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Submitted by HindiWater on Fri, 02/21/2020 - 10:10
शुद्ध जल उपलब्धता - मध्यप्रदेश के बढ़ते सधे कदम 
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों से लोगों को पीने के साफ पानी को उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार के स्तर पर लगातार चिन्तन चल रहा है। कार्यशालाएं हो रही हैं। देश भर से जल विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उनकी राय ली जा रही है। अनुभव बटोरे जा रहे हैं। इस चिन्तन में पीएचई मंत्री और ग्रामीण विकास मंत्री, अपनी-अपनी टीम को लेकर एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

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Submitted by RuralWater on Thu, 09/03/2015 - 11:56
Source:
construction
दिल्ली में पानी की कमी है। दूसरे राज्यों से आने वाला पानी दिल्ली की प्यास बुझाता है। एक समय था जब दिल्ली में पानी की कोई कमी नहीं थी। दिल्ली के शासकों ने भी शहर में बड़े-बड़े तालाब और झील बनवाए थे। नीला हौज, हौज खास, भलस्वा और दक्षिणी दिल्ली रिज में कई बड़े झील थे। तब दिल्ली के तालाबों और झीलों में लबालब पानी भरा होता था जो पीने और सिंचाई के काम आता था। लेकिन आज अधिकांश झील सूखे और गन्दगी के शिकार हैं।

नीला हौज झील कभी दक्षिणी दिल्ली की प्यास बुझाने के काम आता था लेकिन अब यह खुद ही प्यासी है। झील में स्वच्छ पानी के जगह कूड़े और गन्दगी का अम्बार है। झील में गिरने वाली कॉलोनियों का सीवर पानी को दूषित कर चुका है। वसंत कुंज स्थित इस झील की गिनती कभी दिल्ली के प्राकृतिक झीलों में हुआ करती थी। हरियाली से भरे इस क्षेत्र में झील की स्थिति दयनीय है। इसमें तैरते थर्माकोल और प्लास्टिक के टुकड़े झील के सौंदर्य और अस्तित्व पर ग्रहण लगा रहे हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने झील को संरक्षित करने का आदेश दिया है। लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण और सार्वजनिक निर्माण विभाग की आपसी खींचतान की वजह से इसके स्वरूप में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। झील सरकारी अतिक्रमण और गन्दगी का शिकार है। झील के किनारे बने सड़क ने पहले इसके क्षेत्र को सीमित किया। अब फ्लाईओवर ने रही सही कसर पूरी कर दी है। झील को बचाने के लिये स्थानीय नागरिक अदालत की शरण में हैं।

यह किसी एक झील की कहानी नहीं है। बल्कि राजधानी के अधिकांश झीलों एवं तालाबों का यही हाल है। जलाशयों को पाटकर बड़े-बड़े बिल्डिंग और शॉपिंग मॉल बनाए जा रहे हैं। शहरीकरण के शोर में दिल्ली के तालाब धीरे-धीरे अपना वजूद खोते जा रहे हैं। कुछ सालों पहले तक जिन तालाबों, पोखरों और बावड़ियों में लबालब पानी भरा होता था आज उनमें से अधिकांश सूखे पड़े हैं।

सूखे तालाबों पर बिल्डर और भूमाफियाओं के साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण और अन्य सरकारी एजेंसियाँ अतिक्रमण करके कंक्रीट के जंगल उगा रही हैं, जिसके कारण दिल्ली में तालाबों की संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है। दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के दस्तावेज़ों के अनुसार राजधानी में कुल 1012 तालाब हैं। लेकिन उच्च न्यायालय में दिये हलफनामें में राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि राजधानी में अब केवल 629 तालाब ही सही सलामत हैं।

सैकड़ों तालाब अतिक्रमण के शिकार हैं। कई तालाब तो अपना वजूद ही खो चुके हैं, जिसके कारण उन्हें चिन्हित ही नहीं किया जा सकता है। पर्यावरण विभाग के 'पार्क एंड गार्डेन सोसायटी' के आँकड़ों पर विश्वास करें तो तालाबों पर अतिक्रमण की यह तस्वीर बहुत भयावह है। राजस्व विभाग के दस्तावेजों को आधार बनाकर जब इस विभाग ने सर्वेक्षण किया तो पाया कि अधिकांश तालाब बदहाल हैं। सोसायटी अपने सर्वे में 905 तालाबों का ही भौतिक सत्यापन कर सकी।

107 तालाबों को चिन्हित नहीं किया जा सका, क्योंकि उन तालाबों पर अब कॉलोनियाँ बसा दी गईं हैं। जबकि 70 तालाबों पर आंशिक रूप से अतिक्रमण तो 98 तालाबों पर पूरी तरह से अतिक्रमण किया जा चुका है। वहीं पर विभिन्न सरकारी विभागों ने अतिक्रमण को कानूनी जामा पहनाते हुए 78 तालाबों पर निर्माण करके उनके अस्तित्व पर कंक्रीट का आलीशान जंगल खड़ा कर दिया है तो 39 तालाबों पर अवैध रूप से निर्माण किया गया है।

दिल्ली में तालाब, बावड़ी, कुएँ, और नहरों का जाल बिछा था। दिल्ली में पहली नहर 1860 में बनी थी। तब यह पंजाब राज्य का एक सूबा हुआ करता था। तालाबों के पानी का उपयोग सिचाईं में होता था। तालाबों में इकट्ठा वर्षाजल यमुना के पानी को रिचार्ज करता था। लेकिन सरकार की उदासीनता ने तालाबों को गन्दगी इकट्ठा करने का केन्द्र बना दिया है। अतिक्रमण को बढ़ावा दिया है। आज दिल्ली पेयजल के लिये दूसरे राज्यों पर निर्भर है।
Submitted by RuralWater on Fri, 08/28/2015 - 15:25
Source:
water
विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष
Submitted by RuralWater on Thu, 08/27/2015 - 11:08
Source:
rainwater harvesting

वर्षा की बूँदें जहाँ गिरे वहीं रोक लेना और संग्रहित जल का विभिन्न प्रयोजनों में उपयोग करना सर्वोत्तम जल-प्रबन्धन है। इसकी कई तकनीकें प्रचलित हैं। कुछ तकनीकें प्राचीन और परम्परासिद्ध हैं तो कुछ नई विकसित हुई हैं। संग्रह और वितरण की इन प्रणालियों में भूजल कुण्डों के पुनर्भरण का समावेश भी होता है जिसका उप

प्रयास

Submitted by RuralWater on Wed, 02/19/2020 - 10:49
चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल
मैंने जिंदगी का सबसे अहम पाठ सीख लिया है कि कभी हार मत मानो और अपनी बातों का अनुसरण करते रहो। सभी महिलाएं चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपक गईं। वनकर्मियों ने हमें समझाने की कोशिशें की, तो लकड़ी माफिया ने हमें रिश्वत देने की कोशिश की और मना करने पर हमें जान से मारने की धमकी भी दी। लेकिन हमने अपने कदम पीछे लेने से मना कर दिया।

नोटिस बोर्ड

Submitted by RuralWater on Mon, 02/17/2020 - 15:35
Source:
Hindi Watet Portal
नदी घाटी विचार मंच
अब खतरा मात्र नदी नही, नदी घाटियों पर सामने दिखता है। नदी घाटियों का व्यवसायिकरण हो रहा है। बांधों की बात तो पीछे छोड़े, पूरी नदी घाटी, नदी जोड़ परियोजना से प्रभावित होने की बात है; जिसका न केवल मानव बल्कि पूरी प्रकृति पर स्थानीय देशी और वैश्विक प्रभाव भी हो रहा है।
Submitted by HindiWater on Mon, 02/10/2020 - 10:51
Source:
जल संसाधन प्रबंधन पर पुणे में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
राष्ट्रीय जल अकादमी, केन्द्रीय जल आयोग, पुणे में “जल संसाधन प्रबंधन पर प्रशिक्षण.सह.कार्यशाला” विषय पर 26-27 मार्च को गैर सरकारी संगठनों और मीडिया कर्मियों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में पंजीकरण कराने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।
Submitted by HindiWater on Mon, 01/20/2020 - 11:07
Source:
मीडिया महोत्सव-2020
गत वर्षों की भांति इस बार भी 22-23 फरवरी, 2020 (शनिवार-रविवार, चतुर्दशी-अमावस्या, कृष्ण पक्ष, माघ, विक्रम संवत 2076) को “भारत का अभ्युदय : मीडिया की भूमिका” पर केन्द्रित “मीडिया महोत्सव-2020” का आयोजन भोपाल में होना सुनिश्चित हुआ है l

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खासम-खास

शुद्ध जल उपलब्धता - मध्यप्रदेश के बढ़ते सधे कदम 

Submitted by HindiWater on Fri, 02/21/2020 - 10:10
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
शुद्ध जल उपलब्धता - मध्यप्रदेश के बढ़ते सधे कदम 
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों से लोगों को पीने के साफ पानी को उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार के स्तर पर लगातार चिन्तन चल रहा है। कार्यशालाएं हो रही हैं। देश भर से जल विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उनकी राय ली जा रही है। अनुभव बटोरे जा रहे हैं। इस चिन्तन में पीएचई मंत्री और ग्रामीण विकास मंत्री, अपनी-अपनी टीम को लेकर एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

Content

दिल्ली के तालाबों में कंक्रीट के जंगल

Submitted by RuralWater on Thu, 09/03/2015 - 11:56
Author
प्रदीप सिंह
construction
. दिल्ली में पानी की कमी है। दूसरे राज्यों से आने वाला पानी दिल्ली की प्यास बुझाता है। एक समय था जब दिल्ली में पानी की कोई कमी नहीं थी। दिल्ली के शासकों ने भी शहर में बड़े-बड़े तालाब और झील बनवाए थे। नीला हौज, हौज खास, भलस्वा और दक्षिणी दिल्ली रिज में कई बड़े झील थे। तब दिल्ली के तालाबों और झीलों में लबालब पानी भरा होता था जो पीने और सिंचाई के काम आता था। लेकिन आज अधिकांश झील सूखे और गन्दगी के शिकार हैं।

नीला हौज झील कभी दक्षिणी दिल्ली की प्यास बुझाने के काम आता था लेकिन अब यह खुद ही प्यासी है। झील में स्वच्छ पानी के जगह कूड़े और गन्दगी का अम्बार है। झील में गिरने वाली कॉलोनियों का सीवर पानी को दूषित कर चुका है। वसंत कुंज स्थित इस झील की गिनती कभी दिल्ली के प्राकृतिक झीलों में हुआ करती थी। हरियाली से भरे इस क्षेत्र में झील की स्थिति दयनीय है। इसमें तैरते थर्माकोल और प्लास्टिक के टुकड़े झील के सौंदर्य और अस्तित्व पर ग्रहण लगा रहे हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने झील को संरक्षित करने का आदेश दिया है। लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण और सार्वजनिक निर्माण विभाग की आपसी खींचतान की वजह से इसके स्वरूप में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। झील सरकारी अतिक्रमण और गन्दगी का शिकार है। झील के किनारे बने सड़क ने पहले इसके क्षेत्र को सीमित किया। अब फ्लाईओवर ने रही सही कसर पूरी कर दी है। झील को बचाने के लिये स्थानीय नागरिक अदालत की शरण में हैं।

यह किसी एक झील की कहानी नहीं है। बल्कि राजधानी के अधिकांश झीलों एवं तालाबों का यही हाल है। जलाशयों को पाटकर बड़े-बड़े बिल्डिंग और शॉपिंग मॉल बनाए जा रहे हैं। शहरीकरण के शोर में दिल्ली के तालाब धीरे-धीरे अपना वजूद खोते जा रहे हैं। कुछ सालों पहले तक जिन तालाबों, पोखरों और बावड़ियों में लबालब पानी भरा होता था आज उनमें से अधिकांश सूखे पड़े हैं।

सूखे तालाबों पर बिल्डर और भूमाफियाओं के साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण और अन्य सरकारी एजेंसियाँ अतिक्रमण करके कंक्रीट के जंगल उगा रही हैं, जिसके कारण दिल्ली में तालाबों की संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है। दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के दस्तावेज़ों के अनुसार राजधानी में कुल 1012 तालाब हैं। लेकिन उच्च न्यायालय में दिये हलफनामें में राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि राजधानी में अब केवल 629 तालाब ही सही सलामत हैं।

सैकड़ों तालाब अतिक्रमण के शिकार हैं। कई तालाब तो अपना वजूद ही खो चुके हैं, जिसके कारण उन्हें चिन्हित ही नहीं किया जा सकता है। पर्यावरण विभाग के 'पार्क एंड गार्डेन सोसायटी' के आँकड़ों पर विश्वास करें तो तालाबों पर अतिक्रमण की यह तस्वीर बहुत भयावह है। राजस्व विभाग के दस्तावेजों को आधार बनाकर जब इस विभाग ने सर्वेक्षण किया तो पाया कि अधिकांश तालाब बदहाल हैं। सोसायटी अपने सर्वे में 905 तालाबों का ही भौतिक सत्यापन कर सकी।

107 तालाबों को चिन्हित नहीं किया जा सका, क्योंकि उन तालाबों पर अब कॉलोनियाँ बसा दी गईं हैं। जबकि 70 तालाबों पर आंशिक रूप से अतिक्रमण तो 98 तालाबों पर पूरी तरह से अतिक्रमण किया जा चुका है। वहीं पर विभिन्न सरकारी विभागों ने अतिक्रमण को कानूनी जामा पहनाते हुए 78 तालाबों पर निर्माण करके उनके अस्तित्व पर कंक्रीट का आलीशान जंगल खड़ा कर दिया है तो 39 तालाबों पर अवैध रूप से निर्माण किया गया है।

दिल्ली में तालाब, बावड़ी, कुएँ, और नहरों का जाल बिछा था। दिल्ली में पहली नहर 1860 में बनी थी। तब यह पंजाब राज्य का एक सूबा हुआ करता था। तालाबों के पानी का उपयोग सिचाईं में होता था। तालाबों में इकट्ठा वर्षाजल यमुना के पानी को रिचार्ज करता था। लेकिन सरकार की उदासीनता ने तालाबों को गन्दगी इकट्ठा करने का केन्द्र बना दिया है। अतिक्रमण को बढ़ावा दिया है। आज दिल्ली पेयजल के लिये दूसरे राज्यों पर निर्भर है।

वर्षाजल संचयन की प्रकृति सम्मत उपयोगी व्यवस्था

Submitted by RuralWater on Thu, 08/27/2015 - 11:08
Author
अमरनाथ
rainwater harvesting

.वर्षा की बूँदें जहाँ गिरे वहीं रोक लेना और संग्रहित जल का विभिन्न प्रयोजनों में उपयोग करना सर्वोत्तम जल-प्रबन्धन है। इसकी कई तकनीकें प्रचलित हैं। कुछ तकनीकें प्राचीन और परम्परासिद्ध हैं तो कुछ नई विकसित हुई हैं। संग्रह और वितरण की इन प्रणालियों में भूजल कुण्डों के पुनर्भरण का समावेश भी होता है जिसका उप

प्रयास

चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल

Submitted by RuralWater on Wed, 02/19/2020 - 10:49
Source
अमर उजाला, 19 फरवरी, 2020
चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल
मैंने जिंदगी का सबसे अहम पाठ सीख लिया है कि कभी हार मत मानो और अपनी बातों का अनुसरण करते रहो। सभी महिलाएं चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपक गईं। वनकर्मियों ने हमें समझाने की कोशिशें की, तो लकड़ी माफिया ने हमें रिश्वत देने की कोशिश की और मना करने पर हमें जान से मारने की धमकी भी दी। लेकिन हमने अपने कदम पीछे लेने से मना कर दिया।

नोटिस बोर्ड

नदी घाटी विचार मंच

Submitted by RuralWater on Mon, 02/17/2020 - 15:35
Source
Hindi Watet Portal
नदी घाटी विचार मंच
अब खतरा मात्र नदी नही, नदी घाटियों पर सामने दिखता है। नदी घाटियों का व्यवसायिकरण हो रहा है। बांधों की बात तो पीछे छोड़े, पूरी नदी घाटी, नदी जोड़ परियोजना से प्रभावित होने की बात है; जिसका न केवल मानव बल्कि पूरी प्रकृति पर स्थानीय देशी और वैश्विक प्रभाव भी हो रहा है।

जल संसाधन प्रबंधन पर पुणे में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला

Submitted by HindiWater on Mon, 02/10/2020 - 10:51
जल संसाधन प्रबंधन पर पुणे में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
राष्ट्रीय जल अकादमी, केन्द्रीय जल आयोग, पुणे में “जल संसाधन प्रबंधन पर प्रशिक्षण.सह.कार्यशाला” विषय पर 26-27 मार्च को गैर सरकारी संगठनों और मीडिया कर्मियों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में पंजीकरण कराने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।

मीडिया महोत्सव-2020

Submitted by HindiWater on Mon, 01/20/2020 - 11:07
मीडिया महोत्सव-2020
गत वर्षों की भांति इस बार भी 22-23 फरवरी, 2020 (शनिवार-रविवार, चतुर्दशी-अमावस्या, कृष्ण पक्ष, माघ, विक्रम संवत 2076) को “भारत का अभ्युदय : मीडिया की भूमिका” पर केन्द्रित “मीडिया महोत्सव-2020” का आयोजन भोपाल में होना सुनिश्चित हुआ है l

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