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Submitted by Editorial Team on Fri, 07/08/2022 - 17:20
केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण
भूजल का दोहन, भूस्वामी की जमीन की सीमा तक सीमित नहीं होता। वह अनेक पैरामीटर पर निर्भर होता है। उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि वैज्ञानिकों को अधिनियम को मानवीय और वैज्ञानिक चेहरा प्रदान करने के लिए काफी कुछ करना बाकी है। सबसे अधिक आवश्यक है सामाजिक स्वीकार्यता। यदि अधिनियम से सामाजिक स्वीकार्यता अनुपस्थित है तो अधिनियमों को धरती पर उतारना और समस्या को हल करना कठिन हो सकता है। भूमि जल प्राधिकरण के सामने यही असली चुनौती है।

Content

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 05/14/2009 - 10:08
Source:
Climate Change
हिमाचल सरकार ने पिछले दिनों क्लाईमेट चेंज पर नीति का मसौदा तैयार किया। विश्व भर में पिछले 5 वर्षों में शायद ही कोई और मुद्दा इतनी चर्चा और चिंतन का विषय रहा होगा जितना कि क्लाईमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन। और क्यों न हो जब यह विस्तृत रूप से साबित हो चुका है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान से आने वाले समय में बदलते और अपूर्वानुमेय मौसम, बाढ़, साईक्लोन अन्य आपदाएं और स्वास्थ्य समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी।

पृथ्वी के बढ़ते तापमान का मुख्य कारण है जीवाश्म इंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग जिससे कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में मात्रा हद से ज्यादा बढ़ जाती है। यह बात भी स्पष्ट हो चुकी है कि विश्व के अधिकांश देश एक ऐसी विकास प्रणाली अपना चुके हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित है।

अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे विकसित देश आर्थिक विकास की इस अंधी दौड़ में आगे हैं तो भारत और चीन जैसे विकासशील देश भी इसी विकास की परिभाषा को अपनाए हुए हैं। बड़े पैमाने पर खनन, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिकरण ही उपभोगवादी समाज और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था इस विकास का मुख्य आधार रहा है जिसके फलस्वरूप आज हमें इस संकट का सामना करना पड़ रहा है।

सामान्य समझ (common sense) के हिसाब से तो साफ जाहिर है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति कम करनी है तो उपभोगवादी विकास की धारा को बदलना ही होगा। परंतु क्लाईमेट चेंज की समस्या से जूझने के उपाय और प्रस्ताव जो मुख्यधारा में उभर कर आए हैं उन्हें देखकर लगता है कि अभी भी हम इस संकट की जड़ को पहचानने से कतरा रहे हैं।

इस संवाद में एक तरफ अमेरिका जैसे देश इस जिम्मेदारी से साफ मुकर, भारत और चीन की तरफ उंगली कर रहे हैं - जिनकी आज विश्व के सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है। वहीं दूसरी ओर भारत और चीन कहते हैं कि आर्थिक विकास “हमारा अधिकार है” और जो कि विकसित देशों का कार्बन उत्सर्ग अधिक है तो भरपाई की जिम्मेवारी पहले उनकी बनती है।

क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक चर्चाओं के बाद 1997 में जलवायु परिवर्तन पर ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ नामक समझौता अपनाया गया। समझौते के अनुसार विकसित एवं औद्योगिक देशों को 2012 तक अपने-अपने देशों के कार्बन उत्सर्ग में 95 प्रतिशत तक की कटौती करने पर प्रतिबद्ध किया गया। परंतु अमेरिका जैसे देश इससे पूरी तरह से मान्य नहीं थे और इससे बचने का भी उपाय निकाल लिया।

यह उपाय था क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) – जिसे कार्बन व्यापार के नाम से भी जाना जाता है। क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीडीएम का संचालन संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत स्थापित संस्था द्वारा किया जाता है।

भारत की सरकार और यहां की कंपनियों ने भी इस योजना का खुशी से स्वागत किया और देखते-ही-देखते सीडीएम परियोजना का दर्जा पाने के लिए प्रस्तावों की लाइन लग गई। इसमें मुख्यतः वह परियोजनाएं शामिल हैं जो किसी भी प्रकार का पुनर्चक्रण (recycling) या फिर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का प्रयोग कर रही हो। ऐसे उद्योगों के लिए सीडीएम बड़े फायदे का सौदा है क्योंकि इससे परियोजना की लागत में कमी होती है और नफा बढ़ जाता है। लगे हाथ ऐसी कंपनियों को पर्यावरण-अनुकूल (ईको-फ्रेंडली) होने का खिताब भी मिल जाता है। प्रत्यक्ष रूप से देखने पर यह व्यवस्था उचित जरूर लगती है। पर क्या वाकई में सीडीएम परियोजनाएं पर्यावरण के संरक्षण में भागीदारी दे रही हैं?

हमारे सामने आज सबसे बड़ा उदाहरण है जल विद्युत परियोजनाओं का जिन्हें जल जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत से बिजली पैदा करने के कारण सीडीएम सब्सिडी के लिए स्वीकृतियां मिल रही हैं। ऐसी कई परियोजनाएं हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं। अब यदि जल विद्युत परियोजनाओं की बात की जाए तो हिमाचल के किसी भी क्षेत्र से, जहां ये परियोजनाएं बनाई गई हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं, एक भयानक चित्र उभर कर निकलता है।

इस चित्र में टूटे-फूटे पहाड़, धंसती जमीन, बिना पानी की नदियां, उजड़ते खेतों और कटे हुए पेड़ों का नजारा मिलेगा। वहां रहने वाले लोगों से बात की जाए तो इन परियोजनाओं से उनके जीवन और आजीविकाओं के अस्त-व्यस्त होने की बेशुमार कहानियां भी मिलेंगी। कई वर्षों से स्थानीय समुदाय, पर्यावरण कार्यकर्ता और संगठन इन मुद्दों को लेकर जल विद्युत परियोजनाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

अचंभे की बात है कि निजी कंपनियां ऐसी परियोजनाओं के लिए क्लाईमेट चेंज (को रोकने) के नाम पर सीडीएम सब्सिडी पाकर नफा कमा रही हैं। भारत से ऐसी 102 जल विद्युत परियोजनाओं को सीडीएम के अंतर्गत मान्यता मिली है। इनके अलावा अंबूजा सीमेंट, टाटा स्टील, रिलायंस जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अन्य परियोजनाएं सीडीएम से फायदा उठा रही हैं।

इस पूरे विषय में दो बड़े चिंताजनक पहलू हैं। पहला यह कि जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या को केवल कार्बन उत्सर्ग तक सीमित कर इससे निपटने के लिए विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कार्बन व्यापार का बाजारू तरीका अपनाया है। दुनिया भर से पर्यावरणविदों और संस्थाओं ने इसका विरोध करते हुए अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्लाईमेट चेंज के मुद्दे को हाईजैक करने का आरोप लगाया है।

दूसरा यह कि भारत जैसे देश और स्थानीय उद्योग इस बाजार श्रृंखला का हिस्सा बन पर्यावरण संकट से भी लाभ के अवसर ढूंढ रहे हैं। एक पहाड़ी क्षेत्र और ग्लेशियर, नदियों, जंगलों जैसे संसाधनों से भरपूर होने के नाते शायद हिमाचल सरकार को अपनी क्लाईमेट चेंज नीति में यहां की प्रकृति धरोहर के संरक्षण के लिए रणनीति रखनी चाहिए थी। परंतु नीति के मसौदे में सीडीएम के अलावा और कोई बात नहीं। हिमाचल सरकार ने जल-विद्युत, परिवहन, सीमेंट उद्योग जैसे हर क्षेत्र में सीडीएम से फायदा उठाने की योजना बनाई है।

जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योग के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को जानते हुए आज हिमाचल सरकार न सिर्फ इन्हें बढ़ावा दे रही है बल्कि इनके लिए सीडीएम सब्सिडी दिलाने के भी पक्ष में है। मुख्यमंत्री जी, क्या आपको वाकई में लगता है कि सीडीएम और कार्बन के व्यापार से हिमाचल, ये देश और ये विश्व जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बच सकते हैं? या फिर जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योगों को सीडीएम सब्सिडी दिलवा के हम अपने पर्यावरण और भविष्य को और असुरक्षित बना रहे हैं?

Submitted by admin on Sat, 04/25/2009 - 19:44
Source:

वैश्विक धारा के प्रवाह को लेकर हुए एक व्यापक अध्ययन के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियां अपना पानी खो रहीं हैं. अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेयरिक रिसर्च के वैज्ञानिकों के नेतृत्व हुए इस अध्ययन के मुताबिक कई मामलों में प्रवाह के कम होने की वजह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है.
Submitted by admin on Sat, 04/25/2009 - 17:21
Source:

जल पर्यावरण का जीवनदायी तत्व है. परिस्थितिकी के निर्माण में जल आधारभूत कारक है. वनस्पतियों से लेकर जीव-जंतु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल से करते हैं. मनुष्य के भौतिकवादी दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक की निरंतर प्रगति, बढता औद्योगीकरण और शहरीकरण, खेतों में पैदावार बढाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, कीटनाशकों का अनियंत्रित प्रयोग व जनसंख्या में हो रही वृद्धि तथा जनमानस की प्रदूषण के प्रति उदासीनता के कारण जल प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है.संसार के अनेक भागों के भूजल में आर्सेनिक पाया गया है. भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति मात्र ही मानव जाति के लिए अवांछनीय है.

प्रयास

Submitted by Shivendra on Fri, 07/01/2022 - 13:28
राजस्थान के उदयपुर जिले के मेनार गांव में धंध झील में पक्षियों का झुंड
इससे मेवाड़ के ग्रामीण क्षेत्र को रामसर स्थल का दर्जा मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। गाँव की दो झीलें ब्रह्मा और धंध में हर साल सर्दियों के मौसम में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को देखा जा सकता है। इसी वजह से गांव का नाम बर्ड विलेज पड़ा।   

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 07/25/2022 - 15:34
Source:
यूसर्क
जल शिक्षा व्याख्यान श्रृंखला
इस दौरान राष्ट्रीय पर्यावरण  इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्था के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अपशिष्ट जल विभाग विभाग के प्रमुख डॉक्टर रितेश विजय  सस्टेनेबल  वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट फॉर लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट (Sustainable Wastewater Treatment for Liquid Waste Management) विषय  पर विशेषज्ञ तौर पर अपनी राय रखेंगे।
Submitted by Shivendra on Fri, 06/10/2022 - 10:20
Source:
भूजल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वालो को यूपी सरकार करेगी सम्मानित
भूजल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाले संस्था या व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की सरकार सम्मानित करने जा रही है । उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रथम राज्य भूजल पुरस्कार की घोषणा की है इस पुरस्कार के लिए हर जिले से आवेदन मांगे
Submitted by Shivendra on Tue, 04/26/2022 - 15:43
Source:
तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
भारत  और CAWST, कनाडा साथ मिलकर ‘स्वस्थ जीवन के लिए घरेलू जल उपचार और स्वच्छता (WASH) व्यवहार में परिवर्तन’ विषय पर  18 से 20 मई तक गुरुग्राम, हरियाणा  में  तीन-दिन की प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन करने जा रहे हैं।

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खासम-खास

केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण  : कुछ तथ्य, कुछ जानकारियां

Submitted by Editorial Team on Fri, 07/08/2022 - 17:20
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
kendriya-bhoomi-jal-pradhikaran-:-kuchh-tathy,-kuchh-jankariyan
केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण
भूजल का दोहन, भूस्वामी की जमीन की सीमा तक सीमित नहीं होता। वह अनेक पैरामीटर पर निर्भर होता है। उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि वैज्ञानिकों को अधिनियम को मानवीय और वैज्ञानिक चेहरा प्रदान करने के लिए काफी कुछ करना बाकी है। सबसे अधिक आवश्यक है सामाजिक स्वीकार्यता। यदि अधिनियम से सामाजिक स्वीकार्यता अनुपस्थित है तो अधिनियमों को धरती पर उतारना और समस्या को हल करना कठिन हो सकता है। भूमि जल प्राधिकरण के सामने यही असली चुनौती है।

Content

क्लाईमेट चेंज के नाम पर कार्बन का व्यापार

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 05/14/2009 - 10:08
Author
मांशी आशर
Climate Change
.हिमाचल सरकार ने पिछले दिनों क्लाईमेट चेंज पर नीति का मसौदा तैयार किया। विश्व भर में पिछले 5 वर्षों में शायद ही कोई और मुद्दा इतनी चर्चा और चिंतन का विषय रहा होगा जितना कि क्लाईमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन। और क्यों न हो जब यह विस्तृत रूप से साबित हो चुका है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान से आने वाले समय में बदलते और अपूर्वानुमेय मौसम, बाढ़, साईक्लोन अन्य आपदाएं और स्वास्थ्य समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी।

पृथ्वी के बढ़ते तापमान का मुख्य कारण है जीवाश्म इंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग जिससे कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में मात्रा हद से ज्यादा बढ़ जाती है। यह बात भी स्पष्ट हो चुकी है कि विश्व के अधिकांश देश एक ऐसी विकास प्रणाली अपना चुके हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित है।

अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे विकसित देश आर्थिक विकास की इस अंधी दौड़ में आगे हैं तो भारत और चीन जैसे विकासशील देश भी इसी विकास की परिभाषा को अपनाए हुए हैं। बड़े पैमाने पर खनन, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिकरण ही उपभोगवादी समाज और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था इस विकास का मुख्य आधार रहा है जिसके फलस्वरूप आज हमें इस संकट का सामना करना पड़ रहा है।

सामान्य समझ (common sense) के हिसाब से तो साफ जाहिर है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति कम करनी है तो उपभोगवादी विकास की धारा को बदलना ही होगा। परंतु क्लाईमेट चेंज की समस्या से जूझने के उपाय और प्रस्ताव जो मुख्यधारा में उभर कर आए हैं उन्हें देखकर लगता है कि अभी भी हम इस संकट की जड़ को पहचानने से कतरा रहे हैं।

इस संवाद में एक तरफ अमेरिका जैसे देश इस जिम्मेदारी से साफ मुकर, भारत और चीन की तरफ उंगली कर रहे हैं - जिनकी आज विश्व के सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है। वहीं दूसरी ओर भारत और चीन कहते हैं कि आर्थिक विकास “हमारा अधिकार है” और जो कि विकसित देशों का कार्बन उत्सर्ग अधिक है तो भरपाई की जिम्मेवारी पहले उनकी बनती है।

क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक चर्चाओं के बाद 1997 में जलवायु परिवर्तन पर ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ नामक समझौता अपनाया गया। समझौते के अनुसार विकसित एवं औद्योगिक देशों को 2012 तक अपने-अपने देशों के कार्बन उत्सर्ग में 95 प्रतिशत तक की कटौती करने पर प्रतिबद्ध किया गया। परंतु अमेरिका जैसे देश इससे पूरी तरह से मान्य नहीं थे और इससे बचने का भी उपाय निकाल लिया।

यह उपाय था क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) – जिसे कार्बन व्यापार के नाम से भी जाना जाता है। क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीडीएम का संचालन संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत स्थापित संस्था द्वारा किया जाता है।

भारत की सरकार और यहां की कंपनियों ने भी इस योजना का खुशी से स्वागत किया और देखते-ही-देखते सीडीएम परियोजना का दर्जा पाने के लिए प्रस्तावों की लाइन लग गई। इसमें मुख्यतः वह परियोजनाएं शामिल हैं जो किसी भी प्रकार का पुनर्चक्रण (recycling) या फिर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का प्रयोग कर रही हो। ऐसे उद्योगों के लिए सीडीएम बड़े फायदे का सौदा है क्योंकि इससे परियोजना की लागत में कमी होती है और नफा बढ़ जाता है। लगे हाथ ऐसी कंपनियों को पर्यावरण-अनुकूल (ईको-फ्रेंडली) होने का खिताब भी मिल जाता है। प्रत्यक्ष रूप से देखने पर यह व्यवस्था उचित जरूर लगती है। पर क्या वाकई में सीडीएम परियोजनाएं पर्यावरण के संरक्षण में भागीदारी दे रही हैं?

हमारे सामने आज सबसे बड़ा उदाहरण है जल विद्युत परियोजनाओं का जिन्हें जल जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत से बिजली पैदा करने के कारण सीडीएम सब्सिडी के लिए स्वीकृतियां मिल रही हैं। ऐसी कई परियोजनाएं हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं। अब यदि जल विद्युत परियोजनाओं की बात की जाए तो हिमाचल के किसी भी क्षेत्र से, जहां ये परियोजनाएं बनाई गई हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं, एक भयानक चित्र उभर कर निकलता है।

जलवायु परिवर्तनइस चित्र में टूटे-फूटे पहाड़, धंसती जमीन, बिना पानी की नदियां, उजड़ते खेतों और कटे हुए पेड़ों का नजारा मिलेगा। वहां रहने वाले लोगों से बात की जाए तो इन परियोजनाओं से उनके जीवन और आजीविकाओं के अस्त-व्यस्त होने की बेशुमार कहानियां भी मिलेंगी। कई वर्षों से स्थानीय समुदाय, पर्यावरण कार्यकर्ता और संगठन इन मुद्दों को लेकर जल विद्युत परियोजनाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

अचंभे की बात है कि निजी कंपनियां ऐसी परियोजनाओं के लिए क्लाईमेट चेंज (को रोकने) के नाम पर सीडीएम सब्सिडी पाकर नफा कमा रही हैं। भारत से ऐसी 102 जल विद्युत परियोजनाओं को सीडीएम के अंतर्गत मान्यता मिली है। इनके अलावा अंबूजा सीमेंट, टाटा स्टील, रिलायंस जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अन्य परियोजनाएं सीडीएम से फायदा उठा रही हैं।

इस पूरे विषय में दो बड़े चिंताजनक पहलू हैं। पहला यह कि जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या को केवल कार्बन उत्सर्ग तक सीमित कर इससे निपटने के लिए विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कार्बन व्यापार का बाजारू तरीका अपनाया है। दुनिया भर से पर्यावरणविदों और संस्थाओं ने इसका विरोध करते हुए अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्लाईमेट चेंज के मुद्दे को हाईजैक करने का आरोप लगाया है।

दूसरा यह कि भारत जैसे देश और स्थानीय उद्योग इस बाजार श्रृंखला का हिस्सा बन पर्यावरण संकट से भी लाभ के अवसर ढूंढ रहे हैं। एक पहाड़ी क्षेत्र और ग्लेशियर, नदियों, जंगलों जैसे संसाधनों से भरपूर होने के नाते शायद हिमाचल सरकार को अपनी क्लाईमेट चेंज नीति में यहां की प्रकृति धरोहर के संरक्षण के लिए रणनीति रखनी चाहिए थी। परंतु नीति के मसौदे में सीडीएम के अलावा और कोई बात नहीं। हिमाचल सरकार ने जल-विद्युत, परिवहन, सीमेंट उद्योग जैसे हर क्षेत्र में सीडीएम से फायदा उठाने की योजना बनाई है।

जलवायु परिवर्तनजल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योग के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को जानते हुए आज हिमाचल सरकार न सिर्फ इन्हें बढ़ावा दे रही है बल्कि इनके लिए सीडीएम सब्सिडी दिलाने के भी पक्ष में है। मुख्यमंत्री जी, क्या आपको वाकई में लगता है कि सीडीएम और कार्बन के व्यापार से हिमाचल, ये देश और ये विश्व जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बच सकते हैं? या फिर जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योगों को सीडीएम सब्सिडी दिलवा के हम अपने पर्यावरण और भविष्य को और असुरक्षित बना रहे हैं?

खतरे के दौर से गुजर रहीं बडी नदियां

Submitted by admin on Sat, 04/25/2009 - 19:44
Author
नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेयरिक रिसर्च

वैश्विक धारा के प्रवाह को लेकर हुए एक व्यापक अध्ययन के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियां अपना पानी खो रहीं हैं. अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेयरिक रिसर्च के वैज्ञानिकों के नेतृत्व हुए इस अध्ययन के मुताबिक कई मामलों में प्रवाह के कम होने की वजह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है.

यूपी के महाराजगंज के भूजल में आर्सेनिक की स्थिति

Submitted by admin on Sat, 04/25/2009 - 17:21
Author
कालीचरण
रेणु रस्तोगी
एमएम गौतम

जल पर्यावरण का जीवनदायी तत्व है. परिस्थितिकी के निर्माण में जल आधारभूत कारक है. वनस्पतियों से लेकर जीव-जंतु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल से करते हैं. मनुष्य के भौतिकवादी दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक की निरंतर प्रगति, बढता औद्योगीकरण और शहरीकरण, खेतों में पैदावार बढाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, कीटनाशकों का अनियंत्रित प्रयोग व जनसंख्या में हो रही वृद्धि तथा जनमानस की प्रदूषण के प्रति उदासीनता के कारण जल प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है.संसार के अनेक भागों के भूजल में आर्सेनिक पाया गया है. भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति मात्र ही मानव जाति के लिए अवांछनीय है.

प्रयास

उदयपुर के इस गांव को वेटलैंड घोषित किया जाना तय

Submitted by Shivendra on Fri, 07/01/2022 - 13:28
udayapur-ke-is-gaon-ko-weightland-ghoshit-kiya-jana-tay
राजस्थान के उदयपुर जिले के मेनार गांव में धंध झील में पक्षियों का झुंड
इससे मेवाड़ के ग्रामीण क्षेत्र को रामसर स्थल का दर्जा मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। गाँव की दो झीलें ब्रह्मा और धंध में हर साल सर्दियों के मौसम में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को देखा जा सकता है। इसी वजह से गांव का नाम बर्ड विलेज पड़ा।   

नोटिस बोर्ड

28 जुलाई को यूसर्क द्वारा आयोजित जल शिक्षा व्याख्यान श्रृंखला पर भाग लेने के लिए पंजीकरण करायें

Submitted by Shivendra on Mon, 07/25/2022 - 15:34
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Source
यूसर्क
जल शिक्षा व्याख्यान श्रृंखला
इस दौरान राष्ट्रीय पर्यावरण  इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्था के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अपशिष्ट जल विभाग विभाग के प्रमुख डॉक्टर रितेश विजय  सस्टेनेबल  वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट फॉर लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट (Sustainable Wastewater Treatment for Liquid Waste Management) विषय  पर विशेषज्ञ तौर पर अपनी राय रखेंगे।

भूजल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वालो को यूपी सरकार करेगी सम्मानित

Submitted by Shivendra on Fri, 06/10/2022 - 10:20
bhoojal-sanrakshan-ke-kshetra-men-karya-karne-valo-ke-liye-up-sarkar-ne-manga-avedan
भूजल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वालो को यूपी सरकार करेगी सम्मानित
भूजल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाले संस्था या व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की सरकार सम्मानित करने जा रही है । उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रथम राज्य भूजल पुरस्कार की घोषणा की है इस पुरस्कार के लिए हर जिले से आवेदन मांगे

स्वस्थ जीवन के लिए घरेलू जल उपचार और स्वच्छता व्यवहार में परिवर्तन पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला

Submitted by Shivendra on Tue, 04/26/2022 - 15:43
swasth-jeevan-ke-liye-gharelu-jal-upchar-or-swachhta-vyavahar-mein-parivartan-par-tin-divasiy-prashikshan-karyashala
तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
भारत  और CAWST, कनाडा साथ मिलकर ‘स्वस्थ जीवन के लिए घरेलू जल उपचार और स्वच्छता (WASH) व्यवहार में परिवर्तन’ विषय पर  18 से 20 मई तक गुरुग्राम, हरियाणा  में  तीन-दिन की प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन करने जा रहे हैं।

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