नया ताजा

पसंदीदा आलेख

आगामी कार्यक्रम

खासम-खास

Submitted by HindiWater on Sat, 11/30/2019 - 10:06
मध्यप्रदेश के परम्परागत तालाबों का जल विज्ञान
मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड, बघेलखंड, मालवा तथा महाकोशल अंचलों में परम्परागत तालाबों की समृद्ध परम्परा रही है। इस परम्परा के प्रमाण सर्वत्र मिलते हैं। सबसे पहले उनकी आंचलिक विशेषताओं पर सांकेतिक जानकारी। उसके बाद परम्परागत जल विज्ञान का विवरण।

Content

Submitted by HindiWater on Wed, 10/29/2014 - 12:53
Source:
Pratap Sagar Talab
यहां पचास हजार से अधिक कुएं हैं कोई सात सौ पुराने ताल-तलैया। केन, उर्मिल, लोहर, बन्ने, धसान, काठन, बाचारी, तारपेट जैसी नदियां हैं। इसके अलावा सैंकड़ों बरसाती नाले और अनगिनत प्राकृतिक झिर व झरने भी इस जिले में मौजूद हैं। इतनी पानीदार तस्वीर की हकीकत यह है कि जिला मुख्यालय में भी बारिश के दिनों में एक समय ही पानी आता है।

होली के बाद गांव-के-गांव पानी की कमी के कारण खाली होने लग जाते हैं। चैत तक तो जिले के सभी शहर-कस्बे पानी की एक-एक बूंद के लिए बिलखने लगते हैं। लोग सरकार को कोसते हैं लेकिन इस त्रासदी का ठीकरा केवल प्रशासन के सिर फोड़ना बेमानी होगा, इसका असली कसूरवार तो यहां के बाशिंदे हैं, जिन्होंने नलों से घर पर पानी आता देख अपने पुश्तैनी तालाबों में गाद भर दी थी, कुओं को बिसरा कर नलकूपों की ओर लपके थे और जंगलों को उजाड़ कर नदियों को उथला बना दिया था।

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में पानी की किल्लत के लिए अब गरमी का इंतजार नहीं करना पड़ता है। सरकारी योजनाएं खूब उम्मीदें दिखाती हैं लेकिन पानी की तरावट फाईलों से उबर नहीं पाती है।

गांव का नाम ही है - बनी तलैया। लौंडी ब्लाक के इस गांव के नाम से ही जाहिर होता है कि यहां एक तलैया जरूर होगी। यहां के रहवासियों के पुरखे, अपनी पानी की जरूरतों के लिए इसी तलैया पर निर्भर थे। सत्तर का दशक आते-आते आधुनिकता की ऐसी आंधी गांव तक बह आई कि लोगों को इस तालाब की सफाई करवाने की सुध ही नहीं रही। फिर किसी ने उसके पुराने बंधन को तोड़ डाला, लिहाजा साल भर लबालब रहने वाला तालाब बरसाती गड्ढा बन कर रह गया।

तालाब सूखे तो गांव की तकदीर भी सूख गई- कुओं का जल स्तर घट कर तलहटी पर पुहंच गया। नब्बे का दशक आते-आते विपत्ति इतनी गहरा गई कि लोगों को गांव छोड़ कर भागना पड़ा। यह कहानी कोई एक गांव की नहीं है, जिले के कई गांव-मजरे-बसावटें बीते चार दशकों के दौरान पानी की कमी के चलते वीरान हो गए। चूंकि वहां सदियों से जीवन था यानी वहां पर्याप्त जल संसाधन भी थे जिन्हें आजादी के बाद लोगों ने उपेक्षित किया।

पठार और पहाड़ी बाहुल्य छतरपुर जिले की पुरानी बसाहट पर एक नजर डालें तो पाएंगे कि छतरपुर हो या बक्सवाहा या फिर खजुराहो; हर बस्ती के मुहाने पर पहाड़ जरूर मौजूद हैं। इस पहाड़ से सटा कर तालाब खोदना यहां की सदियों पुरानी परंपरा रही। बेहतरीन कैचमेंट एरिया वाले ये तालाब चंदेल राजाओं यानी 900 से 1200वीं सदी में बनवाए गए थे।

उस काल में वैज्ञानिक समझ बेहद उन्नत थी- हर तालाब में कम बारिश होने पर भी पानी की आवक, संचयन, जावक और ओवर फ्लो निर्मित किए गए थे। अंग्रेज शासक तो इस तकनीक को देख कर चकित थे। उन्होंने जिले की अधिकांश सिंचाई परियोजनाएं इन्हीं तालाबों पर स्थापित की थीं। धीरे-धीरे इनमें मिट्टी, नजदीकी पेड़ों की पत्तियां और इलाके भर की गंदगी गिरने लगी।

तालाबों की देखभाल का सरकारी बजट एक तो ना के बराबर था और जितना था वह कभी तालाब तक पहुंचा ही नहीं। जब लोगों को बूंद-बूंद तरसते हुए अपने ‘‘जल-पुरखों’’ का ध्यान आया तब तक वहां जमी गाद ने तालाबों को नहीं, वहां के निवासियों की तकदीर को जाम कर दिया था। राज्य में दिग्गीराजा के काग्रेस शासन में ‘‘सरोवर हमारी धरोहर’’ योजना आई तो शिवराज सिंह सरकार ने ‘जलाभिषेक’ का नारा दिया- तालाब चमकने तो दूर उन पर हुए कब्जे हटाने से भी सरकारी महकमे ने मुंह मोड़ लिया - जिला मुख्यालय के सांतरी तलैया, किशोर सागर जैसे कई विशाल तालाबों पर दुकानें, मकान बन गए, पानी के आवक-निकास के रास्ते ही बंद कर दिए गए।

पठार और पहाड़ी बाहुल्य छतरपुर जिले की पुरानी बसाहट पर एक नजर डालें तो पाएंगे कि छतरपुर हो या बक्सवाहा या फिर खजुराहो; हर बस्ती के मुहाने पर पहाड़ जरूर मौजूद हैं। इस पहाड़ से सटा कर तालाब खोदना यहां की सदियों पुरानी परंपरा रही। बेहतरीन कैचमेंट एरिया वाले ये तालाब चंदेल राजाओं यानी 900 से 1200वीं सदी में बनवाए गए थे। उस काल में वैज्ञानिक समझ बेहद उन्नत थी- हर तालाब में कम बारिश होने पर भी पानी की आवक, संचयन, जावक और ओवर फ्लो निर्मित किए गए थे। अंग्रेज शासक तो इस तकनीक को देख कर चकित थे। फिर तालाब पर कब्जा कर काटी गई कालेानियों का मल-जल यहां गिरने लगा व ये जीवनदायी तालाब नाबदान बन गए। गहरा करने, सौंदर्यीकरण के नाम पर बजट फूंका जाता रहा और तालाबों का क्षेत्रफल शून्य की ओर सरकता रहा। किशोर सागर से अक्रिमण हटाने पर तो पिछले सप्ताह ही राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने दखल दिया है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत भ्रमण पर आया था तो उसने अपने वृतांत में दर्ज किया है कि खजुराहो में एक मील योजन में फल एक तालाब था। आज उसी खजुराहो व उससे चार किलोमीटर दूर स्थित कस्बे राजनगर में एक-एक बूंद पानी के लिए मारा-मारी मची है। राजनगर का विशाल तालाब, खजुराहो के प्रेम सागर व शिवसागर बदबूदार नाबदान बन कर रह गए हैं।

खजुराहों मंदिरों के एक हजार साल होने पर वहां कई आयोजन हुए थे, उसी समय तालाबों की रंगाई-पुताई कर चमकाया गया था, लेकिन तालाब ऊपरी साज-सज्जा के मोहताज नहीं होते, उनका गहना तो निर्मल जल होता है। शिवसागर से सटा कर कोई हजार पेड़ यूक्लेपिटस के लगा दिए गए थे - एक तो ये पेड़ ही पानी सोखता है, फिर इसकी पत्तियों के कचरे ने तालाब को उथला कर दिया।

छतरपुर जिले के 57 तालाब सिंचाई विभाग के पास है जिन पर रखरखाव के नाम पर खर्च पैसे का पिछले पचास साल का हिसाब लगाया जाए तो जिले की एक-एक इंच जमीन पर कई फुट गहरे तालाब खोदे जा सकते थे। पैसा कैसे खर्च होता है, इसकी बानगी जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर ईसानगर में देख लें - कुख्यात माफिया सरगना व विधायक अशोकवीर विक्रम सिंह उर्फ भैयाराजा की रिहाईश वाले इस गांव के तालबों का क्षेत्रफल 535 एकड़ और पानी भरने की क्षमता 100.59 मिलियन घन फुट हुआ करती थी।

सालों से इसका पानी इलाके के खेतों को सींचता था। इसके अलावा यहां पैदा होने वाली कमल, सिंघाड़े, मछली से कईं घरों का चूल्हा जला करता था। सन् 1989 में सिंचाई विभाग के इंजीनियर द्वारा जारी सिंचाई उपलब्धि तालिका में इस तालाब का सिंचाई रकबा शून्य दर्ज किया गया। जो ताल एक साल पहले तक 400 हेक्टेयर खेत को सींचता था वह अचानक कैसे सूख गया? वह तो भला हो उ.प्र. पुलिस का जो एक हत्या के मामले में भैयाराजा को गिरफ्तार करने आई तो खुलासा हुआ कि उदयपुर के ‘लेक पैलेस’ की तर्ज पर अपना जल महल बनाने के लिए भैयाराजा ने तालाब पर अपना कब्जा कर वहां पक्का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया था।

यही नहीं सन् 1989-90 में तालाब के रखरखाव पर सूखा राहत कार्य के नाम पर साढ़े तीन लाख रूपए खर्च भी दिखाए गए। मार्च-91 में जिला प्रशासन चेता और डायनामाईट से राजा का कब्जा उड़ाया गया, तब जा कर पता चला कि तालाब पर खर्च दिखाया जा रहा पैसा असल में जल महल पर खर्च हो रहा था। समूचे जिले में ऐसे तालाब, जल महल और भैयाराजा चप्पे-चप्पे पर फैले हुए हैं जिनके सामने सरकार व समाज बेबस दिखता है।

यह इलाका ग्रेनाईट पत्थर संरचना वाला है और यहां भूगर्भ जल बेहद गहराई पर है जिसे मत्थर चीर कर ही हासिल किया जा सकता हे। अस्सी के दशक में कई नेताओं ने सेलम (तमिलनाडु) से जमीन का सीना चीर कर पाताल पानी उगाहने की मशीनें मंगवाईं और जहां किसी ने पानी के संकट की गुहार लगाई वहां नलकूप रोप दिया गया।

असल में वे नलकूप जमीन के गर्भ का नहीं, बल्कि बारिश के दौरान जमीन से रिस कर नीचे पहुचे पानी जो ग्रेनाईट के कारण जमा हो जाता है को उलीछ रहे थे। बेतहाशा जल निकासी से आसपास के कुंओं का जल स्तर घटता गया। उन कुओं को पानी से हरा-भरा रखने वाले ताल-तलैया खत्म हुए तो कुंए भी खत्म हो गए। नलकूप का तिलिस्म तो टूटना ही था।

अब सरकारी अफसर चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि ताल-तालाब खत्म होने से ‘‘ग्राउंड वाटर रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं। जहां बड़े तालाब हैं वहीं नलकूप भी सफल हैं। तालाबों को संरक्षण नारा तो बन गया है लेकिन उन पारंपरिक रास्तों पर बने अवैध निर्माण हटाने को कोई राजी नहीं है, जिन रास्तों से हो कर बारिश की हर बूंद तालाबों तक पहुंचती थी।

Submitted by HindiWater on Wed, 10/29/2014 - 11:34
Source:
well
हाल ही में कर्नाटक से सुखद खबर आई है कि वहां कुओं को फिर से पुनर्जीवित किया जा रहा है। बेलगांव शहर में जो कुएं सूख गए थे, गाद या कचरे से पट गए थे उनका नगर निगम और नागरिकों ने मिलकर कायाकल्प कर दिया है। और शहर की करीब आधी आबादी के लिए कुओं से पीने के पानी की आपूर्ति की जा रही है।


बेलगांव में 1995 में जब पीने के पानी का मुख्य स्रोत सूख गया तब वैकल्पिक पानी के स्रोतों की खोज हुई। यहां के वरिष्ठ नागरिक मंच ने कुओं का कायाकल्प करने का सुझाव दिया। इस पर अमल करने से पहले गोवा विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रमुख चाचडी से सलाह मांगी। उन्होंने इसका अध्ययन इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी।

बहरहाल, यह एक आसान काम नहीं था। यहां कुएं से गाद निकालने के लिए भारी यंत्रों का इस्तेमाल करना संभव नहीं था और मजदूर भी इस काम को नहीं करना चाह रहे थे। तब एक स्थानीय आदमी रस्सी और घिर्री के सहारे कुएं में नीचे उतरा और उसने गाद को बाल्टी में भरा और ऊपर खींच लिया। इसी प्रकार अन्य कुओं का भी कायाकल्प किया गया।

इस तरह 21 बड़े और 32 छोटे कुओं को पुनर्जीवित किया जा चुका है। इनमें से एक बारा घादघायची विहिर भी शामिल है जो 1974 तक पीने के पानी का मुख्य स्रोत था।

अब इन कुओं से शहर की 2 लाख आबादी को पीने का पानी मुहैया कराया जा रहा है, जबकि कुल आबादी 5 लाख है। इस कदम से भूजल से सतही जल और बढ़ेगा।


20-25 साल पहले गांवों में लोग कुओं से पानी भरते थे। सुबह और शाम कुओं पर भारी भीड़ हुआ करती थी। महिलाएं कुओं पर पानी भरती थी।

जब सार्वजनिक कुओं में गाद या कचरा हो जाता था तब गांव और मुहल्ले के लोग मिलकर उसकी साफ-सफाई करते थे। इन पर लोग नहाते थे तो इस बात का ख्याल रखा जाता था कि गंदगी न हो और गंदा पानी वापस कुओं में न जाए।


छत्तीसगढ़ में मरार और सोनकर समुदाय के लोग अपने कुओं में टेड़ा पद्धति से सिंचाई करते हैं। टेड़ा पद्धति में कुएं से पानी निकालने के लिए बांस के एक सिरे पर बाल्टी और दूसरे सिरे पर वजनदार पत्थर या लकड़ियां बांध देते हैं जिससे पानी खींचने में आसानी हो।

टेड़ा से सब्जी-भाजी की सिंचाई होती हैं। वहां अब भी ग्रामीण अपनी बाड़ियों में अपने घर के उपयोग के लिए भटा, टमाटर, मूली, प्याज, लहसुन, धनिया और अन्य सब्जियां लगाते हैं।

आज जब जल संकट बहुत विकट रूप से सामने आ रहा है, कुएं पानी का स्थायी स्रोत साबित हो सकते हैं। भूजल स्तर हर साल नीचे खिसकता जा रहा है। कुएं पीढ़ियों तक हमारा साथ दे सकते हैं, हैंडपंप और नलकूप नहीं।

कुओं से हम उतना ही पानी निकालते हैं जितनी जरूरत होती है। जबकि नलकूप या मोटर पंप में व्यर्थ ही पानी बहता रहता है। सार्वजनिक नलों का भी यही हाल है। फिर ये इतनी भारी पूंजी वाली योजना है कि नगर निगम, नगर पालिका या ग्राम पंचायत इनका खर्च भी वहन नहीं कर पाती।

पानी के निजीकरण की कोशिशें चल रही हैं, नदियों से पानी शहरों को दिया जा रहा है, नदी जोड़ योजनाएं चल रही हैं। न तो वे स्थाई जलस्रोत हैं और न ही सस्ती। इसलिए हमें कुओं, तालाब और नदियों के कायाकल्प की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए। फिलहाल, कर्नाटक से कुओं के कायाकल्प की खबर सराहनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है।

Submitted by Hindi on Mon, 10/27/2014 - 16:42
Source:
भारतीय धरोहर, जनवरी-फरवरी 2010
Pond

इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे? जब गणेश जी इस तालाब में पूरे नहीं डूब पाएंगे तो समझ लेना कि गांव पर संकट आने वाले हैं, सुपारी के पत्तों की टोपी पहने उस आदमी ने अपने दादाजी की चेतावनी दुहराते हुए जोड़ा था कि पहले साल गणेश-उत्सव में कुछ ऐसा ही हुआ था।

महाराष्ट्र से जुड़े-कर्नाटक के हिस्से में इस तालाब पर आया संकट देश पर छा रहे पानी के संकट की तरफ इशारा कर रहा है। गांव-गांव में, कस्बों में और शहरों तक में सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक का इंतज़ाम जुटाने वाले तालाब आज बड़े बांध, बड़ी सिंचाई और पेयजल योजनाओं के इस दौर में उपेक्षा की गाद में पट चले हैं। वर्षों तक मजबूती से टिकी रही अनेक तालाबों की पालें आज बदइंतजामी की ‘पछवा हवा में ढह’ चली हैं।

कर्नाटक में मलनाड क्षेत्र की सारी हरियाली और उससे जुड़ी संपन्नता वहां के तालाबों पर टिकी थी। सिंचाई विभाग वाले बताएंगे कि न जाने कब और किसने ये तालाब बनाए थे। पर थे ये बड़े गजब के। ऊंची-नीची जमीन और छोटे पहाड़ों के इस इलाके में हर तरफ पानी का ढाल देख कर इनकी जगह तय की गई थी। पहाड़ की चोटी पर एक बूंद गिरी और इस तरफ उसे अपने में समा लेने वाले तालाब में मिल जाएगी। लेकिन वह पुराना जमाना चला गया सिंचाई के नए-नए तरीके आ गए हैं।

नए माने मनवाए जा रहे तरीकों की जिम्मेदारी उठाने वाले नेता और विभाग अपने इस नए बोझ से अभिभूत हैं। वे जानना ही नहीं चाहते कि उनके कंधे बहुत ही नाजुक हैं। उनके गर्वीले बोझ को दरअसल दूसरे लोग ढो रहे हैं। जमाने के नए तरीकों की ढोल पीटने के बावजूद आज भी कई इलाकों में दम तोड़ रहे इन्हीं तालाबों के बल पर गांवों की व्यवस्था टिकी है। मलनाड के इलाके में 54 प्रतिशत सिंचित खेती तालाबों से पानी ले रही है। चेल्लापु शिरसी में यह चौंकाने की हदतक तालाबों के पानी से सिंचाई 67 प्रतिशत है। सागर तालुक में गन्ने की ‘आधुनिक’ खेती का आधा हिस्सा पुराने तालाबों पर टिका है।

मलनाड के तालाब यों अपेक्षाकृत छोटे हैं और दस से चौदह एकड़ तक के हैं। पर इस इलाके से पूरब में बढ़ते जाएं तो तालाबों का आकार बढ़ता जाता है। शिमोगा में औसत आकार 84 एकड़ ‘आयाकट’ तक मिलेगा। कहीं-कहीं यह 500 एकड़ तक छूता है। कर्नाटक भर में अलग-अलग तरह की जमीन और पनढाल को ध्यान में रख कर कुल मिला कर 34,000 से भी ज्यादा तालाब हैं। इनमें से कोई 23,000 तालाबों के बारे में छिटपुट जानकारी यहां-वहां दर्ज मिलती है। 10 से 50 एकड़ के 16,740, 50 से 100 एकड़ वाले 1363 और 100 से 500 एकड़ आयाकट वाले कोई 2700 तालाब घोर उपेक्षा के बावजूद टिके हुए हैं।

यह उपेक्षा कोई दो-चार साल की नहीं, कम-से-कम 150 साल से चली आ रही है। गाद से पटते जा रहे इन तालाबों की जानकारी देने चली रिपोर्टों पर भी इन्हीं की टक्कर पर धूल चढ़ती जा रही है। इस धूल को झाड़िए तो पता चलता है कि कोई 180 बरस पहले इन तालाबों में रखरखाव पर समाज की शक्ति, अक्ल और रुपया खर्च किया जाता था, आज कल्याणकारी बजट और विकास के लिए बेहद तत्पर विद्वानों और विशेषज्ञों की एक कौड़ी भी इस मद में नहीं खर्च की जा रही है। इन तालाबों के पतन का इतिहास पूरे देश में फैल रहे अकाल की प्रगति का भयानक भविष्य बनता जा रहा है।

पुराने दस्तावेजों की धूल झाड़िए तो पता चलता है कि वर्ष 1800 से वर्ष 1810 तक दीवान पुणैया के राज में कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में बने तालाबों के रखरखाव के लिए हर साल ग्यारह लाख खर्च किए जाते थे। फिर आए अंग्रेज और उनके साथ आया राजस्व विभाग। सिंचाई का प्रबंध राजस्व विभाग के हाथों में दे दिया गया। जो तालाब कल तक गांव के हाथ में थे, वे राजस्व विभाग के हो गए। ‘ढीले-ढाले सुस्त और ऐयाश राज का अंत हुआ और चुस्त प्रशासन का दौर आया।’ चुस्त प्रशासन ने इन तालाबों के रखरखाव में भारी फिजूलखर्ची देखी और सन् 1831 से 1836 तक इन पर हर बरस 11 लाख तक के बदले 80,000 रुपया खर्च किया। सन् 1836 से 1862 तक के सत्ताइस बरसों में और क्या-क्या ‘सुधार’ हुए, इस दौरान बनाए गए और तालाबों की सारी व्यवस्था राजस्व विभाग के हाथों ले कर पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सिद्धांत माना गया कि आखिरकार इन तालाबों का संबंध कोई राजस्व विभाग से तो है नहीं। ये तो लोक कल्याण का मामला है, सो लोक कल्याण विभाग को ही यह काम देखना चाहिए। 1863 से 1871 तक पीडब्ल्यूडी ने क्या किया, पता नहीं चलता। यह जरूर पता चलता है कि उत्पादन को बढ़ाने के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया और इसलिए 1871 में एक स्वतंत्र सिंचाई विभाग की स्थापना कर दी गई।

नया सिंचाई विभाग बेहद सक्रिय हो उठा। सिंचाई की रीढ़ बताए गए तालाबों की बेहतर देखभाल के लिए फटाफट नए-नए कानून बनाए गए। इन्हें पहली नवंबर 1873 से लागू किया गया। सारे नए कायदे-कानून तालाबों से वसूले जाने वाले सिंचाई-कर को ध्यान में रख कर बनाए गए थे। इसलिए पाया गया कि तालाब उस समय 300 रुपए की आमदनी भी नहीं दे सकते भला उनके रखरखाव की जिम्मेदारी उन महान कार्यालयों के जिम्मे क्यों आए, जिनके मालिक के साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता। लिहाजा 300 रुपये तक की आमदनी देने के वो तालाब विभाग के दायित्व से हटा कर फिर से उन्हीं किसानों को सौंप दिए, जो कुछ ही बरस पहले तक इनकी देखभाल करते थे। बिल्कुल बदतमीजी न दिखे, शायद इसलिए इस फैसले में इतना और जोड़ दिया गया कि इन तालाबों के रखरखाव से संबंधित छोटे-छोटे काम तो गांव वाले खुद कर ही लेंगे। ‘गंवाऊ’ और कमाऊ तालाबों का बंटवारा किया गया। स्वतंत्र सिंचाई विभाग के पास रह गए मंझोले और बड़े तालाब। तालाबों से लाभ कमाने, यानी अधिकार जताने और मरम्मत करने यानी कर्तव्य निभाने के बीच की लाइन खींच दी गई। पानी कर तो बाकायदा वसूला जाएगा पर यदि मरम्मत की जरूरत आ पड़ी तो तालाब-इंस्पेक्टर, अमलदार और तालुकेदार रैयत से इस काम के लिए चंदा मांगेंगे।

तालाबों से ‘पानी-कर’ खींचा जाता रहा, पर गाद नहीं निकाली गई कभी। धीरे-धीरे तालाब बिगड़ते गए। उधर पानी-कर की दरें भी बढ़ाई जाती रहीं। किसानों में असंतोष उभरा। बीसवीं सदी आने ही वाली थी। बिगड़ती जा रही सिंचाई व्यवस्था को बीसवीं सदी में ले जाने के ख्याल से ही शायद तब घोषणा की गई कि हर वर्ष 1000 तालाबों की मरम्मत का काम हाथ में लिया जाएगा। अंग्रेजों के काम करने का तरीका कोई मामूली तरीका नहीं था। नया काम हाथ में लेना हो तो पहले उसके लिए नए कानून बनेंगे। इसलिए पुराने कानून बदल डाले। 1904 में रैयत से कहा गया कि हर वर्ष 1000 तालाबों का काम कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। जिन तालाबों की मरम्मत के लिए रैयत पहल करेगी, कुल खर्च का एकतिहाई अपनी ओर से जुटाएगी। उन्हीं तालाबों की मरम्मत का काम सरकार अपने हाथ में लेगी। फिर कुल लागत उस तालाब से मिलने वाले 20 वर्ष के राजस्व से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हां! अग्रेजी राज इंग्लैंड का अपना घर फूंक कर, मलनाड के तालाबों की मरम्मत भला क्यों करे?

इसलिए 1904 से 1913 तक मलनाड के कितने किसान अपना घर फूंक कर अपने तालाब दुरुस्त करते रहे, इसका कोई ठीक लेखा-जोखा नहीं मिल पाता। लेकिन लगता है यह तालाब-प्रसंग बेहद उलझता गया और इसे ‘गुलाम’ बनाने वाले बहुत से तालाब फिर से रेवेन्यू विभाग को सौंप दिए गए। इसी दौर में ‘टैंक पंचायत रेगुलेशन’ कानून बनाया गया और अब तालाबों की मरम्मत में रैयत का चंदा अनिवार्य कर दिया गया। फिर भी काम तो कुछ भी नहीं हुआ; इसलिए एक बार फिर इस मामले पर पुनर्विचार किया गया और फिर सारे तालाबों की देखरेख रेवन्यू से लेकर उसी भरोसेमंद पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सन् 1913 से अंग्रेजी राज के अंतिम वर्षों का दौर उथल-पुथल का रहा। जब पूरा राज ही हाथ से सरक रहा था, तब इन ताल-तलैयों की तरफ भला कैसे ध्यान जाता। फिर भी अपने भारी व्यस्त समय में कुछ पल निकाल कर एक बार उन्हें फिर राजस्व को दिया गया। तालाबों की इस शर्मनाक बदला-बदली का किस्सा आजादी के बाद भी जारी रहा। 1964 में एक बार फिर ‘कुशल प्रबंध’ के लिए तालाब राजस्व के हाथ से छीन कर लोक कल्याण विभाग को सौंप दिए गए। बिल्लियां झगड़ नहीं रही थीं फिर भी उनके हाथ से रोटी छीनकर ‘बंदरबांट’ करने का ऐसा विचित्र किस्सा और शायद ही कहीं मिलेगा।

आज ये तालाब धीमी मौत की तरफ बढ़ते ही चले जा रहे हैं। इनमें प्रतिवर्ष 0.5 से लेकर 1.5 प्रतिशत गाद जमा हो रही है। इन तालाबों से लाभ लेने वाले गांव आज भी अंग्रेजों के जमाने की तरह पानी-कर चुकाए चले जा रहे हैं। सन् 1976 में पानी-कर में 50 से 100 प्रतिशत की वृद्धि भी की जा चुकी है, पर इस बढ़ी हुई कमाई का एक भी पैसा इन तालाबों पर खर्च नहीं किया जाता है। खुद सरकारी रिपोर्टों का कहना है कि क्षेत्र के किसान कर चुकाने में बेहद नियमित हैं।

पिछले दिनों कर्नाटक के योजना विभाग ने इन तालाबों का कुछ अध्ययन किया है। केवल 6 हफ्ते में विभाग के सर्वश्री एसजी भट्ट, रामनाथन चेट्टी और अंबाजी राव ने राज्य के 34,000 तालाबों में से कोई 22000 तालाबों के बारे में एक अच्छी रिपोर्ट बनाई थी। उन्होंने अनेक वर्षों पहले बने इन तालाबों की पीठ थपथपाई है और इन्हें फिर से स्वच्छ व स्वस्थ बनाने का खर्च भी आंका है। 22891 तालाबों से गाद हटाने, उन्हें साफ करने के लिए कोई 72 करोड़ रुपए की जरूरत है। पर इतना पैसा कहां से आएगा? जैसा सरकारी जवाब सुनने को तैयार रहना चाहिए। ऐसे जवाब के बाद यह तो कहना चाहिए कि इन तालाबों से सिंचाई कर लेना छोड़ दो। जब मरम्मत ही नहीं तो कर किस बात का? तब किसान मरते हुए इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे?

 

साफ माथे का समाज   

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

अकाल अच्छे विचारों का

3

'बनाजी' का गांव

4

तैरने वाला समाज डूब रहा है

5

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

6

भूकम्प की तर्जनी और कुम्हड़बतिया

7

पर्यावरण : खाने का और दिखाने का और

8

बीजों के सौदागर

9

बारानी को भी ये दासी बना देंगे

10

सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

11

गोपालपुरा: न बंधुआ बसे, न पेड़ बचे

12

गौना ताल: प्रलय का शिलालेख

13

साध्य, साधन और साधना

14

माटी, जल और ताप की तपस्या

15

सन 2000 में तीन शून्य भी हो सकते हैं

16

साफ माथे का समाज

17

थाली का बैंगन

18

भगदड़ में पड़ी सभ्यता

19

राजरोगियों की खतरनाक रजामंदी

20

असभ्यता की दुर्गंध में एक सुगंध

21

नए थाने खोलने से अपराध नहीं रुकते : अनुपम मिश्र

22

मन्ना: वे गीत फरोश भी थे

23

श्रद्धा-भाव की जरूरत

 

प्रयास

Submitted by HindiWater on Wed, 11/20/2019 - 11:07
कालीबेईं नदी के भागीरथ : संत सींचेवाल
धुन का पक्का एक योद्धा संत, जिसे संत बलबीर सिंह सींचेवाल कहते हैं। जिसने पंजाब में दम तोड़ती नदी काली बेई को फिर से जीवित कर 80 गांवों के लोगों की उम्मीद को मरने से बचाया। नदी जिंदा करने के काम को देखते हुए टाइम पत्रिका ने इन्हें दुनिया के 30 पर्यावरण नायकों की सूची में शामिल किया तो सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित। अधिक जानकारी के लिए देखें वीडियो

नोटिस बोर्ड

Submitted by HindiWater on Fri, 12/06/2019 - 11:05
Source:
गंगा की रक्षा के लिए 15 दिसंबर से पद्मावती मातृसदन में करेंगी अनशन
मातृसदन द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मांगों के संदर्भ में एक पत्र भेजा गया, लेकिन अभी तक मांग पूरी नहीं हुई। जिस कारण मातृसदन की साध्वी पद्मावती ने 15 दिसंबर 2019 से 6 सूत्रीय मांगों को लेकर अनशन की घोषणा कर दी है। अनशन के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भी अवगत करा दिया गया है। 
Submitted by HindiWater on Wed, 11/27/2019 - 13:25
Source:
"संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स-2019" के लिए आवेदन
गैर-लाभकारी संगठन चरखा विकास संचार नेटवर्क ने 'संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स 2019’ की घोषणा की है। इसके अंतर्गत उन लेखकों को मंच प्रदान किया जाएगा जो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में छुपी ऐसी प्रतिभाओं को उजागर करने का हौसला रखते हैं, जो मीडिया की नजरों से अब तक दूर रहा है।
Submitted by HindiWater on Mon, 11/25/2019 - 09:44
Source:
दैनिक जागरण, 25 नवम्बर 2019
‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा हरिद्वार कुंभ
कुंभ-2021 को भव्य, शानदार, यादगार और अनूठा बनाने के लिए कुंभ मेला अधिष्ठान बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहा है। विशेष यह कि इस बार हरिद्वार यह आयोजन ‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा। इसमें गंगा की शुद्धता और पर्यावरण की रक्षा पर विशेष फोकस रहेगा। इसके तहत विद्युत ऊर्जा का कम से कम (लगभग शून्य) और सौर ऊर्जा का अधिकाधिक इस्तेमाल करने की योजना है।

Latest

खासम-खास

मध्यप्रदेश के परम्परागत तालाबों का जल विज्ञान

Submitted by HindiWater on Sat, 11/30/2019 - 10:06
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास'
मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड, बघेलखंड, मालवा तथा महाकोशल अंचलों में परम्परागत तालाबों की समृद्ध परम्परा रही है। इस परम्परा के प्रमाण सर्वत्र मिलते हैं। सबसे पहले उनकी आंचलिक विशेषताओं पर सांकेतिक जानकारी। उसके बाद परम्परागत जल विज्ञान का विवरण।

Content

तालाब मिटते गए सूखा बढ़ता गया

Submitted by HindiWater on Wed, 10/29/2014 - 12:53
Author
पंकज चतुर्वेदी
. यहां पचास हजार से अधिक कुएं हैं कोई सात सौ पुराने ताल-तलैया। केन, उर्मिल, लोहर, बन्ने, धसान, काठन, बाचारी, तारपेट जैसी नदियां हैं। इसके अलावा सैंकड़ों बरसाती नाले और अनगिनत प्राकृतिक झिर व झरने भी इस जिले में मौजूद हैं। इतनी पानीदार तस्वीर की हकीकत यह है कि जिला मुख्यालय में भी बारिश के दिनों में एक समय ही पानी आता है।

होली के बाद गांव-के-गांव पानी की कमी के कारण खाली होने लग जाते हैं। चैत तक तो जिले के सभी शहर-कस्बे पानी की एक-एक बूंद के लिए बिलखने लगते हैं। लोग सरकार को कोसते हैं लेकिन इस त्रासदी का ठीकरा केवल प्रशासन के सिर फोड़ना बेमानी होगा, इसका असली कसूरवार तो यहां के बाशिंदे हैं, जिन्होंने नलों से घर पर पानी आता देख अपने पुश्तैनी तालाबों में गाद भर दी थी, कुओं को बिसरा कर नलकूपों की ओर लपके थे और जंगलों को उजाड़ कर नदियों को उथला बना दिया था।

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में पानी की किल्लत के लिए अब गरमी का इंतजार नहीं करना पड़ता है। सरकारी योजनाएं खूब उम्मीदें दिखाती हैं लेकिन पानी की तरावट फाईलों से उबर नहीं पाती है।

गांव का नाम ही है - बनी तलैया। लौंडी ब्लाक के इस गांव के नाम से ही जाहिर होता है कि यहां एक तलैया जरूर होगी। यहां के रहवासियों के पुरखे, अपनी पानी की जरूरतों के लिए इसी तलैया पर निर्भर थे। सत्तर का दशक आते-आते आधुनिकता की ऐसी आंधी गांव तक बह आई कि लोगों को इस तालाब की सफाई करवाने की सुध ही नहीं रही। फिर किसी ने उसके पुराने बंधन को तोड़ डाला, लिहाजा साल भर लबालब रहने वाला तालाब बरसाती गड्ढा बन कर रह गया।

तालाब सूखे तो गांव की तकदीर भी सूख गई- कुओं का जल स्तर घट कर तलहटी पर पुहंच गया। नब्बे का दशक आते-आते विपत्ति इतनी गहरा गई कि लोगों को गांव छोड़ कर भागना पड़ा। यह कहानी कोई एक गांव की नहीं है, जिले के कई गांव-मजरे-बसावटें बीते चार दशकों के दौरान पानी की कमी के चलते वीरान हो गए। चूंकि वहां सदियों से जीवन था यानी वहां पर्याप्त जल संसाधन भी थे जिन्हें आजादी के बाद लोगों ने उपेक्षित किया।

पठार और पहाड़ी बाहुल्य छतरपुर जिले की पुरानी बसाहट पर एक नजर डालें तो पाएंगे कि छतरपुर हो या बक्सवाहा या फिर खजुराहो; हर बस्ती के मुहाने पर पहाड़ जरूर मौजूद हैं। इस पहाड़ से सटा कर तालाब खोदना यहां की सदियों पुरानी परंपरा रही। बेहतरीन कैचमेंट एरिया वाले ये तालाब चंदेल राजाओं यानी 900 से 1200वीं सदी में बनवाए गए थे।

उस काल में वैज्ञानिक समझ बेहद उन्नत थी- हर तालाब में कम बारिश होने पर भी पानी की आवक, संचयन, जावक और ओवर फ्लो निर्मित किए गए थे। अंग्रेज शासक तो इस तकनीक को देख कर चकित थे। उन्होंने जिले की अधिकांश सिंचाई परियोजनाएं इन्हीं तालाबों पर स्थापित की थीं। धीरे-धीरे इनमें मिट्टी, नजदीकी पेड़ों की पत्तियां और इलाके भर की गंदगी गिरने लगी।

तालाबों की देखभाल का सरकारी बजट एक तो ना के बराबर था और जितना था वह कभी तालाब तक पहुंचा ही नहीं। जब लोगों को बूंद-बूंद तरसते हुए अपने ‘‘जल-पुरखों’’ का ध्यान आया तब तक वहां जमी गाद ने तालाबों को नहीं, वहां के निवासियों की तकदीर को जाम कर दिया था। राज्य में दिग्गीराजा के काग्रेस शासन में ‘‘सरोवर हमारी धरोहर’’ योजना आई तो शिवराज सिंह सरकार ने ‘जलाभिषेक’ का नारा दिया- तालाब चमकने तो दूर उन पर हुए कब्जे हटाने से भी सरकारी महकमे ने मुंह मोड़ लिया - जिला मुख्यालय के सांतरी तलैया, किशोर सागर जैसे कई विशाल तालाबों पर दुकानें, मकान बन गए, पानी के आवक-निकास के रास्ते ही बंद कर दिए गए।

पठार और पहाड़ी बाहुल्य छतरपुर जिले की पुरानी बसाहट पर एक नजर डालें तो पाएंगे कि छतरपुर हो या बक्सवाहा या फिर खजुराहो; हर बस्ती के मुहाने पर पहाड़ जरूर मौजूद हैं। इस पहाड़ से सटा कर तालाब खोदना यहां की सदियों पुरानी परंपरा रही। बेहतरीन कैचमेंट एरिया वाले ये तालाब चंदेल राजाओं यानी 900 से 1200वीं सदी में बनवाए गए थे। उस काल में वैज्ञानिक समझ बेहद उन्नत थी- हर तालाब में कम बारिश होने पर भी पानी की आवक, संचयन, जावक और ओवर फ्लो निर्मित किए गए थे। अंग्रेज शासक तो इस तकनीक को देख कर चकित थे। फिर तालाब पर कब्जा कर काटी गई कालेानियों का मल-जल यहां गिरने लगा व ये जीवनदायी तालाब नाबदान बन गए। गहरा करने, सौंदर्यीकरण के नाम पर बजट फूंका जाता रहा और तालाबों का क्षेत्रफल शून्य की ओर सरकता रहा। किशोर सागर से अक्रिमण हटाने पर तो पिछले सप्ताह ही राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने दखल दिया है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत भ्रमण पर आया था तो उसने अपने वृतांत में दर्ज किया है कि खजुराहो में एक मील योजन में फल एक तालाब था। आज उसी खजुराहो व उससे चार किलोमीटर दूर स्थित कस्बे राजनगर में एक-एक बूंद पानी के लिए मारा-मारी मची है। राजनगर का विशाल तालाब, खजुराहो के प्रेम सागर व शिवसागर बदबूदार नाबदान बन कर रह गए हैं।

खजुराहों मंदिरों के एक हजार साल होने पर वहां कई आयोजन हुए थे, उसी समय तालाबों की रंगाई-पुताई कर चमकाया गया था, लेकिन तालाब ऊपरी साज-सज्जा के मोहताज नहीं होते, उनका गहना तो निर्मल जल होता है। शिवसागर से सटा कर कोई हजार पेड़ यूक्लेपिटस के लगा दिए गए थे - एक तो ये पेड़ ही पानी सोखता है, फिर इसकी पत्तियों के कचरे ने तालाब को उथला कर दिया।

छतरपुर जिले के 57 तालाब सिंचाई विभाग के पास है जिन पर रखरखाव के नाम पर खर्च पैसे का पिछले पचास साल का हिसाब लगाया जाए तो जिले की एक-एक इंच जमीन पर कई फुट गहरे तालाब खोदे जा सकते थे। पैसा कैसे खर्च होता है, इसकी बानगी जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर ईसानगर में देख लें - कुख्यात माफिया सरगना व विधायक अशोकवीर विक्रम सिंह उर्फ भैयाराजा की रिहाईश वाले इस गांव के तालबों का क्षेत्रफल 535 एकड़ और पानी भरने की क्षमता 100.59 मिलियन घन फुट हुआ करती थी।

सालों से इसका पानी इलाके के खेतों को सींचता था। इसके अलावा यहां पैदा होने वाली कमल, सिंघाड़े, मछली से कईं घरों का चूल्हा जला करता था। सन् 1989 में सिंचाई विभाग के इंजीनियर द्वारा जारी सिंचाई उपलब्धि तालिका में इस तालाब का सिंचाई रकबा शून्य दर्ज किया गया। जो ताल एक साल पहले तक 400 हेक्टेयर खेत को सींचता था वह अचानक कैसे सूख गया? वह तो भला हो उ.प्र. पुलिस का जो एक हत्या के मामले में भैयाराजा को गिरफ्तार करने आई तो खुलासा हुआ कि उदयपुर के ‘लेक पैलेस’ की तर्ज पर अपना जल महल बनाने के लिए भैयाराजा ने तालाब पर अपना कब्जा कर वहां पक्का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया था।

यही नहीं सन् 1989-90 में तालाब के रखरखाव पर सूखा राहत कार्य के नाम पर साढ़े तीन लाख रूपए खर्च भी दिखाए गए। मार्च-91 में जिला प्रशासन चेता और डायनामाईट से राजा का कब्जा उड़ाया गया, तब जा कर पता चला कि तालाब पर खर्च दिखाया जा रहा पैसा असल में जल महल पर खर्च हो रहा था। समूचे जिले में ऐसे तालाब, जल महल और भैयाराजा चप्पे-चप्पे पर फैले हुए हैं जिनके सामने सरकार व समाज बेबस दिखता है।

यह इलाका ग्रेनाईट पत्थर संरचना वाला है और यहां भूगर्भ जल बेहद गहराई पर है जिसे मत्थर चीर कर ही हासिल किया जा सकता हे। अस्सी के दशक में कई नेताओं ने सेलम (तमिलनाडु) से जमीन का सीना चीर कर पाताल पानी उगाहने की मशीनें मंगवाईं और जहां किसी ने पानी के संकट की गुहार लगाई वहां नलकूप रोप दिया गया।

प्रताप सागर तालाबअसल में वे नलकूप जमीन के गर्भ का नहीं, बल्कि बारिश के दौरान जमीन से रिस कर नीचे पहुचे पानी जो ग्रेनाईट के कारण जमा हो जाता है को उलीछ रहे थे। बेतहाशा जल निकासी से आसपास के कुंओं का जल स्तर घटता गया। उन कुओं को पानी से हरा-भरा रखने वाले ताल-तलैया खत्म हुए तो कुंए भी खत्म हो गए। नलकूप का तिलिस्म तो टूटना ही था।

अब सरकारी अफसर चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि ताल-तालाब खत्म होने से ‘‘ग्राउंड वाटर रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं। जहां बड़े तालाब हैं वहीं नलकूप भी सफल हैं। तालाबों को संरक्षण नारा तो बन गया है लेकिन उन पारंपरिक रास्तों पर बने अवैध निर्माण हटाने को कोई राजी नहीं है, जिन रास्तों से हो कर बारिश की हर बूंद तालाबों तक पहुंचती थी।

कुओं का कायाकल्प

Submitted by HindiWater on Wed, 10/29/2014 - 11:34
Author
बाबा मायाराम
. हाल ही में कर्नाटक से सुखद खबर आई है कि वहां कुओं को फिर से पुनर्जीवित किया जा रहा है। बेलगांव शहर में जो कुएं सूख गए थे, गाद या कचरे से पट गए थे उनका नगर निगम और नागरिकों ने मिलकर कायाकल्प कर दिया है। और शहर की करीब आधी आबादी के लिए कुओं से पीने के पानी की आपूर्ति की जा रही है।


बेलगांव में 1995 में जब पीने के पानी का मुख्य स्रोत सूख गया तब वैकल्पिक पानी के स्रोतों की खोज हुई। यहां के वरिष्ठ नागरिक मंच ने कुओं का कायाकल्प करने का सुझाव दिया। इस पर अमल करने से पहले गोवा विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रमुख चाचडी से सलाह मांगी। उन्होंने इसका अध्ययन इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी।

बहरहाल, यह एक आसान काम नहीं था। यहां कुएं से गाद निकालने के लिए भारी यंत्रों का इस्तेमाल करना संभव नहीं था और मजदूर भी इस काम को नहीं करना चाह रहे थे। तब एक स्थानीय आदमी रस्सी और घिर्री के सहारे कुएं में नीचे उतरा और उसने गाद को बाल्टी में भरा और ऊपर खींच लिया। इसी प्रकार अन्य कुओं का भी कायाकल्प किया गया।

इस तरह 21 बड़े और 32 छोटे कुओं को पुनर्जीवित किया जा चुका है। इनमें से एक बारा घादघायची विहिर भी शामिल है जो 1974 तक पीने के पानी का मुख्य स्रोत था।

टेढ़ा पद्धतिअब इन कुओं से शहर की 2 लाख आबादी को पीने का पानी मुहैया कराया जा रहा है, जबकि कुल आबादी 5 लाख है। इस कदम से भूजल से सतही जल और बढ़ेगा।


20-25 साल पहले गांवों में लोग कुओं से पानी भरते थे। सुबह और शाम कुओं पर भारी भीड़ हुआ करती थी। महिलाएं कुओं पर पानी भरती थी।

जब सार्वजनिक कुओं में गाद या कचरा हो जाता था तब गांव और मुहल्ले के लोग मिलकर उसकी साफ-सफाई करते थे। इन पर लोग नहाते थे तो इस बात का ख्याल रखा जाता था कि गंदगी न हो और गंदा पानी वापस कुओं में न जाए।


छत्तीसगढ़ में मरार और सोनकर समुदाय के लोग अपने कुओं में टेड़ा पद्धति से सिंचाई करते हैं। टेड़ा पद्धति में कुएं से पानी निकालने के लिए बांस के एक सिरे पर बाल्टी और दूसरे सिरे पर वजनदार पत्थर या लकड़ियां बांध देते हैं जिससे पानी खींचने में आसानी हो।

टेड़ा से सब्जी-भाजी की सिंचाई होती हैं। वहां अब भी ग्रामीण अपनी बाड़ियों में अपने घर के उपयोग के लिए भटा, टमाटर, मूली, प्याज, लहसुन, धनिया और अन्य सब्जियां लगाते हैं।

आज जब जल संकट बहुत विकट रूप से सामने आ रहा है, कुएं पानी का स्थायी स्रोत साबित हो सकते हैं। भूजल स्तर हर साल नीचे खिसकता जा रहा है। कुएं पीढ़ियों तक हमारा साथ दे सकते हैं, हैंडपंप और नलकूप नहीं।

कुओं से हम उतना ही पानी निकालते हैं जितनी जरूरत होती है। जबकि नलकूप या मोटर पंप में व्यर्थ ही पानी बहता रहता है। सार्वजनिक नलों का भी यही हाल है। फिर ये इतनी भारी पूंजी वाली योजना है कि नगर निगम, नगर पालिका या ग्राम पंचायत इनका खर्च भी वहन नहीं कर पाती।

टेढ़ा पद्धतिपानी के निजीकरण की कोशिशें चल रही हैं, नदियों से पानी शहरों को दिया जा रहा है, नदी जोड़ योजनाएं चल रही हैं। न तो वे स्थाई जलस्रोत हैं और न ही सस्ती। इसलिए हमें कुओं, तालाब और नदियों के कायाकल्प की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए। फिलहाल, कर्नाटक से कुओं के कायाकल्प की खबर सराहनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है।

सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

Submitted by Hindi on Mon, 10/27/2014 - 16:42
Author
अनुपम मिश्र
Source
भारतीय धरोहर, जनवरी-फरवरी 2010

इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे? जब गणेश जी इस तालाब में पूरे नहीं डूब पाएंगे तो समझ लेना कि गांव पर संकट आने वाले हैं, सुपारी के पत्तों की टोपी पहने उस आदमी ने अपने दादाजी की चेतावनी दुहराते हुए जोड़ा था कि पहले साल गणेश-उत्सव में कुछ ऐसा ही हुआ था।

महाराष्ट्र से जुड़े-कर्नाटक के हिस्से में इस तालाब पर आया संकट देश पर छा रहे पानी के संकट की तरफ इशारा कर रहा है। गांव-गांव में, कस्बों में और शहरों तक में सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक का इंतज़ाम जुटाने वाले तालाब आज बड़े बांध, बड़ी सिंचाई और पेयजल योजनाओं के इस दौर में उपेक्षा की गाद में पट चले हैं। वर्षों तक मजबूती से टिकी रही अनेक तालाबों की पालें आज बदइंतजामी की ‘पछवा हवा में ढह’ चली हैं।

कर्नाटक में मलनाड क्षेत्र की सारी हरियाली और उससे जुड़ी संपन्नता वहां के तालाबों पर टिकी थी। सिंचाई विभाग वाले बताएंगे कि न जाने कब और किसने ये तालाब बनाए थे। पर थे ये बड़े गजब के। ऊंची-नीची जमीन और छोटे पहाड़ों के इस इलाके में हर तरफ पानी का ढाल देख कर इनकी जगह तय की गई थी। पहाड़ की चोटी पर एक बूंद गिरी और इस तरफ उसे अपने में समा लेने वाले तालाब में मिल जाएगी। लेकिन वह पुराना जमाना चला गया सिंचाई के नए-नए तरीके आ गए हैं।

नए माने मनवाए जा रहे तरीकों की जिम्मेदारी उठाने वाले नेता और विभाग अपने इस नए बोझ से अभिभूत हैं। वे जानना ही नहीं चाहते कि उनके कंधे बहुत ही नाजुक हैं। उनके गर्वीले बोझ को दरअसल दूसरे लोग ढो रहे हैं। जमाने के नए तरीकों की ढोल पीटने के बावजूद आज भी कई इलाकों में दम तोड़ रहे इन्हीं तालाबों के बल पर गांवों की व्यवस्था टिकी है। मलनाड के इलाके में 54 प्रतिशत सिंचित खेती तालाबों से पानी ले रही है। चेल्लापु शिरसी में यह चौंकाने की हदतक तालाबों के पानी से सिंचाई 67 प्रतिशत है। सागर तालुक में गन्ने की ‘आधुनिक’ खेती का आधा हिस्सा पुराने तालाबों पर टिका है।

मलनाड के तालाब यों अपेक्षाकृत छोटे हैं और दस से चौदह एकड़ तक के हैं। पर इस इलाके से पूरब में बढ़ते जाएं तो तालाबों का आकार बढ़ता जाता है। शिमोगा में औसत आकार 84 एकड़ ‘आयाकट’ तक मिलेगा। कहीं-कहीं यह 500 एकड़ तक छूता है। कर्नाटक भर में अलग-अलग तरह की जमीन और पनढाल को ध्यान में रख कर कुल मिला कर 34,000 से भी ज्यादा तालाब हैं। इनमें से कोई 23,000 तालाबों के बारे में छिटपुट जानकारी यहां-वहां दर्ज मिलती है। 10 से 50 एकड़ के 16,740, 50 से 100 एकड़ वाले 1363 और 100 से 500 एकड़ आयाकट वाले कोई 2700 तालाब घोर उपेक्षा के बावजूद टिके हुए हैं।

यह उपेक्षा कोई दो-चार साल की नहीं, कम-से-कम 150 साल से चली आ रही है। गाद से पटते जा रहे इन तालाबों की जानकारी देने चली रिपोर्टों पर भी इन्हीं की टक्कर पर धूल चढ़ती जा रही है। इस धूल को झाड़िए तो पता चलता है कि कोई 180 बरस पहले इन तालाबों में रखरखाव पर समाज की शक्ति, अक्ल और रुपया खर्च किया जाता था, आज कल्याणकारी बजट और विकास के लिए बेहद तत्पर विद्वानों और विशेषज्ञों की एक कौड़ी भी इस मद में नहीं खर्च की जा रही है। इन तालाबों के पतन का इतिहास पूरे देश में फैल रहे अकाल की प्रगति का भयानक भविष्य बनता जा रहा है।

पुराने दस्तावेजों की धूल झाड़िए तो पता चलता है कि वर्ष 1800 से वर्ष 1810 तक दीवान पुणैया के राज में कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में बने तालाबों के रखरखाव के लिए हर साल ग्यारह लाख खर्च किए जाते थे। फिर आए अंग्रेज और उनके साथ आया राजस्व विभाग। सिंचाई का प्रबंध राजस्व विभाग के हाथों में दे दिया गया। जो तालाब कल तक गांव के हाथ में थे, वे राजस्व विभाग के हो गए। ‘ढीले-ढाले सुस्त और ऐयाश राज का अंत हुआ और चुस्त प्रशासन का दौर आया।’ चुस्त प्रशासन ने इन तालाबों के रखरखाव में भारी फिजूलखर्ची देखी और सन् 1831 से 1836 तक इन पर हर बरस 11 लाख तक के बदले 80,000 रुपया खर्च किया। सन् 1836 से 1862 तक के सत्ताइस बरसों में और क्या-क्या ‘सुधार’ हुए, इस दौरान बनाए गए और तालाबों की सारी व्यवस्था राजस्व विभाग के हाथों ले कर पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सिद्धांत माना गया कि आखिरकार इन तालाबों का संबंध कोई राजस्व विभाग से तो है नहीं। ये तो लोक कल्याण का मामला है, सो लोक कल्याण विभाग को ही यह काम देखना चाहिए। 1863 से 1871 तक पीडब्ल्यूडी ने क्या किया, पता नहीं चलता। यह जरूर पता चलता है कि उत्पादन को बढ़ाने के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया और इसलिए 1871 में एक स्वतंत्र सिंचाई विभाग की स्थापना कर दी गई।

नया सिंचाई विभाग बेहद सक्रिय हो उठा। सिंचाई की रीढ़ बताए गए तालाबों की बेहतर देखभाल के लिए फटाफट नए-नए कानून बनाए गए। इन्हें पहली नवंबर 1873 से लागू किया गया। सारे नए कायदे-कानून तालाबों से वसूले जाने वाले सिंचाई-कर को ध्यान में रख कर बनाए गए थे। इसलिए पाया गया कि तालाब उस समय 300 रुपए की आमदनी भी नहीं दे सकते भला उनके रखरखाव की जिम्मेदारी उन महान कार्यालयों के जिम्मे क्यों आए, जिनके मालिक के साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता। लिहाजा 300 रुपये तक की आमदनी देने के वो तालाब विभाग के दायित्व से हटा कर फिर से उन्हीं किसानों को सौंप दिए, जो कुछ ही बरस पहले तक इनकी देखभाल करते थे। बिल्कुल बदतमीजी न दिखे, शायद इसलिए इस फैसले में इतना और जोड़ दिया गया कि इन तालाबों के रखरखाव से संबंधित छोटे-छोटे काम तो गांव वाले खुद कर ही लेंगे। ‘गंवाऊ’ और कमाऊ तालाबों का बंटवारा किया गया। स्वतंत्र सिंचाई विभाग के पास रह गए मंझोले और बड़े तालाब। तालाबों से लाभ कमाने, यानी अधिकार जताने और मरम्मत करने यानी कर्तव्य निभाने के बीच की लाइन खींच दी गई। पानी कर तो बाकायदा वसूला जाएगा पर यदि मरम्मत की जरूरत आ पड़ी तो तालाब-इंस्पेक्टर, अमलदार और तालुकेदार रैयत से इस काम के लिए चंदा मांगेंगे।

तालाबों से ‘पानी-कर’ खींचा जाता रहा, पर गाद नहीं निकाली गई कभी। धीरे-धीरे तालाब बिगड़ते गए। उधर पानी-कर की दरें भी बढ़ाई जाती रहीं। किसानों में असंतोष उभरा। बीसवीं सदी आने ही वाली थी। बिगड़ती जा रही सिंचाई व्यवस्था को बीसवीं सदी में ले जाने के ख्याल से ही शायद तब घोषणा की गई कि हर वर्ष 1000 तालाबों की मरम्मत का काम हाथ में लिया जाएगा। अंग्रेजों के काम करने का तरीका कोई मामूली तरीका नहीं था। नया काम हाथ में लेना हो तो पहले उसके लिए नए कानून बनेंगे। इसलिए पुराने कानून बदल डाले। 1904 में रैयत से कहा गया कि हर वर्ष 1000 तालाबों का काम कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। जिन तालाबों की मरम्मत के लिए रैयत पहल करेगी, कुल खर्च का एकतिहाई अपनी ओर से जुटाएगी। उन्हीं तालाबों की मरम्मत का काम सरकार अपने हाथ में लेगी। फिर कुल लागत उस तालाब से मिलने वाले 20 वर्ष के राजस्व से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हां! अग्रेजी राज इंग्लैंड का अपना घर फूंक कर, मलनाड के तालाबों की मरम्मत भला क्यों करे?

.इसलिए 1904 से 1913 तक मलनाड के कितने किसान अपना घर फूंक कर अपने तालाब दुरुस्त करते रहे, इसका कोई ठीक लेखा-जोखा नहीं मिल पाता। लेकिन लगता है यह तालाब-प्रसंग बेहद उलझता गया और इसे ‘गुलाम’ बनाने वाले बहुत से तालाब फिर से रेवेन्यू विभाग को सौंप दिए गए। इसी दौर में ‘टैंक पंचायत रेगुलेशन’ कानून बनाया गया और अब तालाबों की मरम्मत में रैयत का चंदा अनिवार्य कर दिया गया। फिर भी काम तो कुछ भी नहीं हुआ; इसलिए एक बार फिर इस मामले पर पुनर्विचार किया गया और फिर सारे तालाबों की देखरेख रेवन्यू से लेकर उसी भरोसेमंद पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सन् 1913 से अंग्रेजी राज के अंतिम वर्षों का दौर उथल-पुथल का रहा। जब पूरा राज ही हाथ से सरक रहा था, तब इन ताल-तलैयों की तरफ भला कैसे ध्यान जाता। फिर भी अपने भारी व्यस्त समय में कुछ पल निकाल कर एक बार उन्हें फिर राजस्व को दिया गया। तालाबों की इस शर्मनाक बदला-बदली का किस्सा आजादी के बाद भी जारी रहा। 1964 में एक बार फिर ‘कुशल प्रबंध’ के लिए तालाब राजस्व के हाथ से छीन कर लोक कल्याण विभाग को सौंप दिए गए। बिल्लियां झगड़ नहीं रही थीं फिर भी उनके हाथ से रोटी छीनकर ‘बंदरबांट’ करने का ऐसा विचित्र किस्सा और शायद ही कहीं मिलेगा।

आज ये तालाब धीमी मौत की तरफ बढ़ते ही चले जा रहे हैं। इनमें प्रतिवर्ष 0.5 से लेकर 1.5 प्रतिशत गाद जमा हो रही है। इन तालाबों से लाभ लेने वाले गांव आज भी अंग्रेजों के जमाने की तरह पानी-कर चुकाए चले जा रहे हैं। सन् 1976 में पानी-कर में 50 से 100 प्रतिशत की वृद्धि भी की जा चुकी है, पर इस बढ़ी हुई कमाई का एक भी पैसा इन तालाबों पर खर्च नहीं किया जाता है। खुद सरकारी रिपोर्टों का कहना है कि क्षेत्र के किसान कर चुकाने में बेहद नियमित हैं।

पिछले दिनों कर्नाटक के योजना विभाग ने इन तालाबों का कुछ अध्ययन किया है। केवल 6 हफ्ते में विभाग के सर्वश्री एसजी भट्ट, रामनाथन चेट्टी और अंबाजी राव ने राज्य के 34,000 तालाबों में से कोई 22000 तालाबों के बारे में एक अच्छी रिपोर्ट बनाई थी। उन्होंने अनेक वर्षों पहले बने इन तालाबों की पीठ थपथपाई है और इन्हें फिर से स्वच्छ व स्वस्थ बनाने का खर्च भी आंका है। 22891 तालाबों से गाद हटाने, उन्हें साफ करने के लिए कोई 72 करोड़ रुपए की जरूरत है। पर इतना पैसा कहां से आएगा? जैसा सरकारी जवाब सुनने को तैयार रहना चाहिए। ऐसे जवाब के बाद यह तो कहना चाहिए कि इन तालाबों से सिंचाई कर लेना छोड़ दो। जब मरम्मत ही नहीं तो कर किस बात का? तब किसान मरते हुए इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे?

 

साफ माथे का समाज   

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

अकाल अच्छे विचारों का

3

'बनाजी' का गांव

4

तैरने वाला समाज डूब रहा है

5

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

6

भूकम्प की तर्जनी और कुम्हड़बतिया

7

पर्यावरण : खाने का और दिखाने का और

8

बीजों के सौदागर

9

बारानी को भी ये दासी बना देंगे

10

सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

11

गोपालपुरा: न बंधुआ बसे, न पेड़ बचे

12

गौना ताल: प्रलय का शिलालेख

13

साध्य, साधन और साधना

14

माटी, जल और ताप की तपस्या

15

सन 2000 में तीन शून्य भी हो सकते हैं

16

साफ माथे का समाज

17

थाली का बैंगन

18

भगदड़ में पड़ी सभ्यता

19

राजरोगियों की खतरनाक रजामंदी

20

असभ्यता की दुर्गंध में एक सुगंध

21

नए थाने खोलने से अपराध नहीं रुकते : अनुपम मिश्र

22

मन्ना: वे गीत फरोश भी थे

23

श्रद्धा-भाव की जरूरत

 

प्रयास

कालीबेईं नदी के भागीरथ : संत सींचेवाल

Submitted by HindiWater on Wed, 11/20/2019 - 11:07
धुन का पक्का एक योद्धा संत, जिसे संत बलबीर सिंह सींचेवाल कहते हैं। जिसने पंजाब में दम तोड़ती नदी काली बेई को फिर से जीवित कर 80 गांवों के लोगों की उम्मीद को मरने से बचाया। नदी जिंदा करने के काम को देखते हुए टाइम पत्रिका ने इन्हें दुनिया के 30 पर्यावरण नायकों की सूची में शामिल किया तो सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित। अधिक जानकारी के लिए देखें वीडियो

नोटिस बोर्ड

गंगा की रक्षा के लिए 15 दिसंबर से पद्मावती मातृसदन में करेंगी अनशन

Submitted by HindiWater on Fri, 12/06/2019 - 11:05
मातृसदन द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मांगों के संदर्भ में एक पत्र भेजा गया, लेकिन अभी तक मांग पूरी नहीं हुई। जिस कारण मातृसदन की साध्वी पद्मावती ने 15 दिसंबर 2019 से 6 सूत्रीय मांगों को लेकर अनशन की घोषणा कर दी है। अनशन के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भी अवगत करा दिया गया है। 

"संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स-2019" के लिए आवेदन

Submitted by HindiWater on Wed, 11/27/2019 - 13:25
गैर-लाभकारी संगठन चरखा विकास संचार नेटवर्क ने 'संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स 2019’ की घोषणा की है। इसके अंतर्गत उन लेखकों को मंच प्रदान किया जाएगा जो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में छुपी ऐसी प्रतिभाओं को उजागर करने का हौसला रखते हैं, जो मीडिया की नजरों से अब तक दूर रहा है।

‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा हरिद्वार कुंभ

Submitted by HindiWater on Mon, 11/25/2019 - 09:44
Source
दैनिक जागरण, 25 नवम्बर 2019
कुंभ-2021 को भव्य, शानदार, यादगार और अनूठा बनाने के लिए कुंभ मेला अधिष्ठान बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहा है। विशेष यह कि इस बार हरिद्वार यह आयोजन ‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा। इसमें गंगा की शुद्धता और पर्यावरण की रक्षा पर विशेष फोकस रहेगा। इसके तहत विद्युत ऊर्जा का कम से कम (लगभग शून्य) और सौर ऊर्जा का अधिकाधिक इस्तेमाल करने की योजना है।

Upcoming Event

Popular Articles