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खासम-खास

समाधान खोजता भूजल संकट

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/13/2019 - 21:06
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
भूजल संकट गहराता जा रहा है।भूजल संकट गहराता जा रहा है। बरसात के बाद के सभी जलस्रोत (कुएं, तालाब और नदी) भूजल पर निर्भर होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि धरती में भूजल का संचय स्थानीय भूगोल और धरती की परतों की पानी सहेजने की क्षमता पर निर्भर होता है। बरसात भले ही धरती की गागर भर दे पर जब भूजल का दोहन प्रारंभ होता है तो सारा गणित धरा का धरा रह जाता है। भूजल स्तर के घटने के कारण धरती की उथली परतों का पानी खत्म हो जाता है। उस पर निर्भर झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं। चूँकि भूजल का दोहन हर साल लगातार बढ़ रहा है इस कारण धीरे-धीरे गहरी परतें भी रीतने लगी हैं।

Content

उत्तराखंड : कितने लाभप्रद जल विद्युत के दावे

Submitted by admin on Thu, 08/01/2013 - 09:11
Author
अरुण तिवारी
जहां तक जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली और रोज़गार के स्थानीय लाभ का सवाल है, तो हकीक़त और भी हास्यास्पद है। बतौर केन्द्रीय मंत्री श्री के एल राव ने खुद माना था कि जलविद्युत परियोजनाओं से स्थानीय लोगों को बिजली नहीं मिलती। टिहरी व भाखड़ा इसके पुख्ता उदाहरण हैं। ताज़ा उदाहरण धौली गंगा परियोजना का है। इसकी क्षमता 280 मेगावाट। इसका पहला आपूर्ति सब स्टेशन बरेली है। परियोजना के नज़दीक मुनस्यारी को एक मेगावाट बिजली नहीं दे पा रहे। यह इलाक़ा अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है। हम सब जानते हैं कि परियोजना निर्माण में आधुनिक तकनीक व मशीनों का उपयोग होता है। पानी से पैदा बिजली स्वच्छ, स्वस्थ और सबसे सस्ती होती है। जलविद्युत परियोजनाओं में जो ‘पीकिंग पावर’ होती है। ताप विद्युत की तरह धुआं फैलाकर यह वायुमंडल को प्रदूषित नहीं करती। परमाणु विद्युत उत्पादन इकाइयों से विकरण जैसी आशंका से भी जलविद्युत परियोजनाएं मुक्त हैं। ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाएं तो पूरी तरह सुरक्षित हैं। आम ही नहीं खास पर्यावरण कार्यकर्ताओं की धारणा है कि इनमें कोई बांध नहीं बनता। नदी को इनसे कोई नुकसान नहीं होता। अतः ‘रन ऑफ द रिवर’ जल विद्युत परियोजनाएं बनाई जानी चाहिए। जलविद्युत के पक्ष में दिए जाने वाले ये दावे महज दावे हैं या हकीक़त ? जलविद्युत परियोजनाओं की जद में आने वाली आबादी के लिए यह जानना आज बेहद जरूरी है; खासकर तब, जब उत्तराखंड पुनर्निर्माण की दिशा तय हो रही हो।

उत्तराखंड में आज 98 जलविद्युत परियोजनाएं कार्यरत हैं और 111 निर्माणरत। वर्तमान कार्यरत परियोजनाओं की कुल स्थापना क्षमता 3600 मेगावाट है। 21,213 मेगावाट की 200 परियोजनाएं योजना में हैं। ये उत्तराखंड जलविद्युत निगम के आंकड़े हैं।

विकास बना विनाश

Submitted by admin on Sun, 07/28/2013 - 14:48
Author
शमशेर सिंह बिष्ट
Source
जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
चालीस साल पहले तक उत्तराखंड की राजनीति में लकड़ी और लीसे के ठेकेदार हावी थे। आज यहां शराब और पानी का माफिया राज कर रहा है। पहाड़ों में बन रही जल विद्युत परियोजनाएं इन राजनीतिक दलों के लिए पैसा उगल रही हैं। पूरे उत्तराखंड में 558 जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जिनमें अकेले भागीरथी और अलकनंदा में ही 53 परियोजनाएं हैं। अनुमान है कि इन योजनाओं के बनने पर पूरे उत्तराखंड में नदियों को करीब 1500 किलोमीटर सुरंगों के भीतर बहना होगा। मनेरी से उत्तरकाशी तक भागीरथी 10 किलोमीटर सुरंग में कैद हो गई है। भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय का निर्माण यूरेशियन और एशियन प्लेट्स की आपसी टक्कर का नतीजा है। अरबों साल पहले गोंडवाना लैंड (वर्तमान अफ्रीका और अंटार्कटिका) से टूटकर आए भारतीय उपमहाद्वीप का ऊपरी हिस्सा ही हिमालय है। हिमालय अब तक मूल स्थान से दो हजार किलोमीटर की यात्रा कर चुका है और अभी भी दो सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से चीन की तरफ धंस रहा है। इस भूगर्भीय हलचल के कारण हिमालय क्षेत्र में ज़बरदस्त तनाव रहता है। इस तनाव को कम करने का उपाय भी प्रकृति के ही पास है। बार-बार 6 रिक्टर स्केल का भूकंप आता रहे तो यह भूगर्भीय हलचल कम हो जाती है और इससे अधिक तीव्र स्तर का भूकंप आने की आशंका कम हो जाती है। पिछले सौ वर्ष से यहां आठ या उससे अधिक शक्ति का भूकंप नहीं आया है, इसलिए ऐसा भूकंप आने की आशंका बहुत अधिक है। पूरा उत्तराखंड ही भूकंप के मामले में संवेदनशील है। यहां के नौ जिले-पिथौरागढ़ अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, चमोली, उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी और रुद्रप्रयाग जोन पांच में और शेष चार, देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल के कुछ हिस्से जोन चार में आते हैं।

भूस्खलन और बाढ़ की त्रासदी के सबक

Submitted by admin on Sat, 07/27/2013 - 12:46
Author
खड्गसिंह वल्दिया
Source
जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
उत्तराखंड की तबाही में हुई जान-माल की क्षतिपूर्ति असंभव है। मगर इससे सबक लेकर विचार तो किया ही जाना चाहिए कि ऐसी आपदाओं से बचाव के उपाय क्या हो सकते हैं। नदियों के प्राकृतिक रास्तों में अतार्किक निर्माण की वजह से वहां त्रासदी ने ज्यादा विकराल रूप धारण कर लिया। इसके भौगोलिक और वैज्ञानिक कारणों की पड़ताल कर रहे हैं खड्गसिंह वल्दिया।

दो ढालों के बीच नदी की चौड़ी घाटी उसका स्वाभाविक मार्ग है। उसे ‘फ्लड-वे’ कहते हैं। उस प्राकृतिक चौड़े मार्ग पर कभी भी बाढ़ का पानी बह सकता है। अपने फ्लड-वे यानी प्राकृतिक मार्ग में नदी अपनी धारा बदलती रहती है, पुरानी वाहिकाओं को छोड़कर नई वाहिकाएं बना लेती है। नदी कभी दाएं किनारे बहती है, कभी बाएं और कभी बीच में। बाढ़ की स्थिति में तो अपनी धारा बदलती ही है। अनेक स्थलों पर नदियां अपना बहाया हुआ मलबा जमा कर देती हैं। कच्चे मलबे के अंबार बढ़ते चले जाते हैं और वेदिकाओं में बदलती जाती है। स्थानीय बोली में ऐसी वेदिकाओं को ‘बगड़’ कहते हैं।उत्तुंग केदारनाथ, चौखंबा (बदरीनाथ), त्रिशूल, नंदादेवी और पंचचूली शिखरों वाले वृहद हिमालय (या हिमाद्रि) की विकट दक्षिणी ढाल सदा से भारी वर्षा की मार झेलती रही है। लेकिन पिछले सात-आठ सालों से अतिवृष्टि और भूस्खलनों की न थमने वाली आपदाओं से पिट रही है और बार-बार क्षत-विक्षत हो रही है। सीमित क्षेत्रों में अल्प अवधि में होने वाली अतिवृष्टि (बादल फटने) के कारण वृहद हिमालय की तलहटी की पट्टी के हजारों गांव बार-बार प्राकृतिक विपदाओं की त्रासदी भोग रहे हैं। संयोग से यही वह पट्टी है, जो जब-तब भूकंपों से डोलने लगती है और टूटते हैं पहाड़, सरकती हैं ढालें, और धंसती है धरती। 2009 में जिला पिथौरागढ़ के मुनस्यारी-तेजम क्षेत्र में और 2010 और 2012 में गढ़वाल की भागीरथी और अलकनंदा घाटियों में प्रकृति के अकल्पनीय प्रकोप को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मौसम विज्ञानी वर्षों से कह रहे हैं कि आबोहवा में बदलाव के कारण अब देश में मानसूनी वर्षा असमान रूप से होगी और अतिवृष्टि और अनावृष्टि का दुश्चक्र चलेगा।

प्रयास

कार मैकेनिक से बना पर्यावरण प्रेमी, खेत में 300 से ज्यादा मोरों का बसेरा

Submitted by HindiWater on Tue, 08/20/2019 - 15:54
हिम्मताराम भांबू।हिम्मताराम भांबू। हिम्मताराम भांबू राजस्थान के नागौर जिले के रहने वाले हैं। नागौर जिला पानी की उपलब्धता के हिसाब से डार्क जोन में होने से यहां के लोगों को भारी दिक्कतों को सामना करना पड़ता है। हिम्मताराम भांबू का बचपन इन्हीं परेशानियों से जूझते और कठिनाईयों से निबटने के उपायों को देखते हुए ही बीता था। खेती-किसानी के लिए हिम्मताराम को गांव में कक्षा 6 के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। पैसों की तंगी के कारण बचपन से ही मैकेनिक का काम शुरू कर दिया था और स्थानीय ट्रैक्टर मालिकों को पुर्जे खोलने और मरम्मत करने में सहायता करने लगे।

नोटिस बोर्ड

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 14:19
Source
दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून। बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह प्रदेश के 56 मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

पर्यावरण मंत्रालय से हटा नदियों की सफाई का काम

Submitted by UrbanWater on Wed, 06/19/2019 - 14:46
Source
दैनिक जागरण, 19 जून 2019
अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा।अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा। सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से नदियों की सफाई का काम छीनकर जलशक्ति मंत्रालय को सौंप दिया है। अब तक जलशक्ति मंत्रालय के पास सिर्फ नदियों की सफाई का ही जिम्मा था, लेकिन अब वह शेष नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम भी देखेगा। कैबिनेट सचिवालय ने सरकार (कार्य आबंटन) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का नाम बदल कर जलशक्ति मंत्रालय करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

श्रीनगर बांध परियोजना की खुली नहर से खतरा

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/07/2019 - 14:44
श्रीनगर बांध।श्रीनगर बांध।। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने श्रीनगर बांध परियोजना के पाॅवर चैनल में लीकेज के कारण हो रही समस्याओं पर उत्तम सिंह भंडारी और विमल भाई की याचिका पर सरकार से रिपोर्ट मांगी है। ऊर्जा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा टिहरी के जिलाधिकारी से भी एक महीने में ई-मेल पर इस संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस काम के समन्वयन और अनुपालन की जिम्मेदारी भी दी गई है। साथ ही याचिका की प्रतिलिपि वादियों द्वारा एक हफ्ते में पहुंचाने का भी आदेश दिया है।

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खासम-खास

समाधान खोजता भूजल संकट

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/13/2019 - 21:06
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कृष्ण गोपाल 'व्यास’
भूजल संकट गहराता जा रहा है।भूजल संकट गहराता जा रहा है। बरसात के बाद के सभी जलस्रोत (कुएं, तालाब और नदी) भूजल पर निर्भर होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि धरती में भूजल का संचय स्थानीय भूगोल और धरती की परतों की पानी सहेजने की क्षमता पर निर्भर होता है। बरसात भले ही धरती की गागर भर दे पर जब भूजल का दोहन प्रारंभ होता है तो सारा गणित धरा का धरा रह जाता है। भूजल स्तर के घटने के कारण धरती की उथली परतों का पानी खत्म हो जाता है। उस पर निर्भर झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं। चूँकि भूजल का दोहन हर साल लगातार बढ़ रहा है इस कारण धीरे-धीरे गहरी परतें भी रीतने लगी हैं।

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उत्तराखंड : कितने लाभप्रद जल विद्युत के दावे

Submitted by admin on Thu, 08/01/2013 - 09:11
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अरुण तिवारी
जहां तक जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली और रोज़गार के स्थानीय लाभ का सवाल है, तो हकीक़त और भी हास्यास्पद है। बतौर केन्द्रीय मंत्री श्री के एल राव ने खुद माना था कि जलविद्युत परियोजनाओं से स्थानीय लोगों को बिजली नहीं मिलती। टिहरी व भाखड़ा इसके पुख्ता उदाहरण हैं। ताज़ा उदाहरण धौली गंगा परियोजना का है। इसकी क्षमता 280 मेगावाट। इसका पहला आपूर्ति सब स्टेशन बरेली है। परियोजना के नज़दीक मुनस्यारी को एक मेगावाट बिजली नहीं दे पा रहे। यह इलाक़ा अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है। हम सब जानते हैं कि परियोजना निर्माण में आधुनिक तकनीक व मशीनों का उपयोग होता है। पानी से पैदा बिजली स्वच्छ, स्वस्थ और सबसे सस्ती होती है। जलविद्युत परियोजनाओं में जो ‘पीकिंग पावर’ होती है। ताप विद्युत की तरह धुआं फैलाकर यह वायुमंडल को प्रदूषित नहीं करती। परमाणु विद्युत उत्पादन इकाइयों से विकरण जैसी आशंका से भी जलविद्युत परियोजनाएं मुक्त हैं। ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाएं तो पूरी तरह सुरक्षित हैं। आम ही नहीं खास पर्यावरण कार्यकर्ताओं की धारणा है कि इनमें कोई बांध नहीं बनता। नदी को इनसे कोई नुकसान नहीं होता। अतः ‘रन ऑफ द रिवर’ जल विद्युत परियोजनाएं बनाई जानी चाहिए। जलविद्युत के पक्ष में दिए जाने वाले ये दावे महज दावे हैं या हकीक़त ? जलविद्युत परियोजनाओं की जद में आने वाली आबादी के लिए यह जानना आज बेहद जरूरी है; खासकर तब, जब उत्तराखंड पुनर्निर्माण की दिशा तय हो रही हो।

उत्तराखंड में आज 98 जलविद्युत परियोजनाएं कार्यरत हैं और 111 निर्माणरत। वर्तमान कार्यरत परियोजनाओं की कुल स्थापना क्षमता 3600 मेगावाट है। 21,213 मेगावाट की 200 परियोजनाएं योजना में हैं। ये उत्तराखंड जलविद्युत निगम के आंकड़े हैं।

विकास बना विनाश

Submitted by admin on Sun, 07/28/2013 - 14:48
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शमशेर सिंह बिष्ट
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जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
चालीस साल पहले तक उत्तराखंड की राजनीति में लकड़ी और लीसे के ठेकेदार हावी थे। आज यहां शराब और पानी का माफिया राज कर रहा है। पहाड़ों में बन रही जल विद्युत परियोजनाएं इन राजनीतिक दलों के लिए पैसा उगल रही हैं। पूरे उत्तराखंड में 558 जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जिनमें अकेले भागीरथी और अलकनंदा में ही 53 परियोजनाएं हैं। अनुमान है कि इन योजनाओं के बनने पर पूरे उत्तराखंड में नदियों को करीब 1500 किलोमीटर सुरंगों के भीतर बहना होगा। मनेरी से उत्तरकाशी तक भागीरथी 10 किलोमीटर सुरंग में कैद हो गई है। भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय का निर्माण यूरेशियन और एशियन प्लेट्स की आपसी टक्कर का नतीजा है। अरबों साल पहले गोंडवाना लैंड (वर्तमान अफ्रीका और अंटार्कटिका) से टूटकर आए भारतीय उपमहाद्वीप का ऊपरी हिस्सा ही हिमालय है। हिमालय अब तक मूल स्थान से दो हजार किलोमीटर की यात्रा कर चुका है और अभी भी दो सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से चीन की तरफ धंस रहा है। इस भूगर्भीय हलचल के कारण हिमालय क्षेत्र में ज़बरदस्त तनाव रहता है। इस तनाव को कम करने का उपाय भी प्रकृति के ही पास है। बार-बार 6 रिक्टर स्केल का भूकंप आता रहे तो यह भूगर्भीय हलचल कम हो जाती है और इससे अधिक तीव्र स्तर का भूकंप आने की आशंका कम हो जाती है। पिछले सौ वर्ष से यहां आठ या उससे अधिक शक्ति का भूकंप नहीं आया है, इसलिए ऐसा भूकंप आने की आशंका बहुत अधिक है। पूरा उत्तराखंड ही भूकंप के मामले में संवेदनशील है। यहां के नौ जिले-पिथौरागढ़ अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, चमोली, उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी और रुद्रप्रयाग जोन पांच में और शेष चार, देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल के कुछ हिस्से जोन चार में आते हैं।

भूस्खलन और बाढ़ की त्रासदी के सबक

Submitted by admin on Sat, 07/27/2013 - 12:46
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खड्गसिंह वल्दिया
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जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
उत्तराखंड की तबाही में हुई जान-माल की क्षतिपूर्ति असंभव है। मगर इससे सबक लेकर विचार तो किया ही जाना चाहिए कि ऐसी आपदाओं से बचाव के उपाय क्या हो सकते हैं। नदियों के प्राकृतिक रास्तों में अतार्किक निर्माण की वजह से वहां त्रासदी ने ज्यादा विकराल रूप धारण कर लिया। इसके भौगोलिक और वैज्ञानिक कारणों की पड़ताल कर रहे हैं खड्गसिंह वल्दिया।

दो ढालों के बीच नदी की चौड़ी घाटी उसका स्वाभाविक मार्ग है। उसे ‘फ्लड-वे’ कहते हैं। उस प्राकृतिक चौड़े मार्ग पर कभी भी बाढ़ का पानी बह सकता है। अपने फ्लड-वे यानी प्राकृतिक मार्ग में नदी अपनी धारा बदलती रहती है, पुरानी वाहिकाओं को छोड़कर नई वाहिकाएं बना लेती है। नदी कभी दाएं किनारे बहती है, कभी बाएं और कभी बीच में। बाढ़ की स्थिति में तो अपनी धारा बदलती ही है। अनेक स्थलों पर नदियां अपना बहाया हुआ मलबा जमा कर देती हैं। कच्चे मलबे के अंबार बढ़ते चले जाते हैं और वेदिकाओं में बदलती जाती है। स्थानीय बोली में ऐसी वेदिकाओं को ‘बगड़’ कहते हैं।उत्तुंग केदारनाथ, चौखंबा (बदरीनाथ), त्रिशूल, नंदादेवी और पंचचूली शिखरों वाले वृहद हिमालय (या हिमाद्रि) की विकट दक्षिणी ढाल सदा से भारी वर्षा की मार झेलती रही है। लेकिन पिछले सात-आठ सालों से अतिवृष्टि और भूस्खलनों की न थमने वाली आपदाओं से पिट रही है और बार-बार क्षत-विक्षत हो रही है। सीमित क्षेत्रों में अल्प अवधि में होने वाली अतिवृष्टि (बादल फटने) के कारण वृहद हिमालय की तलहटी की पट्टी के हजारों गांव बार-बार प्राकृतिक विपदाओं की त्रासदी भोग रहे हैं। संयोग से यही वह पट्टी है, जो जब-तब भूकंपों से डोलने लगती है और टूटते हैं पहाड़, सरकती हैं ढालें, और धंसती है धरती। 2009 में जिला पिथौरागढ़ के मुनस्यारी-तेजम क्षेत्र में और 2010 और 2012 में गढ़वाल की भागीरथी और अलकनंदा घाटियों में प्रकृति के अकल्पनीय प्रकोप को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मौसम विज्ञानी वर्षों से कह रहे हैं कि आबोहवा में बदलाव के कारण अब देश में मानसूनी वर्षा असमान रूप से होगी और अतिवृष्टि और अनावृष्टि का दुश्चक्र चलेगा।

प्रयास

कार मैकेनिक से बना पर्यावरण प्रेमी, खेत में 300 से ज्यादा मोरों का बसेरा

Submitted by HindiWater on Tue, 08/20/2019 - 15:54
हिम्मताराम भांबू।हिम्मताराम भांबू। हिम्मताराम भांबू राजस्थान के नागौर जिले के रहने वाले हैं। नागौर जिला पानी की उपलब्धता के हिसाब से डार्क जोन में होने से यहां के लोगों को भारी दिक्कतों को सामना करना पड़ता है। हिम्मताराम भांबू का बचपन इन्हीं परेशानियों से जूझते और कठिनाईयों से निबटने के उपायों को देखते हुए ही बीता था। खेती-किसानी के लिए हिम्मताराम को गांव में कक्षा 6 के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। पैसों की तंगी के कारण बचपन से ही मैकेनिक का काम शुरू कर दिया था और स्थानीय ट्रैक्टर मालिकों को पुर्जे खोलने और मरम्मत करने में सहायता करने लगे।

नोटिस बोर्ड

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 14:19
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दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून। बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह प्रदेश के 56 मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

पर्यावरण मंत्रालय से हटा नदियों की सफाई का काम

Submitted by UrbanWater on Wed, 06/19/2019 - 14:46
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दैनिक जागरण, 19 जून 2019
अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा।अब नदियों के सारे काम जल शक्ति मंत्रालय करेगा। सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से नदियों की सफाई का काम छीनकर जलशक्ति मंत्रालय को सौंप दिया है। अब तक जलशक्ति मंत्रालय के पास सिर्फ नदियों की सफाई का ही जिम्मा था, लेकिन अब वह शेष नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम भी देखेगा। कैबिनेट सचिवालय ने सरकार (कार्य आबंटन) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का नाम बदल कर जलशक्ति मंत्रालय करने की अधिसूचना जारी कर दी है।

श्रीनगर बांध परियोजना की खुली नहर से खतरा

Submitted by UrbanWater on Fri, 06/07/2019 - 14:44
श्रीनगर बांध।श्रीनगर बांध।। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने श्रीनगर बांध परियोजना के पाॅवर चैनल में लीकेज के कारण हो रही समस्याओं पर उत्तम सिंह भंडारी और विमल भाई की याचिका पर सरकार से रिपोर्ट मांगी है। ऊर्जा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा टिहरी के जिलाधिकारी से भी एक महीने में ई-मेल पर इस संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस काम के समन्वयन और अनुपालन की जिम्मेदारी भी दी गई है। साथ ही याचिका की प्रतिलिपि वादियों द्वारा एक हफ्ते में पहुंचाने का भी आदेश दिया है।

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