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खासम-खास

Submitted by Editorial Team on Sun, 01/02/2022 - 13:06
आजाद बहती लोहित नदी, फोटो साभार : पेमा खांडू
नोडल विभाग की भूजल शाखा, साल में चार बार भूजल स्तर के परिवर्तन को दर्ज करती है। परिवर्तन के आधार पर भूजल दोहन के प्रतिशत को ज्ञात करती है। प्रतिशत के आधार पर विकासखंड़ों को सुरक्षित, सेमी-क्रिटिकल, क्रिटिकल और अतिदोहित श्रेणियों में विभाजित करती है लेकिन भूजल दोहन के कारण उत्पन्न होने वाले कुदरती जलचक्र के असन्तुलन, असन्तुलन के कुप्रभाव और उन कुप्रभावों को ठीक करने की रणनीति पर कोई काम नहीं करती। इसी कारण, पूरे देश में कुओं, नलकूपों, परकोलेशन तालाबों तथा नदियों के सूखने की समस्या का इलाज नहीं हो पा रहा है। इस बेरुखी के चलते अनेक लोग, अवैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर नदियों पर काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कुछ संगठन नदी के किनारे की गंदगी साफ कर रहे है। कुछ उसके पानी से प्लास्टिक या अन्य किस्म की बायलाजिकल गंदगी हटा रहे हैं।

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Submitted by admin on Wed, 06/03/2009 - 14:21
Source:

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में स्थित सागर द्वीप का निवासी बिप्लब मोंडल पिछले 25 वर्षों से एक शरणार्थी की तरह दिल्ली की गोविन्दपुरी नामक गंदी बस्ती में रह रहा है। पिछली बातों को याद करते हुए वह कहता है कि ‘मैं जब भी समुद्र को देखता था तो मुझे लगता था कि जैसे वह मेरे गांव में घुस आएगा।’ वह 1992 में दिल्ली में बस गया और दिहाड़ी पर काम करने लगा। साथ ही दिल्ली में बसने के लिए उसने मकान खरीदने के लिए बचत भी प्रारंभ कर दी। 17 वर्ष बाद बिप्लब की आशंका सही साबित हुई। उसके रिश्तेदारों ने बताया कि समुद्र ने धीरे-धीरे मेरे घर को डुबोना प्रारंभ कर दिया है और अब वहां घर जैसा कहने को कुछ भी नहीं बचा है।
Submitted by birendrakrgupta on Thu, 05/14/2009 - 10:08
Source:
Climate Change
हिमाचल सरकार ने पिछले दिनों क्लाईमेट चेंज पर नीति का मसौदा तैयार किया। विश्व भर में पिछले 5 वर्षों में शायद ही कोई और मुद्दा इतनी चर्चा और चिंतन का विषय रहा होगा जितना कि क्लाईमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन। और क्यों न हो जब यह विस्तृत रूप से साबित हो चुका है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान से आने वाले समय में बदलते और अपूर्वानुमेय मौसम, बाढ़, साईक्लोन अन्य आपदाएं और स्वास्थ्य समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी।

पृथ्वी के बढ़ते तापमान का मुख्य कारण है जीवाश्म इंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग जिससे कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में मात्रा हद से ज्यादा बढ़ जाती है। यह बात भी स्पष्ट हो चुकी है कि विश्व के अधिकांश देश एक ऐसी विकास प्रणाली अपना चुके हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित है।

अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे विकसित देश आर्थिक विकास की इस अंधी दौड़ में आगे हैं तो भारत और चीन जैसे विकासशील देश भी इसी विकास की परिभाषा को अपनाए हुए हैं। बड़े पैमाने पर खनन, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिकरण ही उपभोगवादी समाज और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था इस विकास का मुख्य आधार रहा है जिसके फलस्वरूप आज हमें इस संकट का सामना करना पड़ रहा है।

सामान्य समझ (common sense) के हिसाब से तो साफ जाहिर है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति कम करनी है तो उपभोगवादी विकास की धारा को बदलना ही होगा। परंतु क्लाईमेट चेंज की समस्या से जूझने के उपाय और प्रस्ताव जो मुख्यधारा में उभर कर आए हैं उन्हें देखकर लगता है कि अभी भी हम इस संकट की जड़ को पहचानने से कतरा रहे हैं।

इस संवाद में एक तरफ अमेरिका जैसे देश इस जिम्मेदारी से साफ मुकर, भारत और चीन की तरफ उंगली कर रहे हैं - जिनकी आज विश्व के सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है। वहीं दूसरी ओर भारत और चीन कहते हैं कि आर्थिक विकास “हमारा अधिकार है” और जो कि विकसित देशों का कार्बन उत्सर्ग अधिक है तो भरपाई की जिम्मेवारी पहले उनकी बनती है।

क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक चर्चाओं के बाद 1997 में जलवायु परिवर्तन पर ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ नामक समझौता अपनाया गया। समझौते के अनुसार विकसित एवं औद्योगिक देशों को 2012 तक अपने-अपने देशों के कार्बन उत्सर्ग में 95 प्रतिशत तक की कटौती करने पर प्रतिबद्ध किया गया। परंतु अमेरिका जैसे देश इससे पूरी तरह से मान्य नहीं थे और इससे बचने का भी उपाय निकाल लिया।

यह उपाय था क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) – जिसे कार्बन व्यापार के नाम से भी जाना जाता है। क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीडीएम का संचालन संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत स्थापित संस्था द्वारा किया जाता है।

भारत की सरकार और यहां की कंपनियों ने भी इस योजना का खुशी से स्वागत किया और देखते-ही-देखते सीडीएम परियोजना का दर्जा पाने के लिए प्रस्तावों की लाइन लग गई। इसमें मुख्यतः वह परियोजनाएं शामिल हैं जो किसी भी प्रकार का पुनर्चक्रण (recycling) या फिर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का प्रयोग कर रही हो। ऐसे उद्योगों के लिए सीडीएम बड़े फायदे का सौदा है क्योंकि इससे परियोजना की लागत में कमी होती है और नफा बढ़ जाता है। लगे हाथ ऐसी कंपनियों को पर्यावरण-अनुकूल (ईको-फ्रेंडली) होने का खिताब भी मिल जाता है। प्रत्यक्ष रूप से देखने पर यह व्यवस्था उचित जरूर लगती है। पर क्या वाकई में सीडीएम परियोजनाएं पर्यावरण के संरक्षण में भागीदारी दे रही हैं?

हमारे सामने आज सबसे बड़ा उदाहरण है जल विद्युत परियोजनाओं का जिन्हें जल जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत से बिजली पैदा करने के कारण सीडीएम सब्सिडी के लिए स्वीकृतियां मिल रही हैं। ऐसी कई परियोजनाएं हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं। अब यदि जल विद्युत परियोजनाओं की बात की जाए तो हिमाचल के किसी भी क्षेत्र से, जहां ये परियोजनाएं बनाई गई हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं, एक भयानक चित्र उभर कर निकलता है।

इस चित्र में टूटे-फूटे पहाड़, धंसती जमीन, बिना पानी की नदियां, उजड़ते खेतों और कटे हुए पेड़ों का नजारा मिलेगा। वहां रहने वाले लोगों से बात की जाए तो इन परियोजनाओं से उनके जीवन और आजीविकाओं के अस्त-व्यस्त होने की बेशुमार कहानियां भी मिलेंगी। कई वर्षों से स्थानीय समुदाय, पर्यावरण कार्यकर्ता और संगठन इन मुद्दों को लेकर जल विद्युत परियोजनाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

अचंभे की बात है कि निजी कंपनियां ऐसी परियोजनाओं के लिए क्लाईमेट चेंज (को रोकने) के नाम पर सीडीएम सब्सिडी पाकर नफा कमा रही हैं। भारत से ऐसी 102 जल विद्युत परियोजनाओं को सीडीएम के अंतर्गत मान्यता मिली है। इनके अलावा अंबूजा सीमेंट, टाटा स्टील, रिलायंस जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अन्य परियोजनाएं सीडीएम से फायदा उठा रही हैं।

इस पूरे विषय में दो बड़े चिंताजनक पहलू हैं। पहला यह कि जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या को केवल कार्बन उत्सर्ग तक सीमित कर इससे निपटने के लिए विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कार्बन व्यापार का बाजारू तरीका अपनाया है। दुनिया भर से पर्यावरणविदों और संस्थाओं ने इसका विरोध करते हुए अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्लाईमेट चेंज के मुद्दे को हाईजैक करने का आरोप लगाया है।

दूसरा यह कि भारत जैसे देश और स्थानीय उद्योग इस बाजार श्रृंखला का हिस्सा बन पर्यावरण संकट से भी लाभ के अवसर ढूंढ रहे हैं। एक पहाड़ी क्षेत्र और ग्लेशियर, नदियों, जंगलों जैसे संसाधनों से भरपूर होने के नाते शायद हिमाचल सरकार को अपनी क्लाईमेट चेंज नीति में यहां की प्रकृति धरोहर के संरक्षण के लिए रणनीति रखनी चाहिए थी। परंतु नीति के मसौदे में सीडीएम के अलावा और कोई बात नहीं। हिमाचल सरकार ने जल-विद्युत, परिवहन, सीमेंट उद्योग जैसे हर क्षेत्र में सीडीएम से फायदा उठाने की योजना बनाई है।

जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योग के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को जानते हुए आज हिमाचल सरकार न सिर्फ इन्हें बढ़ावा दे रही है बल्कि इनके लिए सीडीएम सब्सिडी दिलाने के भी पक्ष में है। मुख्यमंत्री जी, क्या आपको वाकई में लगता है कि सीडीएम और कार्बन के व्यापार से हिमाचल, ये देश और ये विश्व जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बच सकते हैं? या फिर जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योगों को सीडीएम सब्सिडी दिलवा के हम अपने पर्यावरण और भविष्य को और असुरक्षित बना रहे हैं?

Submitted by admin on Sat, 04/25/2009 - 19:44
Source:

वैश्विक धारा के प्रवाह को लेकर हुए एक व्यापक अध्ययन के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियां अपना पानी खो रहीं हैं. अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेयरिक रिसर्च के वैज्ञानिकों के नेतृत्व हुए इस अध्ययन के मुताबिक कई मामलों में प्रवाह के कम होने की वजह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है.

प्रयास

Submitted by Shivendra on Mon, 01/10/2022 - 12:07
सोलर पैनल और सोलर लिफ्टिंग कार्य
उत्तराखण्ड राज्य के पौडी जनपद के अर्न्तगत द्वाराीखाल ब्लाक का सुदूरवर्ती छोटा सा गांव पाली, सडक से लगभग 1 किमी0 दूरी पर बसा हुआ है।  इस गांव में पानी की किल्लत काफी थी जिसके चलते ज्यादातर परिवार शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए और शेष परिवार सड़क के नजदीक मष्टखाल या चैलूसैंण आ बसे।इस समय लगभग 13 परिवार ही गांव में निवास करते हैं।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 
Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
Source:
चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
Source:
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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खासम-खास

भारत की सूखती नदियाँ और बेखबरी का आलम

Submitted by Editorial Team on Sun, 01/02/2022 - 13:06
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
bharat-ki-sukhti-nadiyaan-or-bekhabari-ka-alam
आजाद बहती लोहित नदी, फोटो साभार : पेमा खांडू
नोडल विभाग की भूजल शाखा, साल में चार बार भूजल स्तर के परिवर्तन को दर्ज करती है। परिवर्तन के आधार पर भूजल दोहन के प्रतिशत को ज्ञात करती है। प्रतिशत के आधार पर विकासखंड़ों को सुरक्षित, सेमी-क्रिटिकल, क्रिटिकल और अतिदोहित श्रेणियों में विभाजित करती है लेकिन भूजल दोहन के कारण उत्पन्न होने वाले कुदरती जलचक्र के असन्तुलन, असन्तुलन के कुप्रभाव और उन कुप्रभावों को ठीक करने की रणनीति पर कोई काम नहीं करती। इसी कारण, पूरे देश में कुओं, नलकूपों, परकोलेशन तालाबों तथा नदियों के सूखने की समस्या का इलाज नहीं हो पा रहा है। इस बेरुखी के चलते अनेक लोग, अवैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर नदियों पर काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कुछ संगठन नदी के किनारे की गंदगी साफ कर रहे है। कुछ उसके पानी से प्लास्टिक या अन्य किस्म की बायलाजिकल गंदगी हटा रहे हैं।

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वैश्विक गर्मी और जलवायु शरणार्थी

Submitted by admin on Wed, 06/03/2009 - 14:21
Author
रिचर्ड महापात्र

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में स्थित सागर द्वीप का निवासी बिप्लब मोंडल पिछले 25 वर्षों से एक शरणार्थी की तरह दिल्ली की गोविन्दपुरी नामक गंदी बस्ती में रह रहा है। पिछली बातों को याद करते हुए वह कहता है कि ‘मैं जब भी समुद्र को देखता था तो मुझे लगता था कि जैसे वह मेरे गांव में घुस आएगा।’ वह 1992 में दिल्ली में बस गया और दिहाड़ी पर काम करने लगा। साथ ही दिल्ली में बसने के लिए उसने मकान खरीदने के लिए बचत भी प्रारंभ कर दी। 17 वर्ष बाद बिप्लब की आशंका सही साबित हुई। उसके रिश्तेदारों ने बताया कि समुद्र ने धीरे-धीरे मेरे घर को डुबोना प्रारंभ कर दिया है और अब वहां घर जैसा कहने को कुछ भी नहीं बचा है।

क्लाईमेट चेंज के नाम पर कार्बन का व्यापार

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 05/14/2009 - 10:08
Author
मांशी आशर
Climate Change
.हिमाचल सरकार ने पिछले दिनों क्लाईमेट चेंज पर नीति का मसौदा तैयार किया। विश्व भर में पिछले 5 वर्षों में शायद ही कोई और मुद्दा इतनी चर्चा और चिंतन का विषय रहा होगा जितना कि क्लाईमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन। और क्यों न हो जब यह विस्तृत रूप से साबित हो चुका है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान से आने वाले समय में बदलते और अपूर्वानुमेय मौसम, बाढ़, साईक्लोन अन्य आपदाएं और स्वास्थ्य समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी।

पृथ्वी के बढ़ते तापमान का मुख्य कारण है जीवाश्म इंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग जिससे कार्बन डाइऑक्साइड की वायु में मात्रा हद से ज्यादा बढ़ जाती है। यह बात भी स्पष्ट हो चुकी है कि विश्व के अधिकांश देश एक ऐसी विकास प्रणाली अपना चुके हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित है।

अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे विकसित देश आर्थिक विकास की इस अंधी दौड़ में आगे हैं तो भारत और चीन जैसे विकासशील देश भी इसी विकास की परिभाषा को अपनाए हुए हैं। बड़े पैमाने पर खनन, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिकरण ही उपभोगवादी समाज और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था इस विकास का मुख्य आधार रहा है जिसके फलस्वरूप आज हमें इस संकट का सामना करना पड़ रहा है।

सामान्य समझ (common sense) के हिसाब से तो साफ जाहिर है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति कम करनी है तो उपभोगवादी विकास की धारा को बदलना ही होगा। परंतु क्लाईमेट चेंज की समस्या से जूझने के उपाय और प्रस्ताव जो मुख्यधारा में उभर कर आए हैं उन्हें देखकर लगता है कि अभी भी हम इस संकट की जड़ को पहचानने से कतरा रहे हैं।

इस संवाद में एक तरफ अमेरिका जैसे देश इस जिम्मेदारी से साफ मुकर, भारत और चीन की तरफ उंगली कर रहे हैं - जिनकी आज विश्व के सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है। वहीं दूसरी ओर भारत और चीन कहते हैं कि आर्थिक विकास “हमारा अधिकार है” और जो कि विकसित देशों का कार्बन उत्सर्ग अधिक है तो भरपाई की जिम्मेवारी पहले उनकी बनती है।

क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक चर्चाओं के बाद 1997 में जलवायु परिवर्तन पर ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ नामक समझौता अपनाया गया। समझौते के अनुसार विकसित एवं औद्योगिक देशों को 2012 तक अपने-अपने देशों के कार्बन उत्सर्ग में 95 प्रतिशत तक की कटौती करने पर प्रतिबद्ध किया गया। परंतु अमेरिका जैसे देश इससे पूरी तरह से मान्य नहीं थे और इससे बचने का भी उपाय निकाल लिया।

यह उपाय था क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) – जिसे कार्बन व्यापार के नाम से भी जाना जाता है। क्लीन डेवेलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) एक ऐसा तंत्र है जिसके अनुसार जो विकसित देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय की गई निर्धारित कार्बन उत्सर्ग सीमा को लांघ रहे हैं और अपने देश में कार्बन उत्सर्ग कम नहीं कर रहे वह विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर सकते हैं जो कार्बन उत्सर्ग को कम करके ऊर्जा का संरक्षण करती हो। इसका अर्थ यह है कि ऐसे देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्ग कम करने की आवश्यकता नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीडीएम का संचालन संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत स्थापित संस्था द्वारा किया जाता है।

भारत की सरकार और यहां की कंपनियों ने भी इस योजना का खुशी से स्वागत किया और देखते-ही-देखते सीडीएम परियोजना का दर्जा पाने के लिए प्रस्तावों की लाइन लग गई। इसमें मुख्यतः वह परियोजनाएं शामिल हैं जो किसी भी प्रकार का पुनर्चक्रण (recycling) या फिर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का प्रयोग कर रही हो। ऐसे उद्योगों के लिए सीडीएम बड़े फायदे का सौदा है क्योंकि इससे परियोजना की लागत में कमी होती है और नफा बढ़ जाता है। लगे हाथ ऐसी कंपनियों को पर्यावरण-अनुकूल (ईको-फ्रेंडली) होने का खिताब भी मिल जाता है। प्रत्यक्ष रूप से देखने पर यह व्यवस्था उचित जरूर लगती है। पर क्या वाकई में सीडीएम परियोजनाएं पर्यावरण के संरक्षण में भागीदारी दे रही हैं?

हमारे सामने आज सबसे बड़ा उदाहरण है जल विद्युत परियोजनाओं का जिन्हें जल जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत से बिजली पैदा करने के कारण सीडीएम सब्सिडी के लिए स्वीकृतियां मिल रही हैं। ऐसी कई परियोजनाएं हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं। अब यदि जल विद्युत परियोजनाओं की बात की जाए तो हिमाचल के किसी भी क्षेत्र से, जहां ये परियोजनाएं बनाई गई हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं, एक भयानक चित्र उभर कर निकलता है।

जलवायु परिवर्तनइस चित्र में टूटे-फूटे पहाड़, धंसती जमीन, बिना पानी की नदियां, उजड़ते खेतों और कटे हुए पेड़ों का नजारा मिलेगा। वहां रहने वाले लोगों से बात की जाए तो इन परियोजनाओं से उनके जीवन और आजीविकाओं के अस्त-व्यस्त होने की बेशुमार कहानियां भी मिलेंगी। कई वर्षों से स्थानीय समुदाय, पर्यावरण कार्यकर्ता और संगठन इन मुद्दों को लेकर जल विद्युत परियोजनाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

अचंभे की बात है कि निजी कंपनियां ऐसी परियोजनाओं के लिए क्लाईमेट चेंज (को रोकने) के नाम पर सीडीएम सब्सिडी पाकर नफा कमा रही हैं। भारत से ऐसी 102 जल विद्युत परियोजनाओं को सीडीएम के अंतर्गत मान्यता मिली है। इनके अलावा अंबूजा सीमेंट, टाटा स्टील, रिलायंस जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अन्य परियोजनाएं सीडीएम से फायदा उठा रही हैं।

इस पूरे विषय में दो बड़े चिंताजनक पहलू हैं। पहला यह कि जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या को केवल कार्बन उत्सर्ग तक सीमित कर इससे निपटने के लिए विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कार्बन व्यापार का बाजारू तरीका अपनाया है। दुनिया भर से पर्यावरणविदों और संस्थाओं ने इसका विरोध करते हुए अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्लाईमेट चेंज के मुद्दे को हाईजैक करने का आरोप लगाया है।

दूसरा यह कि भारत जैसे देश और स्थानीय उद्योग इस बाजार श्रृंखला का हिस्सा बन पर्यावरण संकट से भी लाभ के अवसर ढूंढ रहे हैं। एक पहाड़ी क्षेत्र और ग्लेशियर, नदियों, जंगलों जैसे संसाधनों से भरपूर होने के नाते शायद हिमाचल सरकार को अपनी क्लाईमेट चेंज नीति में यहां की प्रकृति धरोहर के संरक्षण के लिए रणनीति रखनी चाहिए थी। परंतु नीति के मसौदे में सीडीएम के अलावा और कोई बात नहीं। हिमाचल सरकार ने जल-विद्युत, परिवहन, सीमेंट उद्योग जैसे हर क्षेत्र में सीडीएम से फायदा उठाने की योजना बनाई है।

जलवायु परिवर्तनजल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योग के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को जानते हुए आज हिमाचल सरकार न सिर्फ इन्हें बढ़ावा दे रही है बल्कि इनके लिए सीडीएम सब्सिडी दिलाने के भी पक्ष में है। मुख्यमंत्री जी, क्या आपको वाकई में लगता है कि सीडीएम और कार्बन के व्यापार से हिमाचल, ये देश और ये विश्व जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बच सकते हैं? या फिर जल विद्युत परियोजनाओं और सीमेंट उद्योगों को सीडीएम सब्सिडी दिलवा के हम अपने पर्यावरण और भविष्य को और असुरक्षित बना रहे हैं?

खतरे के दौर से गुजर रहीं बडी नदियां

Submitted by admin on Sat, 04/25/2009 - 19:44
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नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेयरिक रिसर्च

वैश्विक धारा के प्रवाह को लेकर हुए एक व्यापक अध्ययन के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियां अपना पानी खो रहीं हैं. अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेयरिक रिसर्च के वैज्ञानिकों के नेतृत्व हुए इस अध्ययन के मुताबिक कई मामलों में प्रवाह के कम होने की वजह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है.

प्रयास

पाली सोलर लिफ्टिंग योजना: एक साझा अनुभव

Submitted by Shivendra on Mon, 01/10/2022 - 12:07
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लोक विज्ञान संस्थान,देहरादून
सोलर पैनल और सोलर लिफ्टिंग कार्य
उत्तराखण्ड राज्य के पौडी जनपद के अर्न्तगत द्वाराीखाल ब्लाक का सुदूरवर्ती छोटा सा गांव पाली, सडक से लगभग 1 किमी0 दूरी पर बसा हुआ है।  इस गांव में पानी की किल्लत काफी थी जिसके चलते ज्यादातर परिवार शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए और शेष परिवार सड़क के नजदीक मष्टखाल या चैलूसैंण आ बसे।इस समय लगभग 13 परिवार ही गांव में निवास करते हैं।

नोटिस बोर्ड

जल संसाधन प्रबंधन पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

Submitted by Shivendra on Mon, 12/06/2021 - 14:01
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 एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन
इंडिया वाटर पार्टनरशिप द्वारा जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड में जल संसाधानों की क्षमता को बढ़ाने को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम जल संसाधनो पर काम कर रहे राज्य के तमाम सरकारी विभागों संस्था और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा। इंडिया वाटर पार्टनरशिप मैनजमेंट (IWRM)  की इस उत्साहपूर्वक पहल से राज्य सरकार को पानी को लेकर हालही की चुनौतियों और हर क्षेत्र में उसका सही इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी। 

चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

Submitted by Editorial Team on Thu, 10/07/2021 - 11:03
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चार‌ ‌दिवसीय‌ ‌सिनेमा‌ ‌कार्यशाला‌ (18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर 2021‌)

अभी‌ ‌तक‌ ‌हम‌ ‌अलग‌ ‌–अलग‌ ‌माध्यमों‌ ‌पर‌ ‌तरह‌ ‌–तरह‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌देखते‌ ‌आये‌ ‌हैं.‌ ‌क्या‌ ‌आपने‌ ‌कभी‌ ‌सोचा‌ ‌है‌ ‌कि‌ ‌जो‌ ‌सिनेमा‌ ‌हमें‌ ‌देखने‌ ‌को‌ ‌मिलता‌ ‌रहा‌ ‌है‌ ‌क्या‌ ‌उसके‌ ‌अलावा‌ ‌भी‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌कोई‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌है.‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌भी‌ ‌कि‌ ‌सिनेमा‌ ‌की‌ ‌अलग‌ ‌दुनिया‌ ‌से‌ ‌आपका‌ ‌भी‌ ‌रिश्ता‌ ‌बन‌ ‌सकता‌ ‌है। दोस्तों,‌ ‌प्रतिरोध‌ ‌का‌ ‌सिनेमा‌ ‌अभियान‌ ‌सम्भावना‌ ‌ट्रस्ट‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌मिलकर‌ ‌आगामी‌ ‌18‌ ‌से‌ ‌21‌ ‌नवम्बर‌ ‌हिमांचल‌ ‌के‌ ‌पालमपुर‌ ‌शहर‌ ‌में‌ ‌चार‌ ‌दिनी‌ ‌वर्कशॉप‌ ‌आयोजित‌ ‌कर‌ ‌रहा‌ ‌है‌। ‌जिसके‌ ‌लिए‌ ‌हम‌ ‌आपको‌ ‌न्योता‌ ‌दे‌ ‌रहे‌ ‌हैं।

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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Source
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

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