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खासम-खास

समाधान खोजता भूजल संकट

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/13/2019 - 21:06
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
भूजल संकट गहराता जा रहा है।भूजल संकट गहराता जा रहा है। बरसात के बाद के सभी जलस्रोत (कुएं, तालाब और नदी) भूजल पर निर्भर होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि धरती में भूजल का संचय स्थानीय भूगोल और धरती की परतों की पानी सहेजने की क्षमता पर निर्भर होता है। बरसात भले ही धरती की गागर भर दे पर जब भूजल का दोहन प्रारंभ होता है तो सारा गणित धरा का धरा रह जाता है। भूजल स्तर के घटने के कारण धरती की उथली परतों का पानी खत्म हो जाता है। उस पर निर्भर झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं। चूँकि भूजल का दोहन हर साल लगातार बढ़ रहा है इस कारण धीरे-धीरे गहरी परतें भी रीतने लगी हैं।

Content

हिमालयी जैव विविधता पर खतरा है काली बासिंग

Submitted by UrbanWater on Mon, 06/24/2019 - 10:35
Author
सुरजीत सिंह रावत
Source
विज्ञान प्रगति, जून, 2019
काली बासिंग जैव विविधता पर कैंसर की तरह है।काली बासिंग जैव विविधता पर कैंसर की तरह है। जैविक आक्रमण आज जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है और जैव विविधता की हानि और स्थानीय प्रजातियों के विलुप्त होने के लिए प्राथमिक कारण के रूप में जाना जाता है। विदेशी जातियां जो स्थानीय रूप से प्रभारी हो जाती हैं और प्राकृतिक समुदायों पर आक्रमण करती हैं उन्हें आक्रमक प्रजाति के रूप में जाना जाता है। एक आक्रमणकारी पौधे, पशु या सूक्ष्म जीवों की एक प्रजाति है जो आम तौर पर मनुष्यों के द्वारा अनजाने या जानबूझकर कर नुकसान पहुंचाया जाता है। आक्रमणकारी प्रजातियां अपने आक्रामक स्वभाव के कारण त्वरित गति से अपने अधिग्रहण क्षेत्र का विस्तार करती हैं और स्थानीय जातियों से प्रतिस्पर्धा करती हैं। धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में अपना साम्राज्य स्थापित कर लेती हैं।

चिंताजनकः हिमालय के ग्लेशियर दोगुनी गति से पिघल रहे हैं

Submitted by UrbanWater on Sat, 06/22/2019 - 12:14
Source
हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, 20 जून 2019

जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को खा रहा है।जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को खा रहा है।

साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक 1975 से 2000 के बीच ये ग्लेशियर प्रति वर्ष 10 इंच घट रहे थे लेकिन 2000 से 2016 के दौरान प्रति वर्ष 20 इंच तक घटने लगे। इससे करीब आठ अरब टन पानी की क्षति हो रही है। कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने उपग्रह से लिए गए 40 वर्षों के चित्रों को आधार बनाकर यह शोध किया है। ये चित्र अमेरिकी जासूसी उपग्रहों द्वारा लिए गए थे। इन्हें थ्री डी माड्यूल में बदल कर अध्ययन किया गया। तस्वीरें भारत, चीन, नेपाल व भूटान में स्थित 650 ग्लेशियर की हैं। जो पश्चिम से पूर्व तक दो हजार किमी. में फैले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को खा रहा है।

सबको पेयजल पहुंचाने की चुनौती

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/20/2019 - 16:42
Source
दैनिक जागरण, 20 जून 2019
हर घर पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती।हर घर पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती। जिस देश में 82 फीसद ग्रामीण परिवारों की साफ पेयजल तक पहुंच न हो वहां पांच साल के अंदर 14 करोड़ घरों तक नल से जल पहुंचाना असंभव नहीं तो मुश्किल काम जरूर है। इसका कारण है कि देश के ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल की स्थिति बेहद गंभीर है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 22 फीसद ग्रामीण परिवारों को पानी लाने के लिए आधा किलोमीटर और इससे अधिक दूर पैदल चलना पड़ता है। इनमें से अधिकतर बोझ महिलाओं को ढोना पड़ता है। गांवों में 15 फीसद परिवार बिना ढके कुओं पर निर्भर हैं तो अन्य लोग दूसरे अपरिष्कृत पेयजल संसाधनों जैसे नदी, झरने, तालाबों आदि पर निर्भर रहते हैं।

प्रयास

पहली बार बिजली से रोशन हुआ गांव, ग्रामीणों को मिला साफ पानी

Submitted by HindiWater on Thu, 07/11/2019 - 16:56
राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां।राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां। आज देश में जहां एक ओर शहरों को ‘‘स्मार्ट सिटी’’ और गांवों को ‘‘स्मार्ट गांव’’ बनाया जा रहा है, तो वहीं देश के करीब एक लाख गांव विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। यहां लोगों के पास जीवनयापन तक के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ये लोग पीने के पानी से लेकर भोजन और बिजली तक के लिए मोहताज हैं। रोजगार के अभाव में बच्चें शिक्षा से वंचित हैं। नेता और मंत्री तो दूर गांव में अभी सड़क तक नहीं पहुंची है। पेयजल की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण कई गांवों के लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। विकास की पहुंच से दूर होने के कारण कोई इस गांव में शादी नहीं करता है, जिस कारण गांव में आखिरी शादी 22 साल पहले हुई थी। इन एक लाख गांवों पर न तो कभी दिल्ली के वातानुकुलित दफ्तरों में बैठकर योजनाएं तैयार करने वाली सरकार की नजर गई और न ही लाखों रुपये वेतन लेने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की।

नोटिस बोर्ड

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 14:19
Source
दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून। बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह प्रदेश के 56 मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

पर्यावरण मंत्रालय से हटा नदियों की सफाई का काम

Submitted by UrbanWater on Wed, 06/19/2019 - 14:46
Source
दैनिक जागरण, 19 जून 2019
अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा।अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा। सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से नदियों की सफाई का काम छीनकर जलशक्ति मंत्रालय को सौंप दिया है। अब तक जलशक्ति मंत्रालय के पास सिर्फ नदियों की सफाई का ही जिम्मा था, लेकिन अब वह शेष नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम भी देखेगा। कैबिनेट सचिवालय ने सरकार (कार्य आबंटन) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का नाम बदल कर जलशक्ति मंत्रालय करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

श्रीनगर बांध परियोजना की खुली नहर से खतरा

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/07/2019 - 14:44
श्रीनगर बांध।श्रीनगर बांध।। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने श्रीनगर बांध परियोजना के पाॅवर चैनल में लीकेज के कारण हो रही समस्याओं पर उत्तम सिंह भंडारी और विमल भाई की याचिका पर सरकार से रिपोर्ट मांगी है। ऊर्जा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा टिहरी के जिलाधिकारी से भी एक महीने में ई-मेल पर इस संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस काम के समन्वयन और अनुपालन की जिम्मेदारी भी दी गई है। साथ ही याचिका की प्रतिलिपि वादियों द्वारा एक हफ्ते में पहुंचाने का भी आदेश दिया है।

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समाधान खोजता भूजल संकट

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/13/2019 - 21:06
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कृष्ण गोपाल 'व्यास’
भूजल संकट गहराता जा रहा है।भूजल संकट गहराता जा रहा है। बरसात के बाद के सभी जलस्रोत (कुएं, तालाब और नदी) भूजल पर निर्भर होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि धरती में भूजल का संचय स्थानीय भूगोल और धरती की परतों की पानी सहेजने की क्षमता पर निर्भर होता है। बरसात भले ही धरती की गागर भर दे पर जब भूजल का दोहन प्रारंभ होता है तो सारा गणित धरा का धरा रह जाता है। भूजल स्तर के घटने के कारण धरती की उथली परतों का पानी खत्म हो जाता है। उस पर निर्भर झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं। चूँकि भूजल का दोहन हर साल लगातार बढ़ रहा है इस कारण धीरे-धीरे गहरी परतें भी रीतने लगी हैं।

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हिमालयी जैव विविधता पर खतरा है काली बासिंग

Submitted by UrbanWater on Mon, 06/24/2019 - 10:35
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सुरजीत सिंह रावत
Source
विज्ञान प्रगति, जून, 2019
काली बासिंग जैव विविधता पर कैंसर की तरह है।काली बासिंग जैव विविधता पर कैंसर की तरह है। जैविक आक्रमण आज जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है और जैव विविधता की हानि और स्थानीय प्रजातियों के विलुप्त होने के लिए प्राथमिक कारण के रूप में जाना जाता है। विदेशी जातियां जो स्थानीय रूप से प्रभारी हो जाती हैं और प्राकृतिक समुदायों पर आक्रमण करती हैं उन्हें आक्रमक प्रजाति के रूप में जाना जाता है। एक आक्रमणकारी पौधे, पशु या सूक्ष्म जीवों की एक प्रजाति है जो आम तौर पर मनुष्यों के द्वारा अनजाने या जानबूझकर कर नुकसान पहुंचाया जाता है। आक्रमणकारी प्रजातियां अपने आक्रामक स्वभाव के कारण त्वरित गति से अपने अधिग्रहण क्षेत्र का विस्तार करती हैं और स्थानीय जातियों से प्रतिस्पर्धा करती हैं। धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में अपना साम्राज्य स्थापित कर लेती हैं।

चिंताजनकः हिमालय के ग्लेशियर दोगुनी गति से पिघल रहे हैं

Submitted by UrbanWater on Sat, 06/22/2019 - 12:14
Source
हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, 20 जून 2019

जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को खा रहा है।जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को खा रहा है।

साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक 1975 से 2000 के बीच ये ग्लेशियर प्रति वर्ष 10 इंच घट रहे थे लेकिन 2000 से 2016 के दौरान प्रति वर्ष 20 इंच तक घटने लगे। इससे करीब आठ अरब टन पानी की क्षति हो रही है। कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने उपग्रह से लिए गए 40 वर्षों के चित्रों को आधार बनाकर यह शोध किया है। ये चित्र अमेरिकी जासूसी उपग्रहों द्वारा लिए गए थे। इन्हें थ्री डी माड्यूल में बदल कर अध्ययन किया गया। तस्वीरें भारत, चीन, नेपाल व भूटान में स्थित 650 ग्लेशियर की हैं। जो पश्चिम से पूर्व तक दो हजार किमी. में फैले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को खा रहा है।

सबको पेयजल पहुंचाने की चुनौती

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/20/2019 - 16:42
Source
दैनिक जागरण, 20 जून 2019
हर घर पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती।हर घर पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती। जिस देश में 82 फीसद ग्रामीण परिवारों की साफ पेयजल तक पहुंच न हो वहां पांच साल के अंदर 14 करोड़ घरों तक नल से जल पहुंचाना असंभव नहीं तो मुश्किल काम जरूर है। इसका कारण है कि देश के ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल की स्थिति बेहद गंभीर है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 22 फीसद ग्रामीण परिवारों को पानी लाने के लिए आधा किलोमीटर और इससे अधिक दूर पैदल चलना पड़ता है। इनमें से अधिकतर बोझ महिलाओं को ढोना पड़ता है। गांवों में 15 फीसद परिवार बिना ढके कुओं पर निर्भर हैं तो अन्य लोग दूसरे अपरिष्कृत पेयजल संसाधनों जैसे नदी, झरने, तालाबों आदि पर निर्भर रहते हैं।

प्रयास

पहली बार बिजली से रोशन हुआ गांव, ग्रामीणों को मिला साफ पानी

Submitted by HindiWater on Thu, 07/11/2019 - 16:56
राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां।राजघाट में अथक प्रयासों के बाद लगाई गई पानी की टंकियां। आज देश में जहां एक ओर शहरों को ‘‘स्मार्ट सिटी’’ और गांवों को ‘‘स्मार्ट गांव’’ बनाया जा रहा है, तो वहीं देश के करीब एक लाख गांव विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। यहां लोगों के पास जीवनयापन तक के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ये लोग पीने के पानी से लेकर भोजन और बिजली तक के लिए मोहताज हैं। रोजगार के अभाव में बच्चें शिक्षा से वंचित हैं। नेता और मंत्री तो दूर गांव में अभी सड़क तक नहीं पहुंची है। पेयजल की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण कई गांवों के लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। विकास की पहुंच से दूर होने के कारण कोई इस गांव में शादी नहीं करता है, जिस कारण गांव में आखिरी शादी 22 साल पहले हुई थी। इन एक लाख गांवों पर न तो कभी दिल्ली के वातानुकुलित दफ्तरों में बैठकर योजनाएं तैयार करने वाली सरकार की नजर गई और न ही लाखों रुपये वेतन लेने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की।

नोटिस बोर्ड

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 14:19
Source
दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून। बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह प्रदेश के 56 मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

पर्यावरण मंत्रालय से हटा नदियों की सफाई का काम

Submitted by UrbanWater on Wed, 06/19/2019 - 14:46
Source
दैनिक जागरण, 19 जून 2019
अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा।अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा। सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से नदियों की सफाई का काम छीनकर जलशक्ति मंत्रालय को सौंप दिया है। अब तक जलशक्ति मंत्रालय के पास सिर्फ नदियों की सफाई का ही जिम्मा था, लेकिन अब वह शेष नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम भी देखेगा। कैबिनेट सचिवालय ने सरकार (कार्य आबंटन) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का नाम बदल कर जलशक्ति मंत्रालय करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

श्रीनगर बांध परियोजना की खुली नहर से खतरा

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/07/2019 - 14:44
श्रीनगर बांध।श्रीनगर बांध।। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने श्रीनगर बांध परियोजना के पाॅवर चैनल में लीकेज के कारण हो रही समस्याओं पर उत्तम सिंह भंडारी और विमल भाई की याचिका पर सरकार से रिपोर्ट मांगी है। ऊर्जा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा टिहरी के जिलाधिकारी से भी एक महीने में ई-मेल पर इस संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस काम के समन्वयन और अनुपालन की जिम्मेदारी भी दी गई है। साथ ही याचिका की प्रतिलिपि वादियों द्वारा एक हफ्ते में पहुंचाने का भी आदेश दिया है।

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