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खासम-खास

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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Submitted by admin on Fri, 07/24/2009 - 07:43
Source:
जल निगम द्वारा कराई गई पानी की जांच में यह भी सामने आया है कि जनपद के अन्य ब्लाकों में ताखा ब्लाक के ग्राम रौरा में 1-92, महेवा ब्लाक के अहेरीपुर में 1-8 मिग्रा फ्लोराइड की मात्रा पाई गई है। इसके साथ ही जसवंतनगर ब्लाक के ही ग्राम शाहजहांपुर में 1-6, दर्शनपुरा में 1-8, खनाबाग में 1-6, ताखा ब्लाक के ग्राम नगला ढकाउ में 1-8 मिग्रा, नगला कले में 1-6, भर्थना ब्लाक के ग्राम हरनारायणपुर में फ्लोराइड की मात्रा 1-6 मिग्रा, लीटर पाई गई है जो निर्धातिर मानकों से काफी अधिक है।मौसम में लगातार हो रहे असंतुलन ने भूजल को बुरी तरह प्रदूषित किया है. पीने के लिए सरकार द्वारा लगवाए गए हैंडपंपों के पानी में जिस प्रकार से रसायनिक अवयवों का संतुलन बिगड़ा है, उससे यह पानी स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य जल निगम की इटावा शाखा द्वारा पेयजल के लिए गए नमूनों में जिस प्रकार से पेयजल के अवयवों में फ्लोराइड आयरन एवं नाइट्रेट की मात्रा बढ़ जाने से यह पानी लोगों की अपंगता का कारण बनता जा रहा है।

वहीं नाइट्रेट की बढ़ी मात्रा तो बच्चों की मौत का कारण तक बन जाती है। आश्चर्यजनक यह है कि पेयजल के लिए गए नमूनों के बाद शोधकर्ताओं ने साफ किया कि पानी के अवयवों का संतुलन नहीं बनाया जा सकता है और इसका एकमात्र उपाय यही है कि पेयजल की आपूर्ति पानी की टंकी के माध्यम से की जाए।

Submitted by admin on Tue, 07/21/2009 - 15:53
Source:
रंजन के पांडा / इन्फोचेंज समाचार एवं फीचर
वास्तव में भारत के हर गांव और हर शहर की अपनी पारंपरिक जल संचयन तकनीक थी। लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इस तरह के पारंपरिक ज्ञान को तिरस्कार की दृष्टि से देखा और हम आज इसकी कीमत चुका रहे हैं।उच्चतम न्यायालय के मुताबिक ‘हां है’। न्यायालय ने अपने हालिया निर्देशों में बार-बार कहा है कि आर्यभट्ट और रामानुजन के देश में पानी की समस्या का समाधान करने के लिए वैज्ञानिक आगे आएं। मगर रंजन के पांडा मानते हैं कि यह विज्ञान ही है जिसने इतनी समस्याएं खडी की हैं, ऐसे में हमें जल प्रबंधन के पारंपरिक और सांस्कृतिक समाधानों को मजबूत बनाने के प्रयास भी करने चाहिए। इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति तत्काल गठित करने की सिफारिश की जो भारत में जल संकट के वैज्ञानिक समाधान की तलाश करे।
26 अप्रैल 2009 को एक अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए उसने सरकार पर भारी प्रहार किया और उसे इस मुद्दे पर निश्चित लक्ष्य और तय समय सीमा के साथ काम करने का निर्देश दिया।
Submitted by admin on Mon, 07/20/2009 - 12:54
Source:
राजेश मेहता
दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में WUS स्वास्थ्य केन्द्र है। यह विश्वविद्यालय कर्मियों का एकमात्र अस्पताल है। आपको हैरानी होगी यह जानकर कि कई सालों से यहां पीने का पानी ही नहीं है। ज्यादातर तो यहां पानी आता ही नहीं है और कभी आता है तो वह भी काफी दुर्गंध भरा होता है। दावे से कह सकता हूं कि वह दिल्ली जल बोर्ड का पानी तो हो नहीं सकता।

WUS स्वास्थ्य केन्द्र का उद्घाटन भारत के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद, ने वर्ष 1955 में किया था। वर्ल्ड युनिवर्सिटी सर्विस, जिनेवा का एक अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन है, इसकी सहायता से ही विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य केंद्र की शुरुआत हुई थी।

प्रयास

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
Source:
एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 
Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
Source:
चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
Source:
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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खासम-खास

बांधों पर मंडराता खतरा: टिकाऊ माडल की तलाश

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास'
bandhon-per-mandrata-khatra:-tikau-model-ki-talash
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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इटावा का पानी

Submitted by admin on Fri, 07/24/2009 - 07:43
Author
दिनेश शाक्य
जल निगम द्वारा कराई गई पानी की जांच में यह भी सामने आया है कि जनपद के अन्य ब्लाकों में ताखा ब्लाक के ग्राम रौरा में 1-92, महेवा ब्लाक के अहेरीपुर में 1-8 मिग्रा फ्लोराइड की मात्रा पाई गई है। इसके साथ ही जसवंतनगर ब्लाक के ही ग्राम शाहजहांपुर में 1-6, दर्शनपुरा में 1-8, खनाबाग में 1-6, ताखा ब्लाक के ग्राम नगला ढकाउ में 1-8 मिग्रा, नगला कले में 1-6, भर्थना ब्लाक के ग्राम हरनारायणपुर में फ्लोराइड की मात्रा 1-6 मिग्रा, लीटर पाई गई है जो निर्धातिर मानकों से काफी अधिक है।मौसम में लगातार हो रहे असंतुलन ने भूजल को बुरी तरह प्रदूषित किया है. पीने के लिए सरकार द्वारा लगवाए गए हैंडपंपों के पानी में जिस प्रकार से रसायनिक अवयवों का संतुलन बिगड़ा है, उससे यह पानी स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य जल निगम की इटावा शाखा द्वारा पेयजल के लिए गए नमूनों में जिस प्रकार से पेयजल के अवयवों में फ्लोराइड आयरन एवं नाइट्रेट की मात्रा बढ़ जाने से यह पानी लोगों की अपंगता का कारण बनता जा रहा है।

वहीं नाइट्रेट की बढ़ी मात्रा तो बच्चों की मौत का कारण तक बन जाती है। आश्चर्यजनक यह है कि पेयजल के लिए गए नमूनों के बाद शोधकर्ताओं ने साफ किया कि पानी के अवयवों का संतुलन नहीं बनाया जा सकता है और इसका एकमात्र उपाय यही है कि पेयजल की आपूर्ति पानी की टंकी के माध्यम से की जाए।

विज्ञान के पास जलसंकट का समाधान है?

Submitted by admin on Tue, 07/21/2009 - 15:53
Source
रंजन के पांडा / इन्फोचेंज समाचार एवं फीचर
वास्तव में भारत के हर गांव और हर शहर की अपनी पारंपरिक जल संचयन तकनीक थी। लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इस तरह के पारंपरिक ज्ञान को तिरस्कार की दृष्टि से देखा और हम आज इसकी कीमत चुका रहे हैं।उच्चतम न्यायालय के मुताबिक ‘हां है’। न्यायालय ने अपने हालिया निर्देशों में बार-बार कहा है कि आर्यभट्ट और रामानुजन के देश में पानी की समस्या का समाधान करने के लिए वैज्ञानिक आगे आएं। मगर रंजन के पांडा मानते हैं कि यह विज्ञान ही है जिसने इतनी समस्याएं खडी की हैं, ऐसे में हमें जल प्रबंधन के पारंपरिक और सांस्कृतिक समाधानों को मजबूत बनाने के प्रयास भी करने चाहिए। इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति तत्काल गठित करने की सिफारिश की जो भारत में जल संकट के वैज्ञानिक समाधान की तलाश करे।
26 अप्रैल 2009 को एक अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए उसने सरकार पर भारी प्रहार किया और उसे इस मुद्दे पर निश्चित लक्ष्य और तय समय सीमा के साथ काम करने का निर्देश दिया।

डीयू स्वास्थ्य केन्द्र मे पानी नहीं

Submitted by admin on Mon, 07/20/2009 - 12:54
Source
राजेश मेहता
दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर में WUS स्वास्थ्य केन्द्र है। यह विश्वविद्यालय कर्मियों का एकमात्र अस्पताल है। आपको हैरानी होगी यह जानकर कि कई सालों से यहां पीने का पानी ही नहीं है। ज्यादातर तो यहां पानी आता ही नहीं है और कभी आता है तो वह भी काफी दुर्गंध भरा होता है। दावे से कह सकता हूं कि वह दिल्ली जल बोर्ड का पानी तो हो नहीं सकता।

WUS स्वास्थ्य केन्द्र का उद्घाटन भारत के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद, ने वर्ष 1955 में किया था। वर्ल्ड युनिवर्सिटी सर्विस, जिनेवा का एक अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन है, इसकी सहायता से ही विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य केंद्र की शुरुआत हुई थी।

प्रयास

पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा - मायलम्मा

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
pani-paryavaran-andolan-key-amma---mayalamma
Source
पानी पत्रक
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

जल संसाधन प्रबंधन पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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 एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 

चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
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चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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Source
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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