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खासम-खास

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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Submitted by Shivendra on Fri, 01/07/2022 - 10:33
Source:
एन्वाइ टाइम्स
मध्य प्रदेश के एक गाँव इमलिडोल में पानी की कमी का मतलब है कि लोग साल में केवल एक ही फसल उगाते हैं
2019 में जल जीवन मिशन की शुरुआत हुई थी,तब भारत के घरों में से लगभग 1/6  के पास एक साफ पानी का नल हुआ करता  था। और  अब यह संख्या  तकरीबन 1/2  हो गई है । भारत में यूनिसेफ की जल और स्वच्छता इकाई का नेतृत्व कर रहे निकोलस ऑस्बर्ट का कहना है कि शायद ही यह अभियान आपकी सरकार से आप तक पहुंचा हो लेकिन इतना जरूर है,ये अच्छी तरह से वित्त पोषित है। क्योंकि इस अभियान के लिए अच्छा खासा बजट निर्धारित किया गया है। निकोलस ऑस्बर्ट आगे कहते है कि कोरोना से सभी सामाजिक क्षेत्र किसी न किसी तरह से प्रभावित हुए है,लेकिन इस पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इसे संरक्षित गया था।  
Submitted by Shivendra on Wed, 01/05/2022 - 17:04
Source:
चरखा फीचर
माहवारी में सामाजिक कुरीतियों का दर्द सहती किशोरियां
देश के दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों की तरह उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित कपकोट ब्लॉक के कई गांव इसी प्रकार की मान्यताओं और अवधारणाओं से ग्रसित हैं. जहां आज भी माहवारी को अभिशाप समझा जाता है और इस दौरान किशोरियों से लेकर महिलाओं तक को शारीरिक और मानसिक यातनाओं से गुज़रना होता है. उन्हें माहवारी के दौरान घर से बाहर गौशाला में रहना पड़ता है. जहां किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं होती है. इस संबंध में जगन्नाथ गांव की रहने वाली किशोरी रेनू अपना अनुभव साझा करते हुए कहती है कि "गौशाला पास हो या दूर, वहां लाईट हो या ना हो, गाय मारती हो या ना मारती हो, लेकिन हमें माहवारी के दौरान पूरा समय वहीं गुज़ारना होता है. इसके साथ ही सुबह 4 बजे उठकर नदी पर स्नान करने जाना पड़ता है, फिर मौसम चाहे गर्मी की हो या ठंड की, बालिका छोटी हो या बड़ी, वह नदी घर से दूर ही क्यों न हो. हमें वहीं जाकर स्नान करना पड़ता है" 
Submitted by Shivendra on Tue, 01/04/2022 - 10:55
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गंगा नदी,फोटो साभार: इंडिया वाटर पोर्टल फ्लिकर
नदी जैसे मानव शरीर विभिन्न अंगों से मिलकर बना उसी प्रकार से नदी विभिन्न छोटी छोटी नालियों के आपस में जुड़ने से बनी प्राकृतिक संरचनाओं में से एक है। बहुत सी छोटी नदियां मिल कर एक बड़ी महानदी का निर्माण करतीं,भारत में लगभग दो सौ नदियों है जिनमें गंगा प्रवाह सबसे बड़ा व सिंधु नदी लम्बाई में सबसे बड़ी है वहीं लगभग ग्यारह सो ऐसी नदी है जो दस से पच्चास किलोमीटर दूर तक जाकर लुप्त हो जाती हैं या अपनी सहायक नदी का हिस्सा बन जाती, इनमें अनेकों नदीया अपना नाम भी नहीं रख पाती। लेकिन नदी का बड़ा या छोटा होना महत्व नहीं रखता, नदी का मानव जीवन में योगदान, उपयोगिता, जैवविविधता, पर्यावरण संरक्षण में सहयोग उससे ज्यादा महत्व रखता । नदी की अपनी महत्त्वाकांक्षाओं से क्षेत्र विशेष के लोगों, वन्यजीव, जलीय जीव, के विकास में योगदान से लगाया जा सकता है।

प्रयास

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
Source:
एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 
Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
Source:
चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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खासम-खास

बांधों पर मंडराता खतरा: टिकाऊ माडल की तलाश

Submitted by Shivendra on Tue, 01/18/2022 - 14:44
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास'
bandhon-per-mandrata-khatra:-tikau-model-ki-talash
2441 मीटर लंबा तुंगभद्रा बांध
भारत में पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है वहीं गाद जमाव के कारण बुढ़ाते बडे बाधों की भंडारण क्षमता लगातार कम हो रही है। भंडारण क्षमता कम होने के कारण उनमें, साल-दर-साल कम पानी जमा हो रहा है। पानी के घटते भंडारण के कारण भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष जल संकट अर्थात पेयजल, निस्तार, खेती, उद्योग तथा पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना है। अर्थात बढ़ती मांग के संदर्भ में पानी की टिकाऊ उपलब्धता पर साल-दर-साल खतरा बढ़ रहा है। उम्र बढ़ने के कारण, बडे बांधों में, संरचनात्मक क्षति होती है। भारत के बांध इसका अपवाद नहीं हैं। यह क्षति मुख्यतः पाल और वेस्टवियर पर होती है। पाल और वेस्टवियर की क्षति पानी की तरंगों के सतत प्रहार तथा पाल की सतह पर बरसाती पानी की मार के कारण होती है।

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कैसे जल जीवन मिशन कामयाबी की बुलंदियों को छू रहा है

Submitted by Shivendra on Fri, 01/07/2022 - 10:33
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Source
एन्वाइ टाइम्स
मध्य प्रदेश के एक गाँव इमलिडोल में पानी की कमी का मतलब है कि लोग साल में केवल एक ही फसल उगाते हैं
2019 में जल जीवन मिशन की शुरुआत हुई थी,तब भारत के घरों में से लगभग 1/6  के पास एक साफ पानी का नल हुआ करता  था। और  अब यह संख्या  तकरीबन 1/2  हो गई है । भारत में यूनिसेफ की जल और स्वच्छता इकाई का नेतृत्व कर रहे निकोलस ऑस्बर्ट का कहना है कि शायद ही यह अभियान आपकी सरकार से आप तक पहुंचा हो लेकिन इतना जरूर है,ये अच्छी तरह से वित्त पोषित है। क्योंकि इस अभियान के लिए अच्छा खासा बजट निर्धारित किया गया है। निकोलस ऑस्बर्ट आगे कहते है कि कोरोना से सभी सामाजिक क्षेत्र किसी न किसी तरह से प्रभावित हुए है,लेकिन इस पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इसे संरक्षित गया था।  

माहवारी में सामाजिक कुरीतियों का दर्द सहती किशोरियां

Submitted by Shivendra on Wed, 01/05/2022 - 17:04
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चरखा फीचर
माहवारी में सामाजिक कुरीतियों का दर्द सहती किशोरियां
देश के दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों की तरह उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित कपकोट ब्लॉक के कई गांव इसी प्रकार की मान्यताओं और अवधारणाओं से ग्रसित हैं. जहां आज भी माहवारी को अभिशाप समझा जाता है और इस दौरान किशोरियों से लेकर महिलाओं तक को शारीरिक और मानसिक यातनाओं से गुज़रना होता है. उन्हें माहवारी के दौरान घर से बाहर गौशाला में रहना पड़ता है. जहां किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं होती है. इस संबंध में जगन्नाथ गांव की रहने वाली किशोरी रेनू अपना अनुभव साझा करते हुए कहती है कि "गौशाला पास हो या दूर, वहां लाईट हो या ना हो, गाय मारती हो या ना मारती हो, लेकिन हमें माहवारी के दौरान पूरा समय वहीं गुज़ारना होता है. इसके साथ ही सुबह 4 बजे उठकर नदी पर स्नान करने जाना पड़ता है, फिर मौसम चाहे गर्मी की हो या ठंड की, बालिका छोटी हो या बड़ी, वह नदी घर से दूर ही क्यों न हो. हमें वहीं जाकर स्नान करना पड़ता है" 

नदी को समझना होगा

Submitted by Shivendra on Tue, 01/04/2022 - 10:55
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गंगा नदी,फोटो साभार: इंडिया वाटर पोर्टल फ्लिकर
नदी जैसे मानव शरीर विभिन्न अंगों से मिलकर बना उसी प्रकार से नदी विभिन्न छोटी छोटी नालियों के आपस में जुड़ने से बनी प्राकृतिक संरचनाओं में से एक है। बहुत सी छोटी नदियां मिल कर एक बड़ी महानदी का निर्माण करतीं,भारत में लगभग दो सौ नदियों है जिनमें गंगा प्रवाह सबसे बड़ा व सिंधु नदी लम्बाई में सबसे बड़ी है वहीं लगभग ग्यारह सो ऐसी नदी है जो दस से पच्चास किलोमीटर दूर तक जाकर लुप्त हो जाती हैं या अपनी सहायक नदी का हिस्सा बन जाती, इनमें अनेकों नदीया अपना नाम भी नहीं रख पाती। लेकिन नदी का बड़ा या छोटा होना महत्व नहीं रखता, नदी का मानव जीवन में योगदान, उपयोगिता, जैवविविधता, पर्यावरण संरक्षण में सहयोग उससे ज्यादा महत्व रखता । नदी की अपनी महत्त्वाकांक्षाओं से क्षेत्र विशेष के लोगों, वन्यजीव, जलीय जीव, के विकास में योगदान से लगाया जा सकता है।

प्रयास

पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा - मायलम्मा

Submitted by Shivendra on Wed, 01/19/2022 - 15:31
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पानी पत्रक
पानी-पर्यावरण आंदोलन की अम्मा-मायलम्मा
मायलम्मा का सालों भर पानी से लबालब रहनेवाला कुआँ जब अचानक ही सूखा तो उनके पचास साला अनुभवी दिमाग ने भाँप लिया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है। इरावलार जनजाति की इस महिला की आँखों ने अपनी आनेवाली पीढ़ियों की तबाही का मंजर देख लिया था। उनका कहना था- “तीन वर्षों में इतनी बर्बादी हुई है, तो दस-पन्द्रह वर्षों बाद क्या हालत होगी! तब हमारे बच्चे हमें कोसते हुए इस बंजर भूमि पर रहने के लिए अभिशप्त होंगे।” उन्हें लगा कि यदि उन्होंने और उनके समुदाय ने भावी जीवन के लिए जल नहीं बचाया तो आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें माफ नहीं करेंगी। फिर क्या था, मायलम्मा ने समुदाय की औरतों को एकत्र कर “कोका कोला विरुद्ध समर समिति” का गठन किया। और फिर शुरू हुई दुनिया के दो सौ देशों में व्यवसाय करनेवाले कारपोरेटी दानव के खिलाफ जंग।

नोटिस बोर्ड

जल संसाधन प्रबंधन पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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 एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 

चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
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चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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