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खासम-खास

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 13:27
Source:
चरखा फीचर
पानी है मगर पीने का साफ़ पानी नहीं है
पानी की समस्या के जल्द हल निकालने की बात करते हुए लमचूला पंचायत के सदस्य बलवंत राम कहते हैं कि पंचायत इस समस्या की गंभीरता को समझता है, इसलिए हम संबंधित विभाग के निरंतर संपर्क में हैं. पंचायत इसकी पूरी कोशिश कर रहा है और सब कुछ ठीक होने में अभी भी 6 से 8 माह का समय लग सकता है. बहरहाल सरकार का हर घर जल योजना अर्थात जल जीवन मिशन का उद्देश्य 2024 तक देश के सभी घरों में पीने का साफ़ पानी पहुंचना है. योजना का मुख्य फोकस ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं होता है और इसके लिए उन्हें मीलों पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है. इस योजना के तहत इंफ्रास्ट्रचर को भी मज़बूत करना है, जिससे जल संरक्षण को भी बढ़ावा दिया जा सके ताकि भविष्य में पानी की कमी को भी दूर किया जा सके.
Submitted by Shivendra on Mon, 01/17/2022 - 14:40
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लुप्त होती जोहड़ संस्कृति में बढ़ा जल अपव्यय
राजस्थान में जल का महत्व,जल संस्कृति पढ़ने,देखने, सुनने को काफ़ी हद तक मिलती है । गांव, गुवाडे, ढाणी ,कस्बे में जल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए  उसकी पूर्ति के लिए गांव समाज जाति धर्म साथ मिलकर वहां की भौगौलिक धरातलीय  भूगर्भिक संरचनाओं, प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए  निर्माण करतें है ताकि वह हमेशा सुरक्षित उपयोगी रह सकें। समाज में जोहड़ का अपना विशेष महत्व रहा। यें पीने के पानी, जल संग्रहण, भू गर्भ में पानी पहुंचाने , पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के साथ जैवविविधता को बनानें का काम करते है । जोहड़ बनने के बाद एकत्रित पानी का 40 प्रतिशत ग्राउंड वाटर लेवल, 20 प्रतिशत वाष्प बनकर वातावरण में आर्द्रता पैदा करता है और शेष 40 प्रतिशत पानी जोहड़ में वर्षभर पशु पक्षी, मानव, जीवं जंतू, वनस्पति के काम आता है ।
Submitted by Shivendra on Sat, 01/15/2022 - 17:41
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चरखा फीचर
समस्या जल नहीं, जल विभाग है
गांव में पानी की समस्या का सबसे नकारात्मक प्रभाव महिलाओं और किशोरियों पर पड़ा है. इससे जहां महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ रहा है वहीं किशोरियों की शिक्षा भी प्रभावित हो रही है. किशोरियों को अपनी पढ़ाई छोड़कर पानी के लिए दूर दूर जाना पड़ रहा है. लड़कियां सर पर पानी ढ़ोकर ला रही हैं. दूर दराज के लोग घोड़ों के द्वारा पानी अपने घर पहुंचा रहे हैं और कुछ लोग ऑटो में भर कर पीने के पानी की व्यवस्था कर रहे हैं. जब यहां के लोग जल विभाग के जेईई से मिले और बात की तब वह स्वयं गांव में पहुंचे और सारी स्थिति को देखा फिर उन्होंने जो लाइनमैन काम नहीं कर रहा था उसकी जगह पर दूसरा लाइनमैन भेजा, हालांकि वह जल विभाग में स्थाई कर्मचारी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उसने लोगों तक पानी पहुंचाने की पूरी कोशिश की, जिसका स्थानीय निवासियों को काफी लाभ भी हुआ. 

प्रयास

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 
Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
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चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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खासम-खास

बांधों पर मंडराता खतरा: टिकाऊ माडल की तलाश

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
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कृष्ण गोपाल 'व्यास'
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2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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स्वच्छ जल के लिए संघर्ष करता गांव

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 13:27
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चरखा फीचर
पानी है मगर पीने का साफ़ पानी नहीं है
पानी की समस्या के जल्द हल निकालने की बात करते हुए लमचूला पंचायत के सदस्य बलवंत राम कहते हैं कि पंचायत इस समस्या की गंभीरता को समझता है, इसलिए हम संबंधित विभाग के निरंतर संपर्क में हैं. पंचायत इसकी पूरी कोशिश कर रहा है और सब कुछ ठीक होने में अभी भी 6 से 8 माह का समय लग सकता है. बहरहाल सरकार का हर घर जल योजना अर्थात जल जीवन मिशन का उद्देश्य 2024 तक देश के सभी घरों में पीने का साफ़ पानी पहुंचना है. योजना का मुख्य फोकस ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं होता है और इसके लिए उन्हें मीलों पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है. इस योजना के तहत इंफ्रास्ट्रचर को भी मज़बूत करना है, जिससे जल संरक्षण को भी बढ़ावा दिया जा सके ताकि भविष्य में पानी की कमी को भी दूर किया जा सके.

लुप्त होती जोहड़ संस्कृति में बढ़ा जल अपव्यय

Submitted by Shivendra on Mon, 01/17/2022 - 14:40
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लुप्त होती जोहड़ संस्कृति में बढ़ा जल अपव्यय
राजस्थान में जल का महत्व,जल संस्कृति पढ़ने,देखने, सुनने को काफ़ी हद तक मिलती है । गांव, गुवाडे, ढाणी ,कस्बे में जल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए  उसकी पूर्ति के लिए गांव समाज जाति धर्म साथ मिलकर वहां की भौगौलिक धरातलीय  भूगर्भिक संरचनाओं, प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए  निर्माण करतें है ताकि वह हमेशा सुरक्षित उपयोगी रह सकें। समाज में जोहड़ का अपना विशेष महत्व रहा। यें पीने के पानी, जल संग्रहण, भू गर्भ में पानी पहुंचाने , पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के साथ जैवविविधता को बनानें का काम करते है । जोहड़ बनने के बाद एकत्रित पानी का 40 प्रतिशत ग्राउंड वाटर लेवल, 20 प्रतिशत वाष्प बनकर वातावरण में आर्द्रता पैदा करता है और शेष 40 प्रतिशत पानी जोहड़ में वर्षभर पशु पक्षी, मानव, जीवं जंतू, वनस्पति के काम आता है ।

समस्या जल नहीं, जल विभाग है

Submitted by Shivendra on Sat, 01/15/2022 - 17:41
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चरखा फीचर
समस्या जल नहीं, जल विभाग है
गांव में पानी की समस्या का सबसे नकारात्मक प्रभाव महिलाओं और किशोरियों पर पड़ा है. इससे जहां महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ रहा है वहीं किशोरियों की शिक्षा भी प्रभावित हो रही है. किशोरियों को अपनी पढ़ाई छोड़कर पानी के लिए दूर दूर जाना पड़ रहा है. लड़कियां सर पर पानी ढ़ोकर ला रही हैं. दूर दराज के लोग घोड़ों के द्वारा पानी अपने घर पहुंचा रहे हैं और कुछ लोग ऑटो में भर कर पीने के पानी की व्यवस्था कर रहे हैं. जब यहां के लोग जल विभाग के जेईई से मिले और बात की तब वह स्वयं गांव में पहुंचे और सारी स्थिति को देखा फिर उन्होंने जो लाइनमैन काम नहीं कर रहा था उसकी जगह पर दूसरा लाइनमैन भेजा, हालांकि वह जल विभाग में स्थाई कर्मचारी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उसने लोगों तक पानी पहुंचाने की पूरी कोशिश की, जिसका स्थानीय निवासियों को काफी लाभ भी हुआ. 

प्रयास

पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा - मायलम्मा

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
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पानी पत्रक
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

जल संसाधन प्रबंधन पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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 एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 

चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
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चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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Source
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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