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Submitted by HindiWater on Sat, 11/30/2019 - 10:06
मध्यप्रदेश के परम्परागत तालाबों का जल विज्ञान
मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड, बघेलखंड, मालवा तथा महाकोशल अंचलों में परम्परागत तालाबों की समृद्ध परम्परा रही है। इस परम्परा के प्रमाण सर्वत्र मिलते हैं। सबसे पहले उनकी आंचलिक विशेषताओं पर सांकेतिक जानकारी। उसके बाद परम्परागत जल विज्ञान का विवरण।

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Submitted by Hindi on Mon, 10/27/2014 - 16:42
Source:
भारतीय धरोहर, जनवरी-फरवरी 2010
Pond

इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे? जब गणेश जी इस तालाब में पूरे नहीं डूब पाएंगे तो समझ लेना कि गांव पर संकट आने वाले हैं, सुपारी के पत्तों की टोपी पहने उस आदमी ने अपने दादाजी की चेतावनी दुहराते हुए जोड़ा था कि पहले साल गणेश-उत्सव में कुछ ऐसा ही हुआ था।

महाराष्ट्र से जुड़े-कर्नाटक के हिस्से में इस तालाब पर आया संकट देश पर छा रहे पानी के संकट की तरफ इशारा कर रहा है। गांव-गांव में, कस्बों में और शहरों तक में सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक का इंतज़ाम जुटाने वाले तालाब आज बड़े बांध, बड़ी सिंचाई और पेयजल योजनाओं के इस दौर में उपेक्षा की गाद में पट चले हैं। वर्षों तक मजबूती से टिकी रही अनेक तालाबों की पालें आज बदइंतजामी की ‘पछवा हवा में ढह’ चली हैं।

कर्नाटक में मलनाड क्षेत्र की सारी हरियाली और उससे जुड़ी संपन्नता वहां के तालाबों पर टिकी थी। सिंचाई विभाग वाले बताएंगे कि न जाने कब और किसने ये तालाब बनाए थे। पर थे ये बड़े गजब के। ऊंची-नीची जमीन और छोटे पहाड़ों के इस इलाके में हर तरफ पानी का ढाल देख कर इनकी जगह तय की गई थी। पहाड़ की चोटी पर एक बूंद गिरी और इस तरफ उसे अपने में समा लेने वाले तालाब में मिल जाएगी। लेकिन वह पुराना जमाना चला गया सिंचाई के नए-नए तरीके आ गए हैं।

नए माने मनवाए जा रहे तरीकों की जिम्मेदारी उठाने वाले नेता और विभाग अपने इस नए बोझ से अभिभूत हैं। वे जानना ही नहीं चाहते कि उनके कंधे बहुत ही नाजुक हैं। उनके गर्वीले बोझ को दरअसल दूसरे लोग ढो रहे हैं। जमाने के नए तरीकों की ढोल पीटने के बावजूद आज भी कई इलाकों में दम तोड़ रहे इन्हीं तालाबों के बल पर गांवों की व्यवस्था टिकी है। मलनाड के इलाके में 54 प्रतिशत सिंचित खेती तालाबों से पानी ले रही है। चेल्लापु शिरसी में यह चौंकाने की हदतक तालाबों के पानी से सिंचाई 67 प्रतिशत है। सागर तालुक में गन्ने की ‘आधुनिक’ खेती का आधा हिस्सा पुराने तालाबों पर टिका है।

मलनाड के तालाब यों अपेक्षाकृत छोटे हैं और दस से चौदह एकड़ तक के हैं। पर इस इलाके से पूरब में बढ़ते जाएं तो तालाबों का आकार बढ़ता जाता है। शिमोगा में औसत आकार 84 एकड़ ‘आयाकट’ तक मिलेगा। कहीं-कहीं यह 500 एकड़ तक छूता है। कर्नाटक भर में अलग-अलग तरह की जमीन और पनढाल को ध्यान में रख कर कुल मिला कर 34,000 से भी ज्यादा तालाब हैं। इनमें से कोई 23,000 तालाबों के बारे में छिटपुट जानकारी यहां-वहां दर्ज मिलती है। 10 से 50 एकड़ के 16,740, 50 से 100 एकड़ वाले 1363 और 100 से 500 एकड़ आयाकट वाले कोई 2700 तालाब घोर उपेक्षा के बावजूद टिके हुए हैं।

यह उपेक्षा कोई दो-चार साल की नहीं, कम-से-कम 150 साल से चली आ रही है। गाद से पटते जा रहे इन तालाबों की जानकारी देने चली रिपोर्टों पर भी इन्हीं की टक्कर पर धूल चढ़ती जा रही है। इस धूल को झाड़िए तो पता चलता है कि कोई 180 बरस पहले इन तालाबों में रखरखाव पर समाज की शक्ति, अक्ल और रुपया खर्च किया जाता था, आज कल्याणकारी बजट और विकास के लिए बेहद तत्पर विद्वानों और विशेषज्ञों की एक कौड़ी भी इस मद में नहीं खर्च की जा रही है। इन तालाबों के पतन का इतिहास पूरे देश में फैल रहे अकाल की प्रगति का भयानक भविष्य बनता जा रहा है।

पुराने दस्तावेजों की धूल झाड़िए तो पता चलता है कि वर्ष 1800 से वर्ष 1810 तक दीवान पुणैया के राज में कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में बने तालाबों के रखरखाव के लिए हर साल ग्यारह लाख खर्च किए जाते थे। फिर आए अंग्रेज और उनके साथ आया राजस्व विभाग। सिंचाई का प्रबंध राजस्व विभाग के हाथों में दे दिया गया। जो तालाब कल तक गांव के हाथ में थे, वे राजस्व विभाग के हो गए। ‘ढीले-ढाले सुस्त और ऐयाश राज का अंत हुआ और चुस्त प्रशासन का दौर आया।’ चुस्त प्रशासन ने इन तालाबों के रखरखाव में भारी फिजूलखर्ची देखी और सन् 1831 से 1836 तक इन पर हर बरस 11 लाख तक के बदले 80,000 रुपया खर्च किया। सन् 1836 से 1862 तक के सत्ताइस बरसों में और क्या-क्या ‘सुधार’ हुए, इस दौरान बनाए गए और तालाबों की सारी व्यवस्था राजस्व विभाग के हाथों ले कर पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सिद्धांत माना गया कि आखिरकार इन तालाबों का संबंध कोई राजस्व विभाग से तो है नहीं। ये तो लोक कल्याण का मामला है, सो लोक कल्याण विभाग को ही यह काम देखना चाहिए। 1863 से 1871 तक पीडब्ल्यूडी ने क्या किया, पता नहीं चलता। यह जरूर पता चलता है कि उत्पादन को बढ़ाने के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया और इसलिए 1871 में एक स्वतंत्र सिंचाई विभाग की स्थापना कर दी गई।

नया सिंचाई विभाग बेहद सक्रिय हो उठा। सिंचाई की रीढ़ बताए गए तालाबों की बेहतर देखभाल के लिए फटाफट नए-नए कानून बनाए गए। इन्हें पहली नवंबर 1873 से लागू किया गया। सारे नए कायदे-कानून तालाबों से वसूले जाने वाले सिंचाई-कर को ध्यान में रख कर बनाए गए थे। इसलिए पाया गया कि तालाब उस समय 300 रुपए की आमदनी भी नहीं दे सकते भला उनके रखरखाव की जिम्मेदारी उन महान कार्यालयों के जिम्मे क्यों आए, जिनके मालिक के साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता। लिहाजा 300 रुपये तक की आमदनी देने के वो तालाब विभाग के दायित्व से हटा कर फिर से उन्हीं किसानों को सौंप दिए, जो कुछ ही बरस पहले तक इनकी देखभाल करते थे। बिल्कुल बदतमीजी न दिखे, शायद इसलिए इस फैसले में इतना और जोड़ दिया गया कि इन तालाबों के रखरखाव से संबंधित छोटे-छोटे काम तो गांव वाले खुद कर ही लेंगे। ‘गंवाऊ’ और कमाऊ तालाबों का बंटवारा किया गया। स्वतंत्र सिंचाई विभाग के पास रह गए मंझोले और बड़े तालाब। तालाबों से लाभ कमाने, यानी अधिकार जताने और मरम्मत करने यानी कर्तव्य निभाने के बीच की लाइन खींच दी गई। पानी कर तो बाकायदा वसूला जाएगा पर यदि मरम्मत की जरूरत आ पड़ी तो तालाब-इंस्पेक्टर, अमलदार और तालुकेदार रैयत से इस काम के लिए चंदा मांगेंगे।

तालाबों से ‘पानी-कर’ खींचा जाता रहा, पर गाद नहीं निकाली गई कभी। धीरे-धीरे तालाब बिगड़ते गए। उधर पानी-कर की दरें भी बढ़ाई जाती रहीं। किसानों में असंतोष उभरा। बीसवीं सदी आने ही वाली थी। बिगड़ती जा रही सिंचाई व्यवस्था को बीसवीं सदी में ले जाने के ख्याल से ही शायद तब घोषणा की गई कि हर वर्ष 1000 तालाबों की मरम्मत का काम हाथ में लिया जाएगा। अंग्रेजों के काम करने का तरीका कोई मामूली तरीका नहीं था। नया काम हाथ में लेना हो तो पहले उसके लिए नए कानून बनेंगे। इसलिए पुराने कानून बदल डाले। 1904 में रैयत से कहा गया कि हर वर्ष 1000 तालाबों का काम कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। जिन तालाबों की मरम्मत के लिए रैयत पहल करेगी, कुल खर्च का एकतिहाई अपनी ओर से जुटाएगी। उन्हीं तालाबों की मरम्मत का काम सरकार अपने हाथ में लेगी। फिर कुल लागत उस तालाब से मिलने वाले 20 वर्ष के राजस्व से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हां! अग्रेजी राज इंग्लैंड का अपना घर फूंक कर, मलनाड के तालाबों की मरम्मत भला क्यों करे?

इसलिए 1904 से 1913 तक मलनाड के कितने किसान अपना घर फूंक कर अपने तालाब दुरुस्त करते रहे, इसका कोई ठीक लेखा-जोखा नहीं मिल पाता। लेकिन लगता है यह तालाब-प्रसंग बेहद उलझता गया और इसे ‘गुलाम’ बनाने वाले बहुत से तालाब फिर से रेवेन्यू विभाग को सौंप दिए गए। इसी दौर में ‘टैंक पंचायत रेगुलेशन’ कानून बनाया गया और अब तालाबों की मरम्मत में रैयत का चंदा अनिवार्य कर दिया गया। फिर भी काम तो कुछ भी नहीं हुआ; इसलिए एक बार फिर इस मामले पर पुनर्विचार किया गया और फिर सारे तालाबों की देखरेख रेवन्यू से लेकर उसी भरोसेमंद पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सन् 1913 से अंग्रेजी राज के अंतिम वर्षों का दौर उथल-पुथल का रहा। जब पूरा राज ही हाथ से सरक रहा था, तब इन ताल-तलैयों की तरफ भला कैसे ध्यान जाता। फिर भी अपने भारी व्यस्त समय में कुछ पल निकाल कर एक बार उन्हें फिर राजस्व को दिया गया। तालाबों की इस शर्मनाक बदला-बदली का किस्सा आजादी के बाद भी जारी रहा। 1964 में एक बार फिर ‘कुशल प्रबंध’ के लिए तालाब राजस्व के हाथ से छीन कर लोक कल्याण विभाग को सौंप दिए गए। बिल्लियां झगड़ नहीं रही थीं फिर भी उनके हाथ से रोटी छीनकर ‘बंदरबांट’ करने का ऐसा विचित्र किस्सा और शायद ही कहीं मिलेगा।

आज ये तालाब धीमी मौत की तरफ बढ़ते ही चले जा रहे हैं। इनमें प्रतिवर्ष 0.5 से लेकर 1.5 प्रतिशत गाद जमा हो रही है। इन तालाबों से लाभ लेने वाले गांव आज भी अंग्रेजों के जमाने की तरह पानी-कर चुकाए चले जा रहे हैं। सन् 1976 में पानी-कर में 50 से 100 प्रतिशत की वृद्धि भी की जा चुकी है, पर इस बढ़ी हुई कमाई का एक भी पैसा इन तालाबों पर खर्च नहीं किया जाता है। खुद सरकारी रिपोर्टों का कहना है कि क्षेत्र के किसान कर चुकाने में बेहद नियमित हैं।

पिछले दिनों कर्नाटक के योजना विभाग ने इन तालाबों का कुछ अध्ययन किया है। केवल 6 हफ्ते में विभाग के सर्वश्री एसजी भट्ट, रामनाथन चेट्टी और अंबाजी राव ने राज्य के 34,000 तालाबों में से कोई 22000 तालाबों के बारे में एक अच्छी रिपोर्ट बनाई थी। उन्होंने अनेक वर्षों पहले बने इन तालाबों की पीठ थपथपाई है और इन्हें फिर से स्वच्छ व स्वस्थ बनाने का खर्च भी आंका है। 22891 तालाबों से गाद हटाने, उन्हें साफ करने के लिए कोई 72 करोड़ रुपए की जरूरत है। पर इतना पैसा कहां से आएगा? जैसा सरकारी जवाब सुनने को तैयार रहना चाहिए। ऐसे जवाब के बाद यह तो कहना चाहिए कि इन तालाबों से सिंचाई कर लेना छोड़ दो। जब मरम्मत ही नहीं तो कर किस बात का? तब किसान मरते हुए इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे?

 

साफ माथे का समाज   

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

अकाल अच्छे विचारों का

3

'बनाजी' का गांव

4

तैरने वाला समाज डूब रहा है

5

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

6

भूकम्प की तर्जनी और कुम्हड़बतिया

7

पर्यावरण : खाने का और दिखाने का और

8

बीजों के सौदागर

9

बारानी को भी ये दासी बना देंगे

10

सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

11

गोपालपुरा: न बंधुआ बसे, न पेड़ बचे

12

गौना ताल: प्रलय का शिलालेख

13

साध्य, साधन और साधना

14

माटी, जल और ताप की तपस्या

15

सन 2000 में तीन शून्य भी हो सकते हैं

16

साफ माथे का समाज

17

थाली का बैंगन

18

भगदड़ में पड़ी सभ्यता

19

राजरोगियों की खतरनाक रजामंदी

20

असभ्यता की दुर्गंध में एक सुगंध

21

नए थाने खोलने से अपराध नहीं रुकते : अनुपम मिश्र

22

मन्ना: वे गीत फरोश भी थे

23

श्रद्धा-भाव की जरूरत

 

Submitted by Hindi on Mon, 10/27/2014 - 09:20
Source:
कल्पतरू एक्सप्रेस, 27 अक्टूबर 2014
Yamuna
दिल्ली का मीडिया और केंद्र सरकार यमुना सफाई पर फतवे जारी करते रहते हैं, लेकिन नजफगढ़ नाले से लेकर 16 बड़े नालों ने दिल्ली में यमुना का जो हाल कर रखा है वह यमुना के मानव फांस का ही द्योतक है। शुक्र है आज कृष्ण नहीं हुए वरना वे कालिंदी के उद्धार के लिए दिल्ली को ही नाथते। दिल्ली ही आज का वह ‘कालिया नाग’ है जिसने यमुना को विषैला कर रखा है। जरूरी है कि या तो वह अपनी आदत सुधार ले या यमुना को छोड़कर कहीं और चला जाए।यम द्वितीया के दिन जब यम फांस से मुक्ति के लिए मृत्यु लोक के वासी यमुना में डुबकी लगाकर अपने को तार रहे थे तो यमुना मानव फांस से मुक्ति के लिए छटपटा रही थी। कहते हैं कि यम द्वितीया के दिन मथुरा में स्नान का विशेष पुण्य होता है और इसीलिए भाई-बहन के इस पर्व को सफल बनाने के उद्देश्य से प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए थे। तीन हजार क्यूसेक पानी विशेष तौर पर छोड़ा गया था। अफसरों की मुस्तैदी से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलते रहे, सीवेज पंपिंग स्टेशन ओवर फ्लो नहीं हुए। लेकिन, न यमुना को ताजा पानी नसीब हुआ, न ही उसके भक्तों को। अगर आस्था के आगे मनुष्य ने आंख और नाक बंद करने की कला न सीखी होती तो उस पानी में डुबकी लगाना और अपना उद्धार करना मुश्किल था।

इन्हीं स्थितियों से ऊबकर यमुना सत्याग्रहियों ने दो नवंबर को एक बार फिर हथिनी कुंड बैराज पर आर-पार की लड़ाई का फैसला किया है। हथिनी कुंड बैराज वह जगह है, जहां पर हरियाणा यमुना में से अपनी जरूरत के लिहाज से पानी निकाल लेता है। जबरदस्ती का यह सिलसिला ताजेवाला से शुरू होता है और वजीराबाद, ओखला होते हुए गोकुल बैराज और उससे आगे तक जारी रहता है। हरियाणा अगर यमुना के पानी के अधिकतम दोहन के लिए जिम्मेदार है तो दिल्ली उसके दोहन के साथ प्रदूषण के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। यमुना को धीरे-धीरे मारने के इस पाप में उत्तर प्रदेश का भी योगदान है, लेकिन वह हरियाणा और दिल्ली के पाप के आगे दब जाता है। उत्तर प्रदेश का एक उदाहरण गोकुल बैराज है जिसे मथुरा, आगरा और वृंदावन को पानी देने के लिए यमुना पर बनाया गया था, लेकिन इसके फाटक बंद होने से किसानों की जमीनें डूब गईं और वे मुआवजे के लिए तरस रहे हैं। हार कर किसानों ने अब बैराज में कूदकर आत्महत्या की धमकी दी है।

उधर, हरियाणा के मुख्यमंत्री दिल्ली पर यमुना को प्रदूषित करने का आरोप लगाते रहे हैं। यह आरोप तब भी लगता था जब दिल्ली में कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और हरियाणा में उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा थे। यह आरोप अब भी बंद नहीं होगा, चाहे दिल्ली में राष्ट्रपति शासन और हरियाणा में भाजपा सरकार रहे। उसकी वजह भी है। वजीराबाद से पहले यमुना साफ भी है और उसमें पानी भी है। लेकिन, वजीराबाद से ओखला तक पहुंचने में यमुना देश के सबसे चमकदार और सबके कल्याण का लंबा-चौड़ा दावा करने वाली देश की राजधानी की मार से इतनी पस्त हो जाती है कि न तो उसमें पानी बचता है न ही स्वच्छता। ऊपर से तुर्रा यह है कि हम यमुना को टेम्स बना देंगे।

दिल्ली का मीडिया और वहां स्थित केंद्र सरकार यमुना सफाई पर लंबे-चौड़े फतवे जारी करती रहती है। लेकिन, मशहूर नजफगढ़ नाले से लेकर सोलह बड़े नालों ने दिल्ली में यमुना का जो हाल कर रखा है वह यमुना के मानव फांस का ही द्योतक है। शुक्र है आज कृष्ण नहीं हुए वरना वे कालिंदी के उद्धार के लिए दिल्ली को ही नाथते। क्योंकि दिल्ली को नाथे बिना यमुना का उद्धार संभव नहीं है। दिल्ली ही आज का वह ‘कालिया नाग’ है जिसने यमुना को विषैला कर रखा है और जरूरी है कि या तो वह अपनी आदत सुधार ले या यमुना को छोड़कर कहीं और चला जाए। लेकिन, मुश्किल है कि दिल्ली को नाथेगा कौन?

बड़े-बड़े दावे करने वाली दिल्ली यमुना के साथ कितना छल कर रही है, यह बात आंकड़ों से साबित होती है। यमुना सफाई के नाम पर कई हजार करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए जाने के बावजूद राजधानी में अभी महज 17 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जा सके हैं। वे सिर्फ आधी गंदगी का शोधन कर पाते हैं। इस बीच यूपीए सरकार ने 2013 में जापान सरकार के सहयोग से ओखला बैराज पर 1656 करोड़ रुपये की लागत से अति आधुनिक सफाई संयंत्र लगाने की योजना बनाई थी। लेकिन, अब यह राशि कम पड़ रही है और आंकड़ा 6000 करोड़ तक जा रहा है। उधर, दिल्ली जल बोर्ड की योजना के तहत राजधानी में सीवेज ट्रीटमेंट पर 2031 तक 25 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं।

यमुना प्रदूषण के बढ़ते जाने और सफाई खर्च के बीच एक समानुपाती रिश्ता है। यह बात ब्रज लाइफ लाइन वेलफेयर से जुड़े यमुना मुक्ति के योद्धा महेंद्रनाथ चतुर्वेदी की एक पुस्तिका से प्रमाणित होती है। ‘सफरनामा’ नाम से प्रकाशित उनकी यह पुस्तक आरंभ में ही कहती है- ‘नदी के प्रदूषण का प्राथमिक कारक कॉलीफार्म बैक्टीरिया जहां निजामुद्दीन ब्रिज पर 1999 में आठ करोड़ पचास लाख था, वह बढ़कर 2012 में 17 अरब की संख्या पार कर गया। वह भी छह हजार करोड़ रुपयों की भारी राशि के खर्च किए जाने के बाद।’ यह इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकारी धन की किस प्रकार बंदरबांट की गई है। यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि वह 1983-84 के वर्ष को यमुना के प्रदूषण की शुरुआत का वर्ष बताते हैं और लगभग यही वर्ष गंगा एक्शन प्लान का भी है।

आज सवाल यह है कि क्या यमुना की सफाई जल संसाधन मंत्री उमा भारती और उनके साथ धार्मिक तरीके से इसे मुद्दा बनाने का कोलाहल करने वाले लोगों के द्वारा होगी या विशुद्ध वैज्ञानिक तरीके से औद्योगिक लॉबी द्वारा की जाएगी? यह एक गंभीर सवाल है और इस पर समाज में ही नहीं सरकार के भीतर भी खींचतान कम नहीं है। वे इसे वोट के लिए धार्मिक मसला बनाना चाहते हैं, लेकिन औद्योगिक शक्तियों व हरित क्रांति से पोषित किसान लॉबी के बिजली पानी के हितों की कुर्बानी देकर गंगा- यमुना को मुक्त नहीं करना चाहते। पर, यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि गंगा और यमुना किसी पार्टी को वोट नहीं देतीं और न ही किसी धर्म की माला जपती हैं।

वे सभी धर्मों के अनुयायियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से समभाव से ही व्यवहार करती हैं। लेकिन, उनकी अन्याय और अत्याचार सहने की एक सीमा है। जब वे कुपित होती हैं तो न तो हिन्दू बहुल उत्तराखंड को बख्शती हैं और न ही मुस्लिम बहुल कश्मीर को। इसलिए नदियों का अपना धर्म और अपनी राजनीति है। वह धर्म है नदियों के साफ-सुथरे तरीके से अविरल बहने का। हमें उसे समझना होगा और उसे इस लोकतंत्र में जगह देनी ही होगी। तभी यमुना का मानव फांस दूर होगा और तभी वह हमारा यम फांस दूर कर पाएंगी।

(लेखक कल्पतरु एक्सप्रेस के कार्यकारी संपादक हैं), ईमेल-tripathiarunk@gmail.com

Submitted by Hindi on Sun, 10/26/2014 - 12:36
Source:
जनसत्ता, 26 अक्टूबर 2014
भारत को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। उसी का अध्यक्ष पत्रकारों के सवालों के जवाब में यह कह रहा हो कि अभी यह समय मुख्यमंत्री कौन पर बात करने का नहीं, पटाखे जलाने का है। और हमने देखा कि लगभग सभी न्यूज चैनलों के स्क्रीन पटाखे के धुएँ से भर गए। आस्थावान समाज के लिए बेहतर है कि वह टेलीविजन की सारी सामग्री को अभियान का दूसरा संस्करण ही मानेस्वच्छता अभियान के तहत दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान और अभिषेक बच्चन ने ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ के प्रस्तोता कपिल शर्मा की झाडू से सफाई की। फिल्म ‘हैप्पी न्यू इयर’ के प्रमोशन में आए इन सितारों ने पहले स्टूडियो के फर्स पर झाड़ू फिराई फिर एक-एक करके कपिल शर्मा के शरीर पर। जाहिर है, यह सब मनोरंजन के लिए किया गया। जो स्टूडियो में मौजूद दर्शक और खुद कपिल शर्मा लगातार हंसते रहे।

नरेंद्र मोदी सरकार के स्वच्छता अभियान की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ और ‘बिग बॉस’ जैसे आधा दर्जन टेलीविजन कार्यक्रमों में इसकी चर्चा किसी न किसी रूप में हुई। कुछ में तो सीधे-सीधे पूरी टीम को सफाई करते दिखाया गया, तो कुछ में संवादों के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है।

प्रयास

Submitted by HindiWater on Sat, 12/07/2019 - 11:31
पत्नी-बेटे मरे तो पेड़ों को ही बना लिया सबकुछ, अब हैं चालीस हजार वृक्षों के पिता
अपनी खेती बाड़ी से मैं खुश था। इससे होने वाली आय इतनी थी कि मेरे परिवार को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी, लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो तो ऊपर वाले का वज्र टूटता है। मेरे साथ ही ऐसा ही हुआ। 

नोटिस बोर्ड

Submitted by HindiWater on Fri, 12/06/2019 - 11:05
Source:
गंगा की रक्षा के लिए 15 दिसंबर से पद्मावती मातृसदन में करेंगी अनशन
मातृसदन द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मांगों के संदर्भ में एक पत्र भेजा गया, लेकिन अभी तक मांग पूरी नहीं हुई। जिस कारण मातृसदन की साध्वी पद्मावती ने 15 दिसंबर 2019 से 6 सूत्रीय मांगों को लेकर अनशन की घोषणा कर दी है। अनशन के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भी अवगत करा दिया गया है। 
Submitted by HindiWater on Wed, 11/27/2019 - 13:25
Source:
"संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स-2019" के लिए आवेदन
गैर-लाभकारी संगठन चरखा विकास संचार नेटवर्क ने 'संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स 2019’ की घोषणा की है। इसके अंतर्गत उन लेखकों को मंच प्रदान किया जाएगा जो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में छुपी ऐसी प्रतिभाओं को उजागर करने का हौसला रखते हैं, जो मीडिया की नजरों से अब तक दूर रहा है।
Submitted by HindiWater on Mon, 11/25/2019 - 09:44
Source:
दैनिक जागरण, 25 नवम्बर 2019
‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा हरिद्वार कुंभ
कुंभ-2021 को भव्य, शानदार, यादगार और अनूठा बनाने के लिए कुंभ मेला अधिष्ठान बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहा है। विशेष यह कि इस बार हरिद्वार यह आयोजन ‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा। इसमें गंगा की शुद्धता और पर्यावरण की रक्षा पर विशेष फोकस रहेगा। इसके तहत विद्युत ऊर्जा का कम से कम (लगभग शून्य) और सौर ऊर्जा का अधिकाधिक इस्तेमाल करने की योजना है।

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खासम-खास

मध्यप्रदेश के परम्परागत तालाबों का जल विज्ञान

Submitted by HindiWater on Sat, 11/30/2019 - 10:06
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास'
मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड, बघेलखंड, मालवा तथा महाकोशल अंचलों में परम्परागत तालाबों की समृद्ध परम्परा रही है। इस परम्परा के प्रमाण सर्वत्र मिलते हैं। सबसे पहले उनकी आंचलिक विशेषताओं पर सांकेतिक जानकारी। उसके बाद परम्परागत जल विज्ञान का विवरण।

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सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

Submitted by Hindi on Mon, 10/27/2014 - 16:42
Author
अनुपम मिश्र
Source
भारतीय धरोहर, जनवरी-फरवरी 2010

इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे? जब गणेश जी इस तालाब में पूरे नहीं डूब पाएंगे तो समझ लेना कि गांव पर संकट आने वाले हैं, सुपारी के पत्तों की टोपी पहने उस आदमी ने अपने दादाजी की चेतावनी दुहराते हुए जोड़ा था कि पहले साल गणेश-उत्सव में कुछ ऐसा ही हुआ था।

महाराष्ट्र से जुड़े-कर्नाटक के हिस्से में इस तालाब पर आया संकट देश पर छा रहे पानी के संकट की तरफ इशारा कर रहा है। गांव-गांव में, कस्बों में और शहरों तक में सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक का इंतज़ाम जुटाने वाले तालाब आज बड़े बांध, बड़ी सिंचाई और पेयजल योजनाओं के इस दौर में उपेक्षा की गाद में पट चले हैं। वर्षों तक मजबूती से टिकी रही अनेक तालाबों की पालें आज बदइंतजामी की ‘पछवा हवा में ढह’ चली हैं।

कर्नाटक में मलनाड क्षेत्र की सारी हरियाली और उससे जुड़ी संपन्नता वहां के तालाबों पर टिकी थी। सिंचाई विभाग वाले बताएंगे कि न जाने कब और किसने ये तालाब बनाए थे। पर थे ये बड़े गजब के। ऊंची-नीची जमीन और छोटे पहाड़ों के इस इलाके में हर तरफ पानी का ढाल देख कर इनकी जगह तय की गई थी। पहाड़ की चोटी पर एक बूंद गिरी और इस तरफ उसे अपने में समा लेने वाले तालाब में मिल जाएगी। लेकिन वह पुराना जमाना चला गया सिंचाई के नए-नए तरीके आ गए हैं।

नए माने मनवाए जा रहे तरीकों की जिम्मेदारी उठाने वाले नेता और विभाग अपने इस नए बोझ से अभिभूत हैं। वे जानना ही नहीं चाहते कि उनके कंधे बहुत ही नाजुक हैं। उनके गर्वीले बोझ को दरअसल दूसरे लोग ढो रहे हैं। जमाने के नए तरीकों की ढोल पीटने के बावजूद आज भी कई इलाकों में दम तोड़ रहे इन्हीं तालाबों के बल पर गांवों की व्यवस्था टिकी है। मलनाड के इलाके में 54 प्रतिशत सिंचित खेती तालाबों से पानी ले रही है। चेल्लापु शिरसी में यह चौंकाने की हदतक तालाबों के पानी से सिंचाई 67 प्रतिशत है। सागर तालुक में गन्ने की ‘आधुनिक’ खेती का आधा हिस्सा पुराने तालाबों पर टिका है।

मलनाड के तालाब यों अपेक्षाकृत छोटे हैं और दस से चौदह एकड़ तक के हैं। पर इस इलाके से पूरब में बढ़ते जाएं तो तालाबों का आकार बढ़ता जाता है। शिमोगा में औसत आकार 84 एकड़ ‘आयाकट’ तक मिलेगा। कहीं-कहीं यह 500 एकड़ तक छूता है। कर्नाटक भर में अलग-अलग तरह की जमीन और पनढाल को ध्यान में रख कर कुल मिला कर 34,000 से भी ज्यादा तालाब हैं। इनमें से कोई 23,000 तालाबों के बारे में छिटपुट जानकारी यहां-वहां दर्ज मिलती है। 10 से 50 एकड़ के 16,740, 50 से 100 एकड़ वाले 1363 और 100 से 500 एकड़ आयाकट वाले कोई 2700 तालाब घोर उपेक्षा के बावजूद टिके हुए हैं।

यह उपेक्षा कोई दो-चार साल की नहीं, कम-से-कम 150 साल से चली आ रही है। गाद से पटते जा रहे इन तालाबों की जानकारी देने चली रिपोर्टों पर भी इन्हीं की टक्कर पर धूल चढ़ती जा रही है। इस धूल को झाड़िए तो पता चलता है कि कोई 180 बरस पहले इन तालाबों में रखरखाव पर समाज की शक्ति, अक्ल और रुपया खर्च किया जाता था, आज कल्याणकारी बजट और विकास के लिए बेहद तत्पर विद्वानों और विशेषज्ञों की एक कौड़ी भी इस मद में नहीं खर्च की जा रही है। इन तालाबों के पतन का इतिहास पूरे देश में फैल रहे अकाल की प्रगति का भयानक भविष्य बनता जा रहा है।

पुराने दस्तावेजों की धूल झाड़िए तो पता चलता है कि वर्ष 1800 से वर्ष 1810 तक दीवान पुणैया के राज में कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में बने तालाबों के रखरखाव के लिए हर साल ग्यारह लाख खर्च किए जाते थे। फिर आए अंग्रेज और उनके साथ आया राजस्व विभाग। सिंचाई का प्रबंध राजस्व विभाग के हाथों में दे दिया गया। जो तालाब कल तक गांव के हाथ में थे, वे राजस्व विभाग के हो गए। ‘ढीले-ढाले सुस्त और ऐयाश राज का अंत हुआ और चुस्त प्रशासन का दौर आया।’ चुस्त प्रशासन ने इन तालाबों के रखरखाव में भारी फिजूलखर्ची देखी और सन् 1831 से 1836 तक इन पर हर बरस 11 लाख तक के बदले 80,000 रुपया खर्च किया। सन् 1836 से 1862 तक के सत्ताइस बरसों में और क्या-क्या ‘सुधार’ हुए, इस दौरान बनाए गए और तालाबों की सारी व्यवस्था राजस्व विभाग के हाथों ले कर पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सिद्धांत माना गया कि आखिरकार इन तालाबों का संबंध कोई राजस्व विभाग से तो है नहीं। ये तो लोक कल्याण का मामला है, सो लोक कल्याण विभाग को ही यह काम देखना चाहिए। 1863 से 1871 तक पीडब्ल्यूडी ने क्या किया, पता नहीं चलता। यह जरूर पता चलता है कि उत्पादन को बढ़ाने के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया और इसलिए 1871 में एक स्वतंत्र सिंचाई विभाग की स्थापना कर दी गई।

नया सिंचाई विभाग बेहद सक्रिय हो उठा। सिंचाई की रीढ़ बताए गए तालाबों की बेहतर देखभाल के लिए फटाफट नए-नए कानून बनाए गए। इन्हें पहली नवंबर 1873 से लागू किया गया। सारे नए कायदे-कानून तालाबों से वसूले जाने वाले सिंचाई-कर को ध्यान में रख कर बनाए गए थे। इसलिए पाया गया कि तालाब उस समय 300 रुपए की आमदनी भी नहीं दे सकते भला उनके रखरखाव की जिम्मेदारी उन महान कार्यालयों के जिम्मे क्यों आए, जिनके मालिक के साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता। लिहाजा 300 रुपये तक की आमदनी देने के वो तालाब विभाग के दायित्व से हटा कर फिर से उन्हीं किसानों को सौंप दिए, जो कुछ ही बरस पहले तक इनकी देखभाल करते थे। बिल्कुल बदतमीजी न दिखे, शायद इसलिए इस फैसले में इतना और जोड़ दिया गया कि इन तालाबों के रखरखाव से संबंधित छोटे-छोटे काम तो गांव वाले खुद कर ही लेंगे। ‘गंवाऊ’ और कमाऊ तालाबों का बंटवारा किया गया। स्वतंत्र सिंचाई विभाग के पास रह गए मंझोले और बड़े तालाब। तालाबों से लाभ कमाने, यानी अधिकार जताने और मरम्मत करने यानी कर्तव्य निभाने के बीच की लाइन खींच दी गई। पानी कर तो बाकायदा वसूला जाएगा पर यदि मरम्मत की जरूरत आ पड़ी तो तालाब-इंस्पेक्टर, अमलदार और तालुकेदार रैयत से इस काम के लिए चंदा मांगेंगे।

तालाबों से ‘पानी-कर’ खींचा जाता रहा, पर गाद नहीं निकाली गई कभी। धीरे-धीरे तालाब बिगड़ते गए। उधर पानी-कर की दरें भी बढ़ाई जाती रहीं। किसानों में असंतोष उभरा। बीसवीं सदी आने ही वाली थी। बिगड़ती जा रही सिंचाई व्यवस्था को बीसवीं सदी में ले जाने के ख्याल से ही शायद तब घोषणा की गई कि हर वर्ष 1000 तालाबों की मरम्मत का काम हाथ में लिया जाएगा। अंग्रेजों के काम करने का तरीका कोई मामूली तरीका नहीं था। नया काम हाथ में लेना हो तो पहले उसके लिए नए कानून बनेंगे। इसलिए पुराने कानून बदल डाले। 1904 में रैयत से कहा गया कि हर वर्ष 1000 तालाबों का काम कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। जिन तालाबों की मरम्मत के लिए रैयत पहल करेगी, कुल खर्च का एकतिहाई अपनी ओर से जुटाएगी। उन्हीं तालाबों की मरम्मत का काम सरकार अपने हाथ में लेगी। फिर कुल लागत उस तालाब से मिलने वाले 20 वर्ष के राजस्व से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हां! अग्रेजी राज इंग्लैंड का अपना घर फूंक कर, मलनाड के तालाबों की मरम्मत भला क्यों करे?

.इसलिए 1904 से 1913 तक मलनाड के कितने किसान अपना घर फूंक कर अपने तालाब दुरुस्त करते रहे, इसका कोई ठीक लेखा-जोखा नहीं मिल पाता। लेकिन लगता है यह तालाब-प्रसंग बेहद उलझता गया और इसे ‘गुलाम’ बनाने वाले बहुत से तालाब फिर से रेवेन्यू विभाग को सौंप दिए गए। इसी दौर में ‘टैंक पंचायत रेगुलेशन’ कानून बनाया गया और अब तालाबों की मरम्मत में रैयत का चंदा अनिवार्य कर दिया गया। फिर भी काम तो कुछ भी नहीं हुआ; इसलिए एक बार फिर इस मामले पर पुनर्विचार किया गया और फिर सारे तालाबों की देखरेख रेवन्यू से लेकर उसी भरोसेमंद पीडब्ल्यूडी को सौंप दी गई। सन् 1913 से अंग्रेजी राज के अंतिम वर्षों का दौर उथल-पुथल का रहा। जब पूरा राज ही हाथ से सरक रहा था, तब इन ताल-तलैयों की तरफ भला कैसे ध्यान जाता। फिर भी अपने भारी व्यस्त समय में कुछ पल निकाल कर एक बार उन्हें फिर राजस्व को दिया गया। तालाबों की इस शर्मनाक बदला-बदली का किस्सा आजादी के बाद भी जारी रहा। 1964 में एक बार फिर ‘कुशल प्रबंध’ के लिए तालाब राजस्व के हाथ से छीन कर लोक कल्याण विभाग को सौंप दिए गए। बिल्लियां झगड़ नहीं रही थीं फिर भी उनके हाथ से रोटी छीनकर ‘बंदरबांट’ करने का ऐसा विचित्र किस्सा और शायद ही कहीं मिलेगा।

आज ये तालाब धीमी मौत की तरफ बढ़ते ही चले जा रहे हैं। इनमें प्रतिवर्ष 0.5 से लेकर 1.5 प्रतिशत गाद जमा हो रही है। इन तालाबों से लाभ लेने वाले गांव आज भी अंग्रेजों के जमाने की तरह पानी-कर चुकाए चले जा रहे हैं। सन् 1976 में पानी-कर में 50 से 100 प्रतिशत की वृद्धि भी की जा चुकी है, पर इस बढ़ी हुई कमाई का एक भी पैसा इन तालाबों पर खर्च नहीं किया जाता है। खुद सरकारी रिपोर्टों का कहना है कि क्षेत्र के किसान कर चुकाने में बेहद नियमित हैं।

पिछले दिनों कर्नाटक के योजना विभाग ने इन तालाबों का कुछ अध्ययन किया है। केवल 6 हफ्ते में विभाग के सर्वश्री एसजी भट्ट, रामनाथन चेट्टी और अंबाजी राव ने राज्य के 34,000 तालाबों में से कोई 22000 तालाबों के बारे में एक अच्छी रिपोर्ट बनाई थी। उन्होंने अनेक वर्षों पहले बने इन तालाबों की पीठ थपथपाई है और इन्हें फिर से स्वच्छ व स्वस्थ बनाने का खर्च भी आंका है। 22891 तालाबों से गाद हटाने, उन्हें साफ करने के लिए कोई 72 करोड़ रुपए की जरूरत है। पर इतना पैसा कहां से आएगा? जैसा सरकारी जवाब सुनने को तैयार रहना चाहिए। ऐसे जवाब के बाद यह तो कहना चाहिए कि इन तालाबों से सिंचाई कर लेना छोड़ दो। जब मरम्मत ही नहीं तो कर किस बात का? तब किसान मरते हुए इन तालाबों को अपने आप अपने श्रम से, चंदे से, अपनी सूझबूझ से पुनर्जीवित कर लेंगे। दो महीने की लंबी बीमारी से उठ कर आए मुख्य मंत्री रामकृष्ण हेगड़े दो सौ वर्षों से बीमार रखे गए तालाबों और उन तालाबों से जुड़े किसानों का गांवों का दर्द अब भी नहीं समझ सकेंगे तो कब समझेंगे?

 

साफ माथे का समाज   

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

अकाल अच्छे विचारों का

3

'बनाजी' का गांव

4

तैरने वाला समाज डूब रहा है

5

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

6

भूकम्प की तर्जनी और कुम्हड़बतिया

7

पर्यावरण : खाने का और दिखाने का और

8

बीजों के सौदागर

9

बारानी को भी ये दासी बना देंगे

10

सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

11

गोपालपुरा: न बंधुआ बसे, न पेड़ बचे

12

गौना ताल: प्रलय का शिलालेख

13

साध्य, साधन और साधना

14

माटी, जल और ताप की तपस्या

15

सन 2000 में तीन शून्य भी हो सकते हैं

16

साफ माथे का समाज

17

थाली का बैंगन

18

भगदड़ में पड़ी सभ्यता

19

राजरोगियों की खतरनाक रजामंदी

20

असभ्यता की दुर्गंध में एक सुगंध

21

नए थाने खोलने से अपराध नहीं रुकते : अनुपम मिश्र

22

मन्ना: वे गीत फरोश भी थे

23

श्रद्धा-भाव की जरूरत

 

मानव फांस में उलझी यमुना

Submitted by Hindi on Mon, 10/27/2014 - 09:20
Author
अरुण कुमार त्रिपाठी
Source
कल्पतरू एक्सप्रेस, 27 अक्टूबर 2014
दिल्ली का मीडिया और केंद्र सरकार यमुना सफाई पर फतवे जारी करते रहते हैं, लेकिन नजफगढ़ नाले से लेकर 16 बड़े नालों ने दिल्ली में यमुना का जो हाल कर रखा है वह यमुना के मानव फांस का ही द्योतक है। शुक्र है आज कृष्ण नहीं हुए वरना वे कालिंदी के उद्धार के लिए दिल्ली को ही नाथते। दिल्ली ही आज का वह ‘कालिया नाग’ है जिसने यमुना को विषैला कर रखा है। जरूरी है कि या तो वह अपनी आदत सुधार ले या यमुना को छोड़कर कहीं और चला जाए।यम द्वितीया के दिन जब यम फांस से मुक्ति के लिए मृत्यु लोक के वासी यमुना में डुबकी लगाकर अपने को तार रहे थे तो यमुना मानव फांस से मुक्ति के लिए छटपटा रही थी। कहते हैं कि यम द्वितीया के दिन मथुरा में स्नान का विशेष पुण्य होता है और इसीलिए भाई-बहन के इस पर्व को सफल बनाने के उद्देश्य से प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए थे। तीन हजार क्यूसेक पानी विशेष तौर पर छोड़ा गया था। अफसरों की मुस्तैदी से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलते रहे, सीवेज पंपिंग स्टेशन ओवर फ्लो नहीं हुए। लेकिन, न यमुना को ताजा पानी नसीब हुआ, न ही उसके भक्तों को। अगर आस्था के आगे मनुष्य ने आंख और नाक बंद करने की कला न सीखी होती तो उस पानी में डुबकी लगाना और अपना उद्धार करना मुश्किल था।

इन्हीं स्थितियों से ऊबकर यमुना सत्याग्रहियों ने दो नवंबर को एक बार फिर हथिनी कुंड बैराज पर आर-पार की लड़ाई का फैसला किया है। हथिनी कुंड बैराज वह जगह है, जहां पर हरियाणा यमुना में से अपनी जरूरत के लिहाज से पानी निकाल लेता है। जबरदस्ती का यह सिलसिला ताजेवाला से शुरू होता है और वजीराबाद, ओखला होते हुए गोकुल बैराज और उससे आगे तक जारी रहता है। हरियाणा अगर यमुना के पानी के अधिकतम दोहन के लिए जिम्मेदार है तो दिल्ली उसके दोहन के साथ प्रदूषण के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। यमुना को धीरे-धीरे मारने के इस पाप में उत्तर प्रदेश का भी योगदान है, लेकिन वह हरियाणा और दिल्ली के पाप के आगे दब जाता है। उत्तर प्रदेश का एक उदाहरण गोकुल बैराज है जिसे मथुरा, आगरा और वृंदावन को पानी देने के लिए यमुना पर बनाया गया था, लेकिन इसके फाटक बंद होने से किसानों की जमीनें डूब गईं और वे मुआवजे के लिए तरस रहे हैं। हार कर किसानों ने अब बैराज में कूदकर आत्महत्या की धमकी दी है।

उधर, हरियाणा के मुख्यमंत्री दिल्ली पर यमुना को प्रदूषित करने का आरोप लगाते रहे हैं। यह आरोप तब भी लगता था जब दिल्ली में कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और हरियाणा में उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा थे। यह आरोप अब भी बंद नहीं होगा, चाहे दिल्ली में राष्ट्रपति शासन और हरियाणा में भाजपा सरकार रहे। उसकी वजह भी है। वजीराबाद से पहले यमुना साफ भी है और उसमें पानी भी है। लेकिन, वजीराबाद से ओखला तक पहुंचने में यमुना देश के सबसे चमकदार और सबके कल्याण का लंबा-चौड़ा दावा करने वाली देश की राजधानी की मार से इतनी पस्त हो जाती है कि न तो उसमें पानी बचता है न ही स्वच्छता। ऊपर से तुर्रा यह है कि हम यमुना को टेम्स बना देंगे।

दिल्ली का मीडिया और वहां स्थित केंद्र सरकार यमुना सफाई पर लंबे-चौड़े फतवे जारी करती रहती है। लेकिन, मशहूर नजफगढ़ नाले से लेकर सोलह बड़े नालों ने दिल्ली में यमुना का जो हाल कर रखा है वह यमुना के मानव फांस का ही द्योतक है। शुक्र है आज कृष्ण नहीं हुए वरना वे कालिंदी के उद्धार के लिए दिल्ली को ही नाथते। क्योंकि दिल्ली को नाथे बिना यमुना का उद्धार संभव नहीं है। दिल्ली ही आज का वह ‘कालिया नाग’ है जिसने यमुना को विषैला कर रखा है और जरूरी है कि या तो वह अपनी आदत सुधार ले या यमुना को छोड़कर कहीं और चला जाए। लेकिन, मुश्किल है कि दिल्ली को नाथेगा कौन?

बड़े-बड़े दावे करने वाली दिल्ली यमुना के साथ कितना छल कर रही है, यह बात आंकड़ों से साबित होती है। यमुना सफाई के नाम पर कई हजार करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए जाने के बावजूद राजधानी में अभी महज 17 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जा सके हैं। वे सिर्फ आधी गंदगी का शोधन कर पाते हैं। इस बीच यूपीए सरकार ने 2013 में जापान सरकार के सहयोग से ओखला बैराज पर 1656 करोड़ रुपये की लागत से अति आधुनिक सफाई संयंत्र लगाने की योजना बनाई थी। लेकिन, अब यह राशि कम पड़ रही है और आंकड़ा 6000 करोड़ तक जा रहा है। उधर, दिल्ली जल बोर्ड की योजना के तहत राजधानी में सीवेज ट्रीटमेंट पर 2031 तक 25 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं।

.यमुना प्रदूषण के बढ़ते जाने और सफाई खर्च के बीच एक समानुपाती रिश्ता है। यह बात ब्रज लाइफ लाइन वेलफेयर से जुड़े यमुना मुक्ति के योद्धा महेंद्रनाथ चतुर्वेदी की एक पुस्तिका से प्रमाणित होती है। ‘सफरनामा’ नाम से प्रकाशित उनकी यह पुस्तक आरंभ में ही कहती है- ‘नदी के प्रदूषण का प्राथमिक कारक कॉलीफार्म बैक्टीरिया जहां निजामुद्दीन ब्रिज पर 1999 में आठ करोड़ पचास लाख था, वह बढ़कर 2012 में 17 अरब की संख्या पार कर गया। वह भी छह हजार करोड़ रुपयों की भारी राशि के खर्च किए जाने के बाद।’ यह इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकारी धन की किस प्रकार बंदरबांट की गई है। यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि वह 1983-84 के वर्ष को यमुना के प्रदूषण की शुरुआत का वर्ष बताते हैं और लगभग यही वर्ष गंगा एक्शन प्लान का भी है।

आज सवाल यह है कि क्या यमुना की सफाई जल संसाधन मंत्री उमा भारती और उनके साथ धार्मिक तरीके से इसे मुद्दा बनाने का कोलाहल करने वाले लोगों के द्वारा होगी या विशुद्ध वैज्ञानिक तरीके से औद्योगिक लॉबी द्वारा की जाएगी? यह एक गंभीर सवाल है और इस पर समाज में ही नहीं सरकार के भीतर भी खींचतान कम नहीं है। वे इसे वोट के लिए धार्मिक मसला बनाना चाहते हैं, लेकिन औद्योगिक शक्तियों व हरित क्रांति से पोषित किसान लॉबी के बिजली पानी के हितों की कुर्बानी देकर गंगा- यमुना को मुक्त नहीं करना चाहते। पर, यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि गंगा और यमुना किसी पार्टी को वोट नहीं देतीं और न ही किसी धर्म की माला जपती हैं।

वे सभी धर्मों के अनुयायियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से समभाव से ही व्यवहार करती हैं। लेकिन, उनकी अन्याय और अत्याचार सहने की एक सीमा है। जब वे कुपित होती हैं तो न तो हिन्दू बहुल उत्तराखंड को बख्शती हैं और न ही मुस्लिम बहुल कश्मीर को। इसलिए नदियों का अपना धर्म और अपनी राजनीति है। वह धर्म है नदियों के साफ-सुथरे तरीके से अविरल बहने का। हमें उसे समझना होगा और उसे इस लोकतंत्र में जगह देनी ही होगी। तभी यमुना का मानव फांस दूर होगा और तभी वह हमारा यम फांस दूर कर पाएंगी।

(लेखक कल्पतरु एक्सप्रेस के कार्यकारी संपादक हैं), ईमेल-tripathiarunk@gmail.com

सफाई और मनोरंजन

Submitted by Hindi on Sun, 10/26/2014 - 12:36
Author
विनीत कुमार
Source
जनसत्ता, 26 अक्टूबर 2014
भारत को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। उसी का अध्यक्ष पत्रकारों के सवालों के जवाब में यह कह रहा हो कि अभी यह समय मुख्यमंत्री कौन पर बात करने का नहीं, पटाखे जलाने का है। और हमने देखा कि लगभग सभी न्यूज चैनलों के स्क्रीन पटाखे के धुएँ से भर गए। आस्थावान समाज के लिए बेहतर है कि वह टेलीविजन की सारी सामग्री को अभियान का दूसरा संस्करण ही मानेस्वच्छता अभियान के तहत दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान और अभिषेक बच्चन ने ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ के प्रस्तोता कपिल शर्मा की झाडू से सफाई की। फिल्म ‘हैप्पी न्यू इयर’ के प्रमोशन में आए इन सितारों ने पहले स्टूडियो के फर्स पर झाड़ू फिराई फिर एक-एक करके कपिल शर्मा के शरीर पर। जाहिर है, यह सब मनोरंजन के लिए किया गया। जो स्टूडियो में मौजूद दर्शक और खुद कपिल शर्मा लगातार हंसते रहे।

नरेंद्र मोदी सरकार के स्वच्छता अभियान की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ और ‘बिग बॉस’ जैसे आधा दर्जन टेलीविजन कार्यक्रमों में इसकी चर्चा किसी न किसी रूप में हुई। कुछ में तो सीधे-सीधे पूरी टीम को सफाई करते दिखाया गया, तो कुछ में संवादों के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है।

प्रयास

पत्नी-बेटे मरे तो पेड़ों को ही बना लिया सबकुछ, अब हैं चालीस हजार वृक्षों के पिता

Submitted by HindiWater on Sat, 12/07/2019 - 11:31
Source
डाउन टू अर्थ, दिसंबर 2019
अपनी खेती बाड़ी से मैं खुश था। इससे होने वाली आय इतनी थी कि मेरे परिवार को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी, लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो तो ऊपर वाले का वज्र टूटता है। मेरे साथ ही ऐसा ही हुआ। 

नोटिस बोर्ड

गंगा की रक्षा के लिए 15 दिसंबर से पद्मावती मातृसदन में करेंगी अनशन

Submitted by HindiWater on Fri, 12/06/2019 - 11:05
मातृसदन द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मांगों के संदर्भ में एक पत्र भेजा गया, लेकिन अभी तक मांग पूरी नहीं हुई। जिस कारण मातृसदन की साध्वी पद्मावती ने 15 दिसंबर 2019 से 6 सूत्रीय मांगों को लेकर अनशन की घोषणा कर दी है। अनशन के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भी अवगत करा दिया गया है। 

"संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स-2019" के लिए आवेदन

Submitted by HindiWater on Wed, 11/27/2019 - 13:25
गैर-लाभकारी संगठन चरखा विकास संचार नेटवर्क ने 'संजॉय घोष मीडिया अवार्ड्स 2019’ की घोषणा की है। इसके अंतर्गत उन लेखकों को मंच प्रदान किया जाएगा जो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में छुपी ऐसी प्रतिभाओं को उजागर करने का हौसला रखते हैं, जो मीडिया की नजरों से अब तक दूर रहा है।

‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा हरिद्वार कुंभ

Submitted by HindiWater on Mon, 11/25/2019 - 09:44
Source
दैनिक जागरण, 25 नवम्बर 2019
कुंभ-2021 को भव्य, शानदार, यादगार और अनूठा बनाने के लिए कुंभ मेला अधिष्ठान बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहा है। विशेष यह कि इस बार हरिद्वार यह आयोजन ‘ग्रीन कुंभ’ की थीम पर होगा। इसमें गंगा की शुद्धता और पर्यावरण की रक्षा पर विशेष फोकस रहेगा। इसके तहत विद्युत ऊर्जा का कम से कम (लगभग शून्य) और सौर ऊर्जा का अधिकाधिक इस्तेमाल करने की योजना है।

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