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खासम-खास

समाधान खोजता भूजल संकट

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/13/2019 - 21:06
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
भूजल संकट गहराता जा रहा है।भूजल संकट गहराता जा रहा है। बरसात के बाद के सभी जलस्रोत (कुएं, तालाब और नदी) भूजल पर निर्भर होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि धरती में भूजल का संचय स्थानीय भूगोल और धरती की परतों की पानी सहेजने की क्षमता पर निर्भर होता है। बरसात भले ही धरती की गागर भर दे पर जब भूजल का दोहन प्रारंभ होता है तो सारा गणित धरा का धरा रह जाता है। भूजल स्तर के घटने के कारण धरती की उथली परतों का पानी खत्म हो जाता है। उस पर निर्भर झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं। चूँकि भूजल का दोहन हर साल लगातार बढ़ रहा है इस कारण धीरे-धीरे गहरी परतें भी रीतने लगी हैं।

Content

वनाधिकार आंदोलन : जंगल के वजूद और अपने पुश्तैनी हक-हकूक की लड़ाई

Submitted by HindiWater on Wed, 07/10/2019 - 10:58
पहाड़ी पर जंगल से अपने सिर पर घास रख गंतव्य के लिए जाती महिला।पहाड़ी पर जंगल से अपने सिर पर घास रख गंतव्य के लिए जाती महिला। वनों और इंसानों का प्रारंभ से ही परस्पर संबंध रहा है। वन जहां पर्यावरण चक्र को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाते हैं, वहीं मनुष्य के लिए प्राण वायु के रूप में ऑक्सीजन भी पेड़ ही पैदा करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में इन्हीं वनों पर सभी जीवनयापन के लिए पूरी तरह निर्भर थे। भोजन के लिए अनाज, लकड़ी, घर बनाने के लिए पत्थर, बजरी, रेत आदि सभी का इंतेजाम जंगलों से ही होता था। भेड़, बकरी, गाय, भैंस आदि पशुओं के चारे का बंदोबस्त भी जंगलों से होता था। जंगल की सूखी लकड़ी, सूखे पत्तों का उपयोग उन्हें बीनकर चूल्हा जलाने के लिए किया जाता था, जिससे जंगलों में गर्मी के दौरान आग नहीं लगती थी। सभी स्थानीय लोग जंगलों की अपनत्व के साथ पूरी रक्षा करते थे, लेकिन वन संरक्षण के नाम पर वर्ष 1980 में वन (संरक्षण) अधिनियम बनने के बाद सब कुछ बदल गया। पुश्तैनी हक-हकूक छीनने से वनों पर पहाड़ी इलाकों के लोगों का कोई अधिकारी नहीं रहा। वन केवल सरकारी संपत्ति बनकर रह गए। लोगों के पास जंगल से एक पत्थर उठाने तक का अधिकार नहीं रहा। नतीजन उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट गहरा गया।

जलवायु परिवर्तन खेती के लिए बड़ी चुनौती

Submitted by UrbanWater on Wed, 07/10/2019 - 10:52
Source
गांव कनेक्शन, 07-13 जुलाई 2019
जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। फसल उत्पादन के फेल होने, फसल की उत्पादकता कम होने, खड़ी फसलों का नुकसान होना, नये फसली कीटों और बदलते खेती के तरीके की वजह से खेती में नुकसान उठाना पड़ता है। महाराष्ट्र, जो हाल-फिलहाल फिलहाल भयंकर सूखे से गुजर रहा है। किसान बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जलवायु परिवर्तन से मतलब है कि जलवायु की अवस्था में काफी समय के लिए बदलाव। जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक आंतरिक बदलावों या बाहरी कारणों जैसे ज्वालामुखियों में बदलाव या इंसानों की वजह से जलवायु में होने वाले बदलावों से माना जाता है।

जल प्रबंधन प्रणाली एवं उपेक्षित आदर्श मूल्य

Submitted by UrbanWater on Tue, 07/09/2019 - 11:16
Source
 दैनिक अंबर, 7 मार्च 2016
जल की समस्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।जल की समस्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। गर्मी आते ही कुछ समाचारों का सिलसिला शुरू हो जाता है जैसे ‘आज फलां जगह पर पानी की किल्लत से धरना, हंगामा हुआ, मटके फोड़े गए, जल विभागाधिकारी का पुतला फूंका गया। इतना ही नहीं आजकल तो मोबाइल टावर टावर पर चढ़कर पानी की पूर्ति करने की धमकी देते हुए भी देखे जा सकते हैं'। क्या यह सब पानी की किल्लत दूर करने के सही कदम हैं? क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस तरह कोई स्थाई हल निकल पाएंगे, बिल्कुल नहीं। हमारे पास ना तो ऐसा सोचने की शक्ति रही है और ना ही इतना दृढ़ निश्चय कि कुछ करके इसका स्थायी समाधान निकाल सकें।

प्रयास

पहली बार बिजली से रोशन हुआ गांव, ग्रामीणों को मिला साफ पानी

Submitted by HindiWater on Thu, 07/11/2019 - 16:56
राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां।राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां। आज देश में जहां एक ओर शहरों को ‘‘स्मार्ट सिटी’’ और गांवों को ‘‘स्मार्ट गांव’’ बनाया जा रहा है, तो वहीं देश के करीब एक लाख गांव विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। यहां लोगों के पास जीवनयापन तक के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ये लोग पीने के पानी से लेकर भोजन और बिजली तक के लिए मोहताज हैं। रोजगार के अभाव में बच्चें शिक्षा से वंचित हैं। नेता और मंत्री तो दूर गांव में अभी सड़क तक नहीं पहुंची है। पेयजल की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण कई गांवों के लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। विकास की पहुंच से दूर होने के कारण कोई इस गांव में शादी नहीं करता है, जिस कारण गांव में आखिरी शादी 22 साल पहले हुई थी। इन एक लाख गांवों पर न तो कभी दिल्ली के वातानुकुलित दफ्तरों में बैठकर योजनाएं तैयार करने वाली सरकार की नजर गई और न ही लाखों रुपये वेतन लेने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की।

नोटिस बोर्ड

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 14:19
Source
दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून। बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह प्रदेश के 56 मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

पर्यावरण मंत्रालय से हटा नदियों की सफाई का काम

Submitted by UrbanWater on Wed, 06/19/2019 - 14:46
Source
दैनिक जागरण, 19 जून 2019
अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा।अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा। सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से नदियों की सफाई का काम छीनकर जलशक्ति मंत्रालय को सौंप दिया है। अब तक जलशक्ति मंत्रालय के पास सिर्फ नदियों की सफाई का ही जिम्मा था, लेकिन अब वह शेष नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम भी देखेगा। कैबिनेट सचिवालय ने सरकार (कार्य आबंटन) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का नाम बदल कर जलशक्ति मंत्रालय करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

श्रीनगर बांध परियोजना की खुली नहर से खतरा

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/07/2019 - 14:44
श्रीनगर बांध।श्रीनगर बांध।। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने श्रीनगर बांध परियोजना के पाॅवर चैनल में लीकेज के कारण हो रही समस्याओं पर उत्तम सिंह भंडारी और विमल भाई की याचिका पर सरकार से रिपोर्ट मांगी है। ऊर्जा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा टिहरी के जिलाधिकारी से भी एक महीने में ई-मेल पर इस संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस काम के समन्वयन और अनुपालन की जिम्मेदारी भी दी गई है। साथ ही याचिका की प्रतिलिपि वादियों द्वारा एक हफ्ते में पहुंचाने का भी आदेश दिया है।

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समाधान खोजता भूजल संकट

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/13/2019 - 21:06
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कृष्ण गोपाल 'व्यास’
भूजल संकट गहराता जा रहा है।भूजल संकट गहराता जा रहा है। बरसात के बाद के सभी जलस्रोत (कुएं, तालाब और नदी) भूजल पर निर्भर होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि धरती में भूजल का संचय स्थानीय भूगोल और धरती की परतों की पानी सहेजने की क्षमता पर निर्भर होता है। बरसात भले ही धरती की गागर भर दे पर जब भूजल का दोहन प्रारंभ होता है तो सारा गणित धरा का धरा रह जाता है। भूजल स्तर के घटने के कारण धरती की उथली परतों का पानी खत्म हो जाता है। उस पर निर्भर झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं। चूँकि भूजल का दोहन हर साल लगातार बढ़ रहा है इस कारण धीरे-धीरे गहरी परतें भी रीतने लगी हैं।

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वनाधिकार आंदोलन : जंगल के वजूद और अपने पुश्तैनी हक-हकूक की लड़ाई

Submitted by HindiWater on Wed, 07/10/2019 - 10:58
पहाड़ी पर जंगल से अपने सिर पर घास रख गंतव्य के लिए जाती महिला।पहाड़ी पर जंगल से अपने सिर पर घास रख गंतव्य के लिए जाती महिला। वनों और इंसानों का प्रारंभ से ही परस्पर संबंध रहा है। वन जहां पर्यावरण चक्र को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाते हैं, वहीं मनुष्य के लिए प्राण वायु के रूप में ऑक्सीजन भी पेड़ ही पैदा करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में इन्हीं वनों पर सभी जीवनयापन के लिए पूरी तरह निर्भर थे। भोजन के लिए अनाज, लकड़ी, घर बनाने के लिए पत्थर, बजरी, रेत आदि सभी का इंतेजाम जंगलों से ही होता था। भेड़, बकरी, गाय, भैंस आदि पशुओं के चारे का बंदोबस्त भी जंगलों से होता था। जंगल की सूखी लकड़ी, सूखे पत्तों का उपयोग उन्हें बीनकर चूल्हा जलाने के लिए किया जाता था, जिससे जंगलों में गर्मी के दौरान आग नहीं लगती थी। सभी स्थानीय लोग जंगलों की अपनत्व के साथ पूरी रक्षा करते थे, लेकिन वन संरक्षण के नाम पर वर्ष 1980 में वन (संरक्षण) अधिनियम बनने के बाद सब कुछ बदल गया। पुश्तैनी हक-हकूक छीनने से वनों पर पहाड़ी इलाकों के लोगों का कोई अधिकारी नहीं रहा। वन केवल सरकारी संपत्ति बनकर रह गए। लोगों के पास जंगल से एक पत्थर उठाने तक का अधिकार नहीं रहा। नतीजन उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट गहरा गया।

जलवायु परिवर्तन खेती के लिए बड़ी चुनौती

Submitted by UrbanWater on Wed, 07/10/2019 - 10:52
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गांव कनेक्शन, 07-13 जुलाई 2019
जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। फसल उत्पादन के फेल होने, फसल की उत्पादकता कम होने, खड़ी फसलों का नुकसान होना, नये फसली कीटों और बदलते खेती के तरीके की वजह से खेती में नुकसान उठाना पड़ता है। महाराष्ट्र, जो हाल-फिलहाल फिलहाल भयंकर सूखे से गुजर रहा है। किसान बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जलवायु परिवर्तन से मतलब है कि जलवायु की अवस्था में काफी समय के लिए बदलाव। जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक आंतरिक बदलावों या बाहरी कारणों जैसे ज्वालामुखियों में बदलाव या इंसानों की वजह से जलवायु में होने वाले बदलावों से माना जाता है।

जल प्रबंधन प्रणाली एवं उपेक्षित आदर्श मूल्य

Submitted by UrbanWater on Tue, 07/09/2019 - 11:16
Source
 दैनिक अंबर, 7 मार्च 2016
जल की समस्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।जल की समस्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। गर्मी आते ही कुछ समाचारों का सिलसिला शुरू हो जाता है जैसे ‘आज फलां जगह पर पानी की किल्लत से धरना, हंगामा हुआ, मटके फोड़े गए, जल विभागाधिकारी का पुतला फूंका गया। इतना ही नहीं आजकल तो मोबाइल टावर टावर पर चढ़कर पानी की पूर्ति करने की धमकी देते हुए भी देखे जा सकते हैं'। क्या यह सब पानी की किल्लत दूर करने के सही कदम हैं? क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इस तरह कोई स्थाई हल निकल पाएंगे, बिल्कुल नहीं। हमारे पास ना तो ऐसा सोचने की शक्ति रही है और ना ही इतना दृढ़ निश्चय कि कुछ करके इसका स्थायी समाधान निकाल सकें।

प्रयास

पहली बार बिजली से रोशन हुआ गांव, ग्रामीणों को मिला साफ पानी

Submitted by HindiWater on Thu, 07/11/2019 - 16:56
राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां।राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां। आज देश में जहां एक ओर शहरों को ‘‘स्मार्ट सिटी’’ और गांवों को ‘‘स्मार्ट गांव’’ बनाया जा रहा है, तो वहीं देश के करीब एक लाख गांव विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। यहां लोगों के पास जीवनयापन तक के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ये लोग पीने के पानी से लेकर भोजन और बिजली तक के लिए मोहताज हैं। रोजगार के अभाव में बच्चें शिक्षा से वंचित हैं। नेता और मंत्री तो दूर गांव में अभी सड़क तक नहीं पहुंची है। पेयजल की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण कई गांवों के लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। विकास की पहुंच से दूर होने के कारण कोई इस गांव में शादी नहीं करता है, जिस कारण गांव में आखिरी शादी 22 साल पहले हुई थी। इन एक लाख गांवों पर न तो कभी दिल्ली के वातानुकुलित दफ्तरों में बैठकर योजनाएं तैयार करने वाली सरकार की नजर गई और न ही लाखों रुपये वेतन लेने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की।

नोटिस बोर्ड

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 14:19
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दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून। बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह प्रदेश के 56 मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

पर्यावरण मंत्रालय से हटा नदियों की सफाई का काम

Submitted by UrbanWater on Wed, 06/19/2019 - 14:46
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दैनिक जागरण, 19 जून 2019
अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा।अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा। सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से नदियों की सफाई का काम छीनकर जलशक्ति मंत्रालय को सौंप दिया है। अब तक जलशक्ति मंत्रालय के पास सिर्फ नदियों की सफाई का ही जिम्मा था, लेकिन अब वह शेष नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम भी देखेगा। कैबिनेट सचिवालय ने सरकार (कार्य आबंटन) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का नाम बदल कर जलशक्ति मंत्रालय करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

श्रीनगर बांध परियोजना की खुली नहर से खतरा

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/07/2019 - 14:44
श्रीनगर बांध।श्रीनगर बांध।। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने श्रीनगर बांध परियोजना के पाॅवर चैनल में लीकेज के कारण हो रही समस्याओं पर उत्तम सिंह भंडारी और विमल भाई की याचिका पर सरकार से रिपोर्ट मांगी है। ऊर्जा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा टिहरी के जिलाधिकारी से भी एक महीने में ई-मेल पर इस संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस काम के समन्वयन और अनुपालन की जिम्मेदारी भी दी गई है। साथ ही याचिका की प्रतिलिपि वादियों द्वारा एक हफ्ते में पहुंचाने का भी आदेश दिया है।

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