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खासम-खास

Submitted by HindiWater on Mon, 01/13/2020 - 22:17
नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह की बहाली 
भारत की लगभग सभी नदियों का मानसूनी प्रवाह लगभग अप्रभावित है, पर उनके गैर-मानसूनी प्रवाह में कमी आ रही है। अर्थात समस्या केवल नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह के घटने की ही है। गैर-मानसूनी प्रवाह के घटने के कारण छोटी तथा मंझौली नदियाँ मौसमी बनकर रह गई हैं। यह असर व्यापक है।

Content

Submitted by RuralWater on Fri, 08/14/2015 - 14:19
Source:
जनसत्ता (रविवारी) 9 अगस्त 2015
कृषि

खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के निरन्तर इस्तेमाल से आज अनाज, फल, सब्जी जैसी सभी खाद्य वस्तुएँ जहरीली होती जा रही हैं। इसका तोड़ अगर कुछ है तो जैविक या गैर-रासायनिक खेती। भारत के कई राज्यों में इस दिशा में सक्रिय पहल हो चुकी है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर अब भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। इस बारे में बता रही हैं अनीता सहरावत।

ज्यादा अरसा नहीं हुआ, जब आन्ध्र प्रदेश में रामचन्द्रपुरम गाँव के किसानों की खेती की ज़मीन गिरवी रखी जा चुकी थी। महँगी खाद-बीज तो दूर, दो जून की रोटी मयस्सर होनी मुश्किल हो गई थी। तब हारकर उन्होंने हर तरह के रासायनिक खादों और कीटनाशकों को अपनी खेती से निकाल फेंका और परम्परागत जुताई-बुआई की टेक ले ली। जैविक खेती उनके लिये रामबाण साबित हुई।

तीन साल के भीतर उन्होंने न केवल अपना पूरा कर्जा पाट दिया बल्कि अपनी जमीनें भी छुड़ा लीं।

Submitted by RuralWater on Thu, 08/13/2015 - 11:52
Source:
drought
वर्ष-2015, भारत के लिये सूखा वर्ष है या बाढ़ वर्ष?

बाढ़ और सुखाड़ के दुष्प्रभावों के बढ़ाने में इंसानी हाथ को लेकर एक पहलू और है। घोषणा चाहे बाढ़ की हो या सुखाड़ की, तद्नुसार अपनी फसलों और किस्मों में बदलाव की सावधानी अभी ज्यादातर भारतीय किसानों की आदत नहीं बनी है। सुखद है कि पंजाब ने धान की एक तरफा रोपाई की जगह विविध फसल बोने का निर्णय लिया है। किन्तु कम वर्षा की घोषणा बावजूद, उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों ने इस वर्ष की धान की रोपाई में कोई कमी नहीं की। इस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं हो सकता। अब तक हुई बारिश और आई बाढ़ के आधार पर एक भारतीय इसे ‘सूखा वर्ष’ कह रहा है, तो दूसरा ‘बाढ़ वर्ष’? एक जून, 2015 से 10 अगस्त, 2015 तक के आँकड़ों के मुताबिक देश के 355 जिलों में सामान्य से अधिक और 258 में सामान्य से कम बारिश हुई है। इस आधार पर वर्ष 2015 भारत के लिये अधिक वर्षा वर्ष है। एक जून से अगस्त प्रथम सप्ताह तक का राष्ट्रीय औसत देखें, तो वर्षा दीर्घावधि औसत से छह फीसदी कम रही। तय मानकों के मुताबिक, इसे आप सामान्य वर्षा की श्रेणी रख सकते हैं। इस आधार पर यह सामान्य वर्षा वर्ष है।

ग़ौरतलब है कि 1951-2000 का दीर्घावधि औसत 89 सेंटीमीटर है। किसी भी मानसून काल में यदि औसत, दीर्घावधि औसत का 96 से 104 फीसदी हो, तो सामान्य माना जाता है। यदि यह 90 से 96 फीसदी हो, तो सामान्य से कम और 90 फीसदी से कम हो, तो सूखे की स्थिति मानी जाती है और यदि यह 104 से 110 फीसदी हो, तो सामान्य से अधिक वर्षा मानी जाती है। 110 फीसदी से अधिक होने पर इसे अत्यधिक वर्षा की श्रेणी में माना जाता है।
Submitted by RuralWater on Thu, 08/06/2015 - 15:33
Source:
आर्सेनिक : नॉलेज एंड एक्शन नेटवर्क
समस्या
वर्ष 2000 से पहले आर्सेनिक के मामले बांग्लादेश, भारत और चीन से ही सामने आते थे। मगर पिछले दशक के शुरुआती सालों में आर्सेनिक प्रदूषण का फैलाव दूसरे एशियाई मुल्कों जैसे मंगोलिया, नेपाल, कम्बोडिया, म्यांमार, अफगानिस्तान, कोरिया, पाकिस्तान आदि में भी दिखने लगा है। साथ ही बांग्लादेश, भारत और चीन में भी आर्सेनिक की अधिक मात्रा के मामले कई और नए इलाकों में भी सामने आने लगे हैं। महज कुछ दशक पहले तक आर्सेनिक का जिक्र पानी के मुद्दों में अमूमन नहीं होता था। लेकिन पिछले कुछ दशकों से आर्सेनिक प्रदूषण के मामले चर्चा के केन्द्र में आ गए हैं। दुनिया भर में 20 से भी ज्यादा मुल्कों के भूजल में आर्सेनिक होने के मामले सामने आये हैं (बोरडोलोई, 2012)। खासतौर पर हमारे दक्षिण एशियाई देशों में लगातार पेयजल में आर्सेनिक के मामले प्रकाश में आ रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों के इससे पीड़ित होने का पता चल रहा है और अब इसे वृहद जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में देखा जाने लगा है।

हालांकि भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति भूगर्भ में होने की वजह से होता है। पर कई और वजहें भी हैं भूजल में आर्सेनिक की सान्द्रता बढ़ने की। इनमें से कुछ प्राकृतिक वजहें हैं, जैसे, आर्सेनिक चट्टानों के टूटने और सेडिमेंटरी डिपोजीशन (रेजा एट एल., 2010), मानवजनित वजहें जैसे धात्विक खनन, खेती में आर्सेनिकयुक्त उर्वरकों का इस्तेमाल (स्मेडली एट एल., 1996), फर्नीचर आदि के आर्सेनिकयुक्त प्रीजरवेटिव्स और कीटनाशकों के इस्तेमाल (एफएक्यू, 2011)

प्रयास

Submitted by HindiWater on Mon, 01/27/2020 - 12:11
कल्याण सिंह रावत
अपने पिता से मिली पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा को चरिचार्थ किया और चिपको आंदोलन की धरती पर मैती आंदोलन की शुरुआत की। उनका आंदोलन पहाड़ की पथरीली जमीन से निकलकर सात समुंदर पार तक अपनी खुशहाली के बीज रोप रहा है। जिसके लिए भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी 2020 को उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

नोटिस बोर्ड

Submitted by HindiWater on Mon, 01/27/2020 - 12:59
Source:
विश्व वेटलैंड दिवस पर वेटलैंड इंटरनेशनल द्वारा कार्यक्रम
2 फरवरी को दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लोगों को जागरुक करने तथा वैटलैंउ की महत्ता बताने के लिए वैडलैंड इंटरनेशनल द्वारा कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। जिसमे ये भी बताया जाएगा कि कैसे जलवायु और पारिस्थितिक संकट वैटलैंड़ जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी प्रणालियों को बहाल करके हल किया जा सकता है। कार्यक्रम का समय 11 बजकर 30 मिनट से 1 बजे तक रहेगा।
Submitted by HindiWater on Mon, 01/20/2020 - 11:07
Source:
मीडिया महोत्सव-2020
गत वर्षों की भांति इस बार भी 22-23 फरवरी, 2020 (शनिवार-रविवार, चतुर्दशी-अमावस्या, कृष्ण पक्ष, माघ, विक्रम संवत 2076) को “भारत का अभ्युदय : मीडिया की भूमिका” पर केन्द्रित “मीडिया महोत्सव-2020” का आयोजन भोपाल में होना सुनिश्चित हुआ है l
Submitted by HindiWater on Thu, 01/16/2020 - 09:57
Source:
नर्मदा, गंगा, कोसी, पेरियार व अन्य नदी घाटियों पर विचार मंथन
कृपया आपके आने की खबर, सफरनामा, सहभागी व्यक्तियों के नाम, उम्र, संबंधित विशेष कार्य/अनुभव इत्यादि के साथ त्वरित भेजें। 30 जनवरी से पहले भेजने से नियोजन में सहूलियत होगी।

Latest

खासम-खास

नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह की बहाली 

Submitted by HindiWater on Mon, 01/13/2020 - 22:17
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह की बहाली 
भारत की लगभग सभी नदियों का मानसूनी प्रवाह लगभग अप्रभावित है, पर उनके गैर-मानसूनी प्रवाह में कमी आ रही है। अर्थात समस्या केवल नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह के घटने की ही है। गैर-मानसूनी प्रवाह के घटने के कारण छोटी तथा मंझौली नदियाँ मौसमी बनकर रह गई हैं। यह असर व्यापक है।

Content

मौजूदा दौर में जैविक खेती

Submitted by RuralWater on Fri, 08/14/2015 - 14:19
Author
अनीता सहरावत
Source
जनसत्ता (रविवारी) 9 अगस्त 2015
कृषि

खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के निरन्तर इस्तेमाल से आज अनाज, फल, सब्जी जैसी सभी खाद्य वस्तुएँ जहरीली होती जा रही हैं। इसका तोड़ अगर कुछ है तो जैविक या गैर-रासायनिक खेती। भारत के कई राज्यों में इस दिशा में सक्रिय पहल हो चुकी है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर अब भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। इस बारे में बता रही हैं अनीता सहरावत।

.ज्यादा अरसा नहीं हुआ, जब आन्ध्र प्रदेश में रामचन्द्रपुरम गाँव के किसानों की खेती की ज़मीन गिरवी रखी जा चुकी थी। महँगी खाद-बीज तो दूर, दो जून की रोटी मयस्सर होनी मुश्किल हो गई थी। तब हारकर उन्होंने हर तरह के रासायनिक खादों और कीटनाशकों को अपनी खेती से निकाल फेंका और परम्परागत जुताई-बुआई की टेक ले ली। जैविक खेती उनके लिये रामबाण साबित हुई।

तीन साल के भीतर उन्होंने न केवल अपना पूरा कर्जा पाट दिया बल्कि अपनी जमीनें भी छुड़ा लीं।

यहं सूखा, वहं बाढ़

Submitted by RuralWater on Thu, 08/13/2015 - 11:52
Author
अरुण तिवारी
drought
वर्ष-2015, भारत के लिये सूखा वर्ष है या बाढ़ वर्ष?

बाढ़ और सुखाड़ के दुष्प्रभावों के बढ़ाने में इंसानी हाथ को लेकर एक पहलू और है। घोषणा चाहे बाढ़ की हो या सुखाड़ की, तद्नुसार अपनी फसलों और किस्मों में बदलाव की सावधानी अभी ज्यादातर भारतीय किसानों की आदत नहीं बनी है। सुखद है कि पंजाब ने धान की एक तरफा रोपाई की जगह विविध फसल बोने का निर्णय लिया है। किन्तु कम वर्षा की घोषणा बावजूद, उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों ने इस वर्ष की धान की रोपाई में कोई कमी नहीं की। इस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं हो सकता। अब तक हुई बारिश और आई बाढ़ के आधार पर एक भारतीय इसे ‘सूखा वर्ष’ कह रहा है, तो दूसरा ‘बाढ़ वर्ष’? एक जून, 2015 से 10 अगस्त, 2015 तक के आँकड़ों के मुताबिक देश के 355 जिलों में सामान्य से अधिक और 258 में सामान्य से कम बारिश हुई है। इस आधार पर वर्ष 2015 भारत के लिये अधिक वर्षा वर्ष है। एक जून से अगस्त प्रथम सप्ताह तक का राष्ट्रीय औसत देखें, तो वर्षा दीर्घावधि औसत से छह फीसदी कम रही। तय मानकों के मुताबिक, इसे आप सामान्य वर्षा की श्रेणी रख सकते हैं। इस आधार पर यह सामान्य वर्षा वर्ष है।

ग़ौरतलब है कि 1951-2000 का दीर्घावधि औसत 89 सेंटीमीटर है। किसी भी मानसून काल में यदि औसत, दीर्घावधि औसत का 96 से 104 फीसदी हो, तो सामान्य माना जाता है। यदि यह 90 से 96 फीसदी हो, तो सामान्य से कम और 90 फीसदी से कम हो, तो सूखे की स्थिति मानी जाती है और यदि यह 104 से 110 फीसदी हो, तो सामान्य से अधिक वर्षा मानी जाती है। 110 फीसदी से अधिक होने पर इसे अत्यधिक वर्षा की श्रेणी में माना जाता है।

आर्सेनिक : खामोश कातिल (Arsenic : Silent Killer)

Submitted by RuralWater on Thu, 08/06/2015 - 15:33
Author
आर्सेनिक : नॉलेज एंड एक्शन नेटवर्क
Source
आर्सेनिक : नॉलेज एंड एक्शन नेटवर्क

समस्या


वर्ष 2000 से पहले आर्सेनिक के मामले बांग्लादेश, भारत और चीन से ही सामने आते थे। मगर पिछले दशक के शुरुआती सालों में आर्सेनिक प्रदूषण का फैलाव दूसरे एशियाई मुल्कों जैसे मंगोलिया, नेपाल, कम्बोडिया, म्यांमार, अफगानिस्तान, कोरिया, पाकिस्तान आदि में भी दिखने लगा है। साथ ही बांग्लादेश, भारत और चीन में भी आर्सेनिक की अधिक मात्रा के मामले कई और नए इलाकों में भी सामने आने लगे हैं। महज कुछ दशक पहले तक आर्सेनिक का जिक्र पानी के मुद्दों में अमूमन नहीं होता था। लेकिन पिछले कुछ दशकों से आर्सेनिक प्रदूषण के मामले चर्चा के केन्द्र में आ गए हैं। दुनिया भर में 20 से भी ज्यादा मुल्कों के भूजल में आर्सेनिक होने के मामले सामने आये हैं (बोरडोलोई, 2012)। खासतौर पर हमारे दक्षिण एशियाई देशों में लगातार पेयजल में आर्सेनिक के मामले प्रकाश में आ रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों के इससे पीड़ित होने का पता चल रहा है और अब इसे वृहद जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में देखा जाने लगा है।

हालांकि भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति भूगर्भ में होने की वजह से होता है। पर कई और वजहें भी हैं भूजल में आर्सेनिक की सान्द्रता बढ़ने की। इनमें से कुछ प्राकृतिक वजहें हैं, जैसे, आर्सेनिक चट्टानों के टूटने और सेडिमेंटरी डिपोजीशन (रेजा एट एल., 2010), मानवजनित वजहें जैसे धात्विक खनन, खेती में आर्सेनिकयुक्त उर्वरकों का इस्तेमाल (स्मेडली एट एल., 1996), फर्नीचर आदि के आर्सेनिकयुक्त प्रीजरवेटिव्स और कीटनाशकों के इस्तेमाल (एफएक्यू, 2011)

प्रयास

मैती आंदोलन के जनक कल्याण सिंह रावत को मिला पद्मश्री

Submitted by HindiWater on Mon, 01/27/2020 - 12:11
कल्याण सिंह रावत
अपने पिता से मिली पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा को चरिचार्थ किया और चिपको आंदोलन की धरती पर मैती आंदोलन की शुरुआत की। उनका आंदोलन पहाड़ की पथरीली जमीन से निकलकर सात समुंदर पार तक अपनी खुशहाली के बीज रोप रहा है। जिसके लिए भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी 2020 को उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

नोटिस बोर्ड

विश्व वेटलैंड दिवस पर वेटलैंड इंटरनेशनल द्वारा कार्यक्रम

Submitted by HindiWater on Mon, 01/27/2020 - 12:59
विश्व वेटलैंड दिवस पर वेटलैंड इंटरनेशनल  द्वारा कार्यक्रम
2 फरवरी को दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लोगों को जागरुक करने तथा वैटलैंउ की महत्ता बताने के लिए वैडलैंड इंटरनेशनल द्वारा कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। जिसमे ये भी बताया जाएगा कि कैसे जलवायु और पारिस्थितिक संकट वैटलैंड़ जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी प्रणालियों को बहाल करके हल किया जा सकता है। कार्यक्रम का समय 11 बजकर 30 मिनट से 1 बजे तक रहेगा।

मीडिया महोत्सव-2020

Submitted by HindiWater on Mon, 01/20/2020 - 11:07
मीडिया महोत्सव-2020
गत वर्षों की भांति इस बार भी 22-23 फरवरी, 2020 (शनिवार-रविवार, चतुर्दशी-अमावस्या, कृष्ण पक्ष, माघ, विक्रम संवत 2076) को “भारत का अभ्युदय : मीडिया की भूमिका” पर केन्द्रित “मीडिया महोत्सव-2020” का आयोजन भोपाल में होना सुनिश्चित हुआ है l

नर्मदा, गंगा, कोसी, पेरियार व अन्य नदी घाटियों पर विचार मंथन

Submitted by HindiWater on Thu, 01/16/2020 - 09:57
नर्मदा, गंगा, कोसी, पेरियार व अन्य नदी घाटियों पर विचार मंथन
कृपया आपके आने की खबर, सफरनामा, सहभागी व्यक्तियों के नाम, उम्र, संबंधित विशेष कार्य/अनुभव इत्यादि के साथ त्वरित भेजें। 30 जनवरी से पहले भेजने से नियोजन में सहूलियत होगी।

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