी ही नहीं है। ये बातें स्पिरुलिना फाउंडेशन के अध्यक्ष महेश और आर.वी. ने कही।

महेश पिछले डेढ़ दशक से स्पिरुलिना शैवाल की खेती कर रहे हैं और साथ ही इसे आमजन तक पहुँचाने के लिये तमाम कोशिशों में जुटे हैं। उन्होंने बताया कि स्पिरुलिना हरे-नीले रंग का एक शैवाल है। इस शैवाल में करीब 60 फीसदी प्रोटीन होता है।

संयुक्त राष्ट्र ने 1974 में ही स्पिरुलिना को धरती के लिये ‘भविष्य का सर्वश्रेष्ठ आहार’ घोषित कर दिया था। भारत दुनिया में स्पिरुलिना का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। इसके एक ग्राम के सेवन से एक किलो फल और सब्जी के बराबर का पोषण मिलता है। महेश कहते हैं “यह अजब अन्तर्विरोध है कि इस पोषणयुक्त स्पिरुलिना का उत्पादन दुनिया में सबसे ज्यादा भारत में होता है, बावजूद यह देश कुपोषण से जूझ रहा है।” यूनिसेफ के अनुसार, भारत में चार वर्ष से कम उम्र के 60 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।

भारत के समुद्री मछुवारों की जीविकोपार्जन समस्याएँ

Author: 
एस. शिवकामी
Source: 
मात्स्यिकी और जल कृषि में जीविकोपार्जन मसले, केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोचीन, केरल

भूमिका
. भारतीय मात्स्यिकी भारत की अनन्य आर्थिक मेखला में वितरित समुद्री मात्स्यिकी सम्पदाओं के ज्यादातर उत्पादन में और विदेशी मुद्रा अर्जित करने में तुले हुए हैं। यद्यपि, मछलियों के बढ़ते हुए सन्दोहन, अन्त में देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के प्रयोजन में आता है तथापि मछुआरों की जीविका को सुधारने में कम महत्त्व ही दिया जाता है। मछुआरे और मत्स्य कृषक मछली सम्पत्ति और देश की अर्थव्यवस्था के बीच की एक अनिवार्य कड़ी होते हुए भी उनके आवश्यकताओं और हितों पर बहुत कम मान्यता दी गई है। ऐसी स्थिति के लिये कई अन्तरनिहित बातें संजात हुई हैं और इनमें सुधार लाने के लिये अनुसन्धानकर्ताओं, प्रशासकों और नीति बनाने वाले अधिकारियों और गैर सरकारी संगठनों के संयोजित प्रयास की जरूरत है ताकि ये गरीबी, ऋण बाध्यता और बेरोजगारी जैसी बुराईयों से छुटकारा पाया जा सके और उनकी जीविका रीतियों में उन्नयन आ जा सके।

समुद्री मात्स्यिकी क्षेत्र की वर्तमान स्थिति

जलकृषि का पर्यावरणीय प्रभाव - एक मूल्यांकन

Author: 
पी. जयशंकर
Source: 
उत्तरदायित्वपूर्ण मात्स्यिकी और जलकृषि, केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोचीन, केरल, मत्स्यगंधा 2004

पहल

आज कृषि कार्यों में उपयुक्त प्रबंधन उपायों के जरिए अपशिष्टों का उत्पाद एवं बहिस्राव कम करने पर ध्यान देने की प्रवणता बढ़ रही है। ये प्रयास परम प्रधान भी है और भविष्य में पर्यावरणीय मूल्यांकन और किये गये उपायों की पर्यावरणीय दक्षता जाँचने के लिये मॉनिटरिंग कार्य भी बढ़ जाएगा।

सिंचाई व्यवस्थाओं के साथ मछली पालन का एकीकरण - एक नया व्यवस्थित दृष्टिकोण

Author: 
डॉ. के. पलनिसामी, इंजीनियर सी. मयिलसामी, जी. धनलक्ष्मी, जे. डास्वमंड मेनका, आ. गणेश कुमार एवं विनुप्रिया
Source: 
पानी तकनीकी केन्द्र, तमिलनाडु कृषि विश्व विद्यालय कोयम्बत्तूर, तमिलनाडु, मत्स्यगंधा 2001

भूमिका
महाशीर मछली पालन सिंचाई व्यवस्थाओं के अंदर मछली पालन जो कभी-कभी एक तरह का उत्पादन अथवा पालन माना जाता है, करीब दो हजार सालों के पहले से ही प्रचलित एक व्यवसाय है। यद्यपि यह कभी लिखित रूप में नहीं दर्ज हुआ है तथापि धान के खेतों में खासकर, भूमध्य रेखा के नजदीक के प्रदेशों में यह व्यापक रूप में फैला हुआ था। इस शताब्दी में थल पर उगाये जाने वाले धानों की प्रगतिशील प्रबंध एवं जलीय आयोजनों को सफलतापूर्ण उत्पादन के मांगों की पूर्ति, दोनों को एक साथ सामना करना आसान नहीं था। पर धान उत्पादन का एकीकरण इस वातावरण को पूर्ण रूपेण बदल दिया है। अलावा इसके, पिछले 50 सालों से पानी को बांधकर अथवा नदियों की रास्ता को घुमाकर, उस पानी से सिंचाई के प्रबंध तेजी से बढ़ गये हैं पर इन व्यवस्थाओं के अंतर्गत मछली - उत्पादन ने उसी अनुपात में प्रगति नहीं की है। अत: इस दिशा में एकीकरण की गयी व्यवसाय की सफलता के बारे में जाँच पड़ताल करना चाहिए।