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Submitted by UrbanWater on Thu, 06/25/2020 - 09:08
नदी चेतना यात्रा : बिहार में राज-समाज की कोशिश से नदियों को जिंदा करने की कवायद, फोटो: Needpix.com
पिछले तीन दिनों (22 जून से 24 जून) से बिहार में बीस-पच्चीस संवेदनशील लोग नदी चेतना यात्रा के लिए होमवर्क कर रहे हैं। यह समूह रोज सबेरे 8.30 बजे मोबाईल पर एक दूसरे से कनेक्ट होता है और डिजिटल सम्वाद के तरीके से प्रातः लगभग नौ बजे तक होमवर्क करता है। होमवर्क का लक्ष्य है, चेतना यात्रा को प्रभावी बनाना। चयनित नदियों की समस्याओं के कारणों को पहचाना और कछार में निवास करने वाले समाज की मदद से समाज सम्मत हल तलाशना और जन अपेक्षाओं को मूर्त स्वरुप प्रदान करने के लिए राज से सम्वाद करना।

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Submitted by admin on Thu, 08/29/2013 - 11:53
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आपदा के बाद पुनः निर्माण से पहाड़ बचाए जाएं।
जहाँ उत्तराखंड की सरकार आपदा के बाद पुनःनिर्माण की योजना बना रही है वहीं आपदाग्रस्त क्षेत्रों में इन दिनों पलायन की भी चर्चा जोरों पर है। सरकार को सावधानी से इससे निपटने के सुझाव दे रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई की एक रिपोर्ट-

चर्चा गहरी हो गई है कि यहाँ से कहीं दूसरी जगह ही पलायन हो। इससे सावधान रहने के लिए वर्तमान में राज्य को कठिन प्रतिज्ञा करनी चाहिए। राज्य सरकार ने यह निर्णय लेकर कि नदियों के किनारे कोई निर्माण नहीं होगा, इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सका है। क्या इसका अर्थ इस नाम पर लिया जाय कि नदियों के किनारों की दूर तक की आबादी को खाली करवाना है, या नदियों के किनारों को सुदृढ़ ही नहीं करना है। यदि ऐसा है तो जो नदियों के किनारों की आबादी है वह भविष्य में अधिक खतरे की जद में आने वाली है। ऐसी स्थिति पैदा करने से पलायन बढ़ेगा। गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा जैसी पवित्र नदियों के संगम व इनके तटों पर निवास करने वाले लोग कभी बड़े भाग्यशाली माने जाते थे। इसमें ऐसी भी कहावत है कि इन नदियों के तटों पर जो एक रात्रि भी विश्राम करे, वह पुण्य का भागीदार माना जाता है। लेकिन अब स्थिति भिन्न होती नजर आ रही है। नदियों के पास रहने वाले समाज को अनुभव हो रहा है कि उनके आने वाले दिन संकट में गुजरेंगे। हर बरसात में औसत दो गांव और दो ऐसी आबादी वाले क्षेत्र तबाह होते नजर आ रहे हैं, जहाँ पर लोग तीर्थ स्थलों तक पहुँचने से पहले चाय, पानी पीकर विश्राम लेते थे। बरसात में पहाड़ी राज्यों में खासकर उत्तराखंड़, हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी लोगों को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन असुरक्षित नजर आ रही है। आखिर ऐसा पिछले वर्षों में क्या हो गया कि लोग अकस्मात पहाड़ी क्षेत्रों में अब अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।
Submitted by admin on Fri, 08/23/2013 - 16:48
Source:
तहलका, अगस्त 2013
महाराष्ट्र के मेंढा गांव का उदाहरण बताता है कि स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ आजीविका का अवसर मिले तो नक्सलवाद से जूझते इलाकों में खुशहाली का नया अध्याय शुरू हो सकता है..

देवाजी टोफा वह शख्स हैं जिन्होंने अधिकारों के लिए इस क्रांति की अलख जगाई थी। अंग्रेजों ने 1927 में भारतीय वन अधिनियम बनाकर एक तरह से जंगल पर निर्भर समाज को उससे बेदखल कर दिया था। 2006 में केंद्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून पास करने के साथ ही यह अधिकार एक बार फिर से बहाल हुआ। लेकिन हक की यह बहाली सिर्फ फाइलों में हुई थी। वन विभाग के अधिकारियों ने मेंढावासियों को उनका हक देने की राह में जमकर रोड़े अटकाए, मेंढा के पास बांस का अकूत भंडार था। इसके अलावा उसके 1,800 हेक्टेयर के जंगलों में चिरौंजी, महुआ, तेंदू पत्ता, हर्र, बरड़ आदि भी खूब होते हैं। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली की सबसे बड़ी पहचान फिलहाल यही है कि यह नक्सल प्रभावित जिला है। आदिवासी और जंगल की बहुलता वाले इस जिले की धनौरा तहसील में एक गांव है मेंढा। मेंढा और लेखा नाम के दो टोलों का यह गांव देखने में कहीं से भी विशेष नहीं लगता। लेकिन अपनी करनी से इसने वह मिसाल कायम की है जिसमें नक्सलवाद से जूझते देश के कई इलाकों में खुशहाली का एक नया अध्याय कैसे शुरू हो, इसका संकेत छिपा है। मेंढा के नाम दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं। यह देश का पहला गांव है जिसने सामुदायिक वनाधिकार हासिल किया और जिसकी ग्राम सभा को ट्रांजिट परमिट (टीपी) रखने का अधिकार मिला। इस अधिकार ने गांववालों को अपने जंगल का बांस अपनी मर्जी से बेचने की आजादी दी है। इससे वे न सिर्फ स्वाभिमान के साथ आजीविका कमा रहे हैं बल्कि वनों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहे हैं।

सबल, स्वावलंबी, अपने हित के फैसले खुद ले सकने वाला और स्वाभिमानी, महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की यही आत्मा थी। लेकिन विकास की आधुनिक परिभाषा में गांधी और उनके सिद्धांत पीछे छूटते गए।
Submitted by admin on Tue, 08/20/2013 - 13:58
Source:
कल्चर अनप्लग्ड
भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आविर्भाव हुआ। यदि मानव सभ्यता के विकास पर गौर करें तो इसका विकास नदियों के ही किनारे हुआ है।

प्रयास

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/18/2020 - 05:54
सिंचाई-तालाब ही कृषिजल का समाधान, प्रतीकात्मक फोटो: Needpix.com
तालाब हेतु खोदी हुई मिट्टी का उपयोग श्री चौधरी के खेतों में बने निचले, असमतल क्षेत्रों में भरकर उन्हें एक समतल-आकार देने का प्रयास किया गया। साथ ही अन्य मिट्टी का उपयोग खेतों की पहुंच सड़कों ठीक करने में लिया गया। कड़ी मेहनत के बाद मई माह में तालाब निर्मित हुआ और उसका आकार 1 हेक्टेयर में होकर उसमें लगभग 80000 घन मीटर पानी का संग्रहण किया जा सकता था। चूँकि इस तालाब में प्राकृतिक निकास मार्ग (जो कि मुख्य राजमार्ग से लगा हुआ था) से जल का प्रवेश तालाब में कराया गया था, इस कारण अतिरिक्त निकास द्वार न बनाकर ऐसा प्रयास किया गया कि तालाब भरने के उपरान्त पुनः जल अपवाह अपने प्राकृतिक निकास मार्ग से आगे चला जाए।

नोटिस बोर्ड

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 15:04
Source:
वेबिनारः कोरोनार संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 
कोरोना संकट और लॉकडाउन को हिमालय क्षेत्र के परिप्रेक्ष में समझने के लिए 21 मई, गुरुवार 4 बजे हमारे पेज Endangered Himalaya में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के साथ लाइव बातचीत में जुड़ें।  आप Zoom में https://bit.ly/2zmjhHs लिंक में पंजीकरण करके भी जुड़ सकते हैं। इसका आयोजन हिम धारा और रिवाइटललाइज़िग रेनफेड एग्रीकल्चर द्वारा किया जा रहा है।
Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 14:52
Source:
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ विषय पर सहगल फाउंडेशन और सीएडब्ल्यूएसटी ऑनलाइन वर्कशाप का आयोजन करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य वाॅश के प्रति लोगों को जागरुक करना और प्रेरित करना है। ये वेबिनार निन्मलिखित विषयों से संबंधित रहेगा - 
Submitted by UrbanWater on Wed, 05/13/2020 - 11:11
Source:
पंकज मालवीय अक्षधा फाउंडेशन
पानी रे पानी
विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून 2020

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि |
प्रविष्टि रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि – 30 मई 2020
ई-प्रतियोगिता की तिथि – 5 जून 2020,
समय 10 बजे प्रात: से 4 बजे तक

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खासम-खास

नदी चेतना यात्रा : राज से सम्वाद के लिए होमवर्क करता समाज 

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/25/2020 - 09:08
Author
कृष्ण गोपाल व्यास
nadi-chetna-yatra-bihar-nadiyan
नदी चेतना यात्रा : बिहार में राज-समाज की कोशिश से नदियों को जिंदा करने की कवायद, फोटो: Needpix.com
पिछले तीन दिनों (22 जून से 24 जून) से बिहार में बीस-पच्चीस संवेदनशील लोग नदी चेतना यात्रा के लिए होमवर्क कर रहे हैं। यह समूह रोज सबेरे 8.30 बजे मोबाईल पर एक दूसरे से कनेक्ट होता है और डिजिटल सम्वाद के तरीके से प्रातः लगभग नौ बजे तक होमवर्क करता है। होमवर्क का लक्ष्य है, चेतना यात्रा को प्रभावी बनाना। चयनित नदियों की समस्याओं के कारणों को पहचाना और कछार में निवास करने वाले समाज की मदद से समाज सम्मत हल तलाशना और जन अपेक्षाओं को मूर्त स्वरुप प्रदान करने के लिए राज से सम्वाद करना।

Content

आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पलायन

Submitted by admin on Thu, 08/29/2013 - 11:53
Author
सुरेश भाई

आपदा के बाद पुनः निर्माण से पहाड़ बचाए जाएं।


जहाँ उत्तराखंड की सरकार आपदा के बाद पुनःनिर्माण की योजना बना रही है वहीं आपदाग्रस्त क्षेत्रों में इन दिनों पलायन की भी चर्चा जोरों पर है। सरकार को सावधानी से इससे निपटने के सुझाव दे रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई की एक रिपोर्ट-

चर्चा गहरी हो गई है कि यहाँ से कहीं दूसरी जगह ही पलायन हो। इससे सावधान रहने के लिए वर्तमान में राज्य को कठिन प्रतिज्ञा करनी चाहिए। राज्य सरकार ने यह निर्णय लेकर कि नदियों के किनारे कोई निर्माण नहीं होगा, इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सका है। क्या इसका अर्थ इस नाम पर लिया जाय कि नदियों के किनारों की दूर तक की आबादी को खाली करवाना है, या नदियों के किनारों को सुदृढ़ ही नहीं करना है। यदि ऐसा है तो जो नदियों के किनारों की आबादी है वह भविष्य में अधिक खतरे की जद में आने वाली है। ऐसी स्थिति पैदा करने से पलायन बढ़ेगा। गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा जैसी पवित्र नदियों के संगम व इनके तटों पर निवास करने वाले लोग कभी बड़े भाग्यशाली माने जाते थे। इसमें ऐसी भी कहावत है कि इन नदियों के तटों पर जो एक रात्रि भी विश्राम करे, वह पुण्य का भागीदार माना जाता है। लेकिन अब स्थिति भिन्न होती नजर आ रही है। नदियों के पास रहने वाले समाज को अनुभव हो रहा है कि उनके आने वाले दिन संकट में गुजरेंगे। हर बरसात में औसत दो गांव और दो ऐसी आबादी वाले क्षेत्र तबाह होते नजर आ रहे हैं, जहाँ पर लोग तीर्थ स्थलों तक पहुँचने से पहले चाय, पानी पीकर विश्राम लेते थे। बरसात में पहाड़ी राज्यों में खासकर उत्तराखंड़, हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी लोगों को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन असुरक्षित नजर आ रही है। आखिर ऐसा पिछले वर्षों में क्या हो गया कि लोग अकस्मात पहाड़ी क्षेत्रों में अब अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।

‘हमारे गांव में हम ही सरकार’

Submitted by admin on Fri, 08/23/2013 - 16:48
Author
अतुल चौरसिया
Source
तहलका, अगस्त 2013
महाराष्ट्र के मेंढा गांव का उदाहरण बताता है कि स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ आजीविका का अवसर मिले तो नक्सलवाद से जूझते इलाकों में खुशहाली का नया अध्याय शुरू हो सकता है..

देवाजी टोफा वह शख्स हैं जिन्होंने अधिकारों के लिए इस क्रांति की अलख जगाई थी। अंग्रेजों ने 1927 में भारतीय वन अधिनियम बनाकर एक तरह से जंगल पर निर्भर समाज को उससे बेदखल कर दिया था। 2006 में केंद्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून पास करने के साथ ही यह अधिकार एक बार फिर से बहाल हुआ। लेकिन हक की यह बहाली सिर्फ फाइलों में हुई थी। वन विभाग के अधिकारियों ने मेंढावासियों को उनका हक देने की राह में जमकर रोड़े अटकाए, मेंढा के पास बांस का अकूत भंडार था। इसके अलावा उसके 1,800 हेक्टेयर के जंगलों में चिरौंजी, महुआ, तेंदू पत्ता, हर्र, बरड़ आदि भी खूब होते हैं। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली की सबसे बड़ी पहचान फिलहाल यही है कि यह नक्सल प्रभावित जिला है। आदिवासी और जंगल की बहुलता वाले इस जिले की धनौरा तहसील में एक गांव है मेंढा। मेंढा और लेखा नाम के दो टोलों का यह गांव देखने में कहीं से भी विशेष नहीं लगता। लेकिन अपनी करनी से इसने वह मिसाल कायम की है जिसमें नक्सलवाद से जूझते देश के कई इलाकों में खुशहाली का एक नया अध्याय कैसे शुरू हो, इसका संकेत छिपा है। मेंढा के नाम दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं। यह देश का पहला गांव है जिसने सामुदायिक वनाधिकार हासिल किया और जिसकी ग्राम सभा को ट्रांजिट परमिट (टीपी) रखने का अधिकार मिला। इस अधिकार ने गांववालों को अपने जंगल का बांस अपनी मर्जी से बेचने की आजादी दी है। इससे वे न सिर्फ स्वाभिमान के साथ आजीविका कमा रहे हैं बल्कि वनों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रहे हैं।

सबल, स्वावलंबी, अपने हित के फैसले खुद ले सकने वाला और स्वाभिमानी, महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की यही आत्मा थी। लेकिन विकास की आधुनिक परिभाषा में गांधी और उनके सिद्धांत पीछे छूटते गए।

नदी का व्यापार

Submitted by admin on Tue, 08/20/2013 - 13:58
Author
सुधीर गुप्ता
Source
कल्चर अनप्लग्ड
भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आविर्भाव हुआ। यदि मानव सभ्यता के विकास पर गौर करें तो इसका विकास नदियों के ही किनारे हुआ है।

प्रयास

जल संग्रहण तालाब के निर्माण से भरपूर उत्पादन - एक सफल गाथा 

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/18/2020 - 05:54
jal-sangrahan-talab-tal
Source
जल चेतना, खण्ड 7, अंक 2, जुलाई 2018, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की-247667
सिंचाई-तालाब ही कृषिजल का समाधान, प्रतीकात्मक फोटो: Needpix.com
तालाब हेतु खोदी हुई मिट्टी का उपयोग श्री चौधरी के खेतों में बने निचले, असमतल क्षेत्रों में भरकर उन्हें एक समतल-आकार देने का प्रयास किया गया। साथ ही अन्य मिट्टी का उपयोग खेतों की पहुंच सड़कों ठीक करने में लिया गया। कड़ी मेहनत के बाद मई माह में तालाब निर्मित हुआ और उसका आकार 1 हेक्टेयर में होकर उसमें लगभग 80000 घन मीटर पानी का संग्रहण किया जा सकता था। चूँकि इस तालाब में प्राकृतिक निकास मार्ग (जो कि मुख्य राजमार्ग से लगा हुआ था) से जल का प्रवेश तालाब में कराया गया था, इस कारण अतिरिक्त निकास द्वार न बनाकर ऐसा प्रयास किया गया कि तालाब भरने के उपरान्त पुनः जल अपवाह अपने प्राकृतिक निकास मार्ग से आगे चला जाए।

नोटिस बोर्ड

वेबिनारः कोरोना संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 15:04
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वेबिनारः कोरोनार संकट और लाॅकडाउन हिमालय के परिप्रेक्ष में 
कोरोना संकट और लॉकडाउन को हिमालय क्षेत्र के परिप्रेक्ष में समझने के लिए 21 मई, गुरुवार 4 बजे हमारे पेज Endangered Himalaya में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के साथ लाइव बातचीत में जुड़ें।  आप Zoom में https://bit.ly/2zmjhHs लिंक में पंजीकरण करके भी जुड़ सकते हैं। इसका आयोजन हिम धारा और रिवाइटललाइज़िग रेनफेड एग्रीकल्चर द्वारा किया जा रहा है।

‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार

Submitted by HindiWater on Tue, 05/19/2020 - 14:52
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‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ पर वेबिनार
‘‘वाॅश फाॅर हेल्थी होम्स-भारत’’ विषय पर सहगल फाउंडेशन और सीएडब्ल्यूएसटी ऑनलाइन वर्कशाप का आयोजन करने जा रहा है। कार्यशाला का उद्देश्य वाॅश के प्रति लोगों को जागरुक करना और प्रेरित करना है। ये वेबिनार निन्मलिखित विषयों से संबंधित रहेगा - 

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि

Submitted by UrbanWater on Wed, 05/13/2020 - 11:11
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Source
पंकज मालवीय अक्षधा फाउंडेशन
पानी रे पानी
विश्व पर्यावरण दिवस – 5 जून 2020

ई-चित्रकला व गृह सज्जा प्रतियोगिता में भाग लें और जीते ₹ 1,51,000 पुरस्कार राशि |
प्रविष्टि रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि – 30 मई 2020
ई-प्रतियोगिता की तिथि – 5 जून 2020,
समय 10 बजे प्रात: से 4 बजे तक

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