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खासम-खास

Submitted by HindiWater on Fri, 02/21/2020 - 10:10
शुद्ध जल उपलब्धता - मध्यप्रदेश के बढ़ते सधे कदम 
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों से लोगों को पीने के साफ पानी को उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार के स्तर पर लगातार चिन्तन चल रहा है। कार्यशालाएं हो रही हैं। देश भर से जल विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उनकी राय ली जा रही है। अनुभव बटोरे जा रहे हैं। इस चिन्तन में पीएचई मंत्री और ग्रामीण विकास मंत्री, अपनी-अपनी टीम को लेकर एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

Content

Submitted by Hindi on Sat, 09/24/2011 - 15:45
Source:
नई दुनिया, 24 सितंबर 2011

तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस के सहयोग से बने परमाणु बिजली घर के खिलाफ जिस तरह का जनसैलाब उमड़ा और सैकड़ों लोग अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे, उससे यह साफ जाहिर होता है कि परमाणु बिजली घर से जुड़ी भीषण दुर्घटना की आशंकाओं ने स्थानीय निवासियों की चेतना को झकझोर दिया है।

जापान के फुकुशिमा में हुई परमाणु दुर्घटना के बाद दुनिया भर में जो परमाणु बिजली घरों के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ था, वह अब जबर्दस्त ढंग से जोर पकड़ रहा है। तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस के सहयोग से जल्द चालू होने वाले परमाणु बिजली घर के खिलाफ लोगों ने अपने संगठित विरोध से राज्य सरकार को झुकाया, जो एक बड़ी नजीर है। परमाणु ऊर्जा के पक्ष-विपक्ष में बंटे लोगों के बीच इस बात पर सहमति बनती नजर आ रही है कि लोगों की आशंकाओं को दूर किए बिना परमाणु बिजली घर नहीं बनने चाहिए। लिहाजा कुडनकुलन की थाप बहुत दूर तक और देर तक सुनाई देगी। वैसे भी इस समय देश भर में जहां भी नए परमाणु बिजली घर प्रस्तावित हैं, वहां उनका कड़ा विरोध चल रहा है।
Submitted by Hindi on Fri, 09/23/2011 - 11:42
Source:
जनसत्ता रविवारी, 04 सितंबर 2011
urbanization
एक तरफ विकास और तरक्की के नए पैमाने गढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ बेकाबू आबादी, प्रदूषण, गंदगी और बीमारी के नए मर्कज भी बन रहे हैं। गांवों से बढ़ता पलायन और बिना किसी नापजोख के चल रहा शहरीकरण देश की कैसी तस्वीर बना रहा है, बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी

शहरीकरण का मतलब ही हो गया है रफ्तार। रफ्तार का मतलब है वाहन। और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित हवा। शहर को ज्यादा बिजली चाहिए। यानी ज्यादा कोयला जलेगा, ज्यादा परमाणु संयंत्र लगेंगे। शहर का मतलब है उद्योगीकरण और अनियोजित कारखानों की भरमार। नतीजा यह हुआ है कि देश की सभी नदियां जहरीली हो चुकी हैं। नदी थी खेती के लिए, मछली के लिए, दैनिक कार्यों के लिए, न कि गंदगी सोखने के लिए।

साल दर साल बढ़ती गर्मी, फैलता जलसंकट और मरीजों से पटते अस्पताल। इसी तरह की तमाम और समस्याएं हैं जो दिनोंदिन चिंता का विषय बनती जा रही हैं। माना जा रहा है कि इन मुश्किलों की एक बड़ी वजह पर्यावरण का विनाश है। पर्यावरण को नष्ट करने में शहरीकरण का बहुत बड़ा हाथ है। असल में देखें, तो संकट घटते जंगलों का हो या फिर साफ हवा या साफ पानी का। सभी के जड़ में विकास की वह अवधारणा है जिसमें शहररूपी सुरसा का मुंह फैलता ही जा रहा है। इसके निशाने पर है कुदरत और इंसान। शहरीकरण की रफ्तार इतनी तेज है कि कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर, महानगर। देश की बहुसंख्यक आबादी नगरों की तरफ भाग रही है। यह पलायन काफी कुछ रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। रोजगार, आधुनिक सुविधाएं और भविष्य की लालसा में लोगबाग अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़कर शहर की चकाचौंध की ओर पलायन कर रहे हैं।
Submitted by Hindi on Thu, 09/22/2011 - 09:55
Source:
जनसत्ता रविवारी, 28 अगस्त 2011
देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो साफ पेयजल से महरूम हैं कहीं सूखे की वजह से भुखमरी की नौबत है तो कहीं सैलाब से कोहराम मचा है। पानी की कमी नहीं है लेकिन खराब जल प्रबंधन की वजह से मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। सरकार हवाई योजनाएं बनाकर चुप बैठी है। निरंतर बढ़ते जलसंकट की पड़ताल कर रहे हैं शेखर।

जल-दोहन इसी तरह से जारी रहा तो आने वाले समय में भारत को अनाज और पानी के संकट को झेलने के लिए अभी से तैयार हो जाना चाहिए। जाहिर है कि जब जल संकट बढ़ेगा तो खेती पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। अनाजों के उत्पादन में कमी आएगी। इस वजह से अनाज संकट पैदा होगा और भूख का एक नया चेहरा उभरकर सामने आएगा। एक बड़ा तबका जो आज भरपेट भोजन कर पाता है उसके लिए पेट भर खाना मिलना मुश्किल हो जाएगा। भुखमरी की जो समस्या पैदा होगी उससे फिर निपटना आसान नहीं होगा।

क्या धरती पर पानी के बिना जिंदगानी संभव है? अगर नहीं, तो पानी की इतनी बड़ी बर्बादी क्यों हो रही है। भारत में जलसंकट लगातार दस्तक दे रहा है और सरकार की तंद्रा टूट नहीं रही है। भारत में बारिश का अस्सी फीसद पानी बर्बाद हो जाता है। आलम यह है कि कुछ इलाके तो सैलाब से घिरे रहते हैं और कुछ सूखे से। जनजीवन की हानि दोनों ही स्थितियों में होती है। ऐसे में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि देश के जल प्रबंधन को लेकर क्या और कैसे किया जाए। फिर देश के कई हिस्सों में सूखे ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। और कई इलाके बाढ़ से तबाह हैं। कई इलाके ऐसे हैं जहां कम बारिश हुई है। इस वजह से वहां खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। 1991 से शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद भी कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए काफी अहम है।

प्रयास

Submitted by RuralWater on Wed, 02/19/2020 - 10:49
चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल
मैंने जिंदगी का सबसे अहम पाठ सीख लिया है कि कभी हार मत मानो और अपनी बातों का अनुसरण करते रहो। सभी महिलाएं चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपक गईं। वनकर्मियों ने हमें समझाने की कोशिशें की, तो लकड़ी माफिया ने हमें रिश्वत देने की कोशिश की और मना करने पर हमें जान से मारने की धमकी भी दी। लेकिन हमने अपने कदम पीछे लेने से मना कर दिया।

नोटिस बोर्ड

Submitted by RuralWater on Mon, 02/17/2020 - 15:35
Source:
Hindi Watet Portal
नदी घाटी विचार मंच
अब खतरा मात्र नदी नही, नदी घाटियों पर सामने दिखता है। नदी घाटियों का व्यवसायिकरण हो रहा है। बांधों की बात तो पीछे छोड़े, पूरी नदी घाटी, नदी जोड़ परियोजना से प्रभावित होने की बात है; जिसका न केवल मानव बल्कि पूरी प्रकृति पर स्थानीय देशी और वैश्विक प्रभाव भी हो रहा है।
Submitted by HindiWater on Mon, 02/10/2020 - 10:51
Source:
जल संसाधन प्रबंधन पर पुणे में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
राष्ट्रीय जल अकादमी, केन्द्रीय जल आयोग, पुणे में “जल संसाधन प्रबंधन पर प्रशिक्षण.सह.कार्यशाला” विषय पर 26-27 मार्च को गैर सरकारी संगठनों और मीडिया कर्मियों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में पंजीकरण कराने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।
Submitted by HindiWater on Mon, 01/20/2020 - 11:07
Source:
मीडिया महोत्सव-2020
गत वर्षों की भांति इस बार भी 22-23 फरवरी, 2020 (शनिवार-रविवार, चतुर्दशी-अमावस्या, कृष्ण पक्ष, माघ, विक्रम संवत 2076) को “भारत का अभ्युदय : मीडिया की भूमिका” पर केन्द्रित “मीडिया महोत्सव-2020” का आयोजन भोपाल में होना सुनिश्चित हुआ है l

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खासम-खास

शुद्ध जल उपलब्धता - मध्यप्रदेश के बढ़ते सधे कदम 

Submitted by HindiWater on Fri, 02/21/2020 - 10:10
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
शुद्ध जल उपलब्धता - मध्यप्रदेश के बढ़ते सधे कदम 
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों से लोगों को पीने के साफ पानी को उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार के स्तर पर लगातार चिन्तन चल रहा है। कार्यशालाएं हो रही हैं। देश भर से जल विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उनकी राय ली जा रही है। अनुभव बटोरे जा रहे हैं। इस चिन्तन में पीएचई मंत्री और ग्रामीण विकास मंत्री, अपनी-अपनी टीम को लेकर एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

Content

परमाणु बिजलीघरों का भविष्य

Submitted by Hindi on Sat, 09/24/2011 - 15:45
Author
भाषा सिंह
Source
नई दुनिया, 24 सितंबर 2011

तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस के सहयोग से बने परमाणु बिजली घर के खिलाफ जिस तरह का जनसैलाब उमड़ा और सैकड़ों लोग अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे, उससे यह साफ जाहिर होता है कि परमाणु बिजली घर से जुड़ी भीषण दुर्घटना की आशंकाओं ने स्थानीय निवासियों की चेतना को झकझोर दिया है।

जापान के फुकुशिमा में हुई परमाणु दुर्घटना के बाद दुनिया भर में जो परमाणु बिजली घरों के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ था, वह अब जबर्दस्त ढंग से जोर पकड़ रहा है। तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस के सहयोग से जल्द चालू होने वाले परमाणु बिजली घर के खिलाफ लोगों ने अपने संगठित विरोध से राज्य सरकार को झुकाया, जो एक बड़ी नजीर है। परमाणु ऊर्जा के पक्ष-विपक्ष में बंटे लोगों के बीच इस बात पर सहमति बनती नजर आ रही है कि लोगों की आशंकाओं को दूर किए बिना परमाणु बिजली घर नहीं बनने चाहिए। लिहाजा कुडनकुलन की थाप बहुत दूर तक और देर तक सुनाई देगी। वैसे भी इस समय देश भर में जहां भी नए परमाणु बिजली घर प्रस्तावित हैं, वहां उनका कड़ा विरोध चल रहा है।

इस शहर का क्या करें

Submitted by Hindi on Fri, 09/23/2011 - 11:42
Author
पंकज चतुर्वेदी
Source
जनसत्ता रविवारी, 04 सितंबर 2011
urbanization
एक तरफ विकास और तरक्की के नए पैमाने गढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ बेकाबू आबादी, प्रदूषण, गंदगी और बीमारी के नए मर्कज भी बन रहे हैं। गांवों से बढ़ता पलायन और बिना किसी नापजोख के चल रहा शहरीकरण देश की कैसी तस्वीर बना रहा है, बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी

शहरीकरण का मतलब ही हो गया है रफ्तार। रफ्तार का मतलब है वाहन। और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित हवा। शहर को ज्यादा बिजली चाहिए। यानी ज्यादा कोयला जलेगा, ज्यादा परमाणु संयंत्र लगेंगे। शहर का मतलब है उद्योगीकरण और अनियोजित कारखानों की भरमार। नतीजा यह हुआ है कि देश की सभी नदियां जहरीली हो चुकी हैं। नदी थी खेती के लिए, मछली के लिए, दैनिक कार्यों के लिए, न कि गंदगी सोखने के लिए।

साल दर साल बढ़ती गर्मी, फैलता जलसंकट और मरीजों से पटते अस्पताल। इसी तरह की तमाम और समस्याएं हैं जो दिनोंदिन चिंता का विषय बनती जा रही हैं। माना जा रहा है कि इन मुश्किलों की एक बड़ी वजह पर्यावरण का विनाश है। पर्यावरण को नष्ट करने में शहरीकरण का बहुत बड़ा हाथ है। असल में देखें, तो संकट घटते जंगलों का हो या फिर साफ हवा या साफ पानी का। सभी के जड़ में विकास की वह अवधारणा है जिसमें शहररूपी सुरसा का मुंह फैलता ही जा रहा है। इसके निशाने पर है कुदरत और इंसान। शहरीकरण की रफ्तार इतनी तेज है कि कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर, महानगर। देश की बहुसंख्यक आबादी नगरों की तरफ भाग रही है। यह पलायन काफी कुछ रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। रोजगार, आधुनिक सुविधाएं और भविष्य की लालसा में लोगबाग अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़कर शहर की चकाचौंध की ओर पलायन कर रहे हैं।

कहीं सूखा कहीं सैलाब, वाह रे आब

Submitted by Hindi on Thu, 09/22/2011 - 09:55
Author
शेखर
Source
जनसत्ता रविवारी, 28 अगस्त 2011
देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो साफ पेयजल से महरूम हैं कहीं सूखे की वजह से भुखमरी की नौबत है तो कहीं सैलाब से कोहराम मचा है। पानी की कमी नहीं है लेकिन खराब जल प्रबंधन की वजह से मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। सरकार हवाई योजनाएं बनाकर चुप बैठी है। निरंतर बढ़ते जलसंकट की पड़ताल कर रहे हैं शेखर।

जल-दोहन इसी तरह से जारी रहा तो आने वाले समय में भारत को अनाज और पानी के संकट को झेलने के लिए अभी से तैयार हो जाना चाहिए। जाहिर है कि जब जल संकट बढ़ेगा तो खेती पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। अनाजों के उत्पादन में कमी आएगी। इस वजह से अनाज संकट पैदा होगा और भूख का एक नया चेहरा उभरकर सामने आएगा। एक बड़ा तबका जो आज भरपेट भोजन कर पाता है उसके लिए पेट भर खाना मिलना मुश्किल हो जाएगा। भुखमरी की जो समस्या पैदा होगी उससे फिर निपटना आसान नहीं होगा।

क्या धरती पर पानी के बिना जिंदगानी संभव है? अगर नहीं, तो पानी की इतनी बड़ी बर्बादी क्यों हो रही है। भारत में जलसंकट लगातार दस्तक दे रहा है और सरकार की तंद्रा टूट नहीं रही है। भारत में बारिश का अस्सी फीसद पानी बर्बाद हो जाता है। आलम यह है कि कुछ इलाके तो सैलाब से घिरे रहते हैं और कुछ सूखे से। जनजीवन की हानि दोनों ही स्थितियों में होती है। ऐसे में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि देश के जल प्रबंधन को लेकर क्या और कैसे किया जाए। फिर देश के कई हिस्सों में सूखे ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। और कई इलाके बाढ़ से तबाह हैं। कई इलाके ऐसे हैं जहां कम बारिश हुई है। इस वजह से वहां खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। 1991 से शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद भी कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए काफी अहम है।

प्रयास

चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल

Submitted by RuralWater on Wed, 02/19/2020 - 10:49
Source
अमर उजाला, 19 फरवरी, 2020
चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल
मैंने जिंदगी का सबसे अहम पाठ सीख लिया है कि कभी हार मत मानो और अपनी बातों का अनुसरण करते रहो। सभी महिलाएं चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपक गईं। वनकर्मियों ने हमें समझाने की कोशिशें की, तो लकड़ी माफिया ने हमें रिश्वत देने की कोशिश की और मना करने पर हमें जान से मारने की धमकी भी दी। लेकिन हमने अपने कदम पीछे लेने से मना कर दिया।

नोटिस बोर्ड

नदी घाटी विचार मंच

Submitted by RuralWater on Mon, 02/17/2020 - 15:35
Source
Hindi Watet Portal
नदी घाटी विचार मंच
अब खतरा मात्र नदी नही, नदी घाटियों पर सामने दिखता है। नदी घाटियों का व्यवसायिकरण हो रहा है। बांधों की बात तो पीछे छोड़े, पूरी नदी घाटी, नदी जोड़ परियोजना से प्रभावित होने की बात है; जिसका न केवल मानव बल्कि पूरी प्रकृति पर स्थानीय देशी और वैश्विक प्रभाव भी हो रहा है।

जल संसाधन प्रबंधन पर पुणे में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला

Submitted by HindiWater on Mon, 02/10/2020 - 10:51
जल संसाधन प्रबंधन पर पुणे में दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
राष्ट्रीय जल अकादमी, केन्द्रीय जल आयोग, पुणे में “जल संसाधन प्रबंधन पर प्रशिक्षण.सह.कार्यशाला” विषय पर 26-27 मार्च को गैर सरकारी संगठनों और मीडिया कर्मियों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में पंजीकरण कराने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।

मीडिया महोत्सव-2020

Submitted by HindiWater on Mon, 01/20/2020 - 11:07
मीडिया महोत्सव-2020
गत वर्षों की भांति इस बार भी 22-23 फरवरी, 2020 (शनिवार-रविवार, चतुर्दशी-अमावस्या, कृष्ण पक्ष, माघ, विक्रम संवत 2076) को “भारत का अभ्युदय : मीडिया की भूमिका” पर केन्द्रित “मीडिया महोत्सव-2020” का आयोजन भोपाल में होना सुनिश्चित हुआ है l

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